Friday, December 26, 2008

साजिश की सोच के सरोकार


सत्येंद्र रंजन
मुंबई पर आतंकवादी हमले के कुछ ही दिन के भीतर ये चर्चा कई हलकों में सुनी जानी लगी कि इस हमले के पीछे हिंदू-यहूदी चरमपंथियों और अमेरिका का हाथ है। जी नहीं, हम पाकिस्तान के मीडिया की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात भारत के उन समूहों की बात कर रहे हैं, जो अपने को न सिर्फ प्रगतिशील, बल्कि क्रांतिकारी भी मानते हैं। ये मुमकिन है कि ऐसे मौकों पर कॉरपोरेट मीडिया में अंधराष्ट्रवाद की जो लहर आती है, उससे बेचैन हो जाते हों और एक दूसरे चरम पर जाकर उतनी ही विवेकहीन प्रतिक्रिया जताने लगते हों। बहरहाल, यह साफ कि ऐसी प्रतिक्रिया विशुद्ध रूप से भावनात्मक होती है, और उससे तर्क-वितर्क की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। इसके बावजूद ऐसी सोच पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। इसलिए कि भले ही साजिश के ऐसे सिद्धांत हाशिये पर ही रहते हों, लेकिन यह उन लोगों का समूह है, जो मौजूदा व्यवस्था का विकल्प उपलब्ध कराने का भ्रम रखते हैं और ऐसा ही दावा करते हैं।

वर्षों के अनुभव से यह समझ अब ठोस रूप ले चुकी है कि राजनीति के व्यापक दायरे में जो बहुत सी बातें कही जाती हैं, उनका सबका आधार राजनीतिक और वैचारिक या विचारधारात्मक रुख नहीं होता। बल्कि बहुत से सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के रुख या सार्वजनिक बयानों का आधार दरअसल मनोवैज्ञानिक होता है। कोई भी क्रांतिकारी या प्रगतिशील विचारधारा जहां समाज और उसके विकासक्रम की वस्तुगत समझ पर आधारित होती है, वहीं कुछ संदर्भों में विरोध का मनोविज्ञान ऐसी जटिल प्रक्रियाओं और परिस्थितियों को समझ सकने की अक्षमता का भी परिचायक होता है। ऐसी अक्षमता के शिकार समूहों में, जिस बात को ज्यादातर लोग मानते हों, वैसी हर बात को नकारने और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति सहज देखी जा सकती है। यह ऐसा मनोविज्ञान इस बन जाता है, जिसमें सबसे अलग रुख लेना और उसमें ही अपनी सार्थकता समझना आम हो जाता है। जाहिर है, इसमें विवेक और जिम्मेदारी की भावना की बलि चढ़ा दी जाती है।

मुंबई के हमलों के पीछे हिंदू-यहूदी चरमपंथियों और अमेरिका का हाथ देखना सिर्फ इसी मनोविज्ञान की अभिव्यक्ति है। और चूंकि ये लोग भारत में रहते हैं, जहां मीडिया और शासक समूहों ने पहले के अनेको मौकों की तरह मुंबई पर हमलों के फौरन बाद भी पाकिस्तान विरोधी माहौल बना दिया, इसलिए एक दूसरे चरम पर जाकर पाकिस्तान से सहानुभूति रखना का अपना फर्ज उन्होंने इस मौके पर भी निभाया है। इसी मानसिकता का एक और इजहार अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के हेमंत करकरे के बारे में दिए गैर जिम्मेदाराना बयान का बचाव भी है, जिसमें इस समूह के लोगों ने अपनी धर्मनिरपेक्षता की प्रखरता देखी।

जबकि प्रगतिशीलता औऱ धर्मनिरपेक्षता का तकाजा यह है कि मुंबई पर हमलों को धार्मिक कट्टरपंथ और आतंकवाद के लगातार बढ़ रहे खतरे के संदर्भ में देखा जाए। हमलावर पाकिस्तान से आए, इसमें शायद ही कोई संदेह है। लेकिन इसमें पाकिस्तान सरकार का कोई हाथ है, यह शक करने की शायद ही कोई वजह है। बल्कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के इस बयान पर सहज भरोसा किया जा सकता है कि हमले के पीछे नॉन स्टेट ऐक्टर्स (यानी ऐसे लोग जिन पर सरकार का नियंत्रण नहीं है) शामिल थे। उन नॉन स्टेट ऐक्टर्स पर काबू पाना और उनके आतंकवादी ढांचे को खत्म करना निसंदेह पाकिस्तान सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यह काम कठिन और पेचीदा है, इसे हम सभी जानते हैं। बेहतर होता, अगर इस बात को ध्यान में रखते हुए सारी चर्चा होती।

अगर ऐसा होता तो भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत लंबे इंतजार और बड़ी मेहनत से शुरू हो सकी शांति प्रक्रिया आतंकवादियों की मंशा के मुताबिक मुंबई हमलों का शिकार नहीं होती। भारत और पाकिस्तान दोनों का दीर्घकालिक हित इस शांति प्रक्रिया की सफलता से जुड़ा है। यह शांति प्रक्रिया संभवतः पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे के खत्म होने और इस्लामी कट्टरपंथ एवं फौज का गठबंधन टूटने की एक अनिवार्य शर्त भी है।

आज प्रगतिशाली समूहों की जिम्मेदारी इसी बात पर जोर देने की है। पाकिस्तान से जंग न सिर्फ परिस्थितियों को और उलझा देगी, बल्कि उससे भारत के लिए कहीं ज्यादा बड़े खतरे पैदा हो जाएंगे। दूसरी तरफ शांति प्रक्रिया धीरे-धीरे आतंक के उस आधार को खत्म कर सकती है, जिससे मुंबई जैसे हमलों को अंजाम देना मुमकिन होता रहा है। लेकिन बीच की अवधि में यह भी जरूरी है कि पाकिस्तान सरकार पर कट्टरपंथ और आतंकवादी ढांचे पर कार्रवाई करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ाया जाए। मुंबई हमलों के बाद इस दिशा में भारत सरकार ने जो पहल की है, वो काफी हद तक सही रास्ते पर है।

उन्नीसवीं सदी के अंत और पूरी बीसवीं सदी में भारत के जिस विचार का उदय हुआ, मजहबी कट्टरपंथ हमेशा उसका एक प्रतिवाद (एंटी-थीसीस) रहा है। हिंदू और इस्लामी कट्टरपंथ ने बीसवीं सदी के आरंभ से उस भारत को चुनौती दी जो दादा भाई नौरोजी, रवींद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसे नेताओं की वैचारिक छत्रछाया में उभर रहा था, और जिसे समृद्ध बनाने में बहुत से वामपंथी मनीषियों ने बहुमूल्य योगदान दिया। भारत का वह विचार- जिसे मानव गरिमा, समता और स्वतंत्रता के आधुनिक सिद्धांतों के आधार पर विकसित किया गया। मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक ताकतों ने साम्राज्यवाद से मिल कर इसी विचार के विरोध में दो राष्ट्र के सिद्धांत को न सिर्फ पेश किया, बल्कि उसके आधार पर देश के विभाजन की परिस्थिति भी पैदा की। आजादी के बाद भी ऐसी ताकतों से इस भारत को लगातार चुनौती मिली है। १९८०-९० के दशक में सिख कट्टरपंथियों ने भारत की एकता के लिए गंभीर खतरा पेश किया।

आज विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या जनता के ज्यादातर समूहों के हित भारत के आधुनिक विचार के साथ जुड़े हैं या संवैधानिक जनतंत्र के सहारे विकसित हो रहे भारत को कमजोर करने से अधिकांश जनता का हित सधेगा? और जो ताकतें इस भारत को कमजोर करना चाहती हैं, क्या उनका मकसद किसी भी प्रगतिशील विचारधारा से मेल खाता है? कट्टरपंथी और आतंकवादी- चाहे वो हिंदू हों या मुस्लिम या फिर सिख या ईसाई- इंसान की मूलभूत स्वतंत्रता और बुनियादी मानवाधिकारों को मजबूती प्रदान करने वाली शक्तियां हैं या वो इन लक्ष्यों के हासिल करने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हैं? अगर उनके वर्ग चरित्र पर गौर करें तो क्या वे वंचित तबकों के हितों की नुमाइंदगी करती हैं या उनकी पीठ पर ऐसे तबकों का हाथ है, जिनका सीधा टकराव प्रगतिशील व्यवस्थाओं से है?

अगर इस सवालों पर वस्तुगत नजरिए से सोचा जाए तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि दुनिया अभी विकासक्रम की जिस अवस्था में है, उसमें भारत की राज्य-व्यवस्था का हर हाल में विरोध न तो क्रांतिकारिता है और न ही इससे किसी प्रगतिशील उद्देश्य की प्राप्ति होती है। ऐसे उद्देश्यों की प्राप्ति की सबसे पहली शर्त- विरोध और समर्थन के मुद्दों की तार्किक ढंग से पहचान है। अगर इस पहचान में हम सक्षम हो जाएं तो हर जगह साजिश के हवाई सिद्धांत गढ़ने की हमें जरूरत नहीं रहेगी। बहरहाल, यह तो साफ है कि ऐसी साजिश की सोच का कोई बड़ा सरोकार नहीं है। बल्कि यह बड़े सरोकारों के खिलाफ है।

Friday, December 19, 2008

वीपी सिंहः एक श्रद्धांजलि


सत्येंद्र रंजन
मुंबई में आतंकवादी हमले के सदमे और शोर के बीच भारत की एक अहम राजनीतिक शख्सियत दुनिया से उठ गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह के निधन की खबर को भारतीय राष्ट्र पर मंडराते उस गंभीर संकट के बीच महसूस तो किया गया, लेकिन उस माहौल में इस पर चर्चा नहीं हो सकी। बहरहाल, वीपी सिंह ऐसी क्षणिक चर्चा के मोहताज नहीं थे। भारतीय राजनीति पर उनका असर कहीं दीर्घकालिक और दूरगामी है।

आम तौर पर वीपी सिंह को मंडल मसीहा के रूप में याद किया जाता है। यह नाम उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए अन्य पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के उनके फैसले की वजह से मिला। यह एक ऐतिहासिक फैसला था और आज इस मुद्दे पर देश में राजनीतिक आम सहमति है, तब उस कदम के महत्त्व को कहीं बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। वीपी सिंह ने जब मंडल आयोग की सिफारिश को लागू किया, तो उनके मकसद और तरीके पर कई सवाल उठे। उस फैसले के खिलाफ सवर्ण जातियों की घोर प्रतिक्रिया हुई। मोटे तौर पर इन्हीं जातियों से आने वाले अभिजात्य और शहरी मध्य वर्ग हमेशा के लिए उनके खिलाफ हो गए। कारपोरेट मीडिया में उनकी जो खलनायक की छवि बनी, वह उनकी मृत्यु के दिन तक खत्म नहीं हुई।

लेकिन इस कदम ने देश की राजनीति का स्वरूप ही बदल दिया। पूरे उत्तर भारत में व्यापक जन समुदाय की सोयी हुई राजनीतिक आकांक्षाएं इससे जिस तरह जगीं और उससे जिस नई राजनीतिक ऊर्जा का संचार हुआ, उसका असर आज सहज देखने को मिलता है। इससे देश की राजनीतिक व्यवस्था ज्यादा लोकतांत्रिक और ज्यादा प्रातिनिधिक बनी। इसकी प्रतिक्रिया में यथास्थितिवादी ताकतें भी गोलबंद हुईं, जिससे दक्षिणपंथी राजनीति को नई ताकत मिली और उनका ज्यादा उग्र रूप देखने को मिला। इन दोनों परिघटनाओं से जो सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ, वह आज भी जारी है।

इसी संघर्ष का परिणाम है कि वीपी सिंह को लेकर देश में दो परस्पर विरोधी धारणाएं हैं। देश का एक तबका उन्हें आधुनिक भारतीय राष्ट्र के मूलभूत आधार- सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता- के प्रतीक के रूप में देखता है, तो दूसरी तरफ बहुत से लोगों के लिए वो नफ़रत के पात्र हैं। ऐसे लोग उन पर समाज को तोड़़ने और जातीय विद्वेष पैदा करने का इल्ज़ाम लगाते हैं। संभवतः परस्पर विरोधी दो ऐसी उग्र धारणाएं हाल के इतिहास में किसी और नेता के लिए नहीं रही। और यही वीपी सिंह की प्रासंगिकता है।

बहरहाल, वीपी सिंह मंडल मसीहा बाद में बने। ऐसा मसीहा बनने की हैसियत उन्होंने इसके पहले बगैर इस मुद्दे पर राजनीति किए हासिल की थी। यानी इसके पहले उन्होंने अपनी ऐसी हैसियत बनाई, जिससे वे प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच सके। यह यात्रा डेढ़- पौने दशक से ज्यादा की नहीं थी। इस दौरान उनका सारा प्रभामंडल दो पहलुओं से बना- सत्ता का मोह और भ्रष्ट न होने की छवि। १९८० में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बने तो राज्य को उन्होंने डाकुओं से मुक्ति दिलाने का वादा किया, जिनका उन दिनों, खासकर चंबल के इलाके में भारी आतंक था। दो साल में ऐसा नहीं कर पाए तो इस्तीफा पेश कर दिया। राजीव गांधी के शासनकाल में वित्त मंत्री बने तो देश के बड़े उद्योगपतियों पर कर चोरी के आरोप में छापे डलवाने का एक सिलसिला चलाया। इससे उद्योग जगत का इतना दबाव पड़ा कि राजीव गांधी ने उनसे वित्त मंत्रालय छीन कर उन्हें रक्षा मंत्री बना दिया। यह कदम राजीव गांधी को बेहद महंगा पड़ा, क्योंकि अब वीपी सिंह ने रक्षा सौदों में होने वाले भ्रष्टाचार पर नकेल कसनी शुरू कर दी। इससे एचडीडब्लू पनडुब्बी और बोफोर्स जैसे विवाद उठे, जिससे राजीव गांधी और कांग्रेस की एकछत्र सत्ता की बुनियाद हिल गई।

जब बतौर वित्त मंत्री वीपी सिंह उद्योगपतियों पर निशाना साधे हुए थे, तब उन्होंने एक गौरतलब बात कही थी। उन्होंने कहा था कि इस देश में जैसे एक गरीबी रेखा है, वैसे ही एक ‘जेल रेखा’ भी है। इस देश में एक खास सीमा से ज्यादा आमदनी वाला व्यक्ति जेल नहीं जाता है, चाहे वह कैसा भी अपराध करे। तब वीपी सिंह ने कहा था कि उनका मकसद कानून के दायरे को इस ‘जेल रेखा’ से ऊपर रहने वाले लोगों को पहुंचाना है। रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार को सबसे अहम राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। जाहिर है, ऐसे मुद्दों के आधार पर जब उन्होंने एक बार फिर इस्तीफे को औजार बनाया, राजीव गांधी की सरकार छोडी तथा उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया तो वे कांग्रेस विरोधी गठबंधन के स्वाभाविक नेता बन गए।

इसके बाद वीपी सिंह ने जिस सरकार का नेतृत्व किया, वह इस लिहाज से अजूबा थी कि वह एक साथ वामपंथी दलों और लगातार उग्र सांप्रदायिक रूप अपना रही भारतीय जनता पार्टी के समर्थन पर निर्भर थी। खुद वीपी सिंह की अपनी पार्टी, यानी जनता दल भी महत्त्वाकांक्षी एवं सत्ता लोलुप नेताओं के एक जमावड़े से ज्यादा कुछ नहीं था। यह सरकार ज्यादा दिन नहीं टिक सकती थी, यह बात शुरू से साफ थी। एक ऐसी अस्थिर और अल्पकालिक सरकार के साथ वीपी सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट पर अमल जैसा स्थायी महत्त्व का कदम उठाया और लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा को रोकते हुए धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के मुद्दे पर अपनी सरकार गिरने दी, यह उनकी सियासी चतुराई भी कही जा सकती है, लेकिन इससे एक ऐसी राजनीतिक पहल हुई, जिसने वीपी सिंह को लंबे समय तक के लिए प्रासंगिक बना दिया।

बहरहाल, वीपी सिंह जब दुनिया से विदा हुए हैं, उस वक्त अगर सामाजिक न्याय के सवाल को छोड़ दें तो राजनीति की स्वच्छता, भ्रष्टाचार का खात्मा, और धर्मनिरपेक्षता को सुरक्षित बनाने जैसे वो तमाम मुद्दे जहां के तहां नजर आते हैं, जिन्हें वीपी सिंह ने उठाया और जिनके आधार पर वो राजनीति में आगे बढ़े। इसे वीपी सिंह की नाकामी माना जा सकता है। या, यह कहा जा सकता है कि वे भी एक ऐसे राजनेता थे, जो जनता का मूड भांप कर मुद्दे उठाता था और उसका फायदा उठा कर आगे बढ़ जाता था। उसे अंजाम तक पहुंचाने की फिक्र उसे नहीं होती थी। यह हकीकत है कि इसके लिए उन्होंने संगठित ढंग से काम करने का प्रयास कभी नहीं किया। यह भी कहा जा सकता है कि मंडल का मंत्र भी उन्होंने एक खास परिस्थिति में ग्रहण किया, वह कोई उनकी बुनियादी निष्ठा नहीं थी। इन तथ्यों की रोशनी में वीपी सिंह को सस्ती जनप्रियता की राजनीति करने वाले एक नेता के रूप में भी देखा जा सकता है, जो मौजूदा व्यवस्था का ही एक हिस्सा थे।

इसके बावजूद कुछ विशेषताएं वीपी सिंह को सबसे अलग करती थीं। सत्ता को दांव पर लगाने का साहस और अलोकप्रिय होने का जोखिम उठाते हुए भी विवादास्पद फैसले की हिम्मत उन्हें एक खास छवि देती थी। एकांत पसंद निजी जिंदगी में कला और कविता को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने वाली इस शख्सियत के लिए सियासत में ऐसा करना मुमकिन होता रहा। और तभी एक बार वे प्रधानमंत्री पद की कुर्सी को ठुकरा सके और बतौर नागरिक की अपनी भूमिका में प्रासंगिक बने रह सके। गौरतलब है कि १९९६ में जब संयुक्त मोर्चा का प्रयोग हुआ तो उस समय वीपी सिंह इसके स्वाभाविक नेता थे। प्रधानमंत्री की कुर्सी एक बार फिर उनके सामने थी। लेकिन तब उन्होंने सचमुच यह दिखाया कि सत्ता का उनमें तुच्छ मोह नहीं है। दरअसल, इसके पहले ही वीपी सिंह अपनी भूमिका एक जागरूक नागरिक के रूप में सीमित चुके थे, जिसकी वजह से एक पत्रिका ने उन्हें ‘सिटीजेन सिंह’ नाम दिया था। इस भूमिका के साथ वीपी सिंह ने यह साबित किया कि राजनीति में सत्ता अहम और शायद सबसे अहम चीज होती है, लेकिन आखिरी चीज नहीं होती। सत्ता के बिना भी प्रासंगिक बने रहा जा सकता है, अगर आपके पास एक विचार और खास मकसद हो। यही वीपी सिंह का महत्त्व है।

Tuesday, November 18, 2008

मंदी में किधर जाएं?


सत्येंद्र रंजन
मेरिका के वित्तीय संकट के असर को नियंत्रित रखने के उपाय आखिरकार नाकाम रहे हैं और विश्व अर्थव्यवस्था को मंदी से बचा लेने की उम्मीद टूट गई है। यूरो ज़ोन कहे जाने वाले यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था में विकास दर नकारात्मक हो गई है और जल्द ही ऐसी ही खबर अमेरिका से मिलने का अनुमान भी लगाया जा रहा है। इसका असर दुनिया भर में है। उपभोक्ता अपने खर्चों में कटौती कर रहे हैं, इससे कंपनियों की बिक्री कम हो रही है और मुनाफा घट रहा है, इसकी वजह से कंपनियां अपना खर्च घटा रही हैं, और उसकी वजह से लोगों की नौकरियां जा रही हैं। लोगों की नौकरियां जाने से समाज में आमदनी घट रही है, जिससे उपभोग घट रहा है। यानी जिस दुश्चक्र को मंदी कहा जाता है, वह अपने पूरे रूप में सामने है और हर रोज आने वाली खबरें इस रूप का ज्यादा विकराल चेहरा पेश कर रही हैं।

अमेरिका में सितंबर वित्तीय संकट सामने आने के बाद से दुनिया भर की सरकारें इसके असर को काबू में रखने की कोशिश में जुटी रही हैं। मोटे तौर पर अब तक कोशिश बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को ज्यादा नकदी मुहैया कराने की रही है। साथ उनके लिए कर्ज देने की अनुकूल स्थितियां बनाई गई हैं। माना गया है कि कर्ज आसानी से उपलब्ध रहने पर कंपनियों के लिए एक तरफ निवेश की स्थिति बनी रहेगी, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ता मकान जैसे जायदाद में निवेश करने के साथ-साथ उपभोग की वस्तुएं भी खरीदते रहेंगे, जिससे उद्योग धंधों का कारोबार मंदा नहीं होगा और आर्थिक संकट के दुश्चक्र को रोका जा सकेगा। सबसे पहले अमेरिका ने इसके लिए ७०० अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज मंजूर किया। उसके बाद ब्रिटेन और दूसरे देश इस रास्ते पर बढ़े।

बुश प्रशासन के शुरुआती रुख (जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने नामंजूर कर दिया था) और ब्रिटिश सरकार के नजरिए में एक भारी फ़र्क यह था कि जहां बुश प्रशासन सीधे बैंकों और वित्तीय संस्थानों को हुए नुकसान की करदाताओं के धन से भरपाई के रास्ते पर चला, यानी उनकी कोई जवाबदेही तय करने की कोशिश नहीं की गई, वहीं ब्रिटिश सरकार ने बैंकों के शेयर खरीदने का रास्ता चुना। मतलब यह हुआ कि निजी बैंकों में स्थायी सरकारी हिस्सेदारी बना लेने का रास्ता अख्तियार किया गया। यानी वहां वित्त और अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का थैचरवादी दौर एक झटके में पलट गया है। अमेरिका में भी बुश प्रशासन को वित्त और पूंजी की बेलगाम स्वतंत्रता की नीति से कदम पीछे खींचने पड़े हैं।

हालांकि वैचारिक तौर पर बुश प्रशासन अपने इन आखिरी दिनों में भी मुक्त बाजार पूंजीवाद की खुल कर वकालत कर रहा है। वाशिंगटन में वित्तीय संकट पर हुए ग्रुप-२० देशों शिखर सम्मेलन से ठीक पहले बुश प्रशासन ने कहा- ‘आर्थिक समृद्धि के लिए ज्यादा बड़ा खतरा सरकार की कम भूमिका नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा भूमिका है।’ मौजूदा संकट के दौर में यह मुद्दा बेहद अहम होकर उभरा है कि आखिर अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र को कितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और सरकार का दखल कितना रहना चाहिए? बुश प्रशासन के नजरिए से साफ है कि मौजूदा संकट के संदर्भ में पिछले साठ साल में पूंजी और वित्त की पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत करने वाली ताकतें फिलहाल रक्षात्मक मुद्रा में जरूर हैं, लेकिन उन्होंने हथियार नहीं डाला है। दूसरी तरफ बुश प्रशासन से अलग रुख अपनाने वाली ब्रिटिश सरकार और यूरोप के दूसरे देश भी वैचारिक स्तर पर कोई वैकल्पिक रास्ता अपनाने को तैयार हैं, इसके संकेत अभी देखने को नहीं मिले हैं।

मौजूदा संकट को अक्सर आम बोलचाल में पूंजीवाद का संकट बताया जा रहा है। यह बेशक पूंजीवाद का संकट है, लेकिन अभी विमर्श में समाजवाद या कोई दूसरी व्यवस्था बतौर विकल्प मौजूद नहीं है। असल में सरकारी प्रयासों या वाशिंगटन शिखर सम्मेलन जैसे प्रयासों से समाजवाद की स्थापना हो भी नहीं सकती है। दरअसल, आर्थिक व्यवस्थाओं का स्वरूप उत्पादन की अवस्था और उत्पादक शक्तियों के संबंध से तय होता है और इन दोनों ही पहलुओं में समाज की मौजूदा वर्ग संरचना के तहत चुनी गईं सरकारें शायद ही कोई बदलाव ला सकती हैं। इसलिए फिलहाल मुद्दा पूंजीवाद के विकल्प की तलाश नहीं है। अभी सवाल उस नव-उदारवाद का भविष्य है, जिसने पिछले साठ साल में पूंजीवाद का सबसे बेलगाम और सबसे बेरहम रूप दुनिया के सामने पेश किया है।

इसलिए यह अनावश्यक नहीं है कि मौजूदा संकट के दौर में फ्रैंकलीन डेनालो रूजवेल्ट का नाम बार-बार चर्चा में आया है। १९२९ की महामंदी के बाद रूजवेल्ट राष्ट्रपति चुने गए थे और उन्हें अमेरिका को उस संकट से निकालने का श्रेय दिया जाता है। रूजवेल्ट कोई समाजवादी नहीं थे। उन्होंने जॉन मेनार्ड कीन्स के आर्थिक विचारों के मुताबिक संकट का हल निकालने की कोशिश की और उसमें कामयाब रहे। रूजवेल्ट की खूबी यह थी कि उन विचारों को अपनाने पर वो मजबूती से कायम रहे और इसके लिए उन्होंने दक्षिणपंथी रुझान वाले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से भी टक्कर ली। आखिरकार अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप के विचार को स्थापित किया।

रूजवेल्ट की इस सफलता के प्रतिवाद के रूप में ही अमेरिकी निजी पूंजी ने नव-उदारवाद के विचार के प्रसार में अपनी ताकत झोंकी। इसके लिए थिंक टैंक बनाए गए, मीडिया का इस्तेमाल किया गया और धीरे-धीर राजनीतिक संस्थाओं पर वर्चस्व कायम किया गया। १९९१ में सोवियत संघ के विघटन के बाद सारी दुनिया में यह विचारधारा तेजी से फैली। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में, जहां आजादी के बाद अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक नीतियों को खासी अहमियत दी गई, वहां भी १९९० के दशक में नव उदारवाद की लहर चल पड़ी। यह लहर इतनी जोरदार रही है कि इसमें उस नेहरुवाद को भी एक तरह से दफ़ना दिया गया, जिसकी बुनियाद पर नए भारतीय राष्ट्र की नींव डाली गई थी।

नव-उदारवाद की मूल बात यह है कि निजी पूंजी और बाजार की शक्तियों पर कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। दुनिया को इस नियंत्रणहीनता का परिणाम अब देखने को मिल रहा है। बाजार की शक्तियां स्वस्थ और ठोस विकास का कोई रास्ता तो नहीं निकाल सकीं, झूठे वायदों और अनुमानों पर बबूले पैदा करने की अर्थव्यवस्था उन्होंने जरूर खड़ी की जिसमें आए धन और पूंजी की लूट-खसोट की गई और अंत में उसका नतीजा भुगतने को सारी दुनिया को छोड़ दिया गया। बबूले बनने और फूटने का क्रम कई बार हुआ और आखिरकार अब वह संकट सामने आया है, जिसका हल निकालने में नव-उदारवादी ताकतें नाकाम नजर आ रही हैं। सवाल है कि क्या दुनिया भर की सरकारों में आज नव-उदारवाद की इस नाकामी को समझने और उसका विकल्प ढूढने का माद्दा है?

फिलहाल मुद्दा यह नहीं है कि पूंजीवाद रहेगा या नहीं। अभी मुद्दा यह है कि पूंजीवाद के भीतर कीन्स के आर्थिक विचारों और रूजवेल्ट के न्यू डील जैसी पहल की गुंजाइश है या नहीं? और एक खास परिस्थिति के भीतर जवाहर लाल नेहरू ने विकास का जो रास्ता तैयार किया, क्या उसे इस नए अनुभव के बावजूद मखौल उड़ाने का विषय माना जाता रहेगा? यह धीरे-धीरे साफ होता जा रहा है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को कीन्स, रूजवेल्ट और नेहरू के रास्ते को अपनाते हुए भी फिर से पटरी पर लाया जा सकता है। लेकिन बुश प्रशासन लेकर अपने मनमोहन सिंह और चिदंबरम का रुख इसी बात की ही मिसाल है कि बेलगाम निजी पूंजी में निहित स्वार्थ रखने वाली ताकतें और उनके नुमाइंदे दुनिया के व्यापक हित की कीमत पर भी इन रास्तों में रुकावट बनने की पूरी कोशिश कर रही हैं। और इसीलिए मौजूदा आर्थिक मंदी लगातार गहरी होती जा रही है और दूर तक कोई समाधान नज़र नहीं आ रहा है।

Thursday, October 2, 2008

जामिया नगर के प्रश्न


सत्येंद्र रंजन
दिल्ली के जामिया नगर इलाके में पुलिस मुठभेड़ से बना माहौल अब कुछ ठंडा पड़ रहा है, लेकिन उससे उठे सवाल अभी भी हमारे सामने उतनी ही शिद्दत से खड़े हैं। इन सवालों का सीधा वास्ता देश से धर्मनिरपेक्ष ढांचे से है, जो पिछले डेढ़ सौ साल में विकसित हुए भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा है। जामिया नगर एनकाउंटर ने आतंकवाद, आतंकवाद से संघर्ष और बहुसंख्यक वर्चस्व की मानसिकता को लेकर उलझे सवालों को एक बार फिर हमारे सामने पेश कर दिया है। अगर हमें सचमुच भारत के भविष्य की चिंता है तो हम इन सवालों को कतई दरकिनार नहीं कर सकते।

हम इस बहस में नहीं जाना चाहते कि बाटला हाउस के एल-१८ फ्लैट में पुलिस और कथित आतंकवादियों के बीच जो मुठभेड़ हुई, वह असली थी या नहीं। मुठभेड़ की पुलिस की कहानी पर मीडिया के एक हिस्से, मानवाधिकार संगठनों और उस इलाके के लोगों ने कई सवाल उठाए हैं। यहां कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस भी जारी कर चुका है। पुलिस की कहानी कितनी सही या गलत है, इस पर आने वाले दिनों में ज्यादा रोशनी पड़ेगी। बहरहाल, जब आतंकवाद ज्यादा व्यापक स्वरूप लेता जा रहा है, तब पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की मुश्किलों को समझा जा सकता है। इसलिए हर हाल में उन पर टूट पड़ा जाए, इसकी वकालत कोई नहीं कर सकता।

लेकिन पुलिस की हर कहानी पर आंख मूंद कर भरोसा कर लिया जाए, कम से कम भारतीय पुलिस के रिकॉर्ड के देखते हुए यह भी वांछित नहीं है। इससे न तो आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़े लोगों पर काबू पाने में मदद मिलेगी, और न ही आतंकवाद के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जुड़े मसलों को हल करने की राह निकलेगी। मसलन, अगर सोहराबुद्दीन आतंकवादी नहीं था और उसे गुजरात पुलिस ने आतंकवादी बता कर मार डाला तो इससे आतंक के खिलाफ मुहिम में एक कामयाबी का भ्रम ही पैदा हुआ। यानी असली आतंकवादी तो आजाद रहे, लेकिन लोगों में यह झूठा यकीन बना कि एक आतंकवादी को ठिकाने लगा दिया गया है। और जो अहमदाबाद में हुआ, वैसा ही जामिया नगर में नहीं हो सकता, यह बात कोई दावे के साथ नहीं कह सकता।

चूंकि ऐसे सवालों का संबंध मानवाधिकारों की संवैधानिक गारंटी और देश के कानून से होता है, इसलिए संवैधानिक लोकतंत्र के हित में यही है कि ऐसी हर घटना पर अगर किसी के मन में संदेह है तो इसे कहने की उसकी आजादी बरकरार रहे। सवाल और सबूतों का अंतिम फैसला अदालत में होता है, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही कुछ भी साबित नहीं मान लिया जाना चाहिए। लोकतंत्र की बुनियाद संवाद है, और अगर किसी समूह या समुदाय के भीतर कोई संदेह या सवाल हैं, तो उन पर खुली चर्चा की गुंजाइश जरूर बची रही चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण पहलू बहुसंख्यक वर्चस्व की मानसिकता का लगातार हावी होते जाना है, जिसमें कमजोर और अल्पसंख्यक समुदायों की चिंताओं, भावनाओं और प्रश्नों को बहस के दायरे से ही बाहर कर दिया जा रहा है। जामिया नगर और आसपास के इलाकों के लोग अगर सोचते हैं कि बाटला हाउस में हुए एनकाउंटर की पुलिस की कहानी में कई छिद्र हैं, तो इस बात पर आखिर मीडिया में और सार्वजनिक मंचों पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? अपने रिकॉर्ड पर सफाई देने की जिम्मेदारी पुलिस की है, न कि उन मीडियाकर्मियों की जिनकी बहुसंख्यक वर्चस्व की मानसिकता आज मीडिया के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए बड़ा खतरा बन गई है।

परिणाम यह है कि आम तौर पर सार्वजनिक जिंदगी और खास तौर पर कॉरपोरेट मीडिया के भीतर कमजोर और अल्पसंख्यक समूहों से आने वाले ऐसे लोग जो अपनी मजहबी पहचान के साथ जीना चाहते हैं, आज बेहद घुटन महसूस कर रहे हैं। इसलिए कि उनके लिए अपने समुदाय की चिंताओं और भावनाओं को व्यक्त करने की गुंजाइश लगातार सिकुड़ती जा रही है। उन्हें लगता है कि हर पल उन्हें अपने भारतीय होने का सबूत देना पड़ता है और बहुसंख्यक वर्चस्व की सोच से मेल न खाने वाला उनका एक शब्द भी राष्ट्रवाद के प्रति उनकी निष्ठा पर संदेह उठाने का हथियार बन सकता है।

दरअसल राष्ट्रवाद को इतने संकुचित अर्थों में परिभाषित करने की कोशिश हो रही है कि देश के व्यापक जन समुदायों के हित की वकालत करने की संभावना इसमें लगातार घटती जा रही है। यानी स्थिति कुछ ऐसी बन रही है, जिसमें आप या तो ‘राष्ट्रवादी’ हैं, या फिर वामपंथी उग्रवादी, मुसलमान या दूसरे अल्पसंख्यक और वंचित समुदाय के लोग। जाहिर है, यह सबको समाहित कर चलने वाला वह भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है, जो दादा भाई नौरोजी, रवींद्नाथ टैगोर, गांधी और नेहरू की वैचारिक छत्रछाया में फूला-फला।

यह सही है कि आज आतंकवाद का एक मुस्लिम पहलू है। लेकिन क्या सभी मुसलमान आतंकवादी हैं, या आतंकवाद से निपटने के लिए इस पूरे समुदाय पर प्रहार या निगरानी की जरूरत है? दो दशक पहले यह सवाल सिखों के संदर्भ में भी उठा था। प्रश्न यह है कि क्या किसी एक पूरे समुदाय को दुश्मन मानकर किसी लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है? जाहिर है, ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि एक ऐसी मानसिकता सारे देश पर थोपने की कोशिश आज काफी हद तक सफल होती नजर आती है।

अगर आतंकवाद का मुस्लिम पहलू है तो यह भी समझे जाने की जरूरत है कि आखिर ऐसा क्यों है? यह संभव है कि कुछ धर्मांध तत्व इस्लामी राज्य की स्थापना की रूमानी ख्यालों में जीते हों औऱ इसके लिए विदेशी धन और मदद से आतंकवाद के रास्ते पर चल रहे हों। लेकिन यह कहीं ज्यादा बड़ी हकीकत है कि इंसाफ न मिलने की भावना और आम हालात से पैदा हुई हताशा ऐसे तत्वों के लिए ज्यादा मददगार साबित होती है। आखिर इस बात क्या जवाब है कि मुंबई के १९९३ के बम धमाकों के दोषियों को सजा हो जाए, लेकिन उसके पहले के दंगों के बारे में श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट सरकार की अलमारियों में धूल खाती रहे? बाबरी मस्जिद तोड़ने के दोषी खुलेआम घूमते रहें, इससे हम अपनी न्याय व्यवस्था के बारे में कैसे संदेश देते हैं? गुजरात के दंगों पर अब तक चली कानूनी प्रक्रिया आखिर क्या सोचने को मजबूर करती है?

बम धमाकों से निसंदेह आतंक पैदा होता है। इनमें बहुत से निर्दोष लोगों की जान गई है और हजारों लोगों की जिंदगी तबाह हो गई है। लेकिन क्या कंधमाल में हुई तबाही उससे कम है? यह एक बड़ा सवाल है कि आखिर वो लोग आतंकवादी हैं या नहीं, जिनकी वजह से एक पूरा समुदाय आतंक में जीने को मजबूर हो जाता है? आखिर जिस गुस्से के साथ हम सिमी पर प्रतिक्रिया जताते हैं, वही गुस्सा बजरंग दल के बारे में क्यों नहीं उबलता? ये सब बेहद कठिन प्रश्न हैं। ये आराम से जिंदगी गुजारने और वर्गीय एवं सामुदायिक वर्चस्व में हित रखने वाले तबकों को परेशान करने वाले सवाल हैं। लेकिन अगर उनके दिमाग में सचमुच भारत की कोई उदार कल्पना है तो वो इन सवालों की अनदेखी नहीं कर सकते।

आज जरूरत इस सवालों पर संवाद बनाने की है। संवाद उन समुदायों से जो अपने को घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं। संवाद उन लोगों से जो संवैधानिक मूल्यों पर आधारित भारत में यकीन करते हैं। सिर्फ ऐसे संवाद से ही मौजूदा सवालों के हल ढूंढे जा सकते हैं। और सिर्फ तभी लोकतंत्र और उदार भारतीय राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित बनाया जा सकता है।

Sunday, September 14, 2008

अमेरिका के विरोध का मतलब


सत्येंद्र रंजन
असैनिक परमाणु सहयोग समझौते को अमेरिका और भारत के बीच दीर्घकालिक संबंध की एक अहम कड़ी बताया गया है। बुश प्रशासन ने भारत के साथ अमेरिका के रणनीति संबंध को ठोस रूप देने के लिए इस करार को एक खास जरिया बनाया। हालांकि इस समझौते की शर्तों पर उसका दोहरापन, और साथ ही मनमोहन सिंह सरकार की अपने देश की जनता के साथ बरती गई चालाकी अब बेनकाब हो चुकी है, इसके बावजूद भारत के एक बड़े और प्रभावशाली तबके में इस करार को लेकर सुखबोध की जैसी लहर देखने को मिली है, उससे यह साफ है कि भारत के संदर्भ में अमेरिकी मकसद काफी हद तक सफल रहा है। इस तरह अमेरिका एक उभरती अर्थव्यवस्था और विभिन्न वजहों से दुनिया में लगातार अहम होते जा रहे एक देश को अपनी रणनीतिक योजना का हिस्सा बनाने में फिलहाल लगभग कामयाब हो गया है।

दोनों देशों के बीच बनते इस संबंध को दोनों ही देशों के भीतर, या कहें दोनों देशों की सत्ता संरचना में प्रभावशाली तबकों के भीतर, व्यापक समर्थन हासिल है। अमेरिका की दोनों प्रमुख पार्टियों यानी रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स में भारत के साथ रणनीतिक संबंधों के मुद्दे पर पूरी सहमति है। इसकी वजह अमेरिकी विदेश नीति तय करने वालों की यह समझ है कि दुनिया, खासकर एशिया में जो अमेरिकी हित हैं, उन्हें पूरा करने में आज भारत एक खास भूमिका निभा सकता है। भारत अमेरिकी कंपनियों के लिए अपने विशाल बाजार के साथ रक्षा और ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में कारोबार के लिए एक फायदेमंद जगह है। साथ ही भारत एक ऐसी ताकत है, जिसे अपने साथ जोड़ कर अमेरिका भविष्य में अपने साम्राज्यवादी मंसूबों को बेहतर ढंग से अंजाम दे सकता है।

भारत में बड़े पूंजीपतियों, नौकरशाहों औऱ शासक वर्ग के दूसरे हिस्सों को स्वाभाविक रूप से अपना हित अमेरिकी पूंजी और ताकत से जुड़ने में बेहतर ढंग से सधता दिखता है। मीडिया मोटे तौर पर इसी पूंजी से संचालित होता है और मध्य वर्ग की सोच को ढालने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका है। वैसे भी समाज के संपन्न और अपेक्षाकृत आराम से जिंदगी गुजराने वाले तबकों में ताकत और ताकतवर से जुड़ने की स्वाभाविक प्रवृत्ति होती है। खासकर उस दौर में जब इन तबकों के सदियों पुराने वर्चस्व को वंचित और शोषित ताकतें चुनौती दे रही हों, बड़ी ताकत से जुड़ कर अपना हित बचाने का लोभ सहज देखा जा सकता है।

जिस भारत-अमेरिका रणनीतिक संबंध को आज हम बनते देख रहे हैं, उसका भारत में यही समर्थन आधार है। बराबरी और सर्वमान्य नियम-कानून पर आधारित किसी नई दुनिया या नए समाज की कल्पना से आशंकित इन समर्थक समूहों ने राष्ट्रवाद और ऊंचे आदर्शों पर आधारित देशभक्ति की भावना को तिलांजलि दे दी है। उनकी चर्चाओं से यह जाहिर होता है कि उनके पास अमेरिकी शासक वर्ग की सरंचना और उसके उद्देश्यों की समझ का घोर अभाव है। वे अपने स्वार्थ और दास भावना की वजह से ऐसी नीतियों का समर्थन कर रहे हैं, जिनसे दूरगामी तौर पर देश के व्यापक हितों को भारी नुकसान पहुंच सकता है। गौरतलब है कि फिलहाल प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह इन नीतियों के सबसे बड़े प्रतीक के रूप में सामने आए हैं।

परमाणु ऊर्जा का सारा गुणगान या तीन दशक से परमाणु क्लब से जारी भारत के अलगाव को खत्म करने की कथित सफलता पर हर्षध्वनि के जरिए इस हकीकत को नहीं छिपाया जा सकता कि परमाणु समझौता दरअसल, भारत और अमेरिका के बीच व्यापक रणनीतिक योजना का सिर्फ एक पहलू है औऱ इसके जरिए असल में इसी योजना के लिए माहौल बनाने और समर्थन जुटाने की कोशिश की गई है। यहां यह सवाल स्वाभाविक रूप से पूछा जा सकता है कि आखिर अमेरिका के साथ रणनीतिक रिश्ते पर एतराज क्यों है? लेकिन इस सवाल पर हम बाद में आएंगे। उसके पहले एक बात साफ कर लेने की जरूरत है कि कुछ धुर निराशावादी ताकतों को छोड़ कर देश में शायद ही किसी को परमाणु ऊर्जा से एतराज है। लेकिन सवाल है कि इस ऊर्जा को हासिल करने की कीमत क्या है? कीमत का सवाल सिर्फ आर्थिक संदर्भ में नहीं, बल्कि राजनीतिक और नैतिक संदर्भों में भी है। अगर रिएक्टर और यूरेनियम के आयात की कीमत विदेश नीति की स्वतंत्रता और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर समानता का दर्जा छोड़ना है, तो साफ है, यह बात किसी देशभक्त और स्वाभिमानी व्यक्ति या शक्ति को मंजूर नहीं होगी।

लेकिन पिछले तीन साल के मनमोहन सिंह सरकार के आचरण ने यह साबित कर दिया है कि जो करार उसने किया है, उसकी यही कीमत न सिर्फ भारत को भविष्य में चुकानी होगी, बल्कि इसकी शुरुआत हो भी चुकी है। ईरान को घेरने की अमेरिकी रणनीति से जुड़ते हुए अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी में भारत ने दो बार ईरान के खिलाफ मतदान कर सक्रिय भूमिका निभाई। फिर परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह यानी एनएसजी से परमाणु करार को मंजूरी दिलाने के मौके पर विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने जारी अपने बयान में एनरिचमेंट और रीप्रोसेसिंग तकनीक का प्रसार रोकने में मददगार बनने का जो वादा किया, परोक्ष रूप से उसका मतलब ईरान को ऐसी तकनीक से वंचित रखने की कोशिशों में सहायक बनना ही था।

अगर भारत के राजनीतिक फलक पर देखें तो विदेश नीति के इस रुझान को व्यापक समर्थन मिला दिखता है। कांग्रेस के नेतृत्व में यूपीए सरकार इस नीति को लागू कर रही है और भाजपा नेतृत्व वाले एनडीए का इससे कोई बुनियादी मतभेद नहीं है। बल्कि भाजपा तो बाकायदा वैचारिक स्तर पर अमेरिका से रणनीतिक संबंध पर जोर देती है। यानी परमाणु करार का उसका विरोध महज राजनीतिक लाभ के लिए है। वामपंथी दलों के साथ जो पार्टियां इस करार के खिलाफ जुड़ीं, उनमें भी किसी को वैचारिक स्तर पर इस नीति से कोई आपत्ति हो, ऐसा मानने की कोई वजह नहीं है। बल्कि मायावती ने परमाणु करार को जिस मुस्लिम-अमेरिका संदर्भ में पेश किया, प्रगतिशील नजरिए से वह कहीं ज्यादा आपत्तिजनक है। इस तरह यह कहा जा सकता है कि अमेरिका से गहराते रणनीतिक संबंधों के विरोध के मुद्दे पर राजनीतिक दायरे में वामपंथी दल अकेले हैं। उग्र वामपंथी संगठन और कुछ जन संगठन इस मामले में उनके साथी हो सकते हैं, लेकिन उनके बीच बाकी खाई इतनी चौड़ी है कि किसी साझा संघर्ष की संभावना कम से कम निकट भविष्य में नजर नहीं आती।

इसीलिए यह लड़ाई बेहद कठिन और लंबी नजर आती है। यह चुनौती इसलिए और भी बड़ी दिखती है, क्योंकि आम लोगों के बीच अभी यह स्पष्ट ही नहीं है कि आखिर अमेरिका से रणनीतिक रिश्ते का विरोध क्यों किया जाना चाहिए? अगर भारत रूस या फ्रांस या चीन से रणीतिक संबंध बना सकता है, तो आखिर अमेरिका से क्यों नहीं? जब अमेरिका भारत को अपना साझेदार बनाना चाहता है, और इसके लिए वह अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत की वकालत भी कर रहा है, तो उससे वैर पालने की आखिर क्या वजहें हैं?

दरअसल, इस सवालों का जवाब पाने के लिए हमें अमेरिकी सत्ता की संरचना, दुनिया में उसके मकसद और विश्व मामलों में अमेरिका की भूमिका को समझना जरूरी है। तो पहले बात अमेरिकी सत्ता की संरचना की। वो संचरना जो पूंजीवादी सत्ता तंत्र की चरम अवस्था की मिसाल है। यह बात अमेरिकी व्यवस्था का एक सामान्य अध्ययनकर्ता भी जानता भी है कि मुख्य रूप से रिपब्लिकन, लेकिन आम तौर पर डेमोक्रेटिक पार्टी भी बहुराष्ट्रीय कंपनियों की नुमाइंदा हैं, जिनकी घरेलू और विदेश नीतियां इन कंपनियों के हितों के मुताबिक तय होती हैं। यह बात अनगिनत अध्ययनों से सामने आ चुकी है कि बुश-चेनी प्रशासन ने इराक पर हमला आतंकवाद से लड़ने या अल-कायदा को खत्म करने के लिए नहीं, बल्कि इराक के तेल संसाधनों पर कब्जा जमाने और इराक को अड्डा बना कर पश्चिम एशिया में अपने सामरिक उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किया। इसके पीछे मुख्य रूप से बहुराष्ट्रीय तेल कंपनियां प्रेरक शक्ति थीं, जिनके साथ मुख्य रूप से अमेरिकी उप राष्ट्रपति डिक चेनी और आम तौर पर पूरे बुश प्रशासन के हित जुड़े रहे हैं। इराक के बाद ईरान इसी मकसद से अमेरिका के निशान पर है, जबकि इजराइल उसके सामरिक हितों को उस इलाके में पूरा करने वाले एक अड्डे के रूप में वहां पहले से मौजूद है। अल-कायदा या कथित विश्व इस्लामी आतंकवाद अमेरिका की ऐसी ही नीतियों का परिणाम रहे हैं, जिस पर ११ सितंबर २००१ के हमलों के बावजूद दोबारा विचार करने की जरूरत अमेरिका ने कभी महसूस नहीं की। इराक पर हमले को अंजाम देने के लिए बुश प्रशासन ने संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था को पूरी तरह दरकिनार कर दिया। बुश प्रशासन ने एकतरफा कार्रवाई, खतरे का अंदेशा होते ही हमला कर देने और जिसे वह दुश्मन मान ले उसकी संप्रभुता का कोई ख्याल करने की जो नीति घोषित की, वह सभ्यता और विश्व व्यवस्था के अब तक के विकास को सीधे चुनौती है। यह एक खुली साम्राज्यवादी नीति है। जबकि माना गया था कि पहले और दूसरे विश्व युद्ध के अनुभव के बाद दुनिया ने इस नीति को हमेशा के लिए छोड़ दिया है। इस बीच आतंक के खिलाफ युद्ध के क्रम में अमेरिका ने जिस तरह लोकतंत्र और मानवाधिकारों के स्थापित मानदंडों को ठेंगा दिखाया, उसे खुद पूर्व अमेरिकी उप राष्ट्रपित एल गोर ने ‘मानव विवेक पर आघात’ बताया है।

दुनिया के विभिन्न देशों में अपनी अनुयायी सरकारें बनवाने के लिए अमेरिका प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से जैसे दखल देता रहा है, वह जनता के स्वशासन के अधिकार का खुल्ला उल्लंघन है। पूर्व यूगोस्लाविया के विघटन, खासकर हाल में कोसोवो को सर्बिया से अलग कराने के लिए जैसे दांव-पेच का सहारा लिया गया, वह दुनिया के सामने है। पूर्व सोवियत संघ के गणराज्यों में कथित रंग-बिरंगी क्रांतियों में अमेरिकी पैसे की भूमिका और कई दूसरे माध्यमों से हस्तक्षेप की कहानी भी खुल कर सामने आ चुकी है। इसीलिए जब जॉर्जिया में रूस ने दखल दिया तो अमेरिका और उसके साथी देशों के पास उसका विरोध करने का कोई नैतिक तर्क नहीं था। दरअसल, क्यूबा, वेनेजुएला और बोलिविया से लेकर यूक्रेन, बेलारूस और कजाखस्तान तक आत्मनिर्णय के मूलभूत जनाधिकार के हनन की अमेरिकी कोशिशों की मिसाल हैं। अमेरिका का अनुयायी बनने का क्या मतलब होता है, इसे पाकिस्तान से बेहतर कहीं और के लोग शायद नहीं समझ सकते। जो पाकिस्तान सोवियत संघ के खिलाफ संघर्ष में अमेरिका का अग्रिम मोर्चा रहा और आतंक के खिलाफ कथित युद्ध में भी जो उसकी सामरिक योजना का हिस्सा बना, वही आज अमेरिकी आक्रामकता के आगे अपनी संप्रभुता की भीख मांग रहा है।

अगर कारोबार की दुनिया पर निगाह डालें तो दुनिया में व्यापार के तौर-तरीके तय करने में अमेरिकी नीतियां आज कैसे बहुपक्षीय व्यापार के लिए खतरा बन गई हैं, विश्व व्यापार संगठन की हर बैठक इसे साफ कर देती है। हर बार यह अधिक साफ हो जाता है कि अमेरिका अपने बड़े किसानों और पूंजीपतियों के हित में नियम आधारित विश्व व्यापार की संभावना को नष्ट करने पर आमादा है।

इसलिए जब बात अमेरिका के विरोध की होती है, तो वह दरअसल, इन्हीं नीतियों और इनके संचालक शासक वर्ग का विरोध होता है। वह अमेरिका के आम लोगों, अमेरिका के साथ आम व्यापार और अमेरिकी इतिहास और संस्कृति से मेलजोल का विरोध नहीं है। इन नीतियों का विरोध इसलिए जरूरी है कि अगर ये कामयाब हो गई तो दुनिया के अधिकांश जन समुदायों की स्वतंत्रता, आर्थिक बेहतरी और व्यापक अर्थ में विकास की संभावना खतरे में पड़ जाएगी। यही बात भारत के आम जन पर भी लागू होती है। दुनिया ने उपनिवेशवाद के दौर से काफी सबक सीखा है और इसीलिए दुनिया का जागरूक जनमत नव-उपनिवेशवाद के रूप में उस दौर की वापसी न हो, इसके लिए संघर्ष को जरूरी मानता है। इस संदर्भ में भारत के लोगों के सामने बस दो विकल्प हैं- या तो वो आम जन की स्वतंत्रता और बेहतरी का सौदा करने वाली नीतियों का साथ दें, या उस लंबे संघर्ष का- जो भारत के विचार यानी आइडिया ऑफ इंडिया को उसकी मंजिल तक पहुंचाने की अनिवार्य शर्त है।

Thursday, August 28, 2008

खेल में आगे निकलना खेल नहीं


सत्येंद्र रंजन
ओलिंपिक में चीन की सफलता से दुनिया अचंभित नजर आती है। सफलता ओलिंपिक के आयोजन में भी रही और खेलों के मुकाबलों में भी। आयोजन इतना शानदार रहा कि कहीं किसी को नुक्स निकालने का कोई मौका नहीं मिला, बल्कि इसी मकसद से बीजिंग पहुंचे बहुत से पश्चिमी मीडियाकर्मी इसकी तारीफ करते हुए वहां से वापस गए। और खेल मुकाबलों का आलम यह रहा कि चीन पदक तालिका के शिखर पर पहुंच गया। वहां इतने भारी अंतर से पहुंचा कि दूसरे नंबर पर रहे अमेरिका से १५ स्वर्ण पदकों का फासला रहा। सोवियत संघ के विखंडन के बाद पहली बार कोई देश ५० से ज्यादा स्वर्ण पदक हासिल कर पाया।

चार साल पहले एथेंस ओलिंपिक में चीन ३२ स्वर्ण पदक जीत कर अमेरिका से तीन स्वर्ण पदक पीछे रह गया था। उसके बाद यह उसकी जबरदस्त तैयारियों की ही मिसाल है कि बीजिंग ओलिंपिक शुरू होने से दो दिन पहले ही अमेरिका की ओलिंपिक समिति के अधिकारियों ने यह सार्वजनिक बयान दे दिया कि इस बार चीन उन्हें पीछे छोड़ देगा। बढ़ोतरी अमेरिका ने भी की। उसकी झोली में एक स्वर्ण पदक ज्यादा आया। लेकिन चीन ने १९ स्वर्ण पदकों का इजाफा किया। जिमानास्टिक जैसे कई खेलों, जिनमें पहले चीन का बड़ा दांव नहीं रहता था, उनमें भी इस बार चीन ने कामयाबी के झंडे गाड़े। और अब यह खुद महान तैराक मार्क स्पिट्ज का कहना है कि अगले दस साल में तैराकी में भी चीन का दबदबा कायम हो जाएगा।

चीन की इस सफलता को खासकर भारत में बड़ी हैरत और ललचाई निगाहों से देखा जा रहा है। भारत के सामने फिलहाल चुनौती २०१० के कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन की है, जिसकी तैयारियों पर कई संदेह हैं। इसे देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष और कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने एक दिलचस्प सुझाव दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे एक पत्र में कहा कि ओलिंपिक के बाद कई अस्थायी ढांचे तोड़ दिए जाते हैं। शुक्ला बीजिंग में तैयार उन खेल सुविधाओं से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से ऐसी पहल करने की अपील की जिससे बीजिंग के उन ढांचों को दिल्ली ले आया जाए। जहां खेलों में प्रदर्शन की बात है तो उसमें भारत और चीन के बीच फासला तो जगजाहिर है।

सवाल है कि आखिर क्यों चीन आज उस मंजिल पर है, जो भारत की पहुंच से बाहर नजर आती है? भारत जैसी ही बड़ी आबादी, प्राचीन संस्कृति और पिछड़ी अर्थव्यवस्था के साथ बीसवीं सदी के मध्य में ‘नियति से अपने मिलन’ की यात्रा शुरू करने वाला चीन आखिर कैसे आज दुनिया की सबसे बड़ी खेल महाशक्ति बन गया? अगर भारत सचमुच दुनिया में एक बड़ी ताकत बनना चाहता है, तो इस सवालों के जवाब उसके लिए बेहद महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं। इस जवाब की तलाश करते हुए हमें सबसे पहले सामने मौजूद तथ्यों पर गौर करना चाहिए और फिर उन बारीकियों तक पहुंचने की कोशिश चाहिए, जिससे यह संभव हो सका है।

पहले बात खेल तक ही सीमित रखते हैं। भारत के एक राष्ट्रीय अखबार के इनसाइट ग्रुप के शोध के मुताबिक चीन के पास आज साढ़े आठ लाख खेल के मैदान, छह लाख २० हजार स्टेडियम, ४४ हजार स्पोर्ट्स स्कूल, साढ़े ४६ हजार से ज्यादा प्रोफेशनल एथलीट और २५ हजार कोच हैं। वहां हर साल ४० हजार से ज्यादा खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। स्पोर्ट्स स्कूलों में तकरीबन पौने चार लाख छात्र ट्रेनिंग लेते हैं। इनके बीच प्रोफेशनल एथलीट, फिर उनके बीच से नेशनल एथलीट्स और उसके बाद उनके बीच से अंतरराष्ट्रीय एथलीट्स का चयन होता है। बीजिंग ओलिंपिक से पहले चीन के पास ३,२२२ अंतरराष्ट्रीय एथलीट थे, जिनके बीच से ओलिंपिक के लिए टीम का चयन किया गया। बीजिंग ओलिंपिक के लिए टीमें तैयार करने पर ४ अरब ८० करोड़ डॉलर खर्च किए गए। इन तथ्यों की रोशनी में अगर चीन की कामयाबी को देखा जाए तो क्या तब भी वह आश्चर्य की बात रह जाती है?

ये तो दरअसल, पेशेवर खेल की तैयारियों से जुड़े तथ्य हैं। आम जन के लिए चीन सरकार की जो खेल नीति है, वह इसके अलग है। देश भर में खेल सुविधाएं मुहैया कराने पर चीन सरकार ने करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं। १९९५ में तंदुरुस्ती को बढ़ावा देने का एक कानून बनाया गया, जिसके तहत लोगों को कसरत और खेलों में भाग लेने की व्यापक सुविधाएं मुहैया कराई गईं। तब से नियमित सर्वेक्षण कर यह देखा जाता है कि कितने लोग शारीरिक तौर पर फिट हैं और लगातार व्यायाम में हिस्सा लेते हैं। २००५ के सर्वे का नतीजा रहा कि चीन की आबादी का ३० फीसदी हिस्सा खेल-कूद की गतिविधियों में हिस्सा लेता है। देश की राष्ट्रीय तंदुरुस्ती नीति का लक्ष्य इस संख्या को ४० फीसदी तक पहुंचाने का है।

जाहिर है, चीन ने खेल को अपनी सार्वजनिक संस्कृति का अहम हिस्सा बना लिया है, जैसा पहले सोवियत संघ और समाजवादी खेमे के दूसरे देशों में हुआ था। गौरतलब है कि सोवियत संघ लंबे समय तक लगातार ओलिंपिक में अमेरिका को पछाड़ता रहा। यहां तक कि छोटे से देश जर्मन जनवादी गणराज्य (पूर्वी जर्मनी) ने खेलों में इतनी तरक्की की कि दूसरे यूरोपीय देशों पर वह लंबे समय तक भारी पड़ता रहा। आज चीन ने उसी परंपरा को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।
चीन की यह नई संस्कृति माओ त्से तुंग के नेतृत्व में हुई सांस्कृतिक क्रांति की कोख से निकली। उस क्रांति के दौरान सामंती अवशेषों पर हमला करते हुए पुरातन संस्कृति के शिकंजे से देश, खासकर उसके नौजवानों को निकाला गया और उनकी दबी-सोयी पड़ी ऊर्जा को मुक्त कर दिया गया। उसका परिणाम अब सामने है।

बहरहाल, अगर आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में चीन नए सिरे से अपनी व्यवस्था को नहीं ढालता और इसमें नई परिस्थितियों के मुताबिक लगातार बदलाव नहीं करता तो निश्चित रूप से नई संस्कृति की जमीन तैयार नहीं होती। खेलों के संदर्भ में यह सवाल बेहद अहम है कि आखिर समाजवादी व्यवस्थाएं और विकसित अर्थव्यवस्थाएं क्यों खेलों की दुनिया में अपना वर्चस्व बना लेती हैं, जबकि दूसरी व्यवस्थाएं खेलों की दुनिया में पहचान बनाने के लिए कुछ निजी खिलाड़ियों की प्रतिभा और मेहनत पर निर्भर बनी रहती हैं? निसंदेह जमैका जैसा देश उसेन बोल्ट की कामयाबी पर इतरा सकता है, या इथियोपिया और केन्या जैसे गरीब देशों से कुछ ऐसे एथलीट निकल कर आ सकते हैं, जो दुनिया को चकत्कृत कर दें, लेकिन वे देश व्यापक रूप से खेल की बड़ी शक्ति के रूप में कभी नहीं उभर पाते।

इसकी वजह यह है कि खेल में किसी का मन तब लगता है, जब उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो गई हों। अगर किसी नौजवान के मन में अपने भविष्य को लेकर संशय है, रोजगार उसकी पहली चिंता है तो वह ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना नहीं देख सकता। भारत जैसे देश में हकीकत यही है कि अधिकांश नौजवान खेलों में नौकरी या आर्थिक बेहतरी की उम्मीद करते हुए आते हैं। उनके सामने यही छोटा लक्ष्य रहता है। इसके लिए भी उन्हें अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इसीलिए यह कड़वी हकीकत है कि इतने बड़े देश के पास गर्व करने के लिए सिर्फ एक अभिनव बिंद्रा या विजेंद्र कुमार या सुशील कुमार हैं।

यह बात अक्सर बड़े दुख के साथ कही जाती है कि ११० करोड़ आबादी वाले देश में पदक विजेताओं का इतना अभाव है! लेकिन असली बात यह है कि पदक जीतने का आबादी से शायद ही कोई संबंध है। खेलों में विभिन्न देशों के प्रदर्शन पर हुए अध्ययनों के निष्कर्ष के मुताबिक खास बात यह है कि आबादी का कितना हिस्सा वास्तव में खेलों में हिस्सा लेता है। कई अध्ययनकर्ताओं ने इस संदर्भ में अमर्त्य सेन की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कही गई इस बात का हवाला दिया है- ‘हिस्सेदारी की क्षमता कई सामाजिक शर्तों से तय होती है। बाजार तंत्र की विस्तार प्रक्रिया में भाग लेना मुश्किल है, अगर आप निरक्षर हों और आपको स्कूल जाने का मौका न मिला हो, या आप कुपोषण या खराब सेहत की वजह से कमजोर हों या फिर आपके रास्ते में सामाजिक अवरोध, भेदभाव, पूंजी की कमी की रुकावटें हों...।’ यह पूरा उद्धरण खेलों के संदर्भ में भी उतना ही लागू होता है।

ओलिंपिक का आदर्श खुद को ज्यादा तेज, ज्यादा ऊंचा और ज्यादा मजबूत साबित करने की स्वस्थ होड़ है। लेकिन यह काम एक हद तक दुस्साहस की मांग करता है जिसमें शारीरिक जोखिम शामिल रहता है। अगर मन में लगातार संशय हो या परिवार का दबाव हो कि अगर जख्मी हुए तो सारा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा, तो उस हालत में कोई नौजवान बहुत आगे नहीं जा सकता। समाजवादी व्यवस्थाएं इसलिए बेहतरीन खिलाड़ी पैदा कर पाती हैं, क्योंकि वहां इलाज की चिंता किसी के मन में नहीं होती और यह आश्वासन होता है कि रोजगार या जीवन यापन समाज मुहैया करा देगा। तो वैसी हालत में दुस्साहस की हद तक जोखिम उठाने की होड़ में नौजवान अपने को झोंक देते हैं। जिन समाजों ने समृद्धि का एक ऊंचा स्तर हासिल कर लिया है और जहां अपने आर्थिक भविष्य को लेकर आश्वस्ति है, वहां पढ़ाई-लिखाई और करियर बनाने की चिंता छोड़ कर नौजवान खेल में अपनी प्रतिभा को झोंक पाते हैं। जहां ये स्थितियां नहीं हैं, वहां खेल महज निजी जुनून बनकर रह जाता है, जिससे कभी-कभार सफलता तो मिल जाती है, लेकिन यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया नहीं बन पाती।

अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि समृद्धि निसंदेह खेलों में प्रगति का एक अहम आधार है, लेकिन इसके साथ-साथ खेलों में भागीदारी और खेलों के बारे में सूचना की उपलब्धता दो बेहद अहम पहलू हैं। दरअसल, खेलों के बारे में सूचना के प्रसार से भागीदारी बढ़ती है और इससे वे प्रतिभाएं सामने आती हैं, जिनके बीच राष्ट्र्यी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी चुने जा सकें। एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि जिन समाजों में रेडियो नेटवर्क की ज्यादा पहुंच है, वहां खेलों की लोकप्रियता भी ज्यादा है। विकासशील देशों में अखबार आज भी कमोबेस शहरी माध्यम हैं। जिस दौर में भारत में रेडियो सूचना का मुख्य माध्यम था, उस दौर में यहां भी दूरदराज के इलाकों तक विभिन्न खेलों के बारे में ज्यादा जागरूकता थी।

लेकिन प्राइवेट मीडिया (टीवी, अखबार, और अब रेडियो भी) का दबदबा बढ़ने के साथ सूचना के कमोडिटी बनने की परिघटना सामने आई। इसमें जोर तुरत-फुरत चीज बेचकर ग्राहक बढ़ाने पर रहता है। जाहिर है, जिस चीज के बने-बनाए ग्राहक हैं, सिर्फ उन्हें ही बेचा जाता है। क्रिकेट इसकी एक मिसाल है। इसका परिणाम यह है कि दूसरे खेलों की सूचना फैलाने की कोशिश छोड़ दी गई है। नतीजा यह है कि जिसे हम सूचना का युग कहते हैं, उसमें ओलिंपिक स्पोर्ट्स जैसे खेलों को लेकर देश में अज्ञानता और अरुचि का माहौल है। यह इसी बात का परिणाम है कि टेलीविजन चैनलों पर बनावटी क्रिकेट की खबरों या प्रोग्राम को जितनी टीआरपी मिलती है, उतनी ओलिंपिक या विश्व कप फुटबॉल जैसे आयोजनों पर बनाए गए क्वालिटी प्रोग्राम को नहीं मिलती। जब हम भारत की खेल संस्कृति और खेल की दुनिया में अपनी हैसियत की बात करते हैं तो इन सारे पहलुओं पर जरूर गौर किया जाना चाहिए। खास कर उस मौके पर जब अभिनव बिंद्रा, विजेंद्र कुमार और सुशील कुमार की सफलताओं से देश के जागरूक तबकों में उम्मीद का एक माहौल बना हुआ है। उम्मीद का यह माहौल तभी आगे बेहतर नतीजे दे सकता है, जब हम देश के हर गली कूचे से प्रतिभाओं को सामने लाने, उनके मन से आर्थिक भविष्य की चिंता दूर करने, उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराने और पुरातन मनोविज्ञान से मुक्त कर उनमें दुनिया के मंच पर कुछ कर दिखाने का जज्बा भरने के इंतजाम करें। अगर ऐसा नहीं होता है तो अभी का फील गुड माहौल अल्पजीवी ही साबित होगा।

Tuesday, August 12, 2008

चीन क्यों चमक रहा है!


सत्येंद्र रंजन
चीन की चमक से दुनिया चकाचौंध है। बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में भव्यता और सुंदरता का जैसा अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला, उससे सारी दुनिया हतप्रभ रह गई। पश्चिमी मीडिया ने भी आखिरकार ये मान लिया कि चीन में कुछ खास है। भारत में तो खैर, चीन को लेकर एक विचित्र का तरह अंतर्विरोध हाल के वर्षों में देखने को मिलता रहा है। एक तरफ हमारे नेता और भारतीय प्रभुवर्ग आर्थिक एवं विकास के क्षेत्रों में चीन की सफलता पर मोहित नजर आते हैं, वहीं चीन जनवादी गणराज्य जिस बुनियाद पर खड़ा है, उसको लेकर एक वैर-भाव भी उनमें मौजूद देखा जा सकता है। पिछले महीने मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत पर बहस के दौरान वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने चीन की सफलता का जी खोलकर बखान किया। और लगे हाथों यह इल्जाम भी मढ़ दिया कि इस देश में कुछ लोग नहीं चाहते कि भारत चीन की बराबरी करे। जाहिर है, उनका निशाना भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु सहयोग समझौते का विरोध कर रहे समूहों की तरफ था।

बहरहाल, भारत अगर चीन की बराबरी नहीं कर पा रहा है, तो इसके लिए चिदंबरम या मनमोहन सिंह या उनके जैसी नीतियां अपनाने वाले दल एवं समूह तथा उनके समर्थक तबकों की कितनी जिम्मेदारी है, जाहिर है, इस पर उनसे हम कुछ सुनने की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन आखिर चीन ने यह चमत्कार कैसे किया, इसका गंभीर विश्लेषण उन सभी लोगों के लिए बेहद अहम है, जो दुनिया के नक्शे पर भारत को भी उसी शान के साथ देखना चाहते हैं, जैसे चीन आज खड़ा है।
भारत और चीन में कई समानताएं हैं। दोनों सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं। एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में दोनों का सफ़र लगभग एक ही समय शुरू हुआ। दोनों ने अलग, लेकिन अपने ढंग से खास एक विचारधारा पर अपने राष्ट्र की बुनियाद डाली। १९७० के दशक तक दोनों विकास दर और दूसरे कई आर्थिक मानदंडों पर लगभग बराबर थे। लेकिन उसके बाद तस्वीर बदल गई।

१९८४ के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में साम्यवादी चीन ने व्यावहारिक रूप में पहली बार हिस्सा लिया और तब वह सिर्फ एक स्वर्ण पदक जीत सका था। तब तक भारत ओलंपिक में अपने एक निश्चित माने जाने वाले हॉकी के स्वर्ण पदक को जीतने की हैसियत गवां चुका था। उसके बाद चीन का ग्राफ लगातार इतनी तेजी से ऊपर की तरफ चढ़ा कि आज वह स्वर्ण पदकों की सूची में पहले नंबर पर होने का दावेदार है, जबकि भारत में अभिनव बिंद्रा के जीते स्वर्ण पदक से अभी महज शुरुआत भर हुई है। दूसरे क्षेत्रों में चीन की जो सफलताएं हैं, वह मुख्यधारा मीडिया के विमर्श में शामिल है, इसलिए उसे साबित करने के लिए अलग से कोई आंकड़े देने की जरूरत नहीं है।

तो प्रश्न आखिर वही है कि आखिर चीन ऐसा कैसे कर पाया? दरअसल, चीन ऐसा उन्हीं नीतियों के सहारे कर पाया है, जिन्हें लेकर देश के शासक समूहों में गहरा वैर-भाव देखा जाता है। १९४९ की जनवादी क्रांति के बाद चीन ने अपने बुनियादी सामाजिक और आर्थिक ढांचे में आमूल बदलाव की जो पहल की, उसका फल मिलने में कई दशक लगे। लेकिन उस पहल ने समाज और अर्थव्यवस्था की सुसुप्त ऊर्जा को सदियों के बंधनों से मुक्त किया। यहां हम उस पहल के तरीकों, उनकी वजह से हुई उथल-पुथल और उसके फौरी नतीजों पर अपना कोई फैसला नहीं दे रहे हैं। यह ऐतिहासिक विमर्श का विषय है। लेकिन जो तथ्य हैं और उनके जो परिणाम अब सामने हैं, उनकी चर्चा जरूर बेहिचक की जा सकती है।

माओ जे दुंग के नेतृत्व में १९६६ में शुरू हुई सांस्कृतिक क्रांति एक गहरे विवाद का विषय रही है। एक दशक तक चली इस प्रक्रिया को जैसे अंजाम दिया गया, उस पर अलग-अलग राय रही है। लेकिन सांस्कृतिक क्रांति ने चीन को सदियों पुराने सांस्कृतिक अवरोधों से मुक्त कर दिया, यह बात आज तथ्यों की रोशनी में निसंदेह कही जा सकती है। इससे बनी नई संस्कृति ने चीन के लोगों में नई सोच और नया मनोविज्ञान पैदा किया, जिसके सहारे वो मानव संभावनाओं को एक नई ऊंचाई तक ले जा सकने में सफल हो रहे हैं।

माओ जे दुंग ने सतत् क्रांति और क्रांति के भीतर क्रांति की अवधारणाएं पेश की थीं। उनके उत्तराधिकारियों ने इसे व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की। तंग श्याओ फिंग ने ‘सोच के उद्धार’ का जब नारा दिया और चीनी क्रांति से पैदा ऊर्जा का विकास और प्रगति के लिए इस्तेमाल की नीतियां अपनाईं, तो बहुत से हलकों में इसे माओवाद का खंडन माना गया। जियांग जेमिन और हू जिन ताओ के जमाने में अपनाई नीतियों को लेकर खुद साम्यवादी खेमे में गहरे मतभेद रहे हैं। लेकिन अगर इस पूरे घटनाक्रम को एक विकासक्रम के चरणों के तौर पर देखा जाए तो हम आज के चीन को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। चीन ने अपनी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के बाद उसकी बुनियाद पर विकास और सफलताओं की नींव रखी और आज उसकी उपलब्धियां न सिर्फ खेल, बल्कि हर क्षेत्र में सोने के तमगे के रूप में उसके सीने पर सजी नजर आती हैं।

बेशक चीन की मौजूदा पर व्यवस्था पर कई सवाल उठाए जा सकते हैं। मसलन, उसकी राजनीतिक व्यवस्था में लोकतंत्र के कई पहलुओं की कमी है। हाल के दशकों में वहां एक बार फिर गैर बराबरी बढ़ी है और भ्रष्टाचार को कभी खत्म नहीं किया जा सका। वहां फिर से उस संस्कृति का असर बढ़ रहा है, जिसे माओ ने पतनशील कहा था और जिसके खिलाफ मुहिम चलाई थी। लेकिन यह भी देखा जा सकता है कि चीनी समाज और वहां का राजनीतिक नेतृत्व नई समस्याओं से निपटने के लिए नए प्रयोग कर रहे हैं। उनका परिणाम अभी भविष्य के गर्भ में है। मगर, वहां का नेतृत्व नई समस्याओं के नए हल निकालने की कोशिशों में गंभीरता से जुटा है, इसके संकेत भी देखे जा सकते हैं।

दूसरी तरफ भारत में मनमोहन सिंह एंड चिदंबरम एंड कंपनी गैर बराबरी पर आधारित व्यवस्था को छूने की कोशिश करने से गुरेज करती नजर आती है। बात चाहे रोजगार गारंटी कानून या आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार देने के कानून की हो, या पिछड़ों को आरक्षण देने की बात हो, किसी मुद्दे पर शासक वर्ग और उनके नुमाइंदे आस्था के साथ मजबूती से खड़े नजर नहीं आते। लोकतांत्रिक दबावों में वो जो कुछ सकारात्मक कदम उठाते हैं, उसे भी कमजोर कर देने का कोई मौका वो हाथ से नहीं जाने देते। जबकि धनवान तबकों को मदद पहुंचाने वाले कदमों पर उनका उत्साह देखते ही बनता है। जब बात चीन की तरक्की होती है, तो ये तथ्य सहज ही नजरअंदाज कर दिए जाते हैं कि वहां भुखमरी मिटाने, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानव विकास के पहलुओं पर कितना निवेश किया गया और सामाजिक बराबरी लाने की योजनाओं पर किस तरह अमल किया गया।

इन योजनाओं ने चीन की दबी ऊर्जा को आजादी दी, जिसकी चमक से आज वह जगमगा रहा है। भारत ने अपनी ऐसी ऊर्जाओं को आज भी सदियों के सामाजिक अन्याय, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक पिछड़ेपन से दबा रखा है। इसी फर्क की वजह से चीन आज दुनिया में अपनी शर्तों के साथ खड़ा है, जबकि भारत को असैनिक परमाणु सहयोग का करार करने के लिए अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता का सौदा करना पड़ता है। इसलिए आज सबसे अहम बात चीन से चमत्कृत होने की नहीं, बल्कि वहां हुए अनुभवों से कुछ सबक लेने की है।