Friday, December 7, 2007

गुजरात में दांव पर भारत


सत्येंद्र रंजन
रेंद्र मोदी ने मांगरोल की सभा में सोहराबुद्दीन मामले में दिए अपने बयान से एक बार फिर यह साफ कर दिया कि गुजरात के विधानसभा चुनाव में दांव पर क्या लगा हुआ है। इससे एक बार फिर यह बात उभरकर सामने आई है कि यह चुनाव एक साधारण चुनाव नहीं है। बल्कि यह एक ऐसा चुनाव है, जिसमें भारतीय संविधान की मूल आस्थाएं और सभ्य समाज के सारे सिद्धांत दांव पर लगे हुए हैं। मंगलवार को मांगरोल में मोदी के बयान के पहले भी दरअसल यही स्थिति थी, लेकिन पिछले पांच साल से हम इस स्थिति को सहने के अभ्यस्त हो गए हैं, संभवतः इसलिए इसकी गंभीरता उतनी ज्यादा महसूस नहीं हो रही थी। मगर एक बयान से मोदी ने सारी परिस्थिति बदल दी है। फरवरी २००२ में गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी ने देश को हिंदुत्व के शासन का नमूना दिखाया। उन्होंने भौतिकशास्त्र के न्यूटन के क्रिया औऱ प्रतिक्रिया के सिद्धांत को राजनीति और सांप्रदायिक संबंधों के बीच ला कर कानून के शासन का खुला मखौल उड़ाया। समुदायों के आपसी झगड़ों के बीच सरकार की निष्पक्षता की संवैधानिक अपेक्षा की उन्होंने धज्जियां उड़ा दीं। अब जैसाकि तहलका के स्टिंग ऑपरेशन से यह साबित हो चुका है, उनके प्रशासन ने न सिर्फ दंगों में लापरवाही बरती, बल्कि खुलेआम एक समुदाय का साथ भी दिया। मोदी को अपनी इस करनी के लिए कभी अफसोस नहीं हुआ। बल्कि हमेशा वो गर्व से अपनी सरकार औऱ अपने दंगाई साथियों के पराक्रम का बखान करते रहे। ये सारी बातें सार्वजनिक चर्चा का हिस्सा रही हैं। सिविल सोसायटी के भीतर इसीलिए नरेंद्र मोदी का नाम एक खास ढंग की प्रतिक्रिया पैदा करता रहा है। वो भारत की आधुनिक चेतना के आगे एक ऐसा सवाल बन कर खड़े रहे हैं, जिसका जवाब संभवतः नागरिक समाज के पास नहीं है। एक ऐसा व्यक्ति जो आधुनिक राज्य-व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को न मानता हो, जो अपनी संवैधानिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों के लिए चुनौती बना हुआ हो, लेकिन वह इन्हीं सिद्धांतों के तहत चुनाव जीत कर एक प्रदेश के सबसे बड़े पद पर बना रहे, यह एक ऐसी दुविधा है, जिसका हल क्या हो, यह एक यक्ष प्रश्न रहा है।
सोहराबुद्दीन को फर्जी मुठभेड़ में मारे जाने को सही ठहरा कर अब मोदी ने अब इस प्रश्न को और भी गहरा कर दिया है। बल्कि यह प्रश्न अब उस कांटे की तरह हो गया है, जो हमेशा हर संवेदनशील नागरिक के कलेजे में चुभता रहे। यह चुभन कितनी गहरी है, मोदी औऱ उनके समर्थक चाहें तो इसका कुछ अंदाजा इसी से लगा सकते हैं कि सोहराबुद्दीन मामले में अब तक गुजरात सरकार की सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कर रहे वकील केटीएस तुलसी ने भी मोदी के माफी मांगने तक इस केस से अपने को अलग करने का एलान कर दिया है। आखिर एक वकील, जो अपनी पूरी पेशेवर क्षमता से राज्य सरकार की पैरवी कर रहा था, उसे क्यों खुद को अब इससे अलग दिखाना पड़ रहा है, यह सवाल मोदी और उनके समर्थकों के लिए एक आईना जरूर है।
इसके बावजूद आप यह उम्मीद नहीं कर सकते कि मोदी सचमुच इस आईने में अपनी तस्वीर देखेंगे। दरअसल, उनके पास ऐसे आईनों की कभी कमी नहीं रही। और न ही ऐसा है कि इन आईनों में उन्होंने अपनी तस्वीर न देखी हो। यहां मामला अज्ञान या जानकारी न होने का नहीं है। यहां मामला सोच-समझ कर राजनीतिक दांव खेलने और उसका फायदा उठाने का है। वरना, मोदी को आईना उनकी ही पार्टी के सबसे बड़े नेता अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर राज्य भारतीय जनता पार्टी में उनसे असंतुष्ट हुए नेता दिखाते रहे हैं। मगर इन सबकी अनसुनी कर अपने राजनीतिक दांव बढ़ाना अब तक मोदी के काम आता रहा है, और एक बार फिर उन्होंने यही रास्ता अख्तियार किया है। उन्होंने उग्र हिंदुत्व का कार्ड फिर खेलते हुए इस चुनाव में दांव एक बार फिर बढ़ा दिया है। मोदी के लिए कुर्सी दांव पर है। उनकी पार्टी के लिए वह राज्य दांव पर है, जिसे वह अपने मॉडल मानती है। संघ परिवार के लिए हिंदुत्व की यह प्रयोगशाल दांव है। इसके अलावा हम सबके लिए भी वहां काफी कुछ दांव पर है, लेकिन उसकी चर्चा से पहले एक और पहलू गौरतलब है। भारतीय जनता पार्टी ने गुजरात में यह दांव मोदी के कंधों पर सवार होकर खेलने का फैसला करते हुए भारतीय राष्ट्र के सामने एक बार फिर यह जाहिर किया है कि उसने २००४ के आम चुनाव में अपनी हार से कोई सबक नहीं सीखा। ना ही उसकी भारतीय संवैधानिक मूल्यों में कोई आस्था है। अगर ऐसा होता तो भाजपा जरूर समझती कि गोधरा कांड के बाद के दंगों से सारे देश में उसे कैसा नुकसान हुआ।
बहरहाल, भाजपा ने हम सबके सामने यह भी साफ कर दिया है कि उसकी राजनीति का मॉडल कैसा है। हम यह बहुत साफ देख सकते हैं कि इस मॉडल में लोकतंत्र की कोई अहमियत नहीं है। पार्टी को निरंकुश नेतृत्व से कामयाबी मिलती है, तो वह उसे मंजूर है। गुजरात में उसे वो नरेंद्र मोदी मंजूर हैं, जिनकी वजह से राज्य में पार्टी की जड़ें जमाने वाले केशुभाई पटेल और सुरेश मेहता जैसे नेताओं को बगावत की राह अपनानी पड़ी। नरेंद्र मोदी का सियासी तरीका ऐसा रहा है, जिसमें उन पर सवाल उठाने वाले किसी नेता के लिए जगह नहीं है। अगर यह तानाशाही नहीं है तो फिर तानाशाही कैसी होती है? इसीलिए गुजरात के चुनाव में दांव पर सीधे लोकतंत्र है। धर्मनिरपेक्षता वहां पिछले चुनाव में दांव पर लगी थी, और यह स्वीकार करने में हमें कोई हिचक नहीं चाहिए २००२ में भारतीय राष्ट्र का यह मूलभूत सिद्धांत पराजित हुआ। तब दांव पर कानून के शासन का सिद्धांत भी था और उसे भी तब हार का मुंह देखना पड़ा। अब मोदी ने सीधे भारत की न्याय व्यवस्था, और व्यापक अर्थों में संविधान को भी दांव पर लगा दिया है। उन्होंने यह साफ बता दिया है कि किसी को आतंकवादी घोषित करने और उसे मार देने का अधिकार उनको है। इसके लिए किसी कोर्ट या न्याय प्रक्रिया की जरूरत नहीं है। उनका पैगाम यह है कि वे ही राज्य-व्यवस्था के प्रतीक, उनके कर्णधार और उसके नियंता हैं। जो उनके खिलाफ है, वह देशद्रोही है। उन्हें अपना फैसला सुनाने के लिए किसी ‘सोनिया बहन की सलाह’ की जरूरत नहीं है, असल में उन्हें किसी संविधान या न्याय व्यवस्था की जरूरत भी नहीं है।
गुजरात के लोगों को ११ और १६ दिसंबर को यही फैसला करना है कि उन्हें ऐसा मोदी राज चाहिए, या उन्हें उस भारतीय संविधान का राज चाहिए, जिसके मूल्य स्वतंत्रता आंदोलन में विकसित हुए, जिसमें राज्य-व्यवस्था के दुनिया में अब तक विकसित हुए सर्वश्रेष्ट सिद्धांतों को अपनाया गया और जिसकी वजह से यह विभिन्नता भरा देश आज एक है। देश के बाकी हिस्सों के लोग दम साधे २३ दिसंबर का इंतजार करेंगे, जिस दिन गुजरात का फैसला सामने आएगा। अगर जन भावनाओं को भड़काने का मोदी का दांव फिर कामयाब हुआ तो भारतीय राष्ट्र पर एक ऐसा प्रहार होगा, जिसके असर से संभलने में फिर बरसों लगेंगे। मायूसी गुजरात में कांग्रेस के हाल से है। इसके बावजूद २००४ में मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा को २६ में १२ लोकसभा सीटों में हार का मुंह देखना ही पड़ा था। और इस बार जब कई समुदायों और तबकों में मोदी से नाराजगी खुलकर सामने आने के संकेत हैं, फिलहाल यह नहीं कहा जा सकता कि लोकतंत्र एक हारी हुई लड़ाई लड़ रहा है। उम्मीद की किरणें हैं औऱ हम उम्मीद कर सकते हैं कि २३ दिसंबर को कड़ाके की ठंड के बीच भी लोकतंत्र का सूरज गुजरात के क्षितिज पर उगेगा।

1 comment:

darshan said...

कुछ भी कहें मोदी ही जीतेंगे. मानिये या नही वे भविष्य में भारत के प्रधानमंत्री भी बनेंगे क्योकि वे हिंदुत्वा और विकाश साथ लेकर चलते हैं.