Friday, March 14, 2008

गंभीर मुद्दे पर सतही चर्चा


सत्येंद्र रंजन
गर मुंबई में भारत के सबसे धनी लोग नहीं रहते और यह महानगर टेलीविजन न्यूज चैनलों के लिए टीआरपी का सबसे बड़ा केंद्र नहीं होता, तो शायद राज ठाकरे और फिर बाल ठाकरे की उत्तर भारतीय समुदायों के खिलाफ आक्रामक टिप्पणियों का मामला उतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता, जितना वह बना हुआ नजर आता है। चूंकि मुंबई और महाराष्ट्र से जुड़ी हर बात आज बड़ी खबर बन जाती है, क्योंकि वहां सबसे ज्यादा क्रय शक्ति वाले दर्शक/ पाठक हैं, इसलिए ठाकरे चाचा-भतीजे की टिप्पणियां देश की एकता के लिए बड़े खतरे के रूप में पेश की गईं हैं। लेकिन हकीकत यह है कि विभिन्न समुदायों के बीच ऐसे पूर्वाग्रह न सिर्फ देश में अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं, बल्कि उनके हिंसक परिणाम भी हमें देखने को लगातार मिलते रहे हैं। जिन बिहारी या उत्तर भारतीय समुदायों पर अब ठाकरे चाचा-भतीजे ने निशाना साधा है, वे काफी समय से असम में उल्फा की हिंसा का शिकार हैं, जिनमें बहुत से लोग अपनी जान गवां चुके हैं और बहुत से लोग पलायन को मजबूर हुए हैं। लेकिन ऐसे इलाकों की ऐसी घटनाएं फौरी खबर बनकर रह जाती हैं, इसलिए कि वे इलाके टीआरपी ज़ोन में नहीं आते।
विभिन्न समुदायों के बीच एक दूसरे के लिए या किसी खास समुदाय को लेकर बड़े पैमाने पर पूर्वाग्रह का फैला रहना कोई नई बात नहीं है, और न ही उन पूर्वाग्रहों को भड़का कर राजनीतिक रोटियां सेकने की प्रवृत्ति नई है। दरअसल, आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने जो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, उनमें ऐसे पूर्वाग्रहों का हल भी एक अहम मुद्दा है। लेकिन यह हल तभी निकल सकता है, जब चिंता वास्तविक हो, और उदात्त मूल्यों और बड़े लक्ष्य की रोशनी में उन पर चर्चा हो।
भारतीय संविधान ने न सिर्फ देश के सामने ऐसे मूल्य और लक्ष्य रखे हैं, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारने के लिए संवैधानिक प्रावधान भी किए हैं। इसके बावजूद पिछले साठ साल में ठाकरे ब्रांड की राजनीति जारी रही है। अगर आरएसएस ब्रांड की राजनीति को इससे जोड़ कर देखा जाए तो यह राजनीति आज आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश कर रही है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि बहुत सी ऐसी राजनीतिक ताकतें जो इस ब्रांड की राजनीति का अतीत में हिस्सा नहीं रहीं, उन्होंने भी अब प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसे गले लगा लिया है। उदाहरण के तौर पर हम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ले सकते हैं। समाजवादी पृष्ठभूमि से आने का वो दावा करते हैं और आज बिहार के हितों की नुमाइंदगी करने का भी। लेकिन क्या वे इसका कोई तार्किक जवाब दे सकते हैं कि हर बिहारी को सौ बीमारी बताने वाले बाल ठाकरे की पार्टी के साथ वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में क्यों बने हुए हैं?
ठाकरे का उदय कांग्रेस की मौकापरस्त राजनीति से हुआ। हम सभी जानते हैं कि तब मकसद वामपंथी ट्रेड यूनियनों को कमजोर करना था और इसके लिए ठाकरे को आगे बढ़ाया गया। तब ठाकरे के निशाने पर दक्षिण भारतीय (मद्रासी) लोग थे। बाद में ठाकरे ने मराठी मानुष के अपने मुद्दे को हिंदू मानुष से जोड़ा और मुसलमानों को निशाना बनाया। अब राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों का सवाल उठाया है तो चाचा जान भी अपनी लाठी लेकर मैदान में कूद पड़े हैं। लेकिन बिहार या पूर्वांचल के लोग अपनी जमीन से क्यों पलायन करते हैं, या एक अखिल भारतीय बाजार में कैसे विभिन्न राज्यों के लोग एक से दूसरे राज्यों में जाकर काम कर रहे हैं, ऐसे आर्थिक और सामाजिक सवालों पर चर्चा के लिए इस प्रकरण में कोई गुंजाइश नहीं है। चर्चा सीधे ठाकरे द्वारा तय किए गए एजेंडे पर है। शायद इसलिए कि जो मीडिया या शासक समूहों के लोग इस चर्चा के सूत्रधार हैं, उनका हित भी इसी में है कि बात असली मुद्दों से भटकी रहे। बहरहाल, जिम्मेदार सामाजिक और राजनीतिक समूहों जरूर इस मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश करनी चाहिए।

1 comment:

धीरज चौरसिया said...

पलायन तो बंगाल से भी हो रहा ह और वहाँ के सत्ता पर काबिज लोग जोक के तरह जनता को चुस रहे है, आपको नंदीग्राम पर और भी कुछ कहना चाहिये और रही बात नीतीश जी की तो उनके पास कोई विकल्प ही नही था अगर आपके पास कोई हो तो अवश्य बताये ताकी हमे भी पता चले