Monday, October 1, 2007

लोकतंत्र के लिए बड़ी चुनौती



सत्येंद्र रंजन
सेतु समुद्रम मुद्दे पर आयोजित तमिलनाडु बंद को सुप्रीम कोर्ट द्वारा असंवैधानिक करार दिए जाने के बाद मुख्यमंत्री मुतुवेल करुणानिधि और उनकी सहयोगी पार्टियों ने भूख हड़ताल पर बैठने का सही फैसला किया। इससे भी ज्यादा कारगर फैसला शायद यह होता कि वे राज्य की जनता से एक दिन के अनशन की अपील करते। इस तरह वे गांधीवादी रास्ते से लोकतंत्र को नियंत्रित करने के एक प्रयास को माकूल जवाब देते। रॉलेट ऐक्ट पास होने और जलियांवाला बाग कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन की अपील की तो उन्होंने लोगों से प्रार्थना और उपवास करने को कहा। उनसे यह पूछा गया कि क्या वे आम हड़ताल की अपील कर रहे हैं तो उनका जवाब था- सिर्फ प्रार्थना और उपवास। महात्मा गांधी राजनीतिक आंदोलनों में धार्मिक शब्दावली का बखूबी उपयोग करते थे, इसलिए उनके लिए इन शब्दों को व्यापक प्रतिरोध का हथियार बना देना आसान था।
करुणानिधि और उनके कई साथी दलों की तर्कवादी राजनीति में शायद इसकी गुंजाइश नहीं है। चूंकि करुणानिधि इस वक्त सत्ता में हैं, इसलिए उनका सीधे सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सिविल नाफरमानी करना भी मुमकिन नहीं है। इसके बावजूद आम जन से भूख हड़ताल के जरिए एक सार्वजनिक आंदोलन का हिस्सा बनने की अपील करने का रास्ता उनके सामने था, जिसका वे ज्यादा प्रभावशाली इस्तेमाल कर सकते थे। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट का बंद पर प्रतिबंध लगा देना लोकतांत्रिक संदर्भ में बड़े सवाल खड़ा करता है, जिसका जवाब देश में जनतंत्र और जन अधिकारों में आस्था रखने वाली ताकतों को अब जरूर ढूंढना होगा।
रिकॉर्ड के लिए इसका जिक्र कर लेना जरूरी है कि सुप्रीम कोर्ट ने ताजा आदेश १९९८ के अपने फैसले की रोशनी में दिया है, जिसमें बंद और आम हड़ताल को असंवैधानिक ठहरा दिया गया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला केरल हाई कोर्ट के फैसले के खिलाफ दायर याचिका पर सुनवाई के बाद दिया था। केरल हाई कोर्ट ने राज्य के चैंबर ऑफ कॉमर्स एंड इंडस्ट्री की याचिका पर सुनवाई करते हुए बंद और आम हड़ताल पर रोक लगा दी थी। हाई कोर्ट ने यह फैसला भी दिया था कि बंद के दौरान होने वाले सार्वजनिक या निजी संपत्ति के किसी नुकसान की भरपाई बंद की अपील करने वाले संगठन को करनी होगी। यहां यह गौरतलब है कि यह फैसला बड़े व्यापारियों और उद्योगपतियों की याचिका पर दिया गया। यानी उन तबकों की याचिका पर जिनका हित सीधे तौर पर मेहनतकश तबकों और आम जन के अधिकारों पर नियंत्रण लगाने से जुड़ा है। सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले पर मुहर लगा दी। अदालत की दलील है कि आम लोगों का अधिकार पार्टियों के अधिकार से बड़ा है।
लेकिन सवाल है कि आखिर वे आम लोग कौन हैं? बंद और आम हड़ताल आम तौर पर उन तबकों के हथियार हैं, जिनकी बात इस व्यवस्था में नहीं सुनी जाती। या फिर यह राजनीतिक दलों या संगठनों का अपने कार्यक्रम और नीतियों पर जनमत बनाने का एक माध्यम है। ऐसी कार्रवाइयों से जनता की राजनीतिक चेतना में विस्तार होता है, इससे वह अपने अधिकारों के लिए जागरूक होती है और इससे राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में वे मुद्दे सामने आते हैं, जो आम राजनीतिक गतिविधियों की वजह से नहीं आ पाते। अगर बंद और आम हड़ताल पर प्रतिबंध होता, या उस प्रतिबंध का उल्लंघन नहीं किया गया होता तो देश का स्वतंत्रता आंदोलन कभी व्यापक जन आंदोलन नहीं बन पाता। न ही आजादी के बाद सदियों से दबा कर रखे गए समूहों में लोकतांत्रिक चेतना का विस्तार हो पाता।
असल में समस्या यही चेतना है, जिस पर अंकुश लगाना सत्ता और सुविधाओं पर कब्जा जमाए बैठे तबकों की आज सबसे बड़ी चिंता बन गई है। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि न्यायपालिका और कई दूसरी संवैधानिक संस्थाएं इस प्रयास का हिस्सा बनी हुई हैं। हालांकि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है। न्यायपालिका को संचालित करने वाले समूहों का वर्ग आधार आम तौर पर अभिजात्यवर्गीय रहता है। ऐसा सिर्फ भारत में नहीं है, बल्कि दुनिया के दूसरे देशों में भी, जहां लोकतंत्र के प्रयोग हुए, इसकी मिसाल देखी जा सकती है। भारत में सन् साठ के दशक में न्यायपालिका ने प्रीवी पर्स खत्म करने और बैंकों के राष्ट्रीयकरण जैसे प्रगतिशील कदमों पर रोक लगा दी, तो १८९० के दशक के मध्य में अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट ने आय कर को असंवैधानिक करार देकर धनी तबकों को बड़ा लाभ पहुंचाया था। आज भी अमेरिका में न्यायपालिका को मोटे तौर पर दक्षिणपंथी हितों का रक्षक माना जाता है।
इसलिए अगर लोकतंत्र को नियंत्रित करने की मंशाओं के साथ कुछ संवैधानिक संस्थाओं का मेल हो जाए तो इसमें कोई हैरत की बात नहीं है। हैरत की बात उस पर राजनीतिक दलों की दब्बू प्रतिक्रिया है। १९९८ में जब यह फैसला आया, तभी विधायिका को इस पर पहल कर लोकतांत्रिक अधिकारों में कटौती की इस कोशिश को नाकाम कर देना चाहिए था। लेकिन दुर्भाग्य से विधायिका में एक बड़ा हिस्सा दक्षिणपंथी हितों का रक्षक है औऱ एक दूसरा बड़ा हिस्सा अवसरवादी है, जिसके पास इस देश को लेकर कोई सपना नहीं है। ऐसे में विधायिका भले चुनी जनता से जाती हो, लेकिन वह मजबूती से जन अधिकारों की रक्षा नहीं कर रही है।
बहरहाल, यह सवाल उस समय उठा है, जब एक दूसरे मामले में मीडियाकर्मी और न्यायपालिका आमने-सामने हैं। पत्रकार मिड डे अखबार के अवमानना मामले को अभिव्यक्ति की आजादी पर प्रहार बताकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए मैदान में उतरे हुए हैं। यह न्यायोचित संघर्ष है, और इसमें सबको भागीदार बनना चाहिए। लेकिन मीडियाकर्मियों के सामने भी यह सवाल है कि क्या उन्हें सिर्फ अपने अधिकारों की चिंता है, या फिर वे जनता के व्यापक अधिकारों से भी वास्ता रखते हैं? अगर इनसे वास्ता रखते हैं तो उन्हें जन अधिकारों की कटौती से ऐसे सभी सवालों को उठाना चाहिए। अगर पत्रकारों का आंदोलन यह नहीं करता है तो बड़े जनतांत्रिक संदर्भ में उस आंदोलन का कोई मतलब नहीं है।
तमिलनाडु के मामले में सुप्रीम कोर्ट का आदेश उन फैसलों की शृंखला का ही हिस्सा है, जो हाल के वर्षों में उसकी खास पहचान बने रहे हैं। आम मेहनतकश जनता के अधिकारों के संघर्ष पर लगाम, उसे लंबे संघर्ष से मिली आजादियों पर अंकुश और पूंजीवादी हितों की रक्षा इसके खास रुझान रहे हैं। ऐसा हर फैसला यही संदेश देता गया है कि लोकतांत्रिक शक्तियां लंबे समय तक इस परिस्थिति की अनदेखी करने का जोखिम नहीं उठा सकतीं। उन्हें साहस दिखाना होगा और न्यायपालिका को यह बताना होगा कि उसकी संवैधानिक हदें कहां हैं।

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