Saturday, February 7, 2009

कांग्रेस का आत्म-ध्वंस


सत्येंद्र रंजन
कांग्रेस का फैसला है कि वह अगले आम चुनाव में यूपीए गठबंधन के रूप में मैदान नहीं उतरेगी, बल्कि राज्यों के स्तर पर सिर्फ चुनावी समझौते करेगी। पार्टी दूसरा संकेत यह दे रही है कि वह फिर से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करेगी। ये दोनों फैसले सिर्फ इस बात की ही मिसाल हैं कि कांग्रेस के नेता जिस जनादेश के आधार पर पिछले पांच साल से केंद्र में सत्ता का सुख भोग रहे हैं, उसे समझने में वे नाकाम हैं। या यह कहा जा सकता है कि अहंकार उन्हें उस जनादेश का मतलब और देश के राजनीतिक यथार्थ को समझने नहीं दे रहा है। २००४ में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी एजेंडे के खिलाफ आम लोगों के आक्रोश से तैयार हुआ था। तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एनडीए के खिलाफ एक ऐसा गठबंधन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी, जो जनता के उस आक्रोश का वाहक बना।

भाजपा फिर उसी सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी एजेंडे के साथ चुनाव में उतरने को तैयार है। देश का व्यापक जनमत आज भी उस खतरे को समझता है और इसी वजह से मध्यमार्गी-धर्मनिरपेक्ष विकल्प के लिए स्थितियां काफी हद तक अनुकूल नज़र आती हैं। लेकिन कांग्रेस नेता इस तकाज़े को समझने में बिल्कुल अक्षम नजर आते हैं। उन्हें यह साधारण सी बात समझ में नहीं आती कि आज की परिस्थिति में ऐसा विकल्प कांग्रेसे अकेले नहीं बन सकती। वह महज उन दलों और ताकतों का नेतृत्व कर सकती है. जो आपस में मिलकर ऐसा विकल्प तैयार करते हैं।

शायद कांग्रेस नेताओं ने नवंबर के विधानसभा चुनावों के नतीजे का गलत निष्कर्ष निकाला है। यह ठीक है कि दिल्ली में कांग्रेस को आश्चर्चजनक जीत मिली और भाजपा का आतंकवाद का मुद्दा सिरे से नाकाम रहा, लेकिन यह किसी भी रूप में कांग्रेस के पक्ष में देश में चल रही किसी लहर का संकेत नहीं है। आखिर भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एंटी इन्कंबेंसी के पहलू को बेअसर करने में सफल रही और राजस्थान में भी कांग्रेस तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। इसलिए इन चुनाव नतीजों पर आह्लादित होने के बजाय कांग्रेस नेताओं के लिए इन्हें एक चुनौती के रूप में लेना ज्यादा उचित होता। जाहिर है, ऐसे में गठबंधन के महत्त्व के समझने औऱ मौजूदा गठबंधन के दलों के बीच पूरे तालमेल की जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी कांग्रेस नेतृत्व को अपने कंधे पर लेनी चाहिए थी। लेकिन वे उलटे रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं।

देश के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमे में २००४ में उभरी आम सहमति को कांग्रेस अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर पहले ही तोड़ चुकी है। उसने इस मुद्दे पर वामपंथी दलों से नाता तोड़ लिया, जो आम सहमति का खास हिस्सा थे। बल्कि इस आम सहमति को विश्वसनीय और उद्देश्यपूर्ण बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका वामपंथी दलों की ही थी। अब मनमोहन सिंह को फिर से अपना नेता बता कर कांग्रेस वामपंथी दलों से अपनी दूरी और बढ़ाने पर आमादा नजर आ रही है।

मनमोहन सिंह ने जिस तरह अमेरिका से परमाणु करार को अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया और उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए जिस रास्ते पर चले, उसके बाद देश के प्रगतिशाली समूहों में उनके लिए कोई सम्मान नहीं बचा है। खासकर सरकार के लिए बहुमत जुटाने के लिेए जिस तरह के तिकड़मों का सहारा लिया गया और राजनीतिक भ्रष्टाचार का जैसा खुला खेल हुआ, उसके बाद उनकी अपनी निजी छवि भी पहले जैसी नहीं बची। आज यह शायद ही कोई मानता हो कि मनमोहन सिंह एक टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्री हैं, जो आम नेताओं के कल्चर से ऊपर हैं और जिनकी अपनी छवि बेदाग है। यह मुमकिन है कि इसके बावजूद डॉ. सिंह पूंजीपतियों के प्रिय हों और देश के उच्च मध्यम और मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा उन्हें बाकी नेताओं से बेहतर मानता हो, लेकिन हकीकत यही है कि इस देश की राजनीतिक तस्वीर ये तबके तय नहीं करते। वैसे भी ये तबके कांग्रेस से ज्यादा भाजपा का समर्थन आधार हैं।

अपने सहयोगी दलों, और व्यापक रूप से अपने समर्थन आधार का निरादर कर कांग्रेस ने देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा दी है। उसके इस नजरिए से यूपीए के कई घटक दल चुनाव बाद के अपने विकल्पों पर अभी से सोचने लगे हैं। उधर वामपंथी दलों के पास कांग्रेस और भाजपा से अलग तीसरे विकल्प की संभावना तलाशने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है। दुर्भाग्य यह है कि इस तीसरे विकल्प के साथ भी ऐसे दल हैं, जिनकी अपनी निष्ठा संदिग्ध है। मायावती हों या जयललिता या फिर एचडी देवेगौड़ा अथवा चंद्रबाबू नायडू, ये सभी अतीत में भाजपा के सहयोगी रह चुके हैं। भविष्य में ये फिर उसी तरह का सहयोग भाजपा से नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जाहिर है, इसके साथ एक फौरी ताकत तो बनाई जा सकती है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशील नीतियों के आधार पर कोई भरोसेमंद विकल्प तैयार नहीं किया जा सकता।
ऐसे में अपना बहुमत न मिलने के बावजूद चुनाव के बाद भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बन जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। या फिर संयुक्त मोर्चा जैसे अस्थिर प्रयोगों की गुंजाइश भी निकल सकती है। लेकिन ऐसे प्रयोग का हश्र देश पहले भी देख चुका है, और उसका दोहराव देश के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील समूहों में सिर्फ असहाय होने का भाव ही पैदा करेगी।

यूपीए ने कोई ऐसा शासन नहीं दिया जिसकी सकारात्मक कसौटियों पर तारीफ की जाए। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, सूचना का अधिकार कानून और आदिवासी एवं अन्य वनवासी भू-अधिकार कानून जैसी कुछ पहल का श्रेय इसे है, लेकिन यह कितनी अनिच्छा से हुआ और अमल में कैसी ढिलाई बरती गई, वह भी देश के सामने है। अपनी अभिजात्यवादी आर्थिक और विदेश नीतियों से यूपीए सरकार ने देश के बहुत से तबकों को नाराज किया। और आखिरकार मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए तमाम अनैतिक तरीकों का सहारा लेते हुए पिछले जुलाई सत्ताधारी गठबंधन ने बचा-खुचा ऐतबार भी खो दिया।

इसके बाद इसके पास एक ही थाती बची, और वह इसके सहयोगी दल हैं। लेकिन अपनी नासमझी और अहंकार में वह इन्हें भी गंवाने को तैयार है। ठीक उसी तरह जैसे एक जड़विहीन प्रधानमंत्री की जिद को पूरा करने के लिए उसने वामपंथी दलों के सिद्धांतनिष्ठ समर्थन को गंवा दिया। निष्कर्ष यही है कि सोनिया गांधी ने २००४ की अपनी भूमिका से अपनी जो आदरणीय छवि बनाई थी, पिछले कुछ महीनों से खुद ही वो लगातार उसका ध्वंस कर रही हैं। और इससे उन्हीं ताकतों के लिए बेहतर स्थितियां बन रही हैं, जिनके खिलाफ पहल कर उन्होंने अपने और अपनी पार्टी के लिए नई प्रासंगिकता और राजनीतिक वैधता हासिल की थी।

Tuesday, January 27, 2009

स्लमडॉग्स और संकीर्ण सोच


सत्येंद्र रंजन
स्लमडॉग मिलिनेयर (या करोड़पति) तकनीक और सिनेमाई भाषा की अपनी खूबियों की वजह से दुनिया भर में तारीफ बटोर रही है। संभवतः ऑस्कर का सर्वोच्च सम्मान भी इसकी झोली में आ जाए। चूंकि फिल्म भारत की पृष्ठभूमि पर है, जिस उपन्यास पर यह आधारित है उसे एक भारतीय ने लिखा है, फिल्म के कलाकार भारतीय हैं और निर्माण से जुड़ी टीम में भी भारतीयों का बड़ा हिस्सा है, इसलिए मोटे तौर पर इस फिल्म को भारत की कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है। खासकर इस फिल्म से संगीतकार एआर रहमान की दुनिया में जैसी पहचान बनी है, उस पर भारत में फख्र है, जो स्वाभाविक एवं उचित ही है।

लेकिन हकीकत यह है कि यह फिल्म दुनिया के सामने भारत की जैसी तस्वीर पेश करती है, उस पर फख्र करने लायक कुछ भी नहीं है। देश के उच्च एवं मध्य वर्ग, और उनको ध्यान में रख कर चलने वाला कॉरपोरेट मीडिया अक्सर इस हकीकत नजरअंदाज करते हैं। यहां यह गौरतलब है कि भारत में सिनेमा, खासकर गंभीर सिनेमा के दर्शक ज्यादातर उच्च और उच्च-मध्यम वर्गों से ही आते हैं। मल्टीप्लेक्स कल्चर आने के बाद तो यह बात और भी तय-सी हो गई है। अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी के अध्ययन की रोशनी में देखें तो ये तबके देश की आबादी के १० से १५ फ़ीसदी से ज्यादा नहीं हैं। यही देश के अप-मार्केट तबके हैं, और अगर राजनीतिक संदर्भ में कहें तो ‘इंडिया शाइनिंग’ (अथवा भारत उदय) की बनाई गई धारणा का समर्थन आधार हैं।

स्लमडॉग मिलिनेयर इस धारणा के सामने कोई सवाल खड़े नहीं करती। लेकिन वह एक हकीकत जरूर दिखाती है, जिससे यह धारणा स्वतः खंडित होती है। यह दुनिया के सामने ऐसी तस्वीर पेश करती है, जो बताती है कि भारत में सबकी जिंदगी चमक नहीं रही है और सबके उदय का रास्ता एक्सप्रेस वे से होकर नहीं गुजर रहा है। इस तस्वीर का चित्रण इतना शक्तिशाली है कि वह दर्शक के मन में अशांति जरूर पैदा करता है। हालांकि फिल्म की कहानी का क्लाइमैक्स मुख्य किरदार की ‘तकदीर’ से तय होता है। करोड़़पति बनने के गेम शो में जोखिम उठाकर बोला गया उसका दांव कामयाब रहता है और वो दो करोड़ रुपए जीत लेता है। इसके साथ ही उसका बचपन का प्यार भी उसे मिल जाता है और ‘जय हो...’ की धुन पर उनके नाच के साथ ड्रामा का सुखांत हो जाता है।

मगर दुर्भाग्य से सबकी तकदीर जमाल मलिक (मुख्य किरदार) जैसी नहीं होती। अगर फिल्म इस बात को याद दिलाते हुए खत्म होती तो वह यथार्थ से ज्यादा करीबी रिश्ता बनाए रख सकती थी। बहरहाल, यह बहस का मुद्दा नहीं है। विचार-विमर्श का मुद्दा वह पृष्ठभूमि है, जहां जमाल मलिक जैसी करोड़ों ज़िंदगियों के लिए आज भी कोई बेहतर संभावना नहीं है। करीब साठ साल पहले राज कपूर ने अपनी फिल्म आवारा में इन संभावनाविहीन जिंदगियों की तस्वीर दिखाई थी औऱ स्लमडॉग मिलिनेयर इस बात की तस्दीक करती है कि इतनी लंबी अवधि में भी वहां के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आवारा ने अपराध के समाजशास्त्र का चित्रण किया था। उसके मुख्य पात्र ने बताया था कि कोई शख्स अपराध के कीड़े अपने भीतर लेकर पैदा नहीं होता, बल्कि जिन ‘गंदे नालों’ के पास उन्हें रहने को मजबूर कर दिया जाता है, वहां से उनके भीतर ये कीड़े प्रवेश करते हैं।

आतंकवाद के इस दौर में अपराध पर ऐसी चर्चा सिरे से गायब नज़र आती है। जब तक वो ‘गंदे नाले’ हैं, समाज सुरक्षित नहीं हो सकता, इस साधारण सी बात पर मीडिया से लेकर सियासत तक में आज चुप्पी है। आतंकवाद, अंडरवर्ल्ड और आम अपराध के रिश्तों पर तो खूब जोर दिया जाता है, लेकिन इनकी जड़ों को समझने में उतनी ही उदासीनता दिखाई जाती है। नतीजा इस चर्चा का लगातार संकीर्ण दायरे में सिमटते जाना है। इसका व्यावहारिक परिणाम है- सुरक्षा बलों पर संपूर्ण निर्भरता और युद्ध जैसी मानसिकता का प्रसार।

अगर इस सोच की तह में जाने की कोशिश करें तो ऐसा आभास होगा जैसे समाज में कुछ ‘अच्छे‘ लोग हैं जो आराम से अपनी जिंदगी गुजारना चाहते हैं, लेकिन उन पर ‘बुरे लोग‘ आक्रमण कर रहे हैं। ये ‘बुरे लोग‘ अपराधी, आतंकवादी, नक्सलवादी या और कुछ भी हो सकते हैं। इन पर काबू पाने का अकेला तरीका यही है कि इन्हें कुचल दिया जाए। इसलिए कानून को लगातार कड़ा किए जाने और सुरक्षा तैयारियों में लगातार ज्यादा ताकत झोंकने की जरूरत है। इस सोच के आर्थिक एवं सामाजिक आधारों की स्पष्ट पहचान की जा सकती है। जाहिर है, राजनीतिक स्तर पर बनने वाली ऐसी नीतियों के निहितार्थों को भी समझा जा सकता है। इसलिए इसमें कोई अचरज नहीं कि ऐसी नीतियों पर लगातार अमल के बावजूद समाज सुरक्षित नहीं बन पा रहा है।

स्लमडॉग मिलिनेयर बतौर फिल्म कोई संदेश नहीं देती है। आखिर में अगर वह कुछ कहती भी है तो वह भाग्यवाद है। लेकिन उसकी पृष्ठभूमि एक संवेदना पैदा करती है। यह संवेदना अपने देश का सच है। लेकिन चाहे सरकार हो, शासक समूह या उनसे संचालित मीडिया- वो अक्सर न सिर्फ इस सच से आंख चुराने की कोशिश करते हैं, बल्कि इस पर परदा डालने का प्रयास भी किया जाता है। अगर कभी संवेदना जगती भी हो तो करो़ड़ों लोगों की बदहाली को तकदीर का खेल मानकर आगे बढ़ जाया जाता है। इस जगह पर इस फिल्म और ऐसी आम सोच में एक मेल देखा जा सकता है। क्या इस फिल्म पर देश के प्रभुत्वशाली समूहों में गर्व की एक वजह यह भी है?

कुछ जानकारों ने कहा है कि आज का भारत एक आत्मविश्वास से भरा देश है। इसे अपनी कमियों और सामाजिक विद्रुपताओं को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है। यह १९६०-७० के दशक का भारत नहीं है, जब यथार्थ दिखाने वाली रचनाओं पर हाय-तौबा मचाई जाती थी और उसे देश की छवि बिगाड़ने का प्रयास समझा जाता था। बल्कि यह उभरता भारत है जिसकी छवि तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था और इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी की ताकत की है और इसलिए वह दुनिया के सामने अपनी विद्रुपताओं के साथ भी खड़ा हो सकता है।

इस बात में दम है। दरअसल, अगर भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म दुनिया के स्तर पर धूम मचा रही है तो इसके पीछे एक कारण भारत की नई छवि भी है। लेकिन भारत के करोडों लोगों के लिए मुद्दा विद्रुपताओं को महज स्वीकार करना नहीं, बल्कि उनसे मुक्ति पाना है। उनके लिए सबसे अहम सवाल है कि क्या यह मौजूदा व्यवस्था में मुमकिन है? यह व्यवस्था अपनी सोच को व्यापक सामाजिक आयाम दे तो वह इसका जवाब हां में दे सकती है। अगर यह संभव हो तो समाज को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित बनाना भी संभव हो सकता है। वरना, यह विद्रूपता देश के चमकते हिस्से पर अक्सर ग्रहण लगाती रहेगी। इसलिए कि देश के करोड़ों ‘स्लमडॉग्स’ की ‘तकदीर’ जमाल मलिक जैसी नहीं है!

Friday, January 9, 2009

आतंकवाद और लापरवाह सियासत

सत्येंद्र रंजन
ई बनी राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी की भूमिका और दायरे पर हाल ही में हुए मुख्यमंत्रियों के सम्मेलन में एनडीए से जुड़े मुख्यमंत्रियों ने जैसे सवाल उठाए और उस पर सरकार का जो जवाब रहा, उससे यह बात साफ हो गई कि बेदह महत्त्वपूर्ण मुद्दों पर भी राजनीतिक दलों का रवैया कितना लापरवाह और गैर-जिम्मेदार रहता है। एनडीए के मुख्यमंत्रियों ने कहा कि यह एजेंसी संघीय ढांचे के खिलाफ है, क्योंकि कौन से मामले वो अपने हाथ में लेगी और कौन से नहीं लेगी, यह तय करने में राज्य सरकारों की कोई भूमिका नहीं होगी। इस पर गृह मंत्री चिदंबरम ने कहा कि अगर इस एजेंसी को गठित करने के लिए बनाए गए कानून में कोई छेद है, तो उसे भरने के लिए फरवरी में संसद में संशोधन विधेयक लाया जा सकता है।

सिर्फ़ इन दो बयानों से यह साफ हो जाता है कि यह कानून सोच-विचार कर नहीं बनाया गया है। मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद देश में बने माहौल के बीच यह एक जल्दबाजी में की गई प्रतिक्रिया थी। मकसद आतंकवाद से लड़ना नहीं बल्कि देश की जनता को यह दिखाना (अथवा भ्रम पैदा करना) था कि सरकार कुछ कर रही है। गौरतलब है कि भारतीय जनता पार्टी और एनडीए के उसके सहयोगी दल आरंभ से आतंकवाद के खिलाफ कोई राष्ट्रीय या संघीय एजेंसी बनाए जाने के खिलाफ थे। यह प्रस्ताव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का था, लेकिन विपक्ष की सहमति न मिलने की वजह से लंबे समय से टल रहा था।

लेकिन मुंबई हमलों के बाद जिस तरह मीडिया ने माहौल बनाया, खास कर जैसे राजनेताओं के खिलाफ सभ्रांत वर्ग के गुस्से का इजहार वहां देखने को मिला, उससे वामपंथी दलों को छोडकर बाकी विपक्षी दलों ने इस कानून के विरोध की हिम्मत नहीं दिखाई। वामपंथी दलों ने भी महज अपना विरोध दर्ज भर कराया, इसमें उन्होंने अपनी ताकत नहीं झोंकी। अब माहौल ठंडा होने पर एऩडीए इस कानून की खामियां उजागर कर रहा है और उधर सरकार के सोच-विचार का हाल यह है कि वह कानून बनने के महीने भर के भीतर ही इसमें संशोधन को तैयार हो गई है। यूपीए सरकार और एनडीए दोनों का यह नजरिया ही यह समझने के लिए काफी है कि वो आतंकवाद से लड़ने के प्रति कितने गंभीर हैं?

जब इतने गैर जिम्मेदार तरीके से इतने महत्त्वपूर्ण मसलों पर राजनीतिक दल काम करते हों तो उनसे आप नागरिक अधिकारों और बुनियादी लोकतांत्रिक सिद्धांतों के प्रति सचेत रहने की आशा शायद ही कर सकते हैं। इसकी मिसाल सामने है एक दूसरे कानून के रूप में। सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा एजेंसी के साथ ही गैर कानूनी गतिविधि (निरोधक) कानून में संशोधन भी पास करा लिया। इसमें कई ऐसे प्रावधान जोड़ दिए गए हैं, जो पहले पोटा में थे और जिनका कांग्रेस पार्टी और उसके सहयोगी दल विरोध करते थे। मसलन, प्राकृतिक न्याय के खिलाफ यह प्रावधान कि इस कानून के तहत आरोपी बनाए जाने पर खुद को निर्दोष साबित करने की जिम्मेदारी आरोपी की है। और यह कि अब इस कानून के तहत छह महीनों तक जमानत नहीं हो सकेगी। यूपीए सरकार ने सिर्फ इतनी रहम दिखाई कि पुलिस के सामने दिए गए बयान को आखिरी सबूत मानने का प्रावधान संशोधित कानून में शामिल नहीं किया। इस संशोधन से भाजपा औऱ उसके साथी खुश हैं। उनका यह दावा सही है कि आखिरकार इस मुद्दे पर उनकी वैचारिक जीत हुई है।

लेकिन समस्या यह है आतंकवाद के पेच कहीं ज्यादा उलझे हुए हैं और उसका समाधान सिर्फ ऐसे कानूनों ने नहीं हो सकता। टाडा और पोटा के अनुभवों के बाद तो यह बात को सामान्य विवेक से ही समझा जा सकता है। दरअसल, कानून की भूमिका तब शुरू होती है, जब आतंकवादी गतिविधियों को अंजाम दे दिया गया होता है। उसके बाद अगर आतंकवादी पकड़े जा सकें तब उन पर मुकदमे की प्रक्रिया शुरू होती है और कठोरतम कानून भी सिर्फ उसी स्थिति में कारगर हो सकता है। लेकिन जो आतंकवादी आत्मघाती होने की हद तक चले जाते हैं, वो ऐसी स्थितियों से शायद ही डरते हैं। हालांकि यह बात अनेक बार दोहराई जा चुकी है, लेकिन इस संदर्भ में इसे जरूर याद कर लिया जाना चाहिेए कि टाडा और पोटा दोनों के ही तहत सजा होने का प्रतिशत बेहद कम रहा और यह बात बहुत से आतंकवाद विरोधी सुरक्षा विशेषज्ञों ने भी मानी कि वे कानून आतंकवाद पर लगाम लगाने में नाकाम रहे।

जब वो कानून अपेक्षित नतीजे नहीं दे सके तो नए कानून इस कसौटी पर खरे उतरेंगे ऐसी उम्मीद रखने की शायद ही कोई वजह है। बल्कि यह बात अब ज्यादा साफ हो चुकी है कि अधिक जरूरत हमलों को रोकने के उपायों की है, जिसमें खुफिया तंत्र और सुरक्षा एजेंसियों के बीच तालमेल बेहतर करना सबसे पहली शर्त है। सरकार ने इस दिशा में कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन ये कितने सफल होंगे, अभी यह देखना है। बहरहाल, इससे भी ज्यादा जरूरी ऐसा सामाजिक परिवेश बनाने की है, जिसमें आतंकवाद को अपने पैर पसारने का मौका न मिले। गौरतलब है कि कठोर कानून, जिनमें बुनियादी नागरिक अधिकारों की रक्षा का ख्याल न किया गया हो, विभिन्न वर्गों और समुदायों के बीच ऐसे असंतोष की वजह बन जाते हैं, जिससे विपरीत नतीजा सामने आता है।

मुश्किल यह है कि देश के शासक समूहों ने आतंकवाद और उससे लड़ने को तरीकों पर व्यापक नजरिया अपनाने के बजाय इस पूरी बहस को संकीर्ण दायरे में समेट दिया है। इसकी ही ये मिसाल है कि जिहादी आतंकवाद, क्षेत्रीय उग्रवाद और वाम-चरमपंथ को एक ही खाने में डाल दिया गया है। ये सारी धाराएं क्यों पैदा हुईं और इनके पीछे कौन सी ताकतें हैं, बिना इसका वस्तुगत विश्लेषण किए इन सबसे निपटने का एक जैसा तरीका अपनाना शासक वर्गों की समझदारी पर गहरे सवाल उठाता है। आधुनिक, सबको समान दर्जे के साथ खुद में शामिल कर चलने वाले धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक भारतीय राष्ट्रवाद की मूल धारणा पर हमला करने वाले धर्मांध आतंकवादियों का मकसद किसी भी रूप में उन चरमपंथियों से मेल से नहीं खाता जो देश की आबादी के एक बड़े हिस्से के विकास एवं बुनियादी स्वतंत्रताओं से वंचित रहने की वजह से शक्ति एवं प्रासंगिकता हासिल करते हैं। न ही उनकी लड़ाई का तरीका एक जैसा है।

बहरहाल, ये सारी बातें तभी राष्ट्रीय विमर्श में महत्त्व पा सकती हैं, अगर सचमुच किसी समस्या का हल निकालने का सब्र एवं इच्छाशक्ति हो। या फिर ऐसा लोकतांत्रिक दबाव हो, जिसकी अनदेखी सत्ताधारी नहीं कर सकें। दुर्भाग्य यह है कि जिस मीडिया का दबाव कारगर होता है, वह खुद कॉरपोरेट पूंजी के हितों के मुताबिक बेहद संकीर्ण वैचारिक दायरे में काम कर रहा है और कठोर कानून से सबको सुरक्षित बनाने का भ्रम पैदा करने में सरकार के साथ सहभागी है। इसका परिणाम यह हो रहा है कि हम आतंकवाद से तो सुरक्षित नहीं ही हो पा रहे हैं, लंबे संघर्ष से हासिल हमारी नागरिक स्वतंत्रताएं भी संकुचित होती जा रही हैं।

Friday, December 26, 2008

साजिश की सोच के सरोकार


सत्येंद्र रंजन
मुंबई पर आतंकवादी हमले के कुछ ही दिन के भीतर ये चर्चा कई हलकों में सुनी जानी लगी कि इस हमले के पीछे हिंदू-यहूदी चरमपंथियों और अमेरिका का हाथ है। जी नहीं, हम पाकिस्तान के मीडिया की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात भारत के उन समूहों की बात कर रहे हैं, जो अपने को न सिर्फ प्रगतिशील, बल्कि क्रांतिकारी भी मानते हैं। ये मुमकिन है कि ऐसे मौकों पर कॉरपोरेट मीडिया में अंधराष्ट्रवाद की जो लहर आती है, उससे बेचैन हो जाते हों और एक दूसरे चरम पर जाकर उतनी ही विवेकहीन प्रतिक्रिया जताने लगते हों। बहरहाल, यह साफ कि ऐसी प्रतिक्रिया विशुद्ध रूप से भावनात्मक होती है, और उससे तर्क-वितर्क की ज्यादा गुंजाइश नहीं होती। इसके बावजूद ऐसी सोच पर चर्चा जरूर होनी चाहिए। इसलिए कि भले ही साजिश के ऐसे सिद्धांत हाशिये पर ही रहते हों, लेकिन यह उन लोगों का समूह है, जो मौजूदा व्यवस्था का विकल्प उपलब्ध कराने का भ्रम रखते हैं और ऐसा ही दावा करते हैं।

वर्षों के अनुभव से यह समझ अब ठोस रूप ले चुकी है कि राजनीति के व्यापक दायरे में जो बहुत सी बातें कही जाती हैं, उनका सबका आधार राजनीतिक और वैचारिक या विचारधारात्मक रुख नहीं होता। बल्कि बहुत से सामाजिक-राजनीतिक संगठनों के रुख या सार्वजनिक बयानों का आधार दरअसल मनोवैज्ञानिक होता है। कोई भी क्रांतिकारी या प्रगतिशील विचारधारा जहां समाज और उसके विकासक्रम की वस्तुगत समझ पर आधारित होती है, वहीं कुछ संदर्भों में विरोध का मनोविज्ञान ऐसी जटिल प्रक्रियाओं और परिस्थितियों को समझ सकने की अक्षमता का भी परिचायक होता है। ऐसी अक्षमता के शिकार समूहों में, जिस बात को ज्यादातर लोग मानते हों, वैसी हर बात को नकारने और उसका विरोध करने की प्रवृत्ति सहज देखी जा सकती है। यह ऐसा मनोविज्ञान इस बन जाता है, जिसमें सबसे अलग रुख लेना और उसमें ही अपनी सार्थकता समझना आम हो जाता है। जाहिर है, इसमें विवेक और जिम्मेदारी की भावना की बलि चढ़ा दी जाती है।

मुंबई के हमलों के पीछे हिंदू-यहूदी चरमपंथियों और अमेरिका का हाथ देखना सिर्फ इसी मनोविज्ञान की अभिव्यक्ति है। और चूंकि ये लोग भारत में रहते हैं, जहां मीडिया और शासक समूहों ने पहले के अनेको मौकों की तरह मुंबई पर हमलों के फौरन बाद भी पाकिस्तान विरोधी माहौल बना दिया, इसलिए एक दूसरे चरम पर जाकर पाकिस्तान से सहानुभूति रखना का अपना फर्ज उन्होंने इस मौके पर भी निभाया है। इसी मानसिकता का एक और इजहार अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री अब्दुल रहमान अंतुले के हेमंत करकरे के बारे में दिए गैर जिम्मेदाराना बयान का बचाव भी है, जिसमें इस समूह के लोगों ने अपनी धर्मनिरपेक्षता की प्रखरता देखी।

जबकि प्रगतिशीलता औऱ धर्मनिरपेक्षता का तकाजा यह है कि मुंबई पर हमलों को धार्मिक कट्टरपंथ और आतंकवाद के लगातार बढ़ रहे खतरे के संदर्भ में देखा जाए। हमलावर पाकिस्तान से आए, इसमें शायद ही कोई संदेह है। लेकिन इसमें पाकिस्तान सरकार का कोई हाथ है, यह शक करने की शायद ही कोई वजह है। बल्कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के इस बयान पर सहज भरोसा किया जा सकता है कि हमले के पीछे नॉन स्टेट ऐक्टर्स (यानी ऐसे लोग जिन पर सरकार का नियंत्रण नहीं है) शामिल थे। उन नॉन स्टेट ऐक्टर्स पर काबू पाना और उनके आतंकवादी ढांचे को खत्म करना निसंदेह पाकिस्तान सरकार की जिम्मेदारी है, लेकिन यह काम कठिन और पेचीदा है, इसे हम सभी जानते हैं। बेहतर होता, अगर इस बात को ध्यान में रखते हुए सारी चर्चा होती।

अगर ऐसा होता तो भारत और पाकिस्तान के बीच बहुत लंबे इंतजार और बड़ी मेहनत से शुरू हो सकी शांति प्रक्रिया आतंकवादियों की मंशा के मुताबिक मुंबई हमलों का शिकार नहीं होती। भारत और पाकिस्तान दोनों का दीर्घकालिक हित इस शांति प्रक्रिया की सफलता से जुड़ा है। यह शांति प्रक्रिया संभवतः पाकिस्तान में आतंकवादी ढांचे के खत्म होने और इस्लामी कट्टरपंथ एवं फौज का गठबंधन टूटने की एक अनिवार्य शर्त भी है।

आज प्रगतिशाली समूहों की जिम्मेदारी इसी बात पर जोर देने की है। पाकिस्तान से जंग न सिर्फ परिस्थितियों को और उलझा देगी, बल्कि उससे भारत के लिए कहीं ज्यादा बड़े खतरे पैदा हो जाएंगे। दूसरी तरफ शांति प्रक्रिया धीरे-धीरे आतंक के उस आधार को खत्म कर सकती है, जिससे मुंबई जैसे हमलों को अंजाम देना मुमकिन होता रहा है। लेकिन बीच की अवधि में यह भी जरूरी है कि पाकिस्तान सरकार पर कट्टरपंथ और आतंकवादी ढांचे पर कार्रवाई करने के लिए अंतरराष्ट्रीय दबाव लगातार बढ़ाया जाए। मुंबई हमलों के बाद इस दिशा में भारत सरकार ने जो पहल की है, वो काफी हद तक सही रास्ते पर है।

उन्नीसवीं सदी के अंत और पूरी बीसवीं सदी में भारत के जिस विचार का उदय हुआ, मजहबी कट्टरपंथ हमेशा उसका एक प्रतिवाद (एंटी-थीसीस) रहा है। हिंदू और इस्लामी कट्टरपंथ ने बीसवीं सदी के आरंभ से उस भारत को चुनौती दी जो दादा भाई नौरोजी, रवींद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू जैसे नेताओं की वैचारिक छत्रछाया में उभर रहा था, और जिसे समृद्ध बनाने में बहुत से वामपंथी मनीषियों ने बहुमूल्य योगदान दिया। भारत का वह विचार- जिसे मानव गरिमा, समता और स्वतंत्रता के आधुनिक सिद्धांतों के आधार पर विकसित किया गया। मुस्लिम और हिंदू सांप्रदायिक ताकतों ने साम्राज्यवाद से मिल कर इसी विचार के विरोध में दो राष्ट्र के सिद्धांत को न सिर्फ पेश किया, बल्कि उसके आधार पर देश के विभाजन की परिस्थिति भी पैदा की। आजादी के बाद भी ऐसी ताकतों से इस भारत को लगातार चुनौती मिली है। १९८०-९० के दशक में सिख कट्टरपंथियों ने भारत की एकता के लिए गंभीर खतरा पेश किया।

आज विचारणीय प्रश्न यह है कि क्या जनता के ज्यादातर समूहों के हित भारत के आधुनिक विचार के साथ जुड़े हैं या संवैधानिक जनतंत्र के सहारे विकसित हो रहे भारत को कमजोर करने से अधिकांश जनता का हित सधेगा? और जो ताकतें इस भारत को कमजोर करना चाहती हैं, क्या उनका मकसद किसी भी प्रगतिशील विचारधारा से मेल खाता है? कट्टरपंथी और आतंकवादी- चाहे वो हिंदू हों या मुस्लिम या फिर सिख या ईसाई- इंसान की मूलभूत स्वतंत्रता और बुनियादी मानवाधिकारों को मजबूती प्रदान करने वाली शक्तियां हैं या वो इन लक्ष्यों के हासिल करने के रास्ते में सबसे बड़ी रुकावट हैं? अगर उनके वर्ग चरित्र पर गौर करें तो क्या वे वंचित तबकों के हितों की नुमाइंदगी करती हैं या उनकी पीठ पर ऐसे तबकों का हाथ है, जिनका सीधा टकराव प्रगतिशील व्यवस्थाओं से है?

अगर इस सवालों पर वस्तुगत नजरिए से सोचा जाए तो यह आसानी से समझा जा सकता है कि दुनिया अभी विकासक्रम की जिस अवस्था में है, उसमें भारत की राज्य-व्यवस्था का हर हाल में विरोध न तो क्रांतिकारिता है और न ही इससे किसी प्रगतिशील उद्देश्य की प्राप्ति होती है। ऐसे उद्देश्यों की प्राप्ति की सबसे पहली शर्त- विरोध और समर्थन के मुद्दों की तार्किक ढंग से पहचान है। अगर इस पहचान में हम सक्षम हो जाएं तो हर जगह साजिश के हवाई सिद्धांत गढ़ने की हमें जरूरत नहीं रहेगी। बहरहाल, यह तो साफ है कि ऐसी साजिश की सोच का कोई बड़ा सरोकार नहीं है। बल्कि यह बड़े सरोकारों के खिलाफ है।

Friday, December 19, 2008

वीपी सिंहः एक श्रद्धांजलि


सत्येंद्र रंजन
मुंबई में आतंकवादी हमले के सदमे और शोर के बीच भारत की एक अहम राजनीतिक शख्सियत दुनिया से उठ गई। विश्वनाथ प्रताप सिंह के निधन की खबर को भारतीय राष्ट्र पर मंडराते उस गंभीर संकट के बीच महसूस तो किया गया, लेकिन उस माहौल में इस पर चर्चा नहीं हो सकी। बहरहाल, वीपी सिंह ऐसी क्षणिक चर्चा के मोहताज नहीं थे। भारतीय राजनीति पर उनका असर कहीं दीर्घकालिक और दूरगामी है।

आम तौर पर वीपी सिंह को मंडल मसीहा के रूप में याद किया जाता है। यह नाम उन्हें प्रधानमंत्री रहते हुए अन्य पिछड़ी जातियों को सरकारी नौकरियों में आरक्षण देने के उनके फैसले की वजह से मिला। यह एक ऐतिहासिक फैसला था और आज इस मुद्दे पर देश में राजनीतिक आम सहमति है, तब उस कदम के महत्त्व को कहीं बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। वीपी सिंह ने जब मंडल आयोग की सिफारिश को लागू किया, तो उनके मकसद और तरीके पर कई सवाल उठे। उस फैसले के खिलाफ सवर्ण जातियों की घोर प्रतिक्रिया हुई। मोटे तौर पर इन्हीं जातियों से आने वाले अभिजात्य और शहरी मध्य वर्ग हमेशा के लिए उनके खिलाफ हो गए। कारपोरेट मीडिया में उनकी जो खलनायक की छवि बनी, वह उनकी मृत्यु के दिन तक खत्म नहीं हुई।

लेकिन इस कदम ने देश की राजनीति का स्वरूप ही बदल दिया। पूरे उत्तर भारत में व्यापक जन समुदाय की सोयी हुई राजनीतिक आकांक्षाएं इससे जिस तरह जगीं और उससे जिस नई राजनीतिक ऊर्जा का संचार हुआ, उसका असर आज सहज देखने को मिलता है। इससे देश की राजनीतिक व्यवस्था ज्यादा लोकतांत्रिक और ज्यादा प्रातिनिधिक बनी। इसकी प्रतिक्रिया में यथास्थितिवादी ताकतें भी गोलबंद हुईं, जिससे दक्षिणपंथी राजनीति को नई ताकत मिली और उनका ज्यादा उग्र रूप देखने को मिला। इन दोनों परिघटनाओं से जो सामाजिक और राजनीतिक संघर्ष शुरू हुआ, वह आज भी जारी है।

इसी संघर्ष का परिणाम है कि वीपी सिंह को लेकर देश में दो परस्पर विरोधी धारणाएं हैं। देश का एक तबका उन्हें आधुनिक भारतीय राष्ट्र के मूलभूत आधार- सामाजिक न्याय और धर्मनिरपेक्षता- के प्रतीक के रूप में देखता है, तो दूसरी तरफ बहुत से लोगों के लिए वो नफ़रत के पात्र हैं। ऐसे लोग उन पर समाज को तोड़़ने और जातीय विद्वेष पैदा करने का इल्ज़ाम लगाते हैं। संभवतः परस्पर विरोधी दो ऐसी उग्र धारणाएं हाल के इतिहास में किसी और नेता के लिए नहीं रही। और यही वीपी सिंह की प्रासंगिकता है।

बहरहाल, वीपी सिंह मंडल मसीहा बाद में बने। ऐसा मसीहा बनने की हैसियत उन्होंने इसके पहले बगैर इस मुद्दे पर राजनीति किए हासिल की थी। यानी इसके पहले उन्होंने अपनी ऐसी हैसियत बनाई, जिससे वे प्रधानमंत्री के पद तक पहुंच सके। यह यात्रा डेढ़- पौने दशक से ज्यादा की नहीं थी। इस दौरान उनका सारा प्रभामंडल दो पहलुओं से बना- सत्ता का मोह और भ्रष्ट न होने की छवि। १९८० में उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बने तो राज्य को उन्होंने डाकुओं से मुक्ति दिलाने का वादा किया, जिनका उन दिनों, खासकर चंबल के इलाके में भारी आतंक था। दो साल में ऐसा नहीं कर पाए तो इस्तीफा पेश कर दिया। राजीव गांधी के शासनकाल में वित्त मंत्री बने तो देश के बड़े उद्योगपतियों पर कर चोरी के आरोप में छापे डलवाने का एक सिलसिला चलाया। इससे उद्योग जगत का इतना दबाव पड़ा कि राजीव गांधी ने उनसे वित्त मंत्रालय छीन कर उन्हें रक्षा मंत्री बना दिया। यह कदम राजीव गांधी को बेहद महंगा पड़ा, क्योंकि अब वीपी सिंह ने रक्षा सौदों में होने वाले भ्रष्टाचार पर नकेल कसनी शुरू कर दी। इससे एचडीडब्लू पनडुब्बी और बोफोर्स जैसे विवाद उठे, जिससे राजीव गांधी और कांग्रेस की एकछत्र सत्ता की बुनियाद हिल गई।

जब बतौर वित्त मंत्री वीपी सिंह उद्योगपतियों पर निशाना साधे हुए थे, तब उन्होंने एक गौरतलब बात कही थी। उन्होंने कहा था कि इस देश में जैसे एक गरीबी रेखा है, वैसे ही एक ‘जेल रेखा’ भी है। इस देश में एक खास सीमा से ज्यादा आमदनी वाला व्यक्ति जेल नहीं जाता है, चाहे वह कैसा भी अपराध करे। तब वीपी सिंह ने कहा था कि उनका मकसद कानून के दायरे को इस ‘जेल रेखा’ से ऊपर रहने वाले लोगों को पहुंचाना है। रक्षा सौदों में भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर उन्होंने राजनीतिक भ्रष्टाचार को सबसे अहम राष्ट्रीय मुद्दा बना दिया। जाहिर है, ऐसे मुद्दों के आधार पर जब उन्होंने एक बार फिर इस्तीफे को औजार बनाया, राजीव गांधी की सरकार छोडी तथा उन्हें कांग्रेस से निकाल दिया गया तो वे कांग्रेस विरोधी गठबंधन के स्वाभाविक नेता बन गए।

इसके बाद वीपी सिंह ने जिस सरकार का नेतृत्व किया, वह इस लिहाज से अजूबा थी कि वह एक साथ वामपंथी दलों और लगातार उग्र सांप्रदायिक रूप अपना रही भारतीय जनता पार्टी के समर्थन पर निर्भर थी। खुद वीपी सिंह की अपनी पार्टी, यानी जनता दल भी महत्त्वाकांक्षी एवं सत्ता लोलुप नेताओं के एक जमावड़े से ज्यादा कुछ नहीं था। यह सरकार ज्यादा दिन नहीं टिक सकती थी, यह बात शुरू से साफ थी। एक ऐसी अस्थिर और अल्पकालिक सरकार के साथ वीपी सिंह ने मंडल आयोग की रिपोर्ट पर अमल जैसा स्थायी महत्त्व का कदम उठाया और लालकृष्ण आडवाणी की राम रथयात्रा को रोकते हुए धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के मुद्दे पर अपनी सरकार गिरने दी, यह उनकी सियासी चतुराई भी कही जा सकती है, लेकिन इससे एक ऐसी राजनीतिक पहल हुई, जिसने वीपी सिंह को लंबे समय तक के लिए प्रासंगिक बना दिया।

बहरहाल, वीपी सिंह जब दुनिया से विदा हुए हैं, उस वक्त अगर सामाजिक न्याय के सवाल को छोड़ दें तो राजनीति की स्वच्छता, भ्रष्टाचार का खात्मा, और धर्मनिरपेक्षता को सुरक्षित बनाने जैसे वो तमाम मुद्दे जहां के तहां नजर आते हैं, जिन्हें वीपी सिंह ने उठाया और जिनके आधार पर वो राजनीति में आगे बढ़े। इसे वीपी सिंह की नाकामी माना जा सकता है। या, यह कहा जा सकता है कि वे भी एक ऐसे राजनेता थे, जो जनता का मूड भांप कर मुद्दे उठाता था और उसका फायदा उठा कर आगे बढ़ जाता था। उसे अंजाम तक पहुंचाने की फिक्र उसे नहीं होती थी। यह हकीकत है कि इसके लिए उन्होंने संगठित ढंग से काम करने का प्रयास कभी नहीं किया। यह भी कहा जा सकता है कि मंडल का मंत्र भी उन्होंने एक खास परिस्थिति में ग्रहण किया, वह कोई उनकी बुनियादी निष्ठा नहीं थी। इन तथ्यों की रोशनी में वीपी सिंह को सस्ती जनप्रियता की राजनीति करने वाले एक नेता के रूप में भी देखा जा सकता है, जो मौजूदा व्यवस्था का ही एक हिस्सा थे।

इसके बावजूद कुछ विशेषताएं वीपी सिंह को सबसे अलग करती थीं। सत्ता को दांव पर लगाने का साहस और अलोकप्रिय होने का जोखिम उठाते हुए भी विवादास्पद फैसले की हिम्मत उन्हें एक खास छवि देती थी। एकांत पसंद निजी जिंदगी में कला और कविता को अभिव्यक्ति का माध्यम बनाने वाली इस शख्सियत के लिए सियासत में ऐसा करना मुमकिन होता रहा। और तभी एक बार वे प्रधानमंत्री पद की कुर्सी को ठुकरा सके और बतौर नागरिक की अपनी भूमिका में प्रासंगिक बने रह सके। गौरतलब है कि १९९६ में जब संयुक्त मोर्चा का प्रयोग हुआ तो उस समय वीपी सिंह इसके स्वाभाविक नेता थे। प्रधानमंत्री की कुर्सी एक बार फिर उनके सामने थी। लेकिन तब उन्होंने सचमुच यह दिखाया कि सत्ता का उनमें तुच्छ मोह नहीं है। दरअसल, इसके पहले ही वीपी सिंह अपनी भूमिका एक जागरूक नागरिक के रूप में सीमित चुके थे, जिसकी वजह से एक पत्रिका ने उन्हें ‘सिटीजेन सिंह’ नाम दिया था। इस भूमिका के साथ वीपी सिंह ने यह साबित किया कि राजनीति में सत्ता अहम और शायद सबसे अहम चीज होती है, लेकिन आखिरी चीज नहीं होती। सत्ता के बिना भी प्रासंगिक बने रहा जा सकता है, अगर आपके पास एक विचार और खास मकसद हो। यही वीपी सिंह का महत्त्व है।

Tuesday, November 18, 2008

मंदी में किधर जाएं?


सत्येंद्र रंजन
मेरिका के वित्तीय संकट के असर को नियंत्रित रखने के उपाय आखिरकार नाकाम रहे हैं और विश्व अर्थव्यवस्था को मंदी से बचा लेने की उम्मीद टूट गई है। यूरो ज़ोन कहे जाने वाले यूरोपीय संघ की अर्थव्यवस्था में विकास दर नकारात्मक हो गई है और जल्द ही ऐसी ही खबर अमेरिका से मिलने का अनुमान भी लगाया जा रहा है। इसका असर दुनिया भर में है। उपभोक्ता अपने खर्चों में कटौती कर रहे हैं, इससे कंपनियों की बिक्री कम हो रही है और मुनाफा घट रहा है, इसकी वजह से कंपनियां अपना खर्च घटा रही हैं, और उसकी वजह से लोगों की नौकरियां जा रही हैं। लोगों की नौकरियां जाने से समाज में आमदनी घट रही है, जिससे उपभोग घट रहा है। यानी जिस दुश्चक्र को मंदी कहा जाता है, वह अपने पूरे रूप में सामने है और हर रोज आने वाली खबरें इस रूप का ज्यादा विकराल चेहरा पेश कर रही हैं।

अमेरिका में सितंबर वित्तीय संकट सामने आने के बाद से दुनिया भर की सरकारें इसके असर को काबू में रखने की कोशिश में जुटी रही हैं। मोटे तौर पर अब तक कोशिश बैंकों और वित्तीय संस्थाओं को ज्यादा नकदी मुहैया कराने की रही है। साथ उनके लिए कर्ज देने की अनुकूल स्थितियां बनाई गई हैं। माना गया है कि कर्ज आसानी से उपलब्ध रहने पर कंपनियों के लिए एक तरफ निवेश की स्थिति बनी रहेगी, वहीं दूसरी तरफ उपभोक्ता मकान जैसे जायदाद में निवेश करने के साथ-साथ उपभोग की वस्तुएं भी खरीदते रहेंगे, जिससे उद्योग धंधों का कारोबार मंदा नहीं होगा और आर्थिक संकट के दुश्चक्र को रोका जा सकेगा। सबसे पहले अमेरिका ने इसके लिए ७०० अरब डॉलर का बेलआउट पैकेज मंजूर किया। उसके बाद ब्रिटेन और दूसरे देश इस रास्ते पर बढ़े।

बुश प्रशासन के शुरुआती रुख (जिसे अमेरिकी कांग्रेस ने नामंजूर कर दिया था) और ब्रिटिश सरकार के नजरिए में एक भारी फ़र्क यह था कि जहां बुश प्रशासन सीधे बैंकों और वित्तीय संस्थानों को हुए नुकसान की करदाताओं के धन से भरपाई के रास्ते पर चला, यानी उनकी कोई जवाबदेही तय करने की कोशिश नहीं की गई, वहीं ब्रिटिश सरकार ने बैंकों के शेयर खरीदने का रास्ता चुना। मतलब यह हुआ कि निजी बैंकों में स्थायी सरकारी हिस्सेदारी बना लेने का रास्ता अख्तियार किया गया। यानी वहां वित्त और अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने का थैचरवादी दौर एक झटके में पलट गया है। अमेरिका में भी बुश प्रशासन को वित्त और पूंजी की बेलगाम स्वतंत्रता की नीति से कदम पीछे खींचने पड़े हैं।

हालांकि वैचारिक तौर पर बुश प्रशासन अपने इन आखिरी दिनों में भी मुक्त बाजार पूंजीवाद की खुल कर वकालत कर रहा है। वाशिंगटन में वित्तीय संकट पर हुए ग्रुप-२० देशों शिखर सम्मेलन से ठीक पहले बुश प्रशासन ने कहा- ‘आर्थिक समृद्धि के लिए ज्यादा बड़ा खतरा सरकार की कम भूमिका नहीं, बल्कि जरूरत से ज्यादा भूमिका है।’ मौजूदा संकट के दौर में यह मुद्दा बेहद अहम होकर उभरा है कि आखिर अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र को कितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए और सरकार का दखल कितना रहना चाहिए? बुश प्रशासन के नजरिए से साफ है कि मौजूदा संकट के संदर्भ में पिछले साठ साल में पूंजी और वित्त की पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत करने वाली ताकतें फिलहाल रक्षात्मक मुद्रा में जरूर हैं, लेकिन उन्होंने हथियार नहीं डाला है। दूसरी तरफ बुश प्रशासन से अलग रुख अपनाने वाली ब्रिटिश सरकार और यूरोप के दूसरे देश भी वैचारिक स्तर पर कोई वैकल्पिक रास्ता अपनाने को तैयार हैं, इसके संकेत अभी देखने को नहीं मिले हैं।

मौजूदा संकट को अक्सर आम बोलचाल में पूंजीवाद का संकट बताया जा रहा है। यह बेशक पूंजीवाद का संकट है, लेकिन अभी विमर्श में समाजवाद या कोई दूसरी व्यवस्था बतौर विकल्प मौजूद नहीं है। असल में सरकारी प्रयासों या वाशिंगटन शिखर सम्मेलन जैसे प्रयासों से समाजवाद की स्थापना हो भी नहीं सकती है। दरअसल, आर्थिक व्यवस्थाओं का स्वरूप उत्पादन की अवस्था और उत्पादक शक्तियों के संबंध से तय होता है और इन दोनों ही पहलुओं में समाज की मौजूदा वर्ग संरचना के तहत चुनी गईं सरकारें शायद ही कोई बदलाव ला सकती हैं। इसलिए फिलहाल मुद्दा पूंजीवाद के विकल्प की तलाश नहीं है। अभी सवाल उस नव-उदारवाद का भविष्य है, जिसने पिछले साठ साल में पूंजीवाद का सबसे बेलगाम और सबसे बेरहम रूप दुनिया के सामने पेश किया है।

इसलिए यह अनावश्यक नहीं है कि मौजूदा संकट के दौर में फ्रैंकलीन डेनालो रूजवेल्ट का नाम बार-बार चर्चा में आया है। १९२९ की महामंदी के बाद रूजवेल्ट राष्ट्रपति चुने गए थे और उन्हें अमेरिका को उस संकट से निकालने का श्रेय दिया जाता है। रूजवेल्ट कोई समाजवादी नहीं थे। उन्होंने जॉन मेनार्ड कीन्स के आर्थिक विचारों के मुताबिक संकट का हल निकालने की कोशिश की और उसमें कामयाब रहे। रूजवेल्ट की खूबी यह थी कि उन विचारों को अपनाने पर वो मजबूती से कायम रहे और इसके लिए उन्होंने दक्षिणपंथी रुझान वाले अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट से भी टक्कर ली। आखिरकार अर्थव्यवस्था में सरकारी हस्तक्षेप के विचार को स्थापित किया।

रूजवेल्ट की इस सफलता के प्रतिवाद के रूप में ही अमेरिकी निजी पूंजी ने नव-उदारवाद के विचार के प्रसार में अपनी ताकत झोंकी। इसके लिए थिंक टैंक बनाए गए, मीडिया का इस्तेमाल किया गया और धीरे-धीर राजनीतिक संस्थाओं पर वर्चस्व कायम किया गया। १९९१ में सोवियत संघ के विघटन के बाद सारी दुनिया में यह विचारधारा तेजी से फैली। भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में, जहां आजादी के बाद अपनाई गई मिश्रित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक नीतियों को खासी अहमियत दी गई, वहां भी १९९० के दशक में नव उदारवाद की लहर चल पड़ी। यह लहर इतनी जोरदार रही है कि इसमें उस नेहरुवाद को भी एक तरह से दफ़ना दिया गया, जिसकी बुनियाद पर नए भारतीय राष्ट्र की नींव डाली गई थी।

नव-उदारवाद की मूल बात यह है कि निजी पूंजी और बाजार की शक्तियों पर कोई नियंत्रण नहीं होना चाहिए। दुनिया को इस नियंत्रणहीनता का परिणाम अब देखने को मिल रहा है। बाजार की शक्तियां स्वस्थ और ठोस विकास का कोई रास्ता तो नहीं निकाल सकीं, झूठे वायदों और अनुमानों पर बबूले पैदा करने की अर्थव्यवस्था उन्होंने जरूर खड़ी की जिसमें आए धन और पूंजी की लूट-खसोट की गई और अंत में उसका नतीजा भुगतने को सारी दुनिया को छोड़ दिया गया। बबूले बनने और फूटने का क्रम कई बार हुआ और आखिरकार अब वह संकट सामने आया है, जिसका हल निकालने में नव-उदारवादी ताकतें नाकाम नजर आ रही हैं। सवाल है कि क्या दुनिया भर की सरकारों में आज नव-उदारवाद की इस नाकामी को समझने और उसका विकल्प ढूढने का माद्दा है?

फिलहाल मुद्दा यह नहीं है कि पूंजीवाद रहेगा या नहीं। अभी मुद्दा यह है कि पूंजीवाद के भीतर कीन्स के आर्थिक विचारों और रूजवेल्ट के न्यू डील जैसी पहल की गुंजाइश है या नहीं? और एक खास परिस्थिति के भीतर जवाहर लाल नेहरू ने विकास का जो रास्ता तैयार किया, क्या उसे इस नए अनुभव के बावजूद मखौल उड़ाने का विषय माना जाता रहेगा? यह धीरे-धीरे साफ होता जा रहा है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था को कीन्स, रूजवेल्ट और नेहरू के रास्ते को अपनाते हुए भी फिर से पटरी पर लाया जा सकता है। लेकिन बुश प्रशासन लेकर अपने मनमोहन सिंह और चिदंबरम का रुख इसी बात की ही मिसाल है कि बेलगाम निजी पूंजी में निहित स्वार्थ रखने वाली ताकतें और उनके नुमाइंदे दुनिया के व्यापक हित की कीमत पर भी इन रास्तों में रुकावट बनने की पूरी कोशिश कर रही हैं। और इसीलिए मौजूदा आर्थिक मंदी लगातार गहरी होती जा रही है और दूर तक कोई समाधान नज़र नहीं आ रहा है।

Thursday, October 2, 2008

जामिया नगर के प्रश्न


सत्येंद्र रंजन
दिल्ली के जामिया नगर इलाके में पुलिस मुठभेड़ से बना माहौल अब कुछ ठंडा पड़ रहा है, लेकिन उससे उठे सवाल अभी भी हमारे सामने उतनी ही शिद्दत से खड़े हैं। इन सवालों का सीधा वास्ता देश से धर्मनिरपेक्ष ढांचे से है, जो पिछले डेढ़ सौ साल में विकसित हुए भारतीय राष्ट्रवाद की आत्मा है। जामिया नगर एनकाउंटर ने आतंकवाद, आतंकवाद से संघर्ष और बहुसंख्यक वर्चस्व की मानसिकता को लेकर उलझे सवालों को एक बार फिर हमारे सामने पेश कर दिया है। अगर हमें सचमुच भारत के भविष्य की चिंता है तो हम इन सवालों को कतई दरकिनार नहीं कर सकते।

हम इस बहस में नहीं जाना चाहते कि बाटला हाउस के एल-१८ फ्लैट में पुलिस और कथित आतंकवादियों के बीच जो मुठभेड़ हुई, वह असली थी या नहीं। मुठभेड़ की पुलिस की कहानी पर मीडिया के एक हिस्से, मानवाधिकार संगठनों और उस इलाके के लोगों ने कई सवाल उठाए हैं। यहां कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस मामले में दिल्ली पुलिस को नोटिस भी जारी कर चुका है। पुलिस की कहानी कितनी सही या गलत है, इस पर आने वाले दिनों में ज्यादा रोशनी पड़ेगी। बहरहाल, जब आतंकवाद ज्यादा व्यापक स्वरूप लेता जा रहा है, तब पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों की मुश्किलों को समझा जा सकता है। इसलिए हर हाल में उन पर टूट पड़ा जाए, इसकी वकालत कोई नहीं कर सकता।

लेकिन पुलिस की हर कहानी पर आंख मूंद कर भरोसा कर लिया जाए, कम से कम भारतीय पुलिस के रिकॉर्ड के देखते हुए यह भी वांछित नहीं है। इससे न तो आतंकवाद के रास्ते पर चल पड़े लोगों पर काबू पाने में मदद मिलेगी, और न ही आतंकवाद के व्यापक परिप्रेक्ष्य से जुड़े मसलों को हल करने की राह निकलेगी। मसलन, अगर सोहराबुद्दीन आतंकवादी नहीं था और उसे गुजरात पुलिस ने आतंकवादी बता कर मार डाला तो इससे आतंक के खिलाफ मुहिम में एक कामयाबी का भ्रम ही पैदा हुआ। यानी असली आतंकवादी तो आजाद रहे, लेकिन लोगों में यह झूठा यकीन बना कि एक आतंकवादी को ठिकाने लगा दिया गया है। और जो अहमदाबाद में हुआ, वैसा ही जामिया नगर में नहीं हो सकता, यह बात कोई दावे के साथ नहीं कह सकता।

चूंकि ऐसे सवालों का संबंध मानवाधिकारों की संवैधानिक गारंटी और देश के कानून से होता है, इसलिए संवैधानिक लोकतंत्र के हित में यही है कि ऐसी हर घटना पर अगर किसी के मन में संदेह है तो इसे कहने की उसकी आजादी बरकरार रहे। सवाल और सबूतों का अंतिम फैसला अदालत में होता है, इसलिए न्यायिक प्रक्रिया पूरी होने के पहले ही कुछ भी साबित नहीं मान लिया जाना चाहिए। लोकतंत्र की बुनियाद संवाद है, और अगर किसी समूह या समुदाय के भीतर कोई संदेह या सवाल हैं, तो उन पर खुली चर्चा की गुंजाइश जरूर बची रही चाहिए। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण पहलू बहुसंख्यक वर्चस्व की मानसिकता का लगातार हावी होते जाना है, जिसमें कमजोर और अल्पसंख्यक समुदायों की चिंताओं, भावनाओं और प्रश्नों को बहस के दायरे से ही बाहर कर दिया जा रहा है। जामिया नगर और आसपास के इलाकों के लोग अगर सोचते हैं कि बाटला हाउस में हुए एनकाउंटर की पुलिस की कहानी में कई छिद्र हैं, तो इस बात पर आखिर मीडिया में और सार्वजनिक मंचों पर चर्चा क्यों नहीं होनी चाहिए? अपने रिकॉर्ड पर सफाई देने की जिम्मेदारी पुलिस की है, न कि उन मीडियाकर्मियों की जिनकी बहुसंख्यक वर्चस्व की मानसिकता आज मीडिया के लोकतांत्रिक चरित्र के लिए बड़ा खतरा बन गई है।

परिणाम यह है कि आम तौर पर सार्वजनिक जिंदगी और खास तौर पर कॉरपोरेट मीडिया के भीतर कमजोर और अल्पसंख्यक समूहों से आने वाले ऐसे लोग जो अपनी मजहबी पहचान के साथ जीना चाहते हैं, आज बेहद घुटन महसूस कर रहे हैं। इसलिए कि उनके लिए अपने समुदाय की चिंताओं और भावनाओं को व्यक्त करने की गुंजाइश लगातार सिकुड़ती जा रही है। उन्हें लगता है कि हर पल उन्हें अपने भारतीय होने का सबूत देना पड़ता है और बहुसंख्यक वर्चस्व की सोच से मेल न खाने वाला उनका एक शब्द भी राष्ट्रवाद के प्रति उनकी निष्ठा पर संदेह उठाने का हथियार बन सकता है।

दरअसल राष्ट्रवाद को इतने संकुचित अर्थों में परिभाषित करने की कोशिश हो रही है कि देश के व्यापक जन समुदायों के हित की वकालत करने की संभावना इसमें लगातार घटती जा रही है। यानी स्थिति कुछ ऐसी बन रही है, जिसमें आप या तो ‘राष्ट्रवादी’ हैं, या फिर वामपंथी उग्रवादी, मुसलमान या दूसरे अल्पसंख्यक और वंचित समुदाय के लोग। जाहिर है, यह सबको समाहित कर चलने वाला वह भारतीय राष्ट्रवाद नहीं है, जो दादा भाई नौरोजी, रवींद्नाथ टैगोर, गांधी और नेहरू की वैचारिक छत्रछाया में फूला-फला।

यह सही है कि आज आतंकवाद का एक मुस्लिम पहलू है। लेकिन क्या सभी मुसलमान आतंकवादी हैं, या आतंकवाद से निपटने के लिए इस पूरे समुदाय पर प्रहार या निगरानी की जरूरत है? दो दशक पहले यह सवाल सिखों के संदर्भ में भी उठा था। प्रश्न यह है कि क्या किसी एक पूरे समुदाय को दुश्मन मानकर किसी लोकतांत्रिक राष्ट्रवाद की कल्पना की जा सकती है? जाहिर है, ऐसा नहीं हो सकता। लेकिन दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि एक ऐसी मानसिकता सारे देश पर थोपने की कोशिश आज काफी हद तक सफल होती नजर आती है।

अगर आतंकवाद का मुस्लिम पहलू है तो यह भी समझे जाने की जरूरत है कि आखिर ऐसा क्यों है? यह संभव है कि कुछ धर्मांध तत्व इस्लामी राज्य की स्थापना की रूमानी ख्यालों में जीते हों औऱ इसके लिए विदेशी धन और मदद से आतंकवाद के रास्ते पर चल रहे हों। लेकिन यह कहीं ज्यादा बड़ी हकीकत है कि इंसाफ न मिलने की भावना और आम हालात से पैदा हुई हताशा ऐसे तत्वों के लिए ज्यादा मददगार साबित होती है। आखिर इस बात क्या जवाब है कि मुंबई के १९९३ के बम धमाकों के दोषियों को सजा हो जाए, लेकिन उसके पहले के दंगों के बारे में श्रीकृष्ण आयोग की रिपोर्ट सरकार की अलमारियों में धूल खाती रहे? बाबरी मस्जिद तोड़ने के दोषी खुलेआम घूमते रहें, इससे हम अपनी न्याय व्यवस्था के बारे में कैसे संदेश देते हैं? गुजरात के दंगों पर अब तक चली कानूनी प्रक्रिया आखिर क्या सोचने को मजबूर करती है?

बम धमाकों से निसंदेह आतंक पैदा होता है। इनमें बहुत से निर्दोष लोगों की जान गई है और हजारों लोगों की जिंदगी तबाह हो गई है। लेकिन क्या कंधमाल में हुई तबाही उससे कम है? यह एक बड़ा सवाल है कि आखिर वो लोग आतंकवादी हैं या नहीं, जिनकी वजह से एक पूरा समुदाय आतंक में जीने को मजबूर हो जाता है? आखिर जिस गुस्से के साथ हम सिमी पर प्रतिक्रिया जताते हैं, वही गुस्सा बजरंग दल के बारे में क्यों नहीं उबलता? ये सब बेहद कठिन प्रश्न हैं। ये आराम से जिंदगी गुजारने और वर्गीय एवं सामुदायिक वर्चस्व में हित रखने वाले तबकों को परेशान करने वाले सवाल हैं। लेकिन अगर उनके दिमाग में सचमुच भारत की कोई उदार कल्पना है तो वो इन सवालों की अनदेखी नहीं कर सकते।

आज जरूरत इस सवालों पर संवाद बनाने की है। संवाद उन समुदायों से जो अपने को घिरा हुआ महसूस कर रहे हैं। संवाद उन लोगों से जो संवैधानिक मूल्यों पर आधारित भारत में यकीन करते हैं। सिर्फ ऐसे संवाद से ही मौजूदा सवालों के हल ढूंढे जा सकते हैं। और सिर्फ तभी लोकतंत्र और उदार भारतीय राष्ट्र का भविष्य सुरक्षित बनाया जा सकता है।