Sunday, June 29, 2008

कांग्रेस की मुसीबत और मनमोहन


सत्येंद्र रंजन
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक ईमानदार व्यक्ति हैं, इस पर देश में संभवतः किसी को संदेह नहीं है। सर्वोच्च पदों पर रहते हुए भी उन्होंने अपनी बेदाग छवि सलामत रखी है। २००५ में जब पाकिस्तान की क्रिकेट टीम वन डे मैच खेलने दिल्ली आई और अखबारों में ये खबरें छपीं कि प्रधानमंत्री के परिवार के बच्चों ने आम दर्शकों की तरह टिकट लेने की जद्दोजहद की तो इससे पद और सत्ता के दुरुपयोग की आम शिकायत वाले इस देश में लोग बेहद प्रभावित हुए। वित्त मंत्री पद से हटने और प्रधानमंत्री बनने की बीच की अवधि के करीब नौ साल में जिस तरह एक साधारण इंसान की तरह लोगों ने दिल्ली के कुछ बाज़ारों में उन्हें आते-जाते देखा, उससे भी उनकी एक अलग किस्म की छवि बनी।

दरअसल, यही वह छवि है जिसकी वजह से मई २००४ के तेज रफ्तार और नाटकीय घटनाक्रम के बीच मनमोहन सिंह का नाम स्वाभाविक तौर पर प्रधानमंत्री के रूप में उभरा। तब नए बने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के लिए वे एक थाती के रूप में नज़र आए। १९९१-९६ के दौर में बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की नीतियों से असहमत रहे वामपंथी दलों को भी शायद इसी छवि की वजह से बतौर प्रधानमंत्री उन्हें स्वीकार करने में कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।

बहरहाल, पिछले चार साल का अनुभव अपने में एक खास राजनीतिक संदेश समेटे हुए है। संदेश यह है कि व्यक्ति चाहे कितना ही भला हो और उसका इरादा कितना ही नेक हो, अगर उसकी राजनीतिक बुद्धि ठोस जमीनी हकीकत से कटी हुई है, तो लोकतांत्रिक संदर्भ में वह थाती के बजाय एक बोझ ज्यादा साबित हो सकता है। आज जब अमेरिका से असैनिक परमाणु सहयोग के करार को लेकर सियासी माहौल गर्म है, यह संदेश कांग्रेस पार्टी के लिए खास अहमियत रखता है। कांग्रेस पार्टी इस समय इस उधेड़बुन में है कि वह उस व्यापक राजनीतिक समीकरण को साथ लेकर चले, जिसे चार साल पहले तैयार करने में खुद उसकी एक बड़ी भूमिका थी, या परमाणु करार पर इस समीकरण को कुर्बान कर दे?

मनमोहन सिंह मानते हैं कि यह करार देश के हित में है और इसे अंजाम देने के लिए वामपंथी दलों का समर्थन गंवाने की कीमत चुकाई जा सकती है। तीन साल पहले मनमोहन सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ ये करार किया था, और तब से यह उनके लिए निजी प्रतिष्ठा का विषय रहा है। अब जबकि अमेरिकी राजनीति की परिस्थितियों की वजह से करार की प्रक्रियाएं पूरी करने की समयसीमा करीब है, मनमोहन सिंह कोई भी दांव खेलने को तैयार बताए जाते हैं। इसमें एक दांव यह है कि वामपंथी दलों को समर्थन वापस लेने दिया जाए और समय से पहले चुनाव मैदान में उतरना पड़े तो ये जोखिम उठाया जाए।

यह एक ऐसा दांव है, जिसे मनमोहन सिंह खेलने की स्थिति में हैं। लेकिन क्या कांग्रेस पार्टी और उसकी नेता सोनिया गांधी भी इसके लिए तैयार हैं? इस सवाल का संबंध सिर्फ इस पार्टी की सत्ता से नहीं है, बल्कि इसके साथ इस देश का भी काफी कुछ जुड़ा हुआ है। २००४ में सोनिया गांधी की पहल से धर्मनिरपेक्ष दलों का गठबंधन बना तो उससे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सांप्रदायिक फासवादी शासन के खिलाफ देश में तैयार हुई धर्मनिरपेक्ष आम सहमति को राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम मिल सका। धर्मनिरपेक्ष एकजुटता का ही यह परिणाम रहा कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को चुनाव में परास्त किया जा सका। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का परित्याग कर बड़े उद्देश्य के लिए निजी महत्त्वाकांक्षाएं छोड़ने की एक अनोखी मिसाल पेश की। इससे देश की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद की फिर से तलाश का अवसर सामने आया। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साझा न्यूनतम कार्यक्रम को तब इसी तलाश का एक राजनीतिक दस्तावेज माना गया।

क्या कांग्रेस और सोनिया गांधी अब यह मानते हैं कि इस तलाश की अब जरूरत नहीं है? या वे यह मानने लगे हैं कि बिना सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकता के वे अकेले यह तलाश पूरी कर सकने की स्थिति में हैं? आखिर उनके अपने वर्तमान और भविष्य का भी काफी कुछ इस सवाल के साथ दांव पर है? उनके साथ मनमोहन सिंह की तरह यह सुविधा नहीं है कि बिना जीवन में कोई प्रत्यक्ष चुनाव जीते वे सत्ता की ऊंचाई तक पहुंच जाएं या फिर वहां बने रहें। कांग्रेस के बाकी नेताओं के साथ यह सुविधा भी नहीं है कि अर्थशास्त्री रहते हुए वे अचानक एक खास परिस्थिति में देश का वित्त मंत्री बन जाएं और एक वैसी ही परिस्थिति में प्रधानमंत्री का पद खुद उनकी गोद में आ गिरे।

यह बात किसी सामान्य राजनीतिक बुद्धि वाले व्यक्ति को भी समझ में आती है कि देश की मौजूदा परिस्थितियों के बीच अभी आने वाले कई चुनावों तक कांग्रेस पार्टी अपना अकेला बहुमत पाने की नहीं सोच सकती। उसके सहयोगी दल भी इतने और इस हालत में नहीं हैं कि उनके साथ सत्ता में आने का समीकरण बनता हो। यह समीकरण वामपंथी दलों के साथ ही पूरा होता है, जिनकी एक विचारधारा से जुड़ी आपत्ति की अनदेखी करने पर प्रधानमंत्री अड़े हुए हैं। इसी से जुड़ा एक बेहद महत्त्वपूर्ण सवाल है कि क्या मनमोहन सिंह की ही तरह सोनिया गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेता भी २००४ के जनादेश का स्वरूप समझने में नाकाम हैं? यह जनादेश कांग्रेस पार्टी या सोनिया गांधी के लिए नहीं था। यह जनादेश भाजपा विरोधी गठबंधन के लिए था, जिसमें वामपंथी दल भी एक अहम घटक थे। क्या यह साधारण बात भी कहे जाने की जरूरत है कि वामपंथी दलों को अलग करने के साथ ही उस जनादेश का स्वरूप खंडित हो जाता है और उसके बाद मनमोहन सिंह, कांग्रेस या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को सत्ता में बने रहने का कोई वैध और नैतिक अधिकार नहीं रह जाएगा?

इसलिए इस मौके पर सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह नहीं है कि परमाणु करार हो या नहीं अथवा यह करार देश हित में है या नहीं। इस समय सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि जब देश में इस करार पर आम सहमति नहीं है, संसद का बहुमत इसके खिलाफ है, इसके बावजूद इस करार को पूरा करने की जिद क्या लोकतांत्रिक है? मनमोहन सिंह की अपनी समझ में यह करार देश के लिए बेहद जरूरी हो सकता है, और यह समझ रखने के उनके लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान भी किया जा सकता है। लेकिन ऐसी ही समझ रखने का अधिकार देश के हर शख्स और हर राजनीतिक जमात को है। लोकतंत्र में ऐसे मतभेदों के बीच हमेशा ही संख्या फैसले का पैमाना होती है और यह जाहिर है कि संख्या प्रधानमंत्री के साथ नहीं, बल्कि उनके खिलाफ है।
इसके बावजूद अगर मनमोहन सिंह इस करार को अमली रूप देने पर अड़े हुए है तो बड़े दुख के साथ यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र के एक बेहद बुनियादी सिद्धांत के लिए उनके मन में सम्मान नहीं है और ऐसे में वे एक लोकतांत्रिक देश का नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार नहीं रखते हैं। ऐसे में यह जिम्मेदारी कांग्रेस पार्टी पर है कि वह या तो संसद में अपने नेता को पार्टी के अनुशासन में ले आए या फिर नया नेता चुनने पर विचार करे। इसके विपरीत अगर कांग्रेस पार्टी खुद इस जिद के रास्ते पर चल पड़ती है तो एक बार फिर बड़े दुख के साथ यही कहना होगा कि इस पार्टी में १९८० के दशक में हावी हुई आत्मघाती प्रवृत्तियां आज भी जारी हैं।

उन प्रवृत्तियों ने देश पर लगभग एकछत्र राज करने वाली पार्टी को आज दूसरे दलों की बैसाखियों पर निर्भर कर दिया है। अगर एक बार फिर पार्टी उसी प्रवृति का शिकार हो जाती है तो यह बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि वह दूसरे दलों की बैसाखियों के साथ भी फिलहाल राज करने की हालत में नहीं रह जाएगी। जिस साझा न्यूनतम कार्यक्रम की बदौलत कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने अपने पुनरुद्धार की उम्मीद की थी, उस पर अमल में जैसा लचर रुख मनमोहन सिंह सरकार ने अपनाया, उससे इन दलों की साख पर पहले ही काफी बट्टा लग चुका है। अब परमाणु करार पर जोर के साथ विखंडन की जो राह प्रधानमंत्री ने तैयार की है, उस पर अगर ये दल चले तो सियासी जंग के मैदान में यह अपने लिए एक हिरोशिमा को न्योता देने जैसा ही होगा। क्या सोनिया गांधी, कांग्रेस और यूपीए में शामिल दल यह दांव खेलने को तैयार हैं?

Wednesday, June 18, 2008

बिहार में वामपंथ

सत्येंद्र रंजन
हिंदी भाषी राज्यों में बिहार को इस बात का श्रेय है कि उसने सबसे देर तक सांप्रदायिकता को सत्ता में आने से रोके रखा। २००५ के अंत में आखिरकार सांप्रदायिक और सवर्णवादी ताकतें जब वहां कामयाब हुईं, तब भी उन्हें नीतीश कुमार के मुखौटे की जरूरत पड़ी। इस नए घटनाक्रम में एक और बात साफ है कि बिहार में सवर्ण ताकतों को भी सत्ता में आने के लिए मंडल परिघटना को गले लगाना पड़ा है। वहां जमीनी स्तर पर सामाजिक बदलाव की जो प्रक्रिया १९९० के दशक में मंडलवादी राजनीति के विस्तार से शुरू हुई, उसे पलटना सांप्रदायिक और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक ताकतों के लिए भी फिलहाल मुमकिन नजर नहीं आता है। गौरतलब है कि १९८०-९० के दशक में दक्षिणपंथी राजनीति को देश में मिली नई स्वीकृति और लगभग उसी समय बहुसंख्यक वर्चस्व की उठी लहर ने देश की राजनीतिक तस्वीर काफी हद तक बदल दी। इन दोनों विचारों की उग्र प्रतिनिधि ताकत के रूप में भारतीय जनता पार्टी का तेजी से उभार हुआ, और सारा हिंदी इलाका उसके प्रभाव में आ गया।

उन्नीस सौ नब्बे का पूरा दशक इस भगवा उभार का दौर है। लेकिन इस पूरे दौर में अगर बिहार इस लहर पर काफी हद तक लगाम लगाने में कायम रहा तो इसकी वजहें जरूर एक दिलचस्प अध्ययन का विषय हैं। इन वजहों की जड़ें दरअसल बिहार की राजनीति के अतीत में जाती हैं। यह अतीत आजादी की लड़ाई के दौर में पैदा हुआ। भूमि सुधार का आंदोलन उस दौर में ही बिहार की राजनीति की एक खास पहचान बना और वामपंथी विमर्श एक लोकप्रिय धारा के रूप में उभरा। स्वामी सहजानंद सरस्वती, जयप्रकाश नारायण, सूरज नारायण सिंह, कार्यानंद सिन्हा आदि कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्हें इस विमर्श को आगे बढाने का श्रेय दिया जा सकता है। दरअसल, यह उस दौर में हुए संघर्षों का ही नतीजा रहा कि आजादी के बाद बिहार में (अब के झारखंड इलाके को छो़ड़ कर) कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उभरी और सोशलिस्ट धारा की पार्टियों का व्यापक असर देखा गया।

भाकपा ने भूमि सुधार, परती जमीन पर गरीबों के कब्जे, बटाईदारों के हक आदि के लिए लगातार संघर्ष चलाया, जिससे राज्य के कई हिस्सों में उसका मज़बूत जनाधार बना। लेकिन साठ के दशक के अंत में नक्सलवाद के उदय और सत्तर के दशक में बिहार में उसके प्रसार के साथ स्थितियों में बदलाव शुरू हो गया। कमोबेश भाकपा के जनाधार को अपने प्रभावक्षेत्र में लेते हुए ही मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों ने बिहार में अपने कदम फैलाए। धीरे-धीरे भाकपा कुछ मध्य जातियों के बीच सिमटती गई। निसंदेह इमरजेंसी का समर्थन भी भाकपा को कमजोर करने वाला एक पहलू रहा। इससे मध्य वर्ग में पार्टी की लोकप्रियता और स्वीकृति पर असर पड़ा और वामपंथी रुझान वाले आदर्शवादी नौजवानों को मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन या जेपी आंदोलन से उभरे संगठन ज्यादा आकर्षित करने लगे।

फिर भाकपा की जड़ों पर जोरदार प्रहार मंडलवाद के उभार से हुआ। १९९० के दशक के आरंभ में इस राजनीतिक परिघटना का नेतृत्व लालू प्रसाद यादव ने किया। जिन जातियों में लालू प्रसाद यादव का मजबूत जनाधार बना, लगभग वही जातियां राज्य के कई इलाकों में भाकपा का जनाधार थीं। मंडलवादी राजनीति ने इन जातियों को जातिगत आधार पर गोलबंद कर दिया। सामाजिक स्तर पर सीमित संदर्भों में यह एक प्रगतिशील परिघटना थी, लेकिन इसकी विडंबना यह रही कि यह परिघटना वामपंथी राजनीति की कीमत पर आगे बढी। चूंकि भाकपा की पूरी राजनीति संसदीय दायरे में काफी पहले सिमट चुकी थी, इसलिए जातीय वोट-ध्रुवीकरण के आधार पर खड़ी हुई नई राजनीति का मुकाबला करने में भाकपा सक्षम नहीं हो सकी।
बिहार समेत पूरे उत्तर भारत में पिछले डेढ़-पौने दो दशक का दौर जातीय और सांप्रदायिक राजनीति के मजबूत होने का रहा है। यह राजनीति परंपरागत वामपंथी राजनीति के एंटी थीसीस (प्रतिवाद) के बतौर विकसित हुई है। इस राजनीति के पीछे सीमित अर्थों में न्याय पाने की आकांक्षा जरूर है, लेकिन पूरे समाज को न्याय पर आधारित करने की महत्त्वाकांक्षा नहीं है। ऐतिहासिक अन्याय की याद दिलाते हुए जाति, नस्ल या संप्रदाय के आधार पर गोलबंदी एक आसान रास्ता और रणनीति है, जबकि बगैर प्रतिशोध की भावना के एक नया समाज बनाने के सपने को साकार करने की कोशिश उतनी ही मुश्किल है। जब समाज में पहले ढंग के न्याय की लड़ाई मुख्य बनी हुई हो, उस वक्त दूसरे ढंग के संघर्ष का कमजोर पड़ जाने को एक स्वाभाविक परिणति माना जा सकता है। यह अलग बहस का सवाल है कि ऐसे संघर्ष के कमजोर पड़ जाने के लिए जिम्मेदार कौन है?

लेकिन हकीकत यही है कि बिहार में आज वह वामपंथी धारा बेहद कमजोर हो चुकी है, जो लंबे समय तक राज्य में राजनीतिक और सामाजिक विपक्ष की नुमाइंदगी करती रही। संसदीय राजनीति में उसने अपनी ताकत मंडलवादी पार्टियों के हाथों गवां दी और संसदीय राजनीति के बाहर उग्र वामपंथी धारा ने उसे बेदखल कर दिया। उग्र वामपंथी धारा इस पूरे दौर में बिहार में न सिर्फ कायम रही है, बल्कि लगातार मजबूत भी होती गई है। १९८० के दशक में सीपीआई (एम-एल- लिबरेशन) इस धारा की सबसे मजबूत ताकत रही, लेकिन अब वो जगह सीपीआई (माओवादी) ले चुकी है। लिबरेशन जहां अंडरग्राउंड गतिविधियों के साथ-साथ संसदीय राजनीति में जगह बनाने की रणनीति के आधार पर चलती रही है, वहीं माओवादी अंडरग्राउंड जन युद्ध की अकेली रणनीति पर चल रहे हैं।

माओवादियों ने बिहार के बहुत बड़े इलाके में अपनी मजबूत उपस्थिति बना ली है। इतनी कि उनके बंद की अपील पर उन इलाकों का जन जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। वो ट्रेन सेवाओं को रोक देने की ताकत रखते हैं और पुलिस थानों समेत अपने दूसरे निशानों पर हमला करने में वो अक्सर कामयाब रहते हैं। जहानाबाद जैसी सबको चौंका देने वाली कार्रवाई को वो अंजाम दे चुके हैं। राज्य के एक बड़े इलाके में वो संसदीय राजनीति की समानांतर राजनीतिक धारा के रूप अपने कदम फैला रहे हैं। अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि कई इलाकों में संसदीय राजनीति में शामिल पार्टियों और नेताओ को अब उनसे तालमेल बना कर अपना वजूद बनाए रखने की कोशिश करनी पड़ रही है। सुरक्षा एजेंसियां उनके प्रसार को रोकने में अगर नाकाम नहीं, तो काफी हद तक बेअसर जरूर नजर आती हैं।

लेकिन प्रश्न है कि क्या यह उग्र वामपंथी धारा बिहार की व्यापक राजनीति में किसी वाम रुझान का स्रोत बन सकती है? जमीनी स्तर पर यह मुमकिन है कि कई जगहों पर वंचित और उत्पीड़ित समूहों को माओवादी धारा की वजह से राहत मिले, लेकिन क्या इससे एक वैसी ताकत उभर सकती है जो व्यापक जनतांत्रिक दायरे में सांप्रदायिक-फासीवाद का राजनीतिक स्तर पर मुकाबला कर सके और जो राज्य-व्यवस्था पर जनता का नियंत्रण बनाने में मददगार हो? ये सवाल माओवादी विमर्श में शायद अहम नहीं हैं, क्योंकि इस विचारधारा के तहत मौजूदा व्यवस्था के भीतर जनतंत्र की कल्पना का कोई मतलब नहीं है। मौजूदा भारतीय माओवादी धारा हथियारबंद जन युद्ध से राजसत्ता पर कब्जे में यकीन करती है। जब तक यह नहीं हो जाता, तब तक वामपंथ की किसी और राजनीति उसकी राय में निष्फल है।

जाहिर है, माओवादी चाहे जितने मजबूत हों, उनसे बिहार या पूरे देश में कहीं भी परंपरागत अर्थों में वामपंथ को कोई मजबूती नहीं मिलती। बल्कि ऐसे वामपंथ को नष्ट करना माओवादी अपना मकसद मानते हैं। इसीलिए हम बिहार में यह अंतर्विरोध बहुत साफ देख सकते हैं कि एक तरफ जहां माओवादियों की ताकत बढ़ती गई है, वहीं संसदीय राजनीति में वामपंथ लगातार कमजोर होता जा रहा है। इसका परिणाम यह होता है कि मौजूदा संसदीय राजनीति के तहत जनतंत्र के मजबूत होने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इससे इस राजनीति में सांप्रदायिक, प्रतिक्रियावादी और यथास्थितिवादी ताकतों के लिए मैदान खुला मिल जाता है और उनके तहत राज्य-व्यवस्था पर जन विरोधी रुझान उत्तरोत्तर ज्यादा हावी होता जा रहा है।

बिहार में इस अंतर्विरोध और इससे पैदा हुए गतिरोध के टूटने की निकट भविष्य में कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा तभी हो सकता है, अगर माओवादी वैचारिक उग्रता और राजनीतिक जिद से उबरने का साहस दिखाते और अपनी राजनीति को जनतांत्रिक दायरे में ले आते और मुख्यधरा की वामपंथी ताकतों के साथ संवाद कायम करते। लेकिन अभी यह महज एक सदिच्छा है, इसलिए बिहार में फिलहाल किसी मजबूत वामपंथी राजनीति के उभरने की उम्मीद की कोई ठोस जमीन नहीं है।

Monday, May 26, 2008

नेहरू को ना भूलें


सत्येंद्र रंजन
वाहर लाल नेहरू ने आज से ४४ वर्ष पहले दुनिया को अलविदा कहा। तब से उनकी विरासत गंभीर विचार-विमर्श के साथ-साथ गहरे मतभेदों का भी विषय रही है। अपने जीवनकाल में, खासकर आजादी के बाद जब वो भारतीय राजनीति के शिखर पर थे, पंडित नेहरू ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। इसके बूते उन्होंने अपनी ऐसी हैसियत बनाई कि कहा जाता है, १९६२ के चीन युद्ध में भारत की हार तक राष्ट्रीय मुख्यधारा में उन्हें आलोचना से परे माना जाता था। लेकिन निधन के बाद उनके व्यक्तित्व, उनके योगदान और उनके विचारों पर तीखे मतभेद उभरे। इतने कि यह बात बेहिचक कही जा सकती है कि नेहरू स्वतंत्र भारत में सबसे ज्यादा मत-विभाजन पैदा करने वाली शख्सियत नजर आते हैं। यह बात भी लगभग उतने ही ठोस आधार के साथ कही जा सकती है कि पिछले साढ़े चार दशकों में नेहरू के विरोधी विचारों को देश में लगातार अधिक स्वीकृति मिलती गई है, और आज जिस कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के प्रति वफादारी आगे बढ़ने का सबसे बड़ा पैमाना है, वह भी पंडित नेहरू के रास्ते पर चल रही है, यह कहना मुश्किल लगता है।

नेहरू के विरोध के कई मोर्चे हैं। एक मोर्चा दक्षिणपंथ का है, जो मानता है कि जवाहर लाल नेहरू ने समाजवाद के प्रति अपने अति उत्साह की वजह से देश की उद्यमशीलता को कुंद कर दिया। एक मोर्चा उग्र वामपंथ का है, जो मानता है कि नेहरू का समाजवाद दरअसल, पूंजीवाद को निर्बाध अपनी जड़ें जमाने का मौका देने का उपक्रम था। एक मोर्चा लोहियावाद का रहा है, जिसकी राय में नेहरू ने व्यक्तिवाद और परिवारवाद को बढ़ावा दिया और पश्चिमी सभ्यता का अंध अनुकरण करते हुए देसी कौशल और जरूरतों की अनदेखी की। लेकिन नेहरू के खिलाफ सबसे तीखा मोर्चा सांप्रदायिक फासीवाद का है, जिसकी राय में देश में आज मौजूद हर बुराई के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं।

नेहरू विरोधी इन तमाम ज़ुमलों को इतनी अधिक बार दोहराया गया है कि आज की पीढ़ी के एक बहुत बड़े हिस्से ने बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के इन्हें सहज स्वीकार कर लिया है। संभवतः इसीलिए आजादी के पहले महात्मा गांधी के बाद कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता और देश के पहले प्रधानमंत्री के प्रति आज सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक राय मौजूद है। चूंकि ऐसी राय अक्सर बिना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे और वर्तमान के पैमानों को अतीत पर लागू करते हुए बनाई जाती है, इसलिए सामान्य चर्चा में इसे चुनौती देना आसान नहीं होता।

इस संदर्भ में सबसे अहम पहलू यह समझना है कि आज जिन चीजों और स्थितियों को को हम तयशुदा मानते हैं, वह हमेशा से ऐसी नहीं थीं। मसलन, देश की एकता, लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप, विकास का ढांचा, प्रगति की परिस्थितियां आज जितनी सुनिश्चित सी लगती हैं, १९४७ में वो महज सपना ही थीं। देश बंटवारे के जलजले और बिखराव की आम भविष्यवाणियों के बीच तब के स्वप्नदर्शी नेता राज्य व्यवस्था के आधुनिक सिद्धांतों पर अमल और व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतंत्रता के मूलमंत्र को अपनाने का सपना देख पाए, इस बात की अहमियत को सिर्फ यथार्थवादी ऐतिहासिक नजरिए से ही समझा जा सकता है। नेहरू उन स्वप्नदर्शी नेताओं में एक थे, अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने विचारों पर अमल का जोखिम उठाया, संभवतः इस बात से कोई असहमत नहीं होगा।
असहमति की शुरुआत अमल के परिणामों को लेकर होती है। यह असहमति एक स्वस्थ बहस का आधार बनी है और निश्चित रूप से आज भी इस बहस को आगे बढ़ाने की जरूरत है। पंडित नेहरू के नेतृत्व में जो विकास नीति अपनाई गई, वह अपने मकसद को कितना हासिल पाई कर पाई, जो नाकामियां उभरीं उसकी कितनी वजह नेहरू के विचारों में मौजूद थी औऱ उनमें कैसे सुधारों की जरूरत है, यह एक सकारात्मक चर्चा है, जो खुद नेहरू के सपने को साकार करने के लिए जरूरी है। लेकिन गौरतलब यह है कि नेहरू का विरोध हमेशा सिर्फ ऐसे ही सवालों की वजह से नहीं होता। नेहरूवाद का एक बड़ा प्रतिवाद सांप्रदायिक फासीवाद है, जिसका मकसद प्रगति और विकास नहीं, बल्कि पुरातन सामाजिक अन्याय और जोर-जबरदस्ती को कायम रखना है।

देश में मौजूद कई विचारधाराओं का सांप्रदायिक फासीवाद से टकराव रहा है। लेकिन यह एक ऐतिहासिक सच है कि सवर्ण और बहुसंख्यक वर्चस्व की समर्थक इन ताकतों के खिलाफ सबसे मजबूत और कामयाब बुलवर्क पंडित नेहरू साबित हुए। देश विभाजन के बाद बने माहौल में भी ये ताकतें अगर कामयाब नहीं हो सकीं, तो उसकी एक प्रमुख वजह नेहरू की धर्मनिरपेक्षता में अखंड आस्था और इसके लिए अपने को दांव पर लगा देने का उनका दमखम रहा। जाहिर है, ये ताकतें आज भी अपना सबसे तीखा हथियार नेहरू पर हमला करने के लिए सुरक्षित रखती हैं। पिछले दो-ढाई दशकों में दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों के ज्यादा प्रचलित होने, संपन्न और सवर्ण पृष्ठभूमि से उभरे मध्य वर्ग के मजबूत होने और अमेरिका-परस्त जमातों का दायरा फैलने के साथ सांप्रदायिक ताकतों को नया समर्थक आधार मिल गया है। नेहरू अपने सपने और आर्थिक एवं विदेश नीतियों की वजह से इन सभी ताकतों के स्वाभाविक निशाने के रूप में उभरते हैं। और ये ताकतें जानती हैं कि जब तक नेहरूवाद को एक खलनायक के रूप में स्थापित नहीं कर दिया जाता, उनकी अंतिम कामयाबी संदिग्ध है।

पिछले डेढ़ दशक में इन ताकतों के बढ़ते खतरे ने बहुत से लोगों को नेहरू की प्रासंगिकता पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जिस आधुनिक भारत की कल्पना विकसित हुई और जिसे आजादी के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में ठोस रूप दिया गया, उसके लिए पैदा हुए खतरे के बीच यह सवाल बेहद गंभीरता से उठा है कि आखिर इस भारत की रक्षा कैसे की जाए? यह विचार मंथन हमें उन रणनीतियों और सोच की अहमियत समझने की नई दृष्टि देता है, जो पंडित नेहरू ने प्रतिक्रियावादी, आधुनिकता विरोधी और अनुदार शक्तियों के खिलाफ अपनाई। उन्होंने इन ताकतों के खिलाफ वैचारिक संघर्ष जरूर जारी रखा, लेकिन उनकी खास रणनीति देश को विकास एवं प्रगित का सकारत्मक एजेंडा देने की रही, जिससे तब की पीढ़ी भविष्य की तरफ देख पाई और आर्थिक एवं सांस्कृतिक पिछड़पन की व्यापक पृष्ठभूमि के बावजूद एक नए एवं आधुनिक भारत का उदय हो सका।

पंडित नेहरू ने उस वक्त के मानव विकासक्रम की स्थिति, उपलब्ध ज्ञान और संसाधनों के आधार पर उस भारत की नींव रखी, जो आज दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। लेकिन नेहरू की रणनीतियों की नाकामी यह रही कि नए भारत में गरीबी, असमानता और व्यवस्थागत अन्याय को खत्म नहीं किया जा सका। नतीजतन, आज हम एक ऐसे भारत में हैं जहां संपन्नता और विपन्नता की खाई बढ़ती नजर आ रही है, और नेहरू ने समाजवाद के जिन मूल्यों की वकालत की वो आज बेहद खोखले नजर आते हैं। यह विसंगति निसंदेह पंडित नेहरू की विरासत पर बड़ा सवाल है।

लेकिन इस सवाल से उलझते हुए भी आज की पीढ़ी के पास सबसे बेहतरीन विकल्प संभवतः यह नहीं है कि नेहरू की पूरी विरासत को खारिज कर दिया जाए। बल्कि सबको समाहित कर और सबके साथ न्याय की जो बात नेहरू के भारत के सपने के बुनियाद में रही, वह आज भी इस राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, जिसकी जड़ें मजबूत किए जाने की जरूरत है। ये दोनों बातें विकास और प्रगति के एक खास स्तर के साथ ही हासिल की जा सकती हैं, नेहरूवाद की यह मूल भावना भी शायद विवाद से परे है। यह जरूर मुमकिन है कि विकास और प्रगति की नई अवरधारणाएं पेश की जाएं और उनकी रोशनी में पुरानी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार हो। बहरहाल, विश्व मंच पर भारत अपनी स्वतंत्र पहचान रखे और जिन मूल्यों पर भारतीय राष्ट्र की नींव डाली गई, उनकी इन मंचों पर वह वकालत करे, यह नेहरूवादी विरासत आज भी उतना ही अहम है, जितना जवाहर लाल नेहरू के जीवनकाल में था, इस बात पर भी शायद कोई मतभेद नहीं हो सकता।

दरअसल, बात जब नेहरू की होती है, तब ये विचार ही सबसे अहम हैं। इन पर आज सबसे ज्यादा चर्चा की जरूरत है। नेहरू की नाकामियां जरूर रेखांकित की जानी चाहिए, लेकिन उनके कुल योगदान का विश्लेषण वस्तुगत और तार्किक परिप्रेक्ष्य में ही होना चाहिए। वरना, हम उन ताकतों की ही मदद करते दिखेंगे जो नेहरू की छवि एवं विरासत का ध्वंस दरअसल भारत के उस नए विचार का ध्वंस करने के लिए करती हैं, जो आजादी की लड़ाई के दिनों में पैदा हुआ, आधुनिक समतावादी चितंकों ने जिसे विकसित किया, जो गांधी-नेहरू के नेतृत्व में अस्तित्व में आया और जिसे आज दुनिया भर में सहिष्णुता, सह-अस्तित्व एवं मानव विकास का एक बेहतरीन आदर्श माना जा रहा है। नेहरू इसी भारत के प्रतीक हैं, और इसीलिए वैचारिक मतभेदों के बावजूद उनकी विरासत की आज रक्षा किए जाने की जरूरत है।

Friday, May 9, 2008

डेमोक्रेटिक पार्टी का ‘ओन गोल’


सत्येंद्र रंजन
बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने की जंग लगभग जीत चुके हैं। बीते मंगलवार को इंडियाना और नॉर्थ केरोलीना राज्यों की डेमोक्रेटिक प्राइमरी के नतीजों का सभवतः यही पैगाम रहा। हालांकि अब भी छह राज्यों में उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया बाकी है, लेकिन वहां से डेमोक्रेटिक राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए महज २१७ प्रतिनिधि चुने जाने हैं, जबकि अब तक की सूची में ओबामा हिलेरी क्लिंटन पर १६५ प्रतिनिधियों की बढ़त बना चुके हैं। किसी भी हाल में उन छह राज्यों के सभी प्रतिनिधि हिलेरी क्लिंटन को नहीं मिल सकते और इस तरह अब यह तय है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की आखिरी सूची में ओबामा की बढ़त कायम रहेगी। उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में हुए मतदान में भी ओबामा की बढ़त जारी है। उन्हें अब तक ४९.६ फीसदी वोट मिले हैं, जबकि हिलेरी क्लिंटन ४७.३ प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई हैं और इस तरह ओबामा से २.३ फीसदी वोटों से पिछड़ी हुई हैं।

इस सूरत के बावजूद अगर हिलेरी क्लिंटन अब भी मैदान में डटी हुई हैं, तो इसके पीछे उनका अपना गणित है। दरअसल, अब यह भी तय हो गया है कि प्राइमरी और कॉकस के जरिए ओबामा या क्लिंटन दोनों में से कोई भी स्वतः उम्मीदवारी हासिल करने के लिए जरूरी २,०२५ प्रतिनिधियों की निर्णायक संख्या हासिल नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक भूमिका उन प्रतिनिधियों की होगी, जिन्हें सुपर डेलीगेट्स कहा जाता है। ये पार्टी के निर्वाचित जन प्रतिनिधि, पूर्व राष्ट्रपति, गवर्नर और पार्टी पदाधिकारी होते हैं और इनकी संख्या ६०१ है। इन प्रतिनिधियों में जिन लोगों ने अपनी पसंद अब तक जाहिर की है, उनमें हिलेरी क्लिंटन की बढ़त बनी हुई है। सुपर डेलीगेट्स के साथ सुविधा यह होती है कि वे आखिरी वक्त कर अपना रुख बदल सकते हैं। हिलेरी क्लिंटन की अब सारी जंग इन लोगों को यह समझाने की है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर बराक ओबामा ने भले भारी समर्थन हासिल किया हो, लेकिन जब बात नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की आएगी तो ओबामा आम अमेरिकी मतदाताओं के बीच इतना समर्थन हासिल नहीं कर पाएंगे, जिससे वे रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन को हरा सकें।

जनमत सर्वेक्षणों पर गौर करें तो क्लिंटन के दावे में दम नजर आता है। अमेरिकी राजनीति की तस्वीर पेश करने वाली वेब साइट रियल क्लीयर पॉलिटिक्स डॉट कॉम के मुताबिक मैकेन पर जहां ओबामा को २.६ फीसदी की बढ़त हासिल है, वहीं हिलेरी क्लिंटन मैकेन से ३.९ फीसदी अंतर से आगे हैं। यानी अगर क्लिंटन उम्मीदवार बनती हैं तो उनके जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी। असल में ओबामा भले ही ज्यादातर राज्यों में जीते हों, लेकिन अधिकांश बड़े राज्यों में, जो राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक होते हैं, वहां हिलेरी क्लिंटन को ज्यादा समर्थन मिला है। इसी तरह अगर अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों को छोड़ दें तो हिलेरी क्लिंटन को उन सभी समूहों में ज्यादा समर्थन मिला है जो डेमोक्रेटिक पार्टी का वोट आधार रहे हैं।

बराक ओबामा ने दरअसल निर्दलीय समूहों, कुछ पहले रिपब्लिकन पार्टी का समर्थक रहे समूहों और खासकर नौजवानों को ज्यादा आकर्षित किया है। ह्वाइट हाउस की होड़ में वे अपनी इराक युद्ध विरोधी छवि के साथ उतरे। जब इराक युद्ध अमेरिकी जन मानस में एक गहरा नासूर बन चुका था, उस समय बहुत से लोगों को शुरुआत से इस युद्ध का विरोधी होने की ओबामा की छवि ने आकर्षित किया। ओबामा एक ओजस्वी वक्ता के रूप में सामने आए और राजनीति की आम पेचीदगियों में न पड़ते हुए उन्होंने परिवर्तन का नारा दिया, जो सटीक बैठा। ‘वॉशिंगटन ऐस्टैबलिशमेंट’ को अपने निशाने पर लेते हुए उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। इससे उन्होंने जॉर्ज बुश जूनियर के प्रशासन से लोगों की गहरी नाराजगी का फायदा उठाया और साथ ही यह संदेश दिया कि हिलेरी क्लिंटन उसी पुरानी व्यवस्था की नुमाइंदा हैं, जिसकी वजह से आम नागरिकों के हाथ में अपने देश का नियंत्रण नहीं रह गया है।

इस दौर में ओबामा का सारा जोर मतभेद पाटने पर रहा है। नस्ल, वर्ग और क्षेत्र के विभाजनों से ऊपर उठ कर एक अमेरिका का अपना संदेश वे बहुत से लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। जब उनके पुराने पादरी जेरमी राइट ने अमेरिका में काले लोगों के साथ अन्याय के सवाल पर जोशीला भाषण दिया तो ओबामा ने फौरन उसकी निंदा करते हुए उनसे अपने को अलग करने का एलान किया। ओबामा के इस भाषण को कई हलकों में ऐतिहासिक में बताया गया है। खासकर धनी गोरे और सभ्रांत हलकों में, जहां नस्ल के सवालों पर परदा डालने की सहज प्रवृत्ति रहती है। लेकिन मुश्किल यह है कि ये तबके रिपब्लिकन पार्टी के वोटर हैं और उनका समर्थन असली मुकाबले में ओबामा के ज्यादा काम नहीं आ सकता है।

डेमोक्रेटिक पार्टी के असली समर्थक तबकों- मसलन, मेहनतकश और मध्य वर्ग के गोरे समुदायों और हिस्पैनिक समूहों में ओबामा ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं। इन तबकों ने हिलेरी क्लिंटन में अपना ज्यादा भरोसा जताया है। इसकी वजह यह है कि ठोस कार्यक्रमों की बात करें तो ओबामा बेहद हलके नजर आते हैं। उन्होंने लच्छेदार भाषा में जोशीले भाषण खूब दिए हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य देखभाल और यहां तक कि विदेश नीति के सवालों पर भी कोई वैकल्पिक कार्यक्रम या नीति पेश करने में नाकाम रहे हैं। इन बिंदुओं पर हिलेरी क्लिंटन कहीं ज्यादा ठोस नजर आती हैं। मसलन, स्वास्थ्य देखभाल के मुद्दे पर उन्होंने पूरी बारीकियों के साथ अपना कार्यक्रम रखा है, जबकि ओबामा यह कह कर इसका मजाक उड़ाते रहे हैं कि हिलेरी सब पर स्वास्थ्य बीमा जबरन थोपना चाहती हैं।

दरअसल, मुद्दों पर स्पष्ट रुख की वजह से ही हिलेरी क्लिंटन को बांटने वाली शख्सियत कहा गया है। जबकि ओबामा साफ रुख न लेकर मतभेदों को पाटने वाली अपनी छवि पेश करने में सफल रहे हैं। इससे उन्हें उन हलकों से खूब समर्थन मिला है, जो परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ नहीं रहे हैं। लेकिन यही उनकी उम्मीदवारी के सामने सबसे बड़ा सवाल है। हिलेरी क्लिंटन की कोशिश अब सुपर डेलीगेट्स को यह समझाने की है कि अफ्रीकी-अमेरिकियों को छोड़कर डेमोक्रेटिक पार्टी का बाकी असली समर्थन आधार उनके साथ है औऱ इसीलिए उनके जीतने की संभावना ज्यादा मजबूत है।

राष्ट्रपति चुनाव के इस साल में रिपब्लिकन पार्टी ने बेहद कमजोर संभावनाओं के साथ कदम रखा। लेकिन उसने जल्दी उम्मीदवार चुन कर अपने लिए एक अनुकूल स्थिति पैदा की। जॉन मैकेन चुनाव प्रचार में उतर चुके हैं और रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक दक्षिणपंथी धनी समूह और मीडिया उनकी छवि उभारने के अभियान में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी में होड़ लगातार तीखी होती गई है। इस क्रम में ओबामा और क्लिंटन दोनों ने एक दूसरे पर हमले करने के काफी हथियार अपने विरोधियों को खुद मुहैया कर दिए हैं। तमाम संभावनाएं इस ओर संकेत कर रही हैं कि यह होड़ अभी और लंबा खिंचेगी और यह मुमकिन है कि अगस्त में होने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिवेशन में ही जाकर उम्मीदवारी आखिरी रूप से तय हो।
अगर अंततः डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक हुसेन ओबामा ही होते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि रिपब्लिकन चुनाव मशीन नस्ल, और उनके अतीत के कई झूठे-सच्चे किस्से और सवाल जोरशोर से उठाकर मतदाताओं को भरमाने की कोशिश करेगी। बिना ठोस कार्यक्रम के वे डेमोक्रेटिक समर्थन आधार में कैसे उत्साह भरेंगे और ब्लैक समुदाय के एक नेता के राष्ट्रपति बनने की संभावना से भड़कने वाली गोरों की प्रतिक्रिया का तोड़ कैसे निकालेंगे, यह उनकी कामयाबी की असली कसौटी होगी। उधर मौजूदा हालात में अगर हिलेरी क्लिंटन उम्मीदवार बन जाती हैं तो उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं होंगी। इससे रिपब्लिकन पार्टी को यह प्रचार करने का मौका मिलेगा कि डेमोक्रेटिक पार्टी में आम जन के मत का कोई मोल नहीं है, सुपर डेलीगेट यानी पार्टी के मठाधीश वहां जनमत की अवहेलना कर अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिता सकते हैं। इससे पार्टी की लोकतांत्रिक छवि प्रभावित होगी।

लेकिन अब हकीकत यही है कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने शुरुआत में अपने लिए अनुकूल दिख रहे हालात को उलझा दिया है। ओबामा और हिलेरी क्लिंटन की होड़ में लोगों को मजा खूब आया है और इससे अमेरिकी राजनीति में एक तरह की रफ्तार भी आती नजर आई है, लेकिन चुनाव संभावनाओं के लिहाज से देखें तो यह पूरा दौर, अगर फुटबॉल की शब्दावली में कहें, तो डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए ‘ओन गोल’ करने जैसा है।

Wednesday, May 7, 2008

क्रीमी लेयर और न्यायपालिका


सत्येंद्र रंजन
अन्य पिछड़ी जातियों के लिए ऊंचे सरकारी शिक्षा संस्थानों में सत्ताइस फीसदी आरक्षण को संविधान सम्मत ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विधायिका और न्यायपालिका में एक बड़े टकराव की आशंका टल गई। केंद्र की यूपीए सरकार ने इस फैसले से राहत की सांस ली और इसे अपनी जीत बताकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक इस आरक्षण पर अमल में जुट गई है। लेकिन हकीकत यही है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक न्याय की समर्थक शक्तियों की महज आधी जीत है। यह ओबीसी आरक्षण की सैद्धांतिक जीत जरूर है, लेकिन व्यवहार में इस आरक्षण के प्रभावी होने के रास्ते में हाल के न्यायिक फैसले ने कई अड़चनें भी खडी कर दी हैं।

इस आरक्षण को संभव बनाने के लिए संविधान में हुए ९३वें संशोधन के बारे में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा- जहां तक सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थानों की बात है, यह संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। इसी संविधान संशोधन के तहत संसद में पारित हुए शिक्षा संस्थान (दाखिला में आरक्षण) कानून २००६ को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान सम्मत करार दिया। इस तरह पूर्णतः सरकारी या सरकारी सहायता से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का रास्ता साफ हो गया।

लेकिन यह रास्ता क्रीमी लेयर की अवधारणा पर कोर्ट के काफी जोर देने तथा जजों की कई टिप्पणियों से खासा संकरा हो गया है। कोर्ट ने न सिर्फ क्रीमी लेयर को आरक्षण के फायदे से बाहर रखने का निर्देश दिया, बल्कि यह व्यवस्था भी दे दी है कि अगर आरक्षित सीटें अन्य पिछड़ी जातियों के गैर क्रीमी लेयर उम्मीदवारों से नहीं भरती हैं तो वे सीटें सामान्य श्रेणी के छात्रों के भरी जाएं। पांच जजों ने चार अलग-अलग फैसले सुनाए और इनमें से एक फैसले में यह भी कहा गया कि आम छात्रों से दस फीसदी कम नंबर लाने वाले छात्रों तक ही आरक्षण का लाभ सीमित रहे। क्रीमी लेयर की चर्चा करते हुए एक आदेश यह दिया गया कि मौजूदा और पूर्व सांसदों एवं विधायकों की संतानों को इसमें शामिल किया जाए, ताकि उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिल सके। इन व्यवस्थाओं से जजों की सोच का साफ संकेत मिलता है। उनकी टिप्पणियां यह साफ करती हैं कि उनकी सोच में ओबीसी आरक्षण सामाजिक न्याय का कोई कदम नहीं, बल्कि वोट बैंक की राजनीति है, जिस पर लगाम लगाना जरूरी है।

देश की सामाजिक हकीकत से वाकिफ कोई व्यक्ति यह आसानी से समझ सकता है कि जिन शर्तों के साथ आरक्षण को हरी झंडी दी गई है, उनके रहते इस आरक्षण के मकसद को कभी हासिल नहीं किया जा सकता। यहां गौरतलब है कि मौजूदा फैसला इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में १९९३ में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के रोशनी में आया है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएच कीनिया की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने उस फैसले में मंडल आयोग की सिफारिशों के मुताबिक केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए सत्ताइस फीसदी आरक्षण को सही ठहराया था। लेकिन उसके साथ ही क्रीमी लेयर की अवधारणा भी उससे जोड़ दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण का लाभ क्रीमी लेयर को नहीं मिलना चाहिए, बल्कि जो परिवार आरक्षण का लाभ पाकर आगे बढ़ चुके हैं, धीरे-धीरे उन्हें आरक्षण के फायदे से अलग करने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।

तब सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर की अवधारणा को इस आधार पर संविधान सम्मत बताया था कि संविधान में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की बात कही गई है, न कि पिछड़ी जातियों को। कोर्ट ने मंडल आयोग के इस निष्कर्ष को माना कि भारतीय समाज में जाति सामाजिक हैसियत और आर्थिक हालत का एक पैमाना है, लेकिन यह स्वीकार नहीं किया कि एक जाति के सभी लोग इस पैमाने के तहत आते हैं। कोर्ट का कहना था कि जाति, आर्थिक हैसियत और शैक्षिक स्थिति को एक साथ लेते हुए वे वर्ग तय किए जा सकते हैं, जिन्हें आरक्षण का फायदा मिले। तब से क्रीमी लेयर की अवधारणा आरक्षण के संदर्भ में मौजूद है और अक्सर यह मांग उठती रही है कि इसे अनुसूचित जातियों और जन जातियों के लिए जारी आरक्षण में भी लागू किया जाए। फिलहाल जब ओबीसी आरक्षण का दायरा ऊंची शिक्षा में फैलाया गया है तो सुप्रीम कोर्ट ने यहां इस पर सख्ती से अमल का आदेश दिया है।

आरक्षण का फायदा उत्तरोत्तर ज्यादा गरीब और वंचित तबकों को मिले, इस पर किसी को कोई एतराज नहीं है। लेकिन मुश्किल इस व्यवस्था से है कि अगर इन तबकों से आरक्षित सीटें नहीं भर पाती हैं तो फिर उन सीटों को सामान्य श्रेणी के छात्रों से भर दिया जाए। यह व्यवस्था आरक्षण के उद्देश्य को विफल कर देती है। सवाल है कि अगर पिछड़ी जातियों के क्रीमी लेयर के छात्र उन सीटों पर नहीं आएंगे तो वे सीटें ऊंची जातियों के क्रीमी लेयर जैसी हैसियत वाले छात्रों को क्यों मिलनी चाहिए? साथ ही इस चर्चा में आरक्षण से जुड़ी एक बेहद अहम बात नजरअंदाज कर दी गई है कि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है। इसका मकसद निर्णय की प्रक्रिया में उन सभी समूहों और जातियों की नुमाइंदगी सुनिश्चित करना है, जो सदियों से जाति व्यवस्था के कठोर कायदों की वजह से इससे वंचित रहे हैं। इसलिए यह व्यवस्था तो ठीक है कि आरक्षण का लाभ देने में प्राथमिकता आर्थिक आधार पर तय हो, लेकिन इसे अंतिम शर्त बना देना आरक्षण की मूल धारणा पर प्रहार है।

दरअसल, ओबीसी आरक्षण के बारे में सुप्रीम कोर्ट का हाल का फैसला ऐसी टिप्पणियों से भरा हुआ है, जो आरक्षण का पक्ष लेने के बजाय आरक्षण पर सवाल खड़ा करती लगती हैं। १९५१ में संविधान में पहला संशोधन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को संभव बनाने के लिए किया गया था। इस संशोधन के जरिए संविधान के अनुच्छेद १५ में चौथी धारा जोड़ी गई थी। अनुच्छेद १५ (४) के जरिए सरकार को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों अथवा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जन जातियों की तरक्की के लिए कदम उठाने का अधिकार दिया गया। ताजा फैसले में न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी ने इस कदम के उद्देश्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने टिप्पणी की है कि यह व्यवस्था करते समय पहली संसद संविधान निर्माताओं के उद्देश्य से भटक गई। उसने ऐसा संशोधन पास किया, जिससे जातिवाद कमजोर होने के बजाय मजबूत हुआ। जाहिर है, न्यायपालिका की एक धारा आरक्षण जैसे कदमों के साथ खुद को सहज महसूस नहीं कर रही है। वह न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों के बारे में समाज के परंपरागत प्रभु वर्ग की सोच के ज्यादा करीब नज़र आती है। इस सोच में यह बात गहरी बैठी हुई है कि अन्याय के शिकार दरअसल, वे जातियां हैं जिनके हाथ से आरक्षण की वजह से प्रशासनिक वर्चस्व एवं रोजगार के महत्त्वपूर्ण अवसर निकल रहे हैं।

हाल के वर्षों में न्यायपालिका का रुझान ऐसे तबकों के हितों की चिंता करना ज्यादा नजर आता रहा है। हाल का फैसला भी काफी कुछ इसी क्रम में है। इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले के पूर्व फैसले, शिक्षा में ओबीसी के लिए आरक्षण के सवाल पर संपूर्ण राजनीतिक सहमति तथा विधायिका में इस पर सर्वसम्मति के माहौल में सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धांततः इस आरक्षण को संवैधानिक जरूर माना, लेकिन इसके औचित्य पर कुछ सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

अगर लोकतांत्रिक समाजों में न्यायपालिका के इतिहास पर गौर किया जाए तो उसकी इस भूमिका को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। भारतीय संविधान में पहला संशोधन ही इसलिए करना पड़ा क्योंकि कोर्ट ने कुछ जातियों और समुदायों के लिए शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के मद्रास सरकार के फैसले को खारिज कर दिया। इसी तरह न्यायपालिका ने १९६० के दशक में बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजा-महाराजाओं को मिलने वाले प्रीवी पर्स को खत्म करने के सरकार और संसद के फैसले को असंवैधानिक बता दिया था। उसके पहले भूमि सुधारों को लागू करने की सरकार की कोशिश भी न्यायिक हस्तक्षेप से बाधित होती रही, जिसकी वजह से संसद ने संविधान में नौवीं अनुसूची की व्यवस्था की, जिसे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने निष्प्रभावी कर दिया। ये तमाम फैसले धनी और सामाजिक वर्चस्व रखने वाले समूहों के हित में रहे हैं।

अगर अमेरिकी इतिहास पर गौर करें तो वहां भी ऐसे न्यायिक फैसलों की कोई कमी नहीं है। १८६५ में अमेरिकी संविधान में १३वें संशोधन के जरिए गुलामी प्रथा को खत्म किया गया और १९६८ में १४वें संशोधन के जरिए सभी नागरिकों के लिए कानून के समान संरक्षण की व्यवस्था की गई। ये दौर था जब अश्वेत समुदायों के साथ खुलेआम भेदभाव किया जाता था और उन्हें उन स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता था, जिनमें गोरे बच्चे पढ़ते थे। अश्वेत समुदायों को गोरों से अलग रखने की नीतियों को समान संरक्षण कानून के तहत जब १८९८ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि ये नीतियां इस कानून का उल्लंघन नहीं करतीं। १८९० के दशक के मध्य में ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आय कर को असंवैधानिक घोषित करते हुए धनी तबकों को बड़ी राहत दी थी। १९३० के दशक में जब भारी मंदी के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी रूजवेल्ट ने न्यू डील कार्यक्रम के तहत वित्तीय क्षेत्र पर लगाम कसने और कमजोर तबकों को राहत पहुंचाने की कोशिश की, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। तब चिढ़ कर रूजवेल्ट ने ये टिप्पणी की थी कि सुप्रीम कोर्ट ने अब फैसला दे दिया है, उसे खुद ही इस पर अमल करने दीजिए!

दरअसल, न्यायपालिका के ऐसे रुझान की वजह उसकी अंदरूनी संरचना से जुड़ी होती है। यहां आम तौर पर समाज के प्रभु वर्ग के लोग पहुंचते हैं और उसी तबके की सोच से उनका मनोविज्ञान प्रभावित रहता है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के दौर में संविधान पर अमल की समीक्षा के लिए बने आयोग की यह टिप्पणी गौरतलब है- उच्चतर न्यायपालिका में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नाकाफी है। विभिन्न हाई कोर्टों के ६१० जजों में सिर्फ २० जज ही अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के हैं। दरअसल, हर क्षेत्र में ऐसी हालत की वजह से आरक्षण की नीति अपनानी पड़ी। आरक्षण का असली मकसद हर क्षेत्र में ऐसे ही वंचित तबकों के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी करना है। इसके बिना लोकतंत्र महज एक औपचारिक ढांचा ही बना हुआ है। लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने और सामाजिक न्याय को हकीकत में बदलने के लिए आरक्षण की इस मूल भावना पर अमल जरूरी है। लेकिन हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ऐसा अमल मुश्किल हो गया है। राजनीतिक दलों और तमाम लोकतांत्रिक शक्तियों को इस फैसले के इस निहितार्थ को जरूर समझना चाहिए।

इसलिए क्रीमी लेयर की अवधारणा और उसके व्यावहारिक रूप पर आज गंभीर बहस खड़ी किए जाने की जरूरत है। इस पर संसद में न सिर्फ चर्चा होनी चाहिए, बल्कि क्रीमी लेयर कौन है, इसे तय करने का अधिकार भी संसद को खुद अपने हाथ में लेना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि राजनीतिक दल इस जरूरत के प्रति लापरवाह नजर आते हैं। न्यायपालिका ने १९७३ में केशवानंद भारती मामले संविधान के बुनियादी ढांचे की अवधारणा देकर संसद के हाथ बांध दिए और ये दल खामोश रहे। २००७ में नागरिकों के मूल अधिकार की न्यायिक व्याख्या कर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मामलों में अपनी निर्णायक स्थिति बना ली और इस पर भी संसद में चर्चा करने की जरूरत नहीं महसूस की गई। अब यही हाल क्रीमी लेयर की अवधारणा पर होता दिख रहा है। लेकिन ये गौर करने की बात है कि इससे वास्तविक लोकतंत्र का वास्तविक दायरा सिकुड़ रहा है।

Tuesday, April 15, 2008

अब पहले खाने के बारे में सोचिए!


सत्येंद्र रंजन
दुनिया जिस समय विकास के एक नए स्तर पर पहुंची मानी जा रही है और ये मान लिया गया था कि अब इंसान की बुनियादी समस्याएं देर सबेर हल हो जाएंगी, उसी समय मानव समाज को सबसे बुनियादी समस्या ने घेर लिया है। समस्या खाने की है। अनाज का गहरा संकट सारी दुनिया में पैदा हो गया है और उसका सीधा असर लगभग हर समाज पर पड़ रहा है। जाहिर है, हर मसले की तरह इस संकट का भी सबसे बुरा असर गरीबों पर पड़ रहा है। विश्व बैंक का अनुमान है कि अगर इस समस्या का जल्द हल नहीं निकला तो निम्न मध्य वर्ग के दस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे। लेकिन सवाल है कि आखिर ये हल कैसे निकलेगा? क्या दुनिया भर की सरकारें इसके लिए जरूरी संकल्प दिखाएंगी?
बहरहाल, किसी समाधान पर चर्चा के पहले समझने की सबसे जरूरी बात यह है कि आखिर ये समस्या पैदा क्यों हुई? बीसवीं सदी में खेतों की पैदावार बढ़ाने की नई तकनीक सामने आई, जिससे भूख पर विजय की वास्तविक संभावनाएं पैदा हुईं। खेती में उत्पादकता में भारी बढ़ोतरी ने आबादी बढ़ने के बावजूद अतिरिक्त अनाज की उपलब्धता को संभव बनाया। लेकिन २१वीं सदी के पहले दशक में मानव समाज की वह उपलब्धि कहीं खोती नज़र आ रही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? स्पष्टतः इसकी इंसानी और आसमानी दोनों वजहें हैं, लेकिन इंसानी वजहें ज्यादा हैं और ये वजहें तब तक दूर नहीं होंगी, जब तक सरकारों की नीतियों और प्रभावशाली तबकों की सोच में बुनियादी बदलाव नहीं आता है।

पहले इस संकट के आसमानी यानी कुदरती वजहों पर गौर करते हैं। हालांकि इसमें एक खास पहलू यह है कि आसमानी वजहों के पीछे भी एक हद तक इंसान का ही हाथ है। अभी दुनिया को जिस खाद्य संकट का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे एक कारण ऑस्ट्रेलिया में पिछले दो साल से पड़ रहा अकाल है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। वहां से निर्यात न हो पाने की वजह से विश्व बाजार में गेहूं की भारी कमी हो गई है। मलेशिया और फिलीपीन्स जैसे पूर्वी एशियाई देशों में चावल की पैदावार घटने से ऐसी ही स्थिति चावल को लेकर बनी है।

लेकिन कुदरत की मार पर आसानी से काबू पाया जा सकता था, अगर अमेरिका और लैटिन अमेरिका के कुछ देशों में अनाज की खेती के लिए उतनी जमीन मौजूद रहती जितनी अभी हाल तक रहती थी और वहां अनाज का इस्तेमाल खाने के बजाय दूसरे मकसद के लिए नहीं होता। दरअसल, कच्चे तेल के बढते दाम और तेल के भंडार खत्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव-ईंधन पर जोर देना शुरू कर दिया है। वहां मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल इथोनेल जैसे बायो-फ्यूयल यानी जैव ईंधन बनाने के लिए होने लगा है। अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों की सरकारें जैव ईंधन के लिए काम आने वाली फसलों की खेती के लिए सब्सिडी दे रही हैं और किसानों को इसकी खेती में ज्यादा फायदा नज़र आ रहा है। इससे खाने के अनाज के लिए उपलब्ध जमीन और अनाज की मात्रा दोनों घट रही है। इससे विश्व बाजार में अनाज की कमी हो गई है और उसकी कीमत बढ़ रही है।

भारत जैसे बडी आबादी वाले देश में जहां अनाज की आत्म-निर्भरता महज तकनीकी तौर पर ही हासिल की जा सकी थी, हाल के वर्षों में अनाज के बजाय कपास और ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढता गया है, जिसे बाजार में बेच कर पैसा कमाया जा सके। किसान ऐसी खेती करने पर इसलिए मजबूर होते हैं, क्योंकि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उपजाने वाले किसान गरीबी में दम तोड़ते रहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि बिक्री के लिए उपजाई जाने वाली गैर अनाज फसल में नुकसान होने का अंदेशा सामान्य से ज्यादा रहता है और इसीलिए विदर्भ जैसे इलाके में किसान सबसे गहरे संकट में हैं। लेकिन इस अनुभव से कोई सबक लेने के बजाय अब भारत भी जैव ईंधन की दौड़ में शामिल होने को तैयार होता दिख रहा है। इसके लिए ऐसी नीति का खाका तैयार कर लिया गया है और खबर है कि मई के आखिर तक कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की एक समिति इसे अंतिम रूप देने वाली है। इस खाके मुताबिक २०१७ तक देश की परिवहन ईंधन की कुल जरूरत का दस फीसदी जैव ईंधन से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए एक करोड़ २० लाख हेक्टेयर में जैव ईंधन तैयार करने में काम आने वाली फसलें उपजाई जाएंगी। गौरतलब है कि देश में बायो डीजल तैयार करने पर पहले ही काम शुरू हो चुका है। आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसके लिए छह लाख एकड़ जमीन पर एक खास पौधे की खेती की जा रही है।

जाहिर है, खाद्य संकट का सीधा रिश्ता अब तेल से जुड़ गया है। ऐसे में इसमें कोई हैरत की कोई बात नहीं कि तेल और अनाज की महंगाई साथ-साथ दुनिया को झेलनी पड़ रही है। विश्व बाजार में कच्चे तेल का भाव ११० डॉलर प्रति बैरल की सीमा को लांघ चुका है। तेल का दाम बढ़ने से परिवहन महंगा होता है, उससे अनाज की आपूर्ति महंगी होती है। उधर धनी-मानी तबकों की जीवन शैली महंगी होती है और उनमें भविष्य में ऊर्जा की उपलब्धता को लेकर आशंकाएं पैदा होती है। इससे वे विकल्प की तलाश में जुटते हैं और उन्होंने एक विकल्प जैव ईंधन के रूप में चुना है। इस दुश्चक्र से दुनिया भर के गरीबों के मुंह से आहार छीने जाने की हालत पैदा हो गई है।

अगर सिर्फ भारत के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां गेहूं, मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की खेती वाली जमीन में लगातार गिरावट आ रही है। मसलन, पिछले साल देश में दो करोड़ ८२ लाख १४ हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की खेती हुई थी, तो इस साल यह खेती सिर्फ दो करोड़ ७७ लाख ४८ हजार हेक्टेयर जमीन पर हुई है। मोटे अनाजों की पिछले साल ७० लाख ५७ हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई थी, जो इस साल ६८ लाख १६ हजार हेक्टेयर रह गई है। यही हाल दालों और तिलहन का भी है। साफ है कि अनाज की पैदावार देश की कृषि नीति में प्राथमिकता नहीं रह गई है, औऱ इसका नतीजा अब सामने आने लगा है।

लेकिन अनाज संकट की वजहें यहीं तक सीमित नहीं हैं। इसका संबंध बिगड़ते जलवायु और विकासशील देशों में खान-पान की बदलती आदतों से भी है। धरती के बढ़ते तापमान के साथ बारिश का चक्र बिगड़ गया है और इससे कहीं ज्यादा बारिश, तो कहीं सूखा पड़ने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। उधर समुद्र में जलस्तर बढ़ने से कई तटीय इलाकों के डूबने का खतर बढ़ता जा रहा है। इससे भी खेती की काफी जमीन इनसान के हाथ से निकल सकती है। जानकारों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में पड़े अकाल के पीछे जलवायु परिवर्तन की खास भूमिका है। चीन, भारत और कई दूसरे विकासशील देशों में तेजी से औद्योगिक विकास ने जलवायु परिवर्तन की वह रफ्तार तेज कर दी है, जो पहले ही पश्चिम की उपभोक्तावादी जीवनशैली की वजह से खतरनाक रूप ले रही थी। इन देशों में औद्योगिक विकास का एक और परिणाम यहां के धनी तबकों में पश्चिमी ढंग की जीवनशैली का प्रसार है। क्रयशक्ति में इजाफे और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति के साथ इन देशों में अनाज की खपत भी तेजी से बढ़ी है। मसलन, अब लोग यहां मांसाहार ज्यादा करने लगे हैं। जानकारों के मुताबिक १०० कैलोरी के बराबर बीफ (गोमांस) तैयार करने के लिए ७०० कैलोरी के बराबर का अनाज खर्च करना पड़ता है। इसी तरह बकरे या मुर्गियों के पालन में जितना अनाज खर्च होता है, उतना अनाज अगर सीधे खाना हो तो वह कहीं ज्यादा लोगों को उपलब्ध हो सकता है।

ऊर्जा की बढ़ती मांग और बढ़ते उपभोग के साथ-साथ बढ़ती आबादी ने संकट में एक नया आयाम जोड़ दिया है। खासकर एशिया के देशों में आबादी के स्थिर होने का लक्ष्य अभी दूर की बात है। इस बीच एक बार फिर यह हालत पैदा हो गई है कि आबादी में इजाफे की दर अनाज की पैदावार बढ़ने की दर से आगे निकल गई है। ऐसे में अनाज की किल्लत एक स्वाभाविक परिघटना है। बहरहाल, अब उम्मीद की एक वजह यही नजर आती है कि भले ही देर से लेकिन अब सरकारें इस संकट के प्रति जागरूक होती लग रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जैव ईंधन के लिए अनाज की जमीन के इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी देना इस बात का प्रमाण है कि आम तौर पर उद्योग जगत के हितों को तरजीह देने वाले नेता भी अब यह समझने लगे हैं कि अगर पर्याप्त अनाज उपलब्ध नहीं रहा तो औद्योगिक सभ्यता की जड़ें भी हिल जाएंगी। इसके अलावा लोकतांत्रिक समाजों के बढ़ते दायरे के साथ अब आम जन की बुनियादी समस्याओं से बिल्कुल मुंह मोड़े रखना सरकारों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है। विश्व बैंक जैसी अंतराष्ट्रीय पूंजी की हितैषी संस्था का भी खाद्य संकट को लेकर चिंतित होना यह बताता है कि इस संकट ने आखिरकार सभी स्तरों पर हलचल पैदा की है।

लेकिन क्या हलचल वास्तव में नीतियों में किसी आमूल बदलाव की शुरुआत कर सकेगी, इस वक्त यह सबसे बड़ा सवाल है। इसलिए कि ये ऐसी समस्या नहीं है जो कुछ फ़ौरी कदमों से हल कर ली जाए। इसके लिए सोच में बड़े बदलाव की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि दुनिया चाहे विकास की जिस मंजिल पर पहुंच जाए, खेती उसकी बुनियादी आवश्यकता बनी रहेगी। बिना भोजन किए न तो अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकती है और न इंटरनेट और सूचना तकनीक के जरिए सारी दुनिया से जुड़े रहने का आनंद लिया जा सकता है। इसलिए खेती और किसानों को सम्मान देना, किसानों की मेहनत का पूरा दाम देना और उन्हें विज्ञान एवं तकनीक के विकास से उपलब्ध हर सुख-सुविधा मुहैया कराना हर विकास नीति के केंद्र में होना चाहिए।

खासकर यह संकट भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए एक बड़ा सबक है। जिस देश में खाने के लिए एक अरब दस करोड़ मुंह हों, वहां खेती की अनदेखी सिर्फ विनाश को निमंत्रण देते हुए ही की जा सकती है। मुख्य रूप से उस समय जब विश्व बाजार से अनाज के आयात का विकल्प बेहद संकुचित होता जा रहा है। इस मौके पर १९६० के दशक में सीखा गया वो सबक सबको जरूर याद कर लेना चाहिए कि अगर देश की संप्रभुता कायम रखनी है और देश को स्वाभिमान के साथ दुनिया में खड़ा रहना है तो अनाज पैदावार में आत्मनिर्भरता उसकी बुनियादी शर्त है। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने 'जय किसान' का जो नारा दिया था, उसकी अहमियत आज एक बार फिर समझे जाने की जरूरत है।

इसके साथ ही देश के राजनेता अगर कई देशों के हाल के घटनाक्रम पर गौर करें और उससे जरूरी सबक लें तो वे अपने देश के साथ-साथ अपना भी कुछ भला कर सकते हैं। हैती में अनाज की महंगाई की वजह से भड़के दंगों पर पुलिस फायरिंग के बाद आखिरकार वहां के प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है। उधर मिस्र, कैमरून, सेनेगल, बर्किना फासो के साथ-साथ अपने पड़ोसी बांग्लादेश में भी अनाज के लिए दंगों की खबरें मिली हैं। अर्जेंटीना में इस खतरे से जागी वामपंथी सरकार ने अनाज के निर्यात पर पाबंदी लगा दी तो इस संकट में अपनी उपज से ज्यादा पैसा कमाने की उम्मीद लगाए बड़े किसानों के विरोध प्रदर्शनों का उसे सामना करना पड़ा।

फिलहाल भारत में महंगाई का खूब शोर है। विपक्ष के लिए सरकार पर हमला बोलने का यह एक असरदार मुद्दा है। कॉपोरेट मीडिया के पास जन हितैषी का लाबादा ओढ़ने का इससे मौका मिला है। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे सरकार दबाव में आई है और वह महंगाई रोकने के कुछ कदम उठाने को मजबूर हुई है। लेकिन इस सारी चर्चा में संकट की असली गंभीरता, उससे जुड़े तथ्य और उसके व्यापक आयाम गायब हैं। जरूरत इन सभी पहलुओं पर सभी संभव नजरिए से विचार करने और समाधान के कदम उठाने की है। इसमें सबकी बराबर की जिम्मेदारी है। और सबके लिए आजादी के तुरंत बाद कहा और उसके बाद सैकड़ों बार दोहराया गया जवाहर लाल नेहरू का यह कथन सर्वाधिक प्रासंगिक हो गया है कि फिलहाल बाकी सब कुछ इंतजार कर सकता है, लेकिन कृषि नहीं। उसके बारे में तुरंत सोच बदले जाने और कदम उठाने की जरूरत है।

Saturday, April 5, 2008

कितना कारगर है ये नुस्खा?


सत्येंद्र रंजन
हले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और फिर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महाअधिवेशन से वामपंथी राजनीति और रणनीति के मुद्दे बेहतर ढंग से उभर कर सामने आए हैं। जाहिर है, बड़ी और ज्यादा जवाबदेह पार्टी होने के नाते माकपा ने इन मुद्दों पर अपनी समझ को ज्यादा ठोस ढंग से व्यक्त किया। तीन साल पर होने वाले इन सम्मेलनों में दोनों पार्टियों ने अपनी सांगठनिक स्थिति, अपने सामने मौजूद चुनौतियों और अपने भावी लक्ष्यों पर भी विचार-विमर्श किया, लेकिन एक आम नागरिक की ज्यादा दिलचस्पी उन मुद्दों में है, जिनका देश की राजनीति पर आने वाले समय में असर हो सकता है। इस लिहाज से दोनों पार्टियों की मोटे तौर पर तीन कार्यनीति और रणनीतियों पर हम गौर कर सकते हैं।

माकपा ने अपनी उन्नीसवीं पार्टी कांग्रेस की समाप्ति के साथ यह साफ किया कि आज के राजनीतिक संदर्भ में उसके तीन खास मकसद हैं- नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध, भारत को अमेरिकी सामरिक परियोजना में जूनियर पार्टनर बनने से रोकना और भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता में दोबारा न आने देना। पार्टी ने अपनी ज्यादातर कार्यनीति और रणनीतियां इन्हीं तीन मकसदों से बनाई औऱ उनका एलान किया है। इनमें पहले दो मकसद दीर्घकालिक हैं, और उनके लिए लंबे संघर्ष की जरूरत है। जबकि तीसरा मकसद फौरी है और पार्टी की इस कार्यनीति का इम्तिहान एक साल के अंदर ही होने वाला है।
नव-उदारवाद दुनिया भर में जारी एक परिघटना है, जिसकी वैचारिक और राजनीति जमीन पिछली आधी सदी से ज्यादा समय में बहुराष्ट्रीय पूंजी की सक्रिय कोशशों से तैयार हुई है। करीब दो दशक पहले सोवियत खेमे के दुनिया के नक्शे से गायब हो जाने से इस परिघटना के रास्ते में मौजूद सबसे बड़ी रुकावट खत्म हो गई औऱ उसके बाद से यह तेजी से आगे बढ़ी है। भारत के भीतर धनी और खासकर कॉरपोरेट हितों से जुड़े समूहों और शक्तियों ने इस आर्थिक-राजनीतिक विचार और इससे जुड़ी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने में पूरी ताकत झोंक रखी है। नतीजा यह हुआ है कि दक्षिणपंथ से लेकर मध्यमार्गी राजनीतिक दलों में इन नीतियों पर आज आम सहमति नजर आती है।

दरअसल, अमेरिकी साम्राज्यवाद के पक्ष में भारतीय विदेश नीति का झुकना नव-उदारवादी राजनीतिक परिघटना का ही एक परिणाम है। यह स्वाभाविक ही है कि जो राजनीतिक ताकतें देश के अंदर गरीब औऱ कमजोर तबकों को बेलगाम पूंजीवाद की मर्जी पर छोड़ने की दलील स्वीकार कर लें, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को उस शक्ति के साथ जोड़ें, जो इस दलील को दुनिया भर में थोपने की कोशिश कर रही है। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार विदेश नीति के मामले में उसी रास्ते पर चलने को उतावली नजर आई है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार चली थी। यह दरअसल, देश के धनी और प्रभुत्वशाली तबकों का दुनिया के ऐसे ही समूहों के साथ अपने हित और अपनी आकांक्षाएं जोड़ने की परिघटना है, जिसे इस देश के जनतांत्रिक और प्रगतिशील समूहों को जरूर समझना चाहिए। इसीलिए नव-उदारवाद का विरोध और स्वतंत्र विदेश नीति के लिए संघर्ष इस वक्त दो बेहद अहम राजनीतिक मुद्दे हैं और असल में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

माकपा एवं भाकपा ने इन दोनों परिघटनाओं को चर्चा में लाकर एक तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाई है। इसके बावजूद यह जरूर कहा जा सकता है कि इन सवालों पर लंबे संघर्ष का कोई खाका इन दोनों पार्टियों ने पेश नहीं किया है। बल्कि इसके लिए जिस तीसरे विकल्प की कार्यनीति माकपा ने पेश की है, वह समस्याओं से भरी हुई है। तीन साल पहले खुद माकपा ने कहा था कि सिर्फ चुनावी गठबंधन या चुनाव बाद के समीकरणों के लिए तीसरा मोर्चा बनाने के हक में वह नहीं है। वह ऐसे तीसरे विकल्प के पक्ष में है, जो नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमति और साथ-साथ संघर्ष से उभरे। ऐसे तीसरे विकल्प के संकेत आज भी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर कहीं नजर नहीं आते। लेकिन अब माकपा और भाकपा ने समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी और उनके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के साथ अपना मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसमें दिक्कत यह है कि ये दल नीति, आकांक्षा और अपने वर्ग-चरित्र में कहीं से नव-उदारवाद या साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े नजर नहीं आते हैं।
१९८० के दशक में जब मध्य जातियों में आधार रखने वाले और क्षेत्रीय दलों का उभार शुरू हुआ, तब यह उम्मीद जरूर की गई थी कि ये पार्टियां सामाजिक जनतंत्र को आगे बढ़ाने का जरिया बनेंगी। एक हद तक ये भूमिका इन दलों ने तब निभाई। लेकिन जल्द ही ये दिशाहीन हो गए। ये महज अपने नेताओं की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा का माध्यम बन कर रह गए। १९९० के दशक में इनमें से ज्यादातर दल राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी जैसी सांप्रदायिक फासीवादी पार्टी के सहयोगी बन गए। उस अनुभव से इन दलों ने कोई सबक सीखा है, ऐसा कोई संकेत नहीं है। ऐसे में इन दलों के साथ किसी तीसरे विकल्प के उभरने की उम्मीद बेबुनियाद है। ये दल फौरी राजनीतिक फायदे के लिए चंद नव उदारवादी आर्थिक नीतियों या भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु करार जैसे विदेश नीति से जुड़े मुद्दों का विरोध कर सकते हैं, लेकिन उनका यह विरोध सैद्धांतिक या किसी राजनीतिक कार्यक्रम पर आधारित है, यह नहीं कहा जा सकता।

इसके बावजूद माकपा ने अगर इन दलों के साथ मेलजोल बढ़ाने और इनको साथ लेकर दो अहम मुद्दों पर लड़ाई को आगे बढ़ाने की बात की है, जाहिर है, इसे कोई रणनीति मानने के बजाय एक फौरी कार्यनीति ही कहा जा सकता है। यह मुमकिन है कि वामपंथी दलों की जितनी ताकत है, उसके बीच उन्हें इन अहम सवालों पर संघर्ष को आगे बढ़ाने का कोई और तरीका समझ में न आता हो। खासकर उस समय जब जन संघर्षों से जुड़ी ताकतों में आपसी होड़, ईर्ष्या भाव और एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने का भाव इतना गहरा है कि उनके बीच एकता की कोई सूरत फिलहाल नजर नहीं आती। आज देश में भले जन संघर्ष मजबूत हो रहे हों, और समान मकसद वाले संगठनों का दायरा फैल रहा हो, लेकिन उनके बीच संवाद और सहयोग की गुंजाइश बेहद कम बनी हुई है। बल्कि इन ताकतों पर एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति इतनी हावी है कि व्यापक वामपंथी, जनतांत्रिक और प्रगतिशील एकता एक सपना ही बना हुआ है। इस संदर्भ में फिर से भाकपा महासचिव चुने जाने के बाद एबी बर्धन का माओवादियों से संवाद बनाने की इच्छा जताना भले प्रशंसा के काबिल हो, लेकिन ऐसा हो सकने की कोई ठोस स्थिति फिलहाल मौजूद नहीं है। खासकर हाल के नंदीग्राम मसले के अनुभव के बाद तो ऐसी उम्मीदें औऱ दूर हो गई हैं।

वैसे भी संसदीय लोकतंत्र में उन ताकतों की अहमियत कभी कम नहीं आंकी जा सकती जो विधायिका में एक मजबूत मौजूदगी बनाने की हैसियत रखते हैं। इसलिए कथित तीसरे मोर्चे के दलों के साथ नजदीकी बढ़ाने के माकपा के फैसले का भले कोई सैद्धांतिक आधार नहीं हो, लेकिन इसे बिल्कुल अनुपयोगी नहीं कहा जा सकता। दरअसल, इसकी उपयोगिता का खुलासा करते हुए माकपा महासचिव प्रकाश करात ने यह कहा कि भाजपा की रणनीति क्षेत्रीय औऱ छोटे दलों को साथ लेकर अगले चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता में लौटने की है। करात ने कहा कि माकपा ऐसा नहीं होने देगी औऱ इसलिए उसने भाजपा के संभावित सहयोगी दलों से संवाद और सहयोग की प्रक्रिया पहले से शुरू कर दी है। बहरहाल, अगर बात इरादे और प्रयास की हो, तो माकपा की यह कोशिश जरूर फायदेमंद मानी जा सकती है। लेकिन इसमें भी मुश्किल यही है कि तीसरे मोर्चे के नाम पर जिन दलों को इकट्ठा करने की कोशिश हो रही है, वे सत्ता का लालच सामने होने पर भी एक अलग राजनीतिक समूह के रूप में बने रहेंगे, इस पर संदेह करने की पर्याप्त वजहें हैं। १९९८ से २००४ के मध्य तक अब यूएनपीए नाम से इकट्ठा होने वाले दलों ने भाजपा के साथ जिस तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग किया, वह अनुभव इस संदेह का सबसे बड़ा आधार है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी के सांप्रदायिक फासीवाद को आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में चिह्नित करना एक सही राजनीतिक समझ है। वामपंथी पार्टियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इस समझ को न सिर्फ सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है, बल्कि इसके मुताबिक भाजपा को रोकने की रणनीति पर अपनी ताकत और प्रभाव के मुताबिक अमल भी किया है। २००४ में कांग्रेस नेतृत्व वाले मोर्चे को समर्थन उनका एक अहम राजनीतिक फैसला था, जिससे देश को एक स्थिर धर्मनिरपेक्ष सरकार मिल सकी। यह सरकार अगर आम जनता के हित को सर्वोपरि मानकर चलती और मध्यमार्ग से वामपंथ तक के सहयोग को मजबूत करने की नीतियों पर अमल करती तो धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र आज ज्यादा सुरक्षित एवं मजबूत नजर आता। लेकिन नव-उदारवादी नीतियों के वर्चस्व की वजह से यूपीए ने यह मौका काफी हद तक गंवा दिया, जिसकी कीमत उसे अपनी सरकार की अलोकप्रियता के रूप में चुकानी पड़ रही है। ऐसे में वामपंथी दलों का नई संभावनाओं की तलाश करने की मजबूरी और व्यग्रता दोनों समझती जा सकती है। इसके बावजद हकीकत यही है कि ऐसी संभावनाएं बेहद सीमित हैं औऱ देश में आज भी कांग्रेस को छोड़कर किसी धर्मनिरपेक्ष विकल्प की गुंजाइश नहीं है। बल्कि यह बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि अगले आम चुनाव के बाद केंद्र में या तो यूपीए जैसा प्रयोग ही दोहराया जाएगा या फिर भारतीय जनता पार्टी की अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता में वापसी होगी। १९९६ की तरह संयुक्त मोर्चा जैसे प्रयोग की उम्मीद आज लगभग न के बराबर है। इसलिए कि संयुक्त मोर्चा के घटक रहे ज्यादातर दल कांग्रेस या भाजपा की धुरी पर आज गोलबंद हो चुके हैं। और यह भी गौरतलब है कि १९९६ का प्रयोग भी कांग्रेस के बाहर से समर्थन से ही मुमकिन हो सका था।

ऐसे में ज्यादा व्यावहारिक नीति शायद यह लगती है कि वाम मोर्चा अपनी ताकत बरकरार रखे और अपने वैचारिक एवं रणनीति प्रभाव क्षेत्र में समाजवादी पार्टी या यूपीए में शामिल डीएमके और कुछ दूसरे दलों को लाने की कोशिश करे। अगर इन दलों की संसद में ठोस उपस्थिति रहती है, तो नव-उदारवादी नीतियों में यकीन करने वाली पार्टियों को लेकर बनी सरकार पर भी लगाम रखी जा सकती है। भारत-अमेरिका परमाणु करार को रोकने में जैसे वामपंथी दल अब तक कामयाब रहे हैं, और जैसा कि पिछले चार साल का अनुभव है, वैसे ही जन हित और देश की संप्रभुता से जुड़ी बहुत सी नीतियों पर वे अपना असर डाल सकते हैं।

भारतीय राष्ट्र अभी विकास क्रम के जिस मुकाम पर है, वहां वामपंथी नीतियों पर चलने वाली सरकार का गठन मुमकिन नहीं है। राज्य-व्यवस्था के वर्ग आधार और राजनीति को संचालित करने वाली शक्तियों के चरित्र को देखते हुए अभी सर्वाधिक वांछित विकल्प एक ऐसी मध्यमार्गी सरकार ही है, जो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को कायम रखने और जनतांत्रिक प्रयोगों को आगे बढ़ाने में सहायक बने। इस बीच सभी जनतांत्रिक शक्तियों के बीच संवाद और सहयोग एक ऐतिहासिक जरूरत है। लेकिन ये शक्तियां इस जरूरत से नाकिफ नजर आती हैं। उनका अपना मनोविज्ञान इसमें आड़े आता है औऱ अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए उग्र नीतियां और कार्यक्रम अपनाकर वे एक ऐतिहासिक फर्ज़ के प्रति लापरवाही बरत रही हैं।

इसी परिस्थिति और संदर्भ में देश की दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना आगे का एजेंडा तय किया है। इस एजेंडे में शायद नई बात कोई नहीं है। बल्कि १९९० के दशक में भारतीय जनता पार्टी के उभार और उसके देश की एक राजनीतिक धुरी बन जाने के बाद वामपंथी दलों की रणनीति और कार्यनीतियों की जो दिशा तय हुई, उसी को इन पार्टियों ने अब ज्यादा साफ किया है औऱ उस पर आगे बढ़ने का इरादा जताया है। चूंकि यूपीए सरकार के गठन से पहले सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक सरकार को सत्ता से हटाना था, इसलिए तब नव-उदारवाद और राष्ट्रीय संप्रुभता के मुद्दे वामपंथी एजेंडे में मौजूद होने के बावजूद बहुत प्रमुख नहीं थे। लेकिन यूपीए सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों की दिशा को देखने और उसके परिणामों का अनुभव करने के बाद अब जाहिर है, सांप्रदायिकता के विरोध के साथ-साथ ये मुद्दे भी प्रमुख होकर उभरे हैं।