Thursday, August 28, 2008

खेल में आगे निकलना खेल नहीं


सत्येंद्र रंजन
ओलिंपिक में चीन की सफलता से दुनिया अचंभित नजर आती है। सफलता ओलिंपिक के आयोजन में भी रही और खेलों के मुकाबलों में भी। आयोजन इतना शानदार रहा कि कहीं किसी को नुक्स निकालने का कोई मौका नहीं मिला, बल्कि इसी मकसद से बीजिंग पहुंचे बहुत से पश्चिमी मीडियाकर्मी इसकी तारीफ करते हुए वहां से वापस गए। और खेल मुकाबलों का आलम यह रहा कि चीन पदक तालिका के शिखर पर पहुंच गया। वहां इतने भारी अंतर से पहुंचा कि दूसरे नंबर पर रहे अमेरिका से १५ स्वर्ण पदकों का फासला रहा। सोवियत संघ के विखंडन के बाद पहली बार कोई देश ५० से ज्यादा स्वर्ण पदक हासिल कर पाया।

चार साल पहले एथेंस ओलिंपिक में चीन ३२ स्वर्ण पदक जीत कर अमेरिका से तीन स्वर्ण पदक पीछे रह गया था। उसके बाद यह उसकी जबरदस्त तैयारियों की ही मिसाल है कि बीजिंग ओलिंपिक शुरू होने से दो दिन पहले ही अमेरिका की ओलिंपिक समिति के अधिकारियों ने यह सार्वजनिक बयान दे दिया कि इस बार चीन उन्हें पीछे छोड़ देगा। बढ़ोतरी अमेरिका ने भी की। उसकी झोली में एक स्वर्ण पदक ज्यादा आया। लेकिन चीन ने १९ स्वर्ण पदकों का इजाफा किया। जिमानास्टिक जैसे कई खेलों, जिनमें पहले चीन का बड़ा दांव नहीं रहता था, उनमें भी इस बार चीन ने कामयाबी के झंडे गाड़े। और अब यह खुद महान तैराक मार्क स्पिट्ज का कहना है कि अगले दस साल में तैराकी में भी चीन का दबदबा कायम हो जाएगा।

चीन की इस सफलता को खासकर भारत में बड़ी हैरत और ललचाई निगाहों से देखा जा रहा है। भारत के सामने फिलहाल चुनौती २०१० के कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन की है, जिसकी तैयारियों पर कई संदेह हैं। इसे देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष और कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने एक दिलचस्प सुझाव दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे एक पत्र में कहा कि ओलिंपिक के बाद कई अस्थायी ढांचे तोड़ दिए जाते हैं। शुक्ला बीजिंग में तैयार उन खेल सुविधाओं से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से ऐसी पहल करने की अपील की जिससे बीजिंग के उन ढांचों को दिल्ली ले आया जाए। जहां खेलों में प्रदर्शन की बात है तो उसमें भारत और चीन के बीच फासला तो जगजाहिर है।

सवाल है कि आखिर क्यों चीन आज उस मंजिल पर है, जो भारत की पहुंच से बाहर नजर आती है? भारत जैसी ही बड़ी आबादी, प्राचीन संस्कृति और पिछड़ी अर्थव्यवस्था के साथ बीसवीं सदी के मध्य में ‘नियति से अपने मिलन’ की यात्रा शुरू करने वाला चीन आखिर कैसे आज दुनिया की सबसे बड़ी खेल महाशक्ति बन गया? अगर भारत सचमुच दुनिया में एक बड़ी ताकत बनना चाहता है, तो इस सवालों के जवाब उसके लिए बेहद महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं। इस जवाब की तलाश करते हुए हमें सबसे पहले सामने मौजूद तथ्यों पर गौर करना चाहिए और फिर उन बारीकियों तक पहुंचने की कोशिश चाहिए, जिससे यह संभव हो सका है।

पहले बात खेल तक ही सीमित रखते हैं। भारत के एक राष्ट्रीय अखबार के इनसाइट ग्रुप के शोध के मुताबिक चीन के पास आज साढ़े आठ लाख खेल के मैदान, छह लाख २० हजार स्टेडियम, ४४ हजार स्पोर्ट्स स्कूल, साढ़े ४६ हजार से ज्यादा प्रोफेशनल एथलीट और २५ हजार कोच हैं। वहां हर साल ४० हजार से ज्यादा खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। स्पोर्ट्स स्कूलों में तकरीबन पौने चार लाख छात्र ट्रेनिंग लेते हैं। इनके बीच प्रोफेशनल एथलीट, फिर उनके बीच से नेशनल एथलीट्स और उसके बाद उनके बीच से अंतरराष्ट्रीय एथलीट्स का चयन होता है। बीजिंग ओलिंपिक से पहले चीन के पास ३,२२२ अंतरराष्ट्रीय एथलीट थे, जिनके बीच से ओलिंपिक के लिए टीम का चयन किया गया। बीजिंग ओलिंपिक के लिए टीमें तैयार करने पर ४ अरब ८० करोड़ डॉलर खर्च किए गए। इन तथ्यों की रोशनी में अगर चीन की कामयाबी को देखा जाए तो क्या तब भी वह आश्चर्य की बात रह जाती है?

ये तो दरअसल, पेशेवर खेल की तैयारियों से जुड़े तथ्य हैं। आम जन के लिए चीन सरकार की जो खेल नीति है, वह इसके अलग है। देश भर में खेल सुविधाएं मुहैया कराने पर चीन सरकार ने करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं। १९९५ में तंदुरुस्ती को बढ़ावा देने का एक कानून बनाया गया, जिसके तहत लोगों को कसरत और खेलों में भाग लेने की व्यापक सुविधाएं मुहैया कराई गईं। तब से नियमित सर्वेक्षण कर यह देखा जाता है कि कितने लोग शारीरिक तौर पर फिट हैं और लगातार व्यायाम में हिस्सा लेते हैं। २००५ के सर्वे का नतीजा रहा कि चीन की आबादी का ३० फीसदी हिस्सा खेल-कूद की गतिविधियों में हिस्सा लेता है। देश की राष्ट्रीय तंदुरुस्ती नीति का लक्ष्य इस संख्या को ४० फीसदी तक पहुंचाने का है।

जाहिर है, चीन ने खेल को अपनी सार्वजनिक संस्कृति का अहम हिस्सा बना लिया है, जैसा पहले सोवियत संघ और समाजवादी खेमे के दूसरे देशों में हुआ था। गौरतलब है कि सोवियत संघ लंबे समय तक लगातार ओलिंपिक में अमेरिका को पछाड़ता रहा। यहां तक कि छोटे से देश जर्मन जनवादी गणराज्य (पूर्वी जर्मनी) ने खेलों में इतनी तरक्की की कि दूसरे यूरोपीय देशों पर वह लंबे समय तक भारी पड़ता रहा। आज चीन ने उसी परंपरा को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।
चीन की यह नई संस्कृति माओ त्से तुंग के नेतृत्व में हुई सांस्कृतिक क्रांति की कोख से निकली। उस क्रांति के दौरान सामंती अवशेषों पर हमला करते हुए पुरातन संस्कृति के शिकंजे से देश, खासकर उसके नौजवानों को निकाला गया और उनकी दबी-सोयी पड़ी ऊर्जा को मुक्त कर दिया गया। उसका परिणाम अब सामने है।

बहरहाल, अगर आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में चीन नए सिरे से अपनी व्यवस्था को नहीं ढालता और इसमें नई परिस्थितियों के मुताबिक लगातार बदलाव नहीं करता तो निश्चित रूप से नई संस्कृति की जमीन तैयार नहीं होती। खेलों के संदर्भ में यह सवाल बेहद अहम है कि आखिर समाजवादी व्यवस्थाएं और विकसित अर्थव्यवस्थाएं क्यों खेलों की दुनिया में अपना वर्चस्व बना लेती हैं, जबकि दूसरी व्यवस्थाएं खेलों की दुनिया में पहचान बनाने के लिए कुछ निजी खिलाड़ियों की प्रतिभा और मेहनत पर निर्भर बनी रहती हैं? निसंदेह जमैका जैसा देश उसेन बोल्ट की कामयाबी पर इतरा सकता है, या इथियोपिया और केन्या जैसे गरीब देशों से कुछ ऐसे एथलीट निकल कर आ सकते हैं, जो दुनिया को चकत्कृत कर दें, लेकिन वे देश व्यापक रूप से खेल की बड़ी शक्ति के रूप में कभी नहीं उभर पाते।

इसकी वजह यह है कि खेल में किसी का मन तब लगता है, जब उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो गई हों। अगर किसी नौजवान के मन में अपने भविष्य को लेकर संशय है, रोजगार उसकी पहली चिंता है तो वह ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना नहीं देख सकता। भारत जैसे देश में हकीकत यही है कि अधिकांश नौजवान खेलों में नौकरी या आर्थिक बेहतरी की उम्मीद करते हुए आते हैं। उनके सामने यही छोटा लक्ष्य रहता है। इसके लिए भी उन्हें अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इसीलिए यह कड़वी हकीकत है कि इतने बड़े देश के पास गर्व करने के लिए सिर्फ एक अभिनव बिंद्रा या विजेंद्र कुमार या सुशील कुमार हैं।

यह बात अक्सर बड़े दुख के साथ कही जाती है कि ११० करोड़ आबादी वाले देश में पदक विजेताओं का इतना अभाव है! लेकिन असली बात यह है कि पदक जीतने का आबादी से शायद ही कोई संबंध है। खेलों में विभिन्न देशों के प्रदर्शन पर हुए अध्ययनों के निष्कर्ष के मुताबिक खास बात यह है कि आबादी का कितना हिस्सा वास्तव में खेलों में हिस्सा लेता है। कई अध्ययनकर्ताओं ने इस संदर्भ में अमर्त्य सेन की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कही गई इस बात का हवाला दिया है- ‘हिस्सेदारी की क्षमता कई सामाजिक शर्तों से तय होती है। बाजार तंत्र की विस्तार प्रक्रिया में भाग लेना मुश्किल है, अगर आप निरक्षर हों और आपको स्कूल जाने का मौका न मिला हो, या आप कुपोषण या खराब सेहत की वजह से कमजोर हों या फिर आपके रास्ते में सामाजिक अवरोध, भेदभाव, पूंजी की कमी की रुकावटें हों...।’ यह पूरा उद्धरण खेलों के संदर्भ में भी उतना ही लागू होता है।

ओलिंपिक का आदर्श खुद को ज्यादा तेज, ज्यादा ऊंचा और ज्यादा मजबूत साबित करने की स्वस्थ होड़ है। लेकिन यह काम एक हद तक दुस्साहस की मांग करता है जिसमें शारीरिक जोखिम शामिल रहता है। अगर मन में लगातार संशय हो या परिवार का दबाव हो कि अगर जख्मी हुए तो सारा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा, तो उस हालत में कोई नौजवान बहुत आगे नहीं जा सकता। समाजवादी व्यवस्थाएं इसलिए बेहतरीन खिलाड़ी पैदा कर पाती हैं, क्योंकि वहां इलाज की चिंता किसी के मन में नहीं होती और यह आश्वासन होता है कि रोजगार या जीवन यापन समाज मुहैया करा देगा। तो वैसी हालत में दुस्साहस की हद तक जोखिम उठाने की होड़ में नौजवान अपने को झोंक देते हैं। जिन समाजों ने समृद्धि का एक ऊंचा स्तर हासिल कर लिया है और जहां अपने आर्थिक भविष्य को लेकर आश्वस्ति है, वहां पढ़ाई-लिखाई और करियर बनाने की चिंता छोड़ कर नौजवान खेल में अपनी प्रतिभा को झोंक पाते हैं। जहां ये स्थितियां नहीं हैं, वहां खेल महज निजी जुनून बनकर रह जाता है, जिससे कभी-कभार सफलता तो मिल जाती है, लेकिन यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया नहीं बन पाती।

अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि समृद्धि निसंदेह खेलों में प्रगति का एक अहम आधार है, लेकिन इसके साथ-साथ खेलों में भागीदारी और खेलों के बारे में सूचना की उपलब्धता दो बेहद अहम पहलू हैं। दरअसल, खेलों के बारे में सूचना के प्रसार से भागीदारी बढ़ती है और इससे वे प्रतिभाएं सामने आती हैं, जिनके बीच राष्ट्र्यी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी चुने जा सकें। एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि जिन समाजों में रेडियो नेटवर्क की ज्यादा पहुंच है, वहां खेलों की लोकप्रियता भी ज्यादा है। विकासशील देशों में अखबार आज भी कमोबेस शहरी माध्यम हैं। जिस दौर में भारत में रेडियो सूचना का मुख्य माध्यम था, उस दौर में यहां भी दूरदराज के इलाकों तक विभिन्न खेलों के बारे में ज्यादा जागरूकता थी।

लेकिन प्राइवेट मीडिया (टीवी, अखबार, और अब रेडियो भी) का दबदबा बढ़ने के साथ सूचना के कमोडिटी बनने की परिघटना सामने आई। इसमें जोर तुरत-फुरत चीज बेचकर ग्राहक बढ़ाने पर रहता है। जाहिर है, जिस चीज के बने-बनाए ग्राहक हैं, सिर्फ उन्हें ही बेचा जाता है। क्रिकेट इसकी एक मिसाल है। इसका परिणाम यह है कि दूसरे खेलों की सूचना फैलाने की कोशिश छोड़ दी गई है। नतीजा यह है कि जिसे हम सूचना का युग कहते हैं, उसमें ओलिंपिक स्पोर्ट्स जैसे खेलों को लेकर देश में अज्ञानता और अरुचि का माहौल है। यह इसी बात का परिणाम है कि टेलीविजन चैनलों पर बनावटी क्रिकेट की खबरों या प्रोग्राम को जितनी टीआरपी मिलती है, उतनी ओलिंपिक या विश्व कप फुटबॉल जैसे आयोजनों पर बनाए गए क्वालिटी प्रोग्राम को नहीं मिलती। जब हम भारत की खेल संस्कृति और खेल की दुनिया में अपनी हैसियत की बात करते हैं तो इन सारे पहलुओं पर जरूर गौर किया जाना चाहिए। खास कर उस मौके पर जब अभिनव बिंद्रा, विजेंद्र कुमार और सुशील कुमार की सफलताओं से देश के जागरूक तबकों में उम्मीद का एक माहौल बना हुआ है। उम्मीद का यह माहौल तभी आगे बेहतर नतीजे दे सकता है, जब हम देश के हर गली कूचे से प्रतिभाओं को सामने लाने, उनके मन से आर्थिक भविष्य की चिंता दूर करने, उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराने और पुरातन मनोविज्ञान से मुक्त कर उनमें दुनिया के मंच पर कुछ कर दिखाने का जज्बा भरने के इंतजाम करें। अगर ऐसा नहीं होता है तो अभी का फील गुड माहौल अल्पजीवी ही साबित होगा।

Tuesday, August 12, 2008

चीन क्यों चमक रहा है!


सत्येंद्र रंजन
चीन की चमक से दुनिया चकाचौंध है। बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में भव्यता और सुंदरता का जैसा अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला, उससे सारी दुनिया हतप्रभ रह गई। पश्चिमी मीडिया ने भी आखिरकार ये मान लिया कि चीन में कुछ खास है। भारत में तो खैर, चीन को लेकर एक विचित्र का तरह अंतर्विरोध हाल के वर्षों में देखने को मिलता रहा है। एक तरफ हमारे नेता और भारतीय प्रभुवर्ग आर्थिक एवं विकास के क्षेत्रों में चीन की सफलता पर मोहित नजर आते हैं, वहीं चीन जनवादी गणराज्य जिस बुनियाद पर खड़ा है, उसको लेकर एक वैर-भाव भी उनमें मौजूद देखा जा सकता है। पिछले महीने मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत पर बहस के दौरान वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने चीन की सफलता का जी खोलकर बखान किया। और लगे हाथों यह इल्जाम भी मढ़ दिया कि इस देश में कुछ लोग नहीं चाहते कि भारत चीन की बराबरी करे। जाहिर है, उनका निशाना भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु सहयोग समझौते का विरोध कर रहे समूहों की तरफ था।

बहरहाल, भारत अगर चीन की बराबरी नहीं कर पा रहा है, तो इसके लिए चिदंबरम या मनमोहन सिंह या उनके जैसी नीतियां अपनाने वाले दल एवं समूह तथा उनके समर्थक तबकों की कितनी जिम्मेदारी है, जाहिर है, इस पर उनसे हम कुछ सुनने की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन आखिर चीन ने यह चमत्कार कैसे किया, इसका गंभीर विश्लेषण उन सभी लोगों के लिए बेहद अहम है, जो दुनिया के नक्शे पर भारत को भी उसी शान के साथ देखना चाहते हैं, जैसे चीन आज खड़ा है।
भारत और चीन में कई समानताएं हैं। दोनों सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं। एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में दोनों का सफ़र लगभग एक ही समय शुरू हुआ। दोनों ने अलग, लेकिन अपने ढंग से खास एक विचारधारा पर अपने राष्ट्र की बुनियाद डाली। १९७० के दशक तक दोनों विकास दर और दूसरे कई आर्थिक मानदंडों पर लगभग बराबर थे। लेकिन उसके बाद तस्वीर बदल गई।

१९८४ के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में साम्यवादी चीन ने व्यावहारिक रूप में पहली बार हिस्सा लिया और तब वह सिर्फ एक स्वर्ण पदक जीत सका था। तब तक भारत ओलंपिक में अपने एक निश्चित माने जाने वाले हॉकी के स्वर्ण पदक को जीतने की हैसियत गवां चुका था। उसके बाद चीन का ग्राफ लगातार इतनी तेजी से ऊपर की तरफ चढ़ा कि आज वह स्वर्ण पदकों की सूची में पहले नंबर पर होने का दावेदार है, जबकि भारत में अभिनव बिंद्रा के जीते स्वर्ण पदक से अभी महज शुरुआत भर हुई है। दूसरे क्षेत्रों में चीन की जो सफलताएं हैं, वह मुख्यधारा मीडिया के विमर्श में शामिल है, इसलिए उसे साबित करने के लिए अलग से कोई आंकड़े देने की जरूरत नहीं है।

तो प्रश्न आखिर वही है कि आखिर चीन ऐसा कैसे कर पाया? दरअसल, चीन ऐसा उन्हीं नीतियों के सहारे कर पाया है, जिन्हें लेकर देश के शासक समूहों में गहरा वैर-भाव देखा जाता है। १९४९ की जनवादी क्रांति के बाद चीन ने अपने बुनियादी सामाजिक और आर्थिक ढांचे में आमूल बदलाव की जो पहल की, उसका फल मिलने में कई दशक लगे। लेकिन उस पहल ने समाज और अर्थव्यवस्था की सुसुप्त ऊर्जा को सदियों के बंधनों से मुक्त किया। यहां हम उस पहल के तरीकों, उनकी वजह से हुई उथल-पुथल और उसके फौरी नतीजों पर अपना कोई फैसला नहीं दे रहे हैं। यह ऐतिहासिक विमर्श का विषय है। लेकिन जो तथ्य हैं और उनके जो परिणाम अब सामने हैं, उनकी चर्चा जरूर बेहिचक की जा सकती है।

माओ जे दुंग के नेतृत्व में १९६६ में शुरू हुई सांस्कृतिक क्रांति एक गहरे विवाद का विषय रही है। एक दशक तक चली इस प्रक्रिया को जैसे अंजाम दिया गया, उस पर अलग-अलग राय रही है। लेकिन सांस्कृतिक क्रांति ने चीन को सदियों पुराने सांस्कृतिक अवरोधों से मुक्त कर दिया, यह बात आज तथ्यों की रोशनी में निसंदेह कही जा सकती है। इससे बनी नई संस्कृति ने चीन के लोगों में नई सोच और नया मनोविज्ञान पैदा किया, जिसके सहारे वो मानव संभावनाओं को एक नई ऊंचाई तक ले जा सकने में सफल हो रहे हैं।

माओ जे दुंग ने सतत् क्रांति और क्रांति के भीतर क्रांति की अवधारणाएं पेश की थीं। उनके उत्तराधिकारियों ने इसे व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की। तंग श्याओ फिंग ने ‘सोच के उद्धार’ का जब नारा दिया और चीनी क्रांति से पैदा ऊर्जा का विकास और प्रगति के लिए इस्तेमाल की नीतियां अपनाईं, तो बहुत से हलकों में इसे माओवाद का खंडन माना गया। जियांग जेमिन और हू जिन ताओ के जमाने में अपनाई नीतियों को लेकर खुद साम्यवादी खेमे में गहरे मतभेद रहे हैं। लेकिन अगर इस पूरे घटनाक्रम को एक विकासक्रम के चरणों के तौर पर देखा जाए तो हम आज के चीन को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। चीन ने अपनी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के बाद उसकी बुनियाद पर विकास और सफलताओं की नींव रखी और आज उसकी उपलब्धियां न सिर्फ खेल, बल्कि हर क्षेत्र में सोने के तमगे के रूप में उसके सीने पर सजी नजर आती हैं।

बेशक चीन की मौजूदा पर व्यवस्था पर कई सवाल उठाए जा सकते हैं। मसलन, उसकी राजनीतिक व्यवस्था में लोकतंत्र के कई पहलुओं की कमी है। हाल के दशकों में वहां एक बार फिर गैर बराबरी बढ़ी है और भ्रष्टाचार को कभी खत्म नहीं किया जा सका। वहां फिर से उस संस्कृति का असर बढ़ रहा है, जिसे माओ ने पतनशील कहा था और जिसके खिलाफ मुहिम चलाई थी। लेकिन यह भी देखा जा सकता है कि चीनी समाज और वहां का राजनीतिक नेतृत्व नई समस्याओं से निपटने के लिए नए प्रयोग कर रहे हैं। उनका परिणाम अभी भविष्य के गर्भ में है। मगर, वहां का नेतृत्व नई समस्याओं के नए हल निकालने की कोशिशों में गंभीरता से जुटा है, इसके संकेत भी देखे जा सकते हैं।

दूसरी तरफ भारत में मनमोहन सिंह एंड चिदंबरम एंड कंपनी गैर बराबरी पर आधारित व्यवस्था को छूने की कोशिश करने से गुरेज करती नजर आती है। बात चाहे रोजगार गारंटी कानून या आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार देने के कानून की हो, या पिछड़ों को आरक्षण देने की बात हो, किसी मुद्दे पर शासक वर्ग और उनके नुमाइंदे आस्था के साथ मजबूती से खड़े नजर नहीं आते। लोकतांत्रिक दबावों में वो जो कुछ सकारात्मक कदम उठाते हैं, उसे भी कमजोर कर देने का कोई मौका वो हाथ से नहीं जाने देते। जबकि धनवान तबकों को मदद पहुंचाने वाले कदमों पर उनका उत्साह देखते ही बनता है। जब बात चीन की तरक्की होती है, तो ये तथ्य सहज ही नजरअंदाज कर दिए जाते हैं कि वहां भुखमरी मिटाने, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानव विकास के पहलुओं पर कितना निवेश किया गया और सामाजिक बराबरी लाने की योजनाओं पर किस तरह अमल किया गया।

इन योजनाओं ने चीन की दबी ऊर्जा को आजादी दी, जिसकी चमक से आज वह जगमगा रहा है। भारत ने अपनी ऐसी ऊर्जाओं को आज भी सदियों के सामाजिक अन्याय, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक पिछड़ेपन से दबा रखा है। इसी फर्क की वजह से चीन आज दुनिया में अपनी शर्तों के साथ खड़ा है, जबकि भारत को असैनिक परमाणु सहयोग का करार करने के लिए अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता का सौदा करना पड़ता है। इसलिए आज सबसे अहम बात चीन से चमत्कृत होने की नहीं, बल्कि वहां हुए अनुभवों से कुछ सबक लेने की है।

Sunday, July 13, 2008

२००४ में कमाया, २००८ में गंवाया


सत्येंद्र रंजन
सोनिया गांधी चार साल पहले भारतीय राजनीति में एक अज़ीम शख्सियत के रूप में उभरीं। फौरी तौर पर इसके दो पहलू थे। पहला बिंदु अपने निजी अहं और अपनी पार्टी के स्वार्थों को छोड़ कर गठबंधन बनाने के लिए दिखाई गई उनकी उदारता थी, जिससे भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सांप्रदायिक फासीवादी सरकार को चुनाव में चुनौती देने का एक माध्यम तैयार हो सका। जब इस गठबंधन ने भाजपा नेतृत्व वाले गठबंधन को हरा दिया और उसके बाद खुद उनके अपने विदेशी मूल की वजह से धर्मनिरपेक्ष गठबंधन के रास्ते में मुश्किल खड़ी होती नजर आई, तो सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का परित्याग कर एक अनूठी मिसाल कायम की। इन्हीं वजहों से तब सोनिया गांधी को छह साल के भाजपा नेतृत्व वाले शासन की बहुसंख्यक वर्चस्व एवं सवर्णवादी नीतियों के खिलाफ संघर्ष से उभरी धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आम सहमति का प्रतीक मना गया। इन दो पहलुओं ने सोनिया गांधी का कद इतना ऊंचा कर दिया कि तब से देश के धर्मनिरपेक्ष खेमे में उनकी आलोचना से मोटे तौर पर परहेज किया जाता रहा है।

बहरहाल, सोनिया गांधी की बनी इस छवि के पीछे महज २००४ का ही घटनाक्रम नहीं था। बल्कि उसके पहले के तेरह साल का इतिहास भी था, जिसमें न सिर्फ सोनिया गांधी की सत्ता लिप्सा से मुक्त छवि सामने आई थी, बल्कि यह भी जाहिर होता गया था कि उनका एक सामान्य घरेलू महिला से एक राजनेता के रूप में क्रमिक विकास हुआ है। एक ऐसी राजनेता जिसके पास भले विचारों की गहराई और लंबा अनुभव न हो, लेकिन जिसकी बुनियादी राजनीतिक नैतिकता में आस्था है, और जो आधुनिक भारतीय राष्ट्र के आधारभूत मूल्यों के प्रति निष्ठावान हैं। यह छवि बनने की भी एक पृष्ठभूमि थी। १९९१ में जब अचानक राजीव गांधी आतंकवादी हत्यारों का शिकार हो गए तो कांग्रेस के पदलोलुप सत्ता प्रबंधकों ने फौरन उन्हें पार्टी, और प्रकारांतर में सरकार का नेतृत्व देने की पेशकश कर दी।

लेकिन सोनिया गांधी ने यह पेशकश ठुकरा दी। इसके बाद कई वर्षों तक चापलूस नेताओं के राजनीति में आने के निहोरे को वो ठुकराती रहीं। जब तक कांग्रेस सत्ता में रही, सोनिया गांधी ने खुद को घर के दायरे में ही समेटे रखा। राजनीति में कदम उन्होंने तब रखा, जब कांग्रेस अपने सबसे बुरे दिनों में थी, और उसके पूरी तरह बिखर जाने की अटकलें आम हो गई थीं। वह दौर भाजपा के नेतृत्व में सांप्रदायिक फासीवाद के भारतीय राज्य-व्यवस्था के विभिन्न अंगों पर हावी होने का था। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पैदा हुआ भारत का विचार तब खतरे में था और देश का धर्मनिरपेक्ष खेमा भटकाव में नजर आता था। सोनिया गांधी ने तब कांग्रेस को संभालने की चुनौती स्वीकार की।

सोनिया गांधी को वह कांग्रेस मिली थी, जिसकी एक लोकतांत्रिक और आम जन का ख्याल करने वाली पार्टी के रूप में साख बिल्कुल खत्म हो चुकी थी। उनके राजनीति में आने के साथ ही उनके विदेशी मूल को लेकर उनके खिलाफ ज़हरीला अभियान छेड़ दिया गया। इस माहौल में विपक्ष की राजनीति से और प्रतिकूल परिस्थितियों का मुकाबला करते हुए सोनिया गांधी ने राजनीति में कदम आगे बढ़ाए। इसका एक खास पहलू रहा, कांग्रेस की साख को फिर से बहाल करना। कांग्रेस ने उन कार्यक्रमों की फिर से तलाश शुरू की जो नेहरू और इंदिरा गांधी के जमाने में उसकी पहचान रहे। इससे धर्मनिरपेक्ष दलों के बीच सहमति का आधार मजबूत हुआ और वामपंथी दलों से उसके सहयोग का रास्ता बना। २००४ में अगर सोनिया गांधी के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सहजता से बन सका और सरकार बनाने के लिए उसे वामपंथी दलों का सिद्धांत आधारित समर्थन मिल पाया, तो इसके पीछे यही पृष्ठभूमि थी। यूपीए शासनकाल में ज्यादातर समय सोनिया गांधी इस सहमति और एकता की पहरेदार बनी रहीं। बात राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार कानून की हो या सूचना के अधिकार कानून की, या फिर आदिवासी एवं अन्य वनवासी भूमि-अधिकार कानून की, या सार्वजनिक कारखानों के निजीकरण पर उठे विवादों की, जब भी मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली सरकार भटकती और अपने समर्थकों से टकराव की राह पर चलती नजर आई, अंतिम उम्मीद सोनिया गांधी से जोड़ी गई और सोनिया गांधी ने काफी हद तक उस उम्मीद को पूरा भी किया।

इस पृष्ठभूमि में यह देख कर हैरत होती है कि वही सोनिया गांधी भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु सहयोग के समझौते के सवाल पर कैसे इस सहमति को तोड़ने की हद तक चल गईं? वह भी उस वक्त जब खुद अपने नेतृत्व वाला गठबंधन लगतार चुनावों में हार और दोहरे अंक की महंगाई के साथ गहरे संकट में है। क्या प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की जिद की कोई काट उनके पास नहीं थी, जो अपने आग्रहों, समझ और दीर्घकालिक राजनीति में कोई दांव न होने की वजह से ‘अपने अमेरिकी सपने’ को हकीकत में जीने के दुराग्रह पर अड़े रहे हैं? या खुद सोनिया गांधी भी ऐसे ही ‘सपने’ में जीती हैं और इसे अपने और अपनी पार्टी के दीर्घकालिक राजनीतिक हितों से ज्यादा कीमती समझती हैं? जाहिर है, ऐसे सपने का देश के आम आदमी से कोई सीधा रिश्ता नहीं है, जिसकी बात कांग्रेस करती है और अगर उसके दो बड़े नेताओं का सपना ऐसा हो तो पार्टी की प्राथमिकताएं खुद उजागर हो जाती हैं।

फिर भी भारत-अमेरिका परमाणु करार का सवाल एक ऐसा मुद्दा है, जिस पर बहस की गुंजाइश हो सकती है और किसी की नैतिकता पर सिर्फ इसलिए सवाल नहीं उठाए जा सकते कि वह इस समझौते को देश के हित में मानता है। राजनीतिक समझ वर्गीय सोच, समाज और विश्व व्यवस्था की विश्लेषण क्षमता और दुनिया के बारे में अपने सपने से पैदा होती है, और ये सारी बातें किसी खास परिस्थिति में, संयोगवश एक प्रमुख सियासी शख्सियत बन गए शख्स में नहीं भी हो सकती हैं। इसलिए सोनिया गांधी का धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आम सहमति के ऊपर भारत-अमेरिका संबंधों को तरजीह देने के लिए मनमोहन सिंह से सहमत हो जाना भले इस देश के वर्तमान और निकट भविष्य के लिए बेहद दुखद हो, लेकिन इस आधार पर सोनिया गांधी को नैतिकता के कठघरे में खड़ा नहीं किया जा सकता।

अगर आज सोनिया गांधी नैतिक सवालों पर कठघरे में खड़ी नजर आती हैं तो इसलिए इस करार के पक्ष में संसद में बहुमत गढ़ने के लिए मनमोहन सिंह की सरकार और कांग्रेस पार्टी ने जो अनैतिक तरीके अपनाए और जिस तरह के साथियों को चुना है, उसे सोनिया गांधी का वरदहस्त मिला हुआ नजर आता है। मुलायम सिंह-अमर सिंह की जोड़ी ने पिछले डेढ़ दशक में कितनी राजनीतिक लाइन और साथी बदले हैं, राजनीति और आर्थिक क्षेत्र में कैसे-कैसे अंतर्संबंध बनाए हैं और इनके कैसे नतीजे देश को भुगतने पड़े हैं, इसकी सोनिया गांधी से बेहतर जानकारी और किसे होगी? अजित सिंह और एचडी देवेगौडा ने राजनीति में कैसी नैतिकताएं कायम की हैं, इसका भी उन्हें प्रत्यक्ष ज्ञान होगा?

लेकिन आज ये सभी उनके साथी हैं। इन साथियों की जरूरत उन्हें इसलिए पड़ी है कि जिन वामपंथी दलों ने यूपीए को चार साल तक सिद्धांत आधारित समर्थन दिया, जिनकी देश में निजी पर उनकी और कांग्रेस की साख बहाल करने में अहम भूमिका थी, उनकी विचारधारा के साथ तालमेल बनाने की दूरदृष्टि सोनिया गांधी नहीं दिखा सकीं। दरअसल, इसके लिए मई २००४ जैसी उदारता की जरूरत थी, जिस कसौटी पर इस बार सोनिया गांधी चूक गईं। इस विचारधारात्मक नाकामी की कीमत आज वो छोटे सहयोगी दलों के ब्लैकमेल, उनके आर्थिक- स्वार्थों की मांग, और पद लिप्सा को पूरा करते हुए चुकाने को तैयार हैं।
इस नए परिप्रेक्ष्य ने सोनिया गांधी की राजनीतिक नैतिकता को संदिग्ध बना दिया है। यह एक ऐसा नुकसान है, जिसकी कीमत वो, उनकी पार्टी, उनका गठबंधन और आम तौर पर इस देश की धर्मनिरपेक्ष शक्तियां लंबे समय तक चुकाएंगी। इससे वह शख्सियत खंडित हो गई है, जिसे सामने रख कर चुनावी राजनीति में सांप्रदायिक फासीवाद से संघर्ष की एक साफ तस्वीर उभरती थी। इससे सोनिया गांधी का वो कद खत्म हो गया है, जो इस देश के आम लोगों को दूसरे नेताओं से ऊंचा लगता था। कहा जा सकता है कि सोनिया गांधी ने सन् २००४ में जो कमाया था, उसे २००८ में गंवा दिया है।

Sunday, June 29, 2008

कांग्रेस की मुसीबत और मनमोहन


सत्येंद्र रंजन
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह एक ईमानदार व्यक्ति हैं, इस पर देश में संभवतः किसी को संदेह नहीं है। सर्वोच्च पदों पर रहते हुए भी उन्होंने अपनी बेदाग छवि सलामत रखी है। २००५ में जब पाकिस्तान की क्रिकेट टीम वन डे मैच खेलने दिल्ली आई और अखबारों में ये खबरें छपीं कि प्रधानमंत्री के परिवार के बच्चों ने आम दर्शकों की तरह टिकट लेने की जद्दोजहद की तो इससे पद और सत्ता के दुरुपयोग की आम शिकायत वाले इस देश में लोग बेहद प्रभावित हुए। वित्त मंत्री पद से हटने और प्रधानमंत्री बनने की बीच की अवधि के करीब नौ साल में जिस तरह एक साधारण इंसान की तरह लोगों ने दिल्ली के कुछ बाज़ारों में उन्हें आते-जाते देखा, उससे भी उनकी एक अलग किस्म की छवि बनी।

दरअसल, यही वह छवि है जिसकी वजह से मई २००४ के तेज रफ्तार और नाटकीय घटनाक्रम के बीच मनमोहन सिंह का नाम स्वाभाविक तौर पर प्रधानमंत्री के रूप में उभरा। तब नए बने संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के लिए वे एक थाती के रूप में नज़र आए। १९९१-९६ के दौर में बतौर वित्त मंत्री मनमोहन सिंह की नीतियों से असहमत रहे वामपंथी दलों को भी शायद इसी छवि की वजह से बतौर प्रधानमंत्री उन्हें स्वीकार करने में कोई दिक्कत महसूस नहीं हुई।

बहरहाल, पिछले चार साल का अनुभव अपने में एक खास राजनीतिक संदेश समेटे हुए है। संदेश यह है कि व्यक्ति चाहे कितना ही भला हो और उसका इरादा कितना ही नेक हो, अगर उसकी राजनीतिक बुद्धि ठोस जमीनी हकीकत से कटी हुई है, तो लोकतांत्रिक संदर्भ में वह थाती के बजाय एक बोझ ज्यादा साबित हो सकता है। आज जब अमेरिका से असैनिक परमाणु सहयोग के करार को लेकर सियासी माहौल गर्म है, यह संदेश कांग्रेस पार्टी के लिए खास अहमियत रखता है। कांग्रेस पार्टी इस समय इस उधेड़बुन में है कि वह उस व्यापक राजनीतिक समीकरण को साथ लेकर चले, जिसे चार साल पहले तैयार करने में खुद उसकी एक बड़ी भूमिका थी, या परमाणु करार पर इस समीकरण को कुर्बान कर दे?

मनमोहन सिंह मानते हैं कि यह करार देश के हित में है और इसे अंजाम देने के लिए वामपंथी दलों का समर्थन गंवाने की कीमत चुकाई जा सकती है। तीन साल पहले मनमोहन सिंह ने अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश के साथ ये करार किया था, और तब से यह उनके लिए निजी प्रतिष्ठा का विषय रहा है। अब जबकि अमेरिकी राजनीति की परिस्थितियों की वजह से करार की प्रक्रियाएं पूरी करने की समयसीमा करीब है, मनमोहन सिंह कोई भी दांव खेलने को तैयार बताए जाते हैं। इसमें एक दांव यह है कि वामपंथी दलों को समर्थन वापस लेने दिया जाए और समय से पहले चुनाव मैदान में उतरना पड़े तो ये जोखिम उठाया जाए।

यह एक ऐसा दांव है, जिसे मनमोहन सिंह खेलने की स्थिति में हैं। लेकिन क्या कांग्रेस पार्टी और उसकी नेता सोनिया गांधी भी इसके लिए तैयार हैं? इस सवाल का संबंध सिर्फ इस पार्टी की सत्ता से नहीं है, बल्कि इसके साथ इस देश का भी काफी कुछ जुड़ा हुआ है। २००४ में सोनिया गांधी की पहल से धर्मनिरपेक्ष दलों का गठबंधन बना तो उससे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सांप्रदायिक फासवादी शासन के खिलाफ देश में तैयार हुई धर्मनिरपेक्ष आम सहमति को राजनीतिक अभिव्यक्ति का माध्यम मिल सका। धर्मनिरपेक्ष एकजुटता का ही यह परिणाम रहा कि भाजपा नेतृत्व वाली सरकार को चुनाव में परास्त किया जा सका। सोनिया गांधी ने प्रधानमंत्री पद का परित्याग कर बड़े उद्देश्य के लिए निजी महत्त्वाकांक्षाएं छोड़ने की एक अनोखी मिसाल पेश की। इससे देश की धर्मनिरपेक्ष बुनियाद की फिर से तलाश का अवसर सामने आया। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन के साझा न्यूनतम कार्यक्रम को तब इसी तलाश का एक राजनीतिक दस्तावेज माना गया।

क्या कांग्रेस और सोनिया गांधी अब यह मानते हैं कि इस तलाश की अब जरूरत नहीं है? या वे यह मानने लगे हैं कि बिना सभी धर्मनिरपेक्ष ताकतों की एकता के वे अकेले यह तलाश पूरी कर सकने की स्थिति में हैं? आखिर उनके अपने वर्तमान और भविष्य का भी काफी कुछ इस सवाल के साथ दांव पर है? उनके साथ मनमोहन सिंह की तरह यह सुविधा नहीं है कि बिना जीवन में कोई प्रत्यक्ष चुनाव जीते वे सत्ता की ऊंचाई तक पहुंच जाएं या फिर वहां बने रहें। कांग्रेस के बाकी नेताओं के साथ यह सुविधा भी नहीं है कि अर्थशास्त्री रहते हुए वे अचानक एक खास परिस्थिति में देश का वित्त मंत्री बन जाएं और एक वैसी ही परिस्थिति में प्रधानमंत्री का पद खुद उनकी गोद में आ गिरे।

यह बात किसी सामान्य राजनीतिक बुद्धि वाले व्यक्ति को भी समझ में आती है कि देश की मौजूदा परिस्थितियों के बीच अभी आने वाले कई चुनावों तक कांग्रेस पार्टी अपना अकेला बहुमत पाने की नहीं सोच सकती। उसके सहयोगी दल भी इतने और इस हालत में नहीं हैं कि उनके साथ सत्ता में आने का समीकरण बनता हो। यह समीकरण वामपंथी दलों के साथ ही पूरा होता है, जिनकी एक विचारधारा से जुड़ी आपत्ति की अनदेखी करने पर प्रधानमंत्री अड़े हुए हैं। इसी से जुड़ा एक बेहद महत्त्वपूर्ण सवाल है कि क्या मनमोहन सिंह की ही तरह सोनिया गांधी और कांग्रेस के दूसरे नेता भी २००४ के जनादेश का स्वरूप समझने में नाकाम हैं? यह जनादेश कांग्रेस पार्टी या सोनिया गांधी के लिए नहीं था। यह जनादेश भाजपा विरोधी गठबंधन के लिए था, जिसमें वामपंथी दल भी एक अहम घटक थे। क्या यह साधारण बात भी कहे जाने की जरूरत है कि वामपंथी दलों को अलग करने के साथ ही उस जनादेश का स्वरूप खंडित हो जाता है और उसके बाद मनमोहन सिंह, कांग्रेस या संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन को सत्ता में बने रहने का कोई वैध और नैतिक अधिकार नहीं रह जाएगा?

इसलिए इस मौके पर सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह नहीं है कि परमाणु करार हो या नहीं अथवा यह करार देश हित में है या नहीं। इस समय सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्दा यह है कि जब देश में इस करार पर आम सहमति नहीं है, संसद का बहुमत इसके खिलाफ है, इसके बावजूद इस करार को पूरा करने की जिद क्या लोकतांत्रिक है? मनमोहन सिंह की अपनी समझ में यह करार देश के लिए बेहद जरूरी हो सकता है, और यह समझ रखने के उनके लोकतांत्रिक अधिकार का सम्मान भी किया जा सकता है। लेकिन ऐसी ही समझ रखने का अधिकार देश के हर शख्स और हर राजनीतिक जमात को है। लोकतंत्र में ऐसे मतभेदों के बीच हमेशा ही संख्या फैसले का पैमाना होती है और यह जाहिर है कि संख्या प्रधानमंत्री के साथ नहीं, बल्कि उनके खिलाफ है।
इसके बावजूद अगर मनमोहन सिंह इस करार को अमली रूप देने पर अड़े हुए है तो बड़े दुख के साथ यही कहा जा सकता है कि लोकतंत्र के एक बेहद बुनियादी सिद्धांत के लिए उनके मन में सम्मान नहीं है और ऐसे में वे एक लोकतांत्रिक देश का नेतृत्व करने का नैतिक अधिकार नहीं रखते हैं। ऐसे में यह जिम्मेदारी कांग्रेस पार्टी पर है कि वह या तो संसद में अपने नेता को पार्टी के अनुशासन में ले आए या फिर नया नेता चुनने पर विचार करे। इसके विपरीत अगर कांग्रेस पार्टी खुद इस जिद के रास्ते पर चल पड़ती है तो एक बार फिर बड़े दुख के साथ यही कहना होगा कि इस पार्टी में १९८० के दशक में हावी हुई आत्मघाती प्रवृत्तियां आज भी जारी हैं।

उन प्रवृत्तियों ने देश पर लगभग एकछत्र राज करने वाली पार्टी को आज दूसरे दलों की बैसाखियों पर निर्भर कर दिया है। अगर एक बार फिर पार्टी उसी प्रवृति का शिकार हो जाती है तो यह बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि वह दूसरे दलों की बैसाखियों के साथ भी फिलहाल राज करने की हालत में नहीं रह जाएगी। जिस साझा न्यूनतम कार्यक्रम की बदौलत कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने अपने पुनरुद्धार की उम्मीद की थी, उस पर अमल में जैसा लचर रुख मनमोहन सिंह सरकार ने अपनाया, उससे इन दलों की साख पर पहले ही काफी बट्टा लग चुका है। अब परमाणु करार पर जोर के साथ विखंडन की जो राह प्रधानमंत्री ने तैयार की है, उस पर अगर ये दल चले तो सियासी जंग के मैदान में यह अपने लिए एक हिरोशिमा को न्योता देने जैसा ही होगा। क्या सोनिया गांधी, कांग्रेस और यूपीए में शामिल दल यह दांव खेलने को तैयार हैं?

Wednesday, June 18, 2008

बिहार में वामपंथ

सत्येंद्र रंजन
हिंदी भाषी राज्यों में बिहार को इस बात का श्रेय है कि उसने सबसे देर तक सांप्रदायिकता को सत्ता में आने से रोके रखा। २००५ के अंत में आखिरकार सांप्रदायिक और सवर्णवादी ताकतें जब वहां कामयाब हुईं, तब भी उन्हें नीतीश कुमार के मुखौटे की जरूरत पड़ी। इस नए घटनाक्रम में एक और बात साफ है कि बिहार में सवर्ण ताकतों को भी सत्ता में आने के लिए मंडल परिघटना को गले लगाना पड़ा है। वहां जमीनी स्तर पर सामाजिक बदलाव की जो प्रक्रिया १९९० के दशक में मंडलवादी राजनीति के विस्तार से शुरू हुई, उसे पलटना सांप्रदायिक और प्रतिक्रियावादी राजनीतिक ताकतों के लिए भी फिलहाल मुमकिन नजर नहीं आता है। गौरतलब है कि १९८०-९० के दशक में दक्षिणपंथी राजनीति को देश में मिली नई स्वीकृति और लगभग उसी समय बहुसंख्यक वर्चस्व की उठी लहर ने देश की राजनीतिक तस्वीर काफी हद तक बदल दी। इन दोनों विचारों की उग्र प्रतिनिधि ताकत के रूप में भारतीय जनता पार्टी का तेजी से उभार हुआ, और सारा हिंदी इलाका उसके प्रभाव में आ गया।

उन्नीस सौ नब्बे का पूरा दशक इस भगवा उभार का दौर है। लेकिन इस पूरे दौर में अगर बिहार इस लहर पर काफी हद तक लगाम लगाने में कायम रहा तो इसकी वजहें जरूर एक दिलचस्प अध्ययन का विषय हैं। इन वजहों की जड़ें दरअसल बिहार की राजनीति के अतीत में जाती हैं। यह अतीत आजादी की लड़ाई के दौर में पैदा हुआ। भूमि सुधार का आंदोलन उस दौर में ही बिहार की राजनीति की एक खास पहचान बना और वामपंथी विमर्श एक लोकप्रिय धारा के रूप में उभरा। स्वामी सहजानंद सरस्वती, जयप्रकाश नारायण, सूरज नारायण सिंह, कार्यानंद सिन्हा आदि कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्हें इस विमर्श को आगे बढाने का श्रेय दिया जा सकता है। दरअसल, यह उस दौर में हुए संघर्षों का ही नतीजा रहा कि आजादी के बाद बिहार में (अब के झारखंड इलाके को छो़ड़ कर) कांग्रेस के बाद सबसे बड़ी राजनीतिक पार्टी के रूप में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी उभरी और सोशलिस्ट धारा की पार्टियों का व्यापक असर देखा गया।

भाकपा ने भूमि सुधार, परती जमीन पर गरीबों के कब्जे, बटाईदारों के हक आदि के लिए लगातार संघर्ष चलाया, जिससे राज्य के कई हिस्सों में उसका मज़बूत जनाधार बना। लेकिन साठ के दशक के अंत में नक्सलवाद के उदय और सत्तर के दशक में बिहार में उसके प्रसार के साथ स्थितियों में बदलाव शुरू हो गया। कमोबेश भाकपा के जनाधार को अपने प्रभावक्षेत्र में लेते हुए ही मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठनों ने बिहार में अपने कदम फैलाए। धीरे-धीरे भाकपा कुछ मध्य जातियों के बीच सिमटती गई। निसंदेह इमरजेंसी का समर्थन भी भाकपा को कमजोर करने वाला एक पहलू रहा। इससे मध्य वर्ग में पार्टी की लोकप्रियता और स्वीकृति पर असर पड़ा और वामपंथी रुझान वाले आदर्शवादी नौजवानों को मार्क्सवादी-लेनिनवादी संगठन या जेपी आंदोलन से उभरे संगठन ज्यादा आकर्षित करने लगे।

फिर भाकपा की जड़ों पर जोरदार प्रहार मंडलवाद के उभार से हुआ। १९९० के दशक के आरंभ में इस राजनीतिक परिघटना का नेतृत्व लालू प्रसाद यादव ने किया। जिन जातियों में लालू प्रसाद यादव का मजबूत जनाधार बना, लगभग वही जातियां राज्य के कई इलाकों में भाकपा का जनाधार थीं। मंडलवादी राजनीति ने इन जातियों को जातिगत आधार पर गोलबंद कर दिया। सामाजिक स्तर पर सीमित संदर्भों में यह एक प्रगतिशील परिघटना थी, लेकिन इसकी विडंबना यह रही कि यह परिघटना वामपंथी राजनीति की कीमत पर आगे बढी। चूंकि भाकपा की पूरी राजनीति संसदीय दायरे में काफी पहले सिमट चुकी थी, इसलिए जातीय वोट-ध्रुवीकरण के आधार पर खड़ी हुई नई राजनीति का मुकाबला करने में भाकपा सक्षम नहीं हो सकी।
बिहार समेत पूरे उत्तर भारत में पिछले डेढ़-पौने दो दशक का दौर जातीय और सांप्रदायिक राजनीति के मजबूत होने का रहा है। यह राजनीति परंपरागत वामपंथी राजनीति के एंटी थीसीस (प्रतिवाद) के बतौर विकसित हुई है। इस राजनीति के पीछे सीमित अर्थों में न्याय पाने की आकांक्षा जरूर है, लेकिन पूरे समाज को न्याय पर आधारित करने की महत्त्वाकांक्षा नहीं है। ऐतिहासिक अन्याय की याद दिलाते हुए जाति, नस्ल या संप्रदाय के आधार पर गोलबंदी एक आसान रास्ता और रणनीति है, जबकि बगैर प्रतिशोध की भावना के एक नया समाज बनाने के सपने को साकार करने की कोशिश उतनी ही मुश्किल है। जब समाज में पहले ढंग के न्याय की लड़ाई मुख्य बनी हुई हो, उस वक्त दूसरे ढंग के संघर्ष का कमजोर पड़ जाने को एक स्वाभाविक परिणति माना जा सकता है। यह अलग बहस का सवाल है कि ऐसे संघर्ष के कमजोर पड़ जाने के लिए जिम्मेदार कौन है?

लेकिन हकीकत यही है कि बिहार में आज वह वामपंथी धारा बेहद कमजोर हो चुकी है, जो लंबे समय तक राज्य में राजनीतिक और सामाजिक विपक्ष की नुमाइंदगी करती रही। संसदीय राजनीति में उसने अपनी ताकत मंडलवादी पार्टियों के हाथों गवां दी और संसदीय राजनीति के बाहर उग्र वामपंथी धारा ने उसे बेदखल कर दिया। उग्र वामपंथी धारा इस पूरे दौर में बिहार में न सिर्फ कायम रही है, बल्कि लगातार मजबूत भी होती गई है। १९८० के दशक में सीपीआई (एम-एल- लिबरेशन) इस धारा की सबसे मजबूत ताकत रही, लेकिन अब वो जगह सीपीआई (माओवादी) ले चुकी है। लिबरेशन जहां अंडरग्राउंड गतिविधियों के साथ-साथ संसदीय राजनीति में जगह बनाने की रणनीति के आधार पर चलती रही है, वहीं माओवादी अंडरग्राउंड जन युद्ध की अकेली रणनीति पर चल रहे हैं।

माओवादियों ने बिहार के बहुत बड़े इलाके में अपनी मजबूत उपस्थिति बना ली है। इतनी कि उनके बंद की अपील पर उन इलाकों का जन जीवन अस्त व्यस्त हो जाता है। वो ट्रेन सेवाओं को रोक देने की ताकत रखते हैं और पुलिस थानों समेत अपने दूसरे निशानों पर हमला करने में वो अक्सर कामयाब रहते हैं। जहानाबाद जैसी सबको चौंका देने वाली कार्रवाई को वो अंजाम दे चुके हैं। राज्य के एक बड़े इलाके में वो संसदीय राजनीति की समानांतर राजनीतिक धारा के रूप अपने कदम फैला रहे हैं। अक्सर ऐसी खबरें आती हैं कि कई इलाकों में संसदीय राजनीति में शामिल पार्टियों और नेताओ को अब उनसे तालमेल बना कर अपना वजूद बनाए रखने की कोशिश करनी पड़ रही है। सुरक्षा एजेंसियां उनके प्रसार को रोकने में अगर नाकाम नहीं, तो काफी हद तक बेअसर जरूर नजर आती हैं।

लेकिन प्रश्न है कि क्या यह उग्र वामपंथी धारा बिहार की व्यापक राजनीति में किसी वाम रुझान का स्रोत बन सकती है? जमीनी स्तर पर यह मुमकिन है कि कई जगहों पर वंचित और उत्पीड़ित समूहों को माओवादी धारा की वजह से राहत मिले, लेकिन क्या इससे एक वैसी ताकत उभर सकती है जो व्यापक जनतांत्रिक दायरे में सांप्रदायिक-फासीवाद का राजनीतिक स्तर पर मुकाबला कर सके और जो राज्य-व्यवस्था पर जनता का नियंत्रण बनाने में मददगार हो? ये सवाल माओवादी विमर्श में शायद अहम नहीं हैं, क्योंकि इस विचारधारा के तहत मौजूदा व्यवस्था के भीतर जनतंत्र की कल्पना का कोई मतलब नहीं है। मौजूदा भारतीय माओवादी धारा हथियारबंद जन युद्ध से राजसत्ता पर कब्जे में यकीन करती है। जब तक यह नहीं हो जाता, तब तक वामपंथ की किसी और राजनीति उसकी राय में निष्फल है।

जाहिर है, माओवादी चाहे जितने मजबूत हों, उनसे बिहार या पूरे देश में कहीं भी परंपरागत अर्थों में वामपंथ को कोई मजबूती नहीं मिलती। बल्कि ऐसे वामपंथ को नष्ट करना माओवादी अपना मकसद मानते हैं। इसीलिए हम बिहार में यह अंतर्विरोध बहुत साफ देख सकते हैं कि एक तरफ जहां माओवादियों की ताकत बढ़ती गई है, वहीं संसदीय राजनीति में वामपंथ लगातार कमजोर होता जा रहा है। इसका परिणाम यह होता है कि मौजूदा संसदीय राजनीति के तहत जनतंत्र के मजबूत होने की प्रक्रिया बाधित हो जाती है। इससे इस राजनीति में सांप्रदायिक, प्रतिक्रियावादी और यथास्थितिवादी ताकतों के लिए मैदान खुला मिल जाता है और उनके तहत राज्य-व्यवस्था पर जन विरोधी रुझान उत्तरोत्तर ज्यादा हावी होता जा रहा है।

बिहार में इस अंतर्विरोध और इससे पैदा हुए गतिरोध के टूटने की निकट भविष्य में कोई उम्मीद नज़र नहीं आती। मौजूदा परिस्थितियों में ऐसा तभी हो सकता है, अगर माओवादी वैचारिक उग्रता और राजनीतिक जिद से उबरने का साहस दिखाते और अपनी राजनीति को जनतांत्रिक दायरे में ले आते और मुख्यधरा की वामपंथी ताकतों के साथ संवाद कायम करते। लेकिन अभी यह महज एक सदिच्छा है, इसलिए बिहार में फिलहाल किसी मजबूत वामपंथी राजनीति के उभरने की उम्मीद की कोई ठोस जमीन नहीं है।

Monday, May 26, 2008

नेहरू को ना भूलें


सत्येंद्र रंजन
वाहर लाल नेहरू ने आज से ४४ वर्ष पहले दुनिया को अलविदा कहा। तब से उनकी विरासत गंभीर विचार-विमर्श के साथ-साथ गहरे मतभेदों का भी विषय रही है। अपने जीवनकाल में, खासकर आजादी के बाद जब वो भारतीय राजनीति के शिखर पर थे, पंडित नेहरू ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। इसके बूते उन्होंने अपनी ऐसी हैसियत बनाई कि कहा जाता है, १९६२ के चीन युद्ध में भारत की हार तक राष्ट्रीय मुख्यधारा में उन्हें आलोचना से परे माना जाता था। लेकिन निधन के बाद उनके व्यक्तित्व, उनके योगदान और उनके विचारों पर तीखे मतभेद उभरे। इतने कि यह बात बेहिचक कही जा सकती है कि नेहरू स्वतंत्र भारत में सबसे ज्यादा मत-विभाजन पैदा करने वाली शख्सियत नजर आते हैं। यह बात भी लगभग उतने ही ठोस आधार के साथ कही जा सकती है कि पिछले साढ़े चार दशकों में नेहरू के विरोधी विचारों को देश में लगातार अधिक स्वीकृति मिलती गई है, और आज जिस कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के प्रति वफादारी आगे बढ़ने का सबसे बड़ा पैमाना है, वह भी पंडित नेहरू के रास्ते पर चल रही है, यह कहना मुश्किल लगता है।

नेहरू के विरोध के कई मोर्चे हैं। एक मोर्चा दक्षिणपंथ का है, जो मानता है कि जवाहर लाल नेहरू ने समाजवाद के प्रति अपने अति उत्साह की वजह से देश की उद्यमशीलता को कुंद कर दिया। एक मोर्चा उग्र वामपंथ का है, जो मानता है कि नेहरू का समाजवाद दरअसल, पूंजीवाद को निर्बाध अपनी जड़ें जमाने का मौका देने का उपक्रम था। एक मोर्चा लोहियावाद का रहा है, जिसकी राय में नेहरू ने व्यक्तिवाद और परिवारवाद को बढ़ावा दिया और पश्चिमी सभ्यता का अंध अनुकरण करते हुए देसी कौशल और जरूरतों की अनदेखी की। लेकिन नेहरू के खिलाफ सबसे तीखा मोर्चा सांप्रदायिक फासीवाद का है, जिसकी राय में देश में आज मौजूद हर बुराई के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं।

नेहरू विरोधी इन तमाम ज़ुमलों को इतनी अधिक बार दोहराया गया है कि आज की पीढ़ी के एक बहुत बड़े हिस्से ने बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के इन्हें सहज स्वीकार कर लिया है। संभवतः इसीलिए आजादी के पहले महात्मा गांधी के बाद कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता और देश के पहले प्रधानमंत्री के प्रति आज सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक राय मौजूद है। चूंकि ऐसी राय अक्सर बिना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे और वर्तमान के पैमानों को अतीत पर लागू करते हुए बनाई जाती है, इसलिए सामान्य चर्चा में इसे चुनौती देना आसान नहीं होता।

इस संदर्भ में सबसे अहम पहलू यह समझना है कि आज जिन चीजों और स्थितियों को को हम तयशुदा मानते हैं, वह हमेशा से ऐसी नहीं थीं। मसलन, देश की एकता, लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप, विकास का ढांचा, प्रगति की परिस्थितियां आज जितनी सुनिश्चित सी लगती हैं, १९४७ में वो महज सपना ही थीं। देश बंटवारे के जलजले और बिखराव की आम भविष्यवाणियों के बीच तब के स्वप्नदर्शी नेता राज्य व्यवस्था के आधुनिक सिद्धांतों पर अमल और व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतंत्रता के मूलमंत्र को अपनाने का सपना देख पाए, इस बात की अहमियत को सिर्फ यथार्थवादी ऐतिहासिक नजरिए से ही समझा जा सकता है। नेहरू उन स्वप्नदर्शी नेताओं में एक थे, अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने विचारों पर अमल का जोखिम उठाया, संभवतः इस बात से कोई असहमत नहीं होगा।
असहमति की शुरुआत अमल के परिणामों को लेकर होती है। यह असहमति एक स्वस्थ बहस का आधार बनी है और निश्चित रूप से आज भी इस बहस को आगे बढ़ाने की जरूरत है। पंडित नेहरू के नेतृत्व में जो विकास नीति अपनाई गई, वह अपने मकसद को कितना हासिल पाई कर पाई, जो नाकामियां उभरीं उसकी कितनी वजह नेहरू के विचारों में मौजूद थी औऱ उनमें कैसे सुधारों की जरूरत है, यह एक सकारात्मक चर्चा है, जो खुद नेहरू के सपने को साकार करने के लिए जरूरी है। लेकिन गौरतलब यह है कि नेहरू का विरोध हमेशा सिर्फ ऐसे ही सवालों की वजह से नहीं होता। नेहरूवाद का एक बड़ा प्रतिवाद सांप्रदायिक फासीवाद है, जिसका मकसद प्रगति और विकास नहीं, बल्कि पुरातन सामाजिक अन्याय और जोर-जबरदस्ती को कायम रखना है।

देश में मौजूद कई विचारधाराओं का सांप्रदायिक फासीवाद से टकराव रहा है। लेकिन यह एक ऐतिहासिक सच है कि सवर्ण और बहुसंख्यक वर्चस्व की समर्थक इन ताकतों के खिलाफ सबसे मजबूत और कामयाब बुलवर्क पंडित नेहरू साबित हुए। देश विभाजन के बाद बने माहौल में भी ये ताकतें अगर कामयाब नहीं हो सकीं, तो उसकी एक प्रमुख वजह नेहरू की धर्मनिरपेक्षता में अखंड आस्था और इसके लिए अपने को दांव पर लगा देने का उनका दमखम रहा। जाहिर है, ये ताकतें आज भी अपना सबसे तीखा हथियार नेहरू पर हमला करने के लिए सुरक्षित रखती हैं। पिछले दो-ढाई दशकों में दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों के ज्यादा प्रचलित होने, संपन्न और सवर्ण पृष्ठभूमि से उभरे मध्य वर्ग के मजबूत होने और अमेरिका-परस्त जमातों का दायरा फैलने के साथ सांप्रदायिक ताकतों को नया समर्थक आधार मिल गया है। नेहरू अपने सपने और आर्थिक एवं विदेश नीतियों की वजह से इन सभी ताकतों के स्वाभाविक निशाने के रूप में उभरते हैं। और ये ताकतें जानती हैं कि जब तक नेहरूवाद को एक खलनायक के रूप में स्थापित नहीं कर दिया जाता, उनकी अंतिम कामयाबी संदिग्ध है।

पिछले डेढ़ दशक में इन ताकतों के बढ़ते खतरे ने बहुत से लोगों को नेहरू की प्रासंगिकता पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जिस आधुनिक भारत की कल्पना विकसित हुई और जिसे आजादी के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में ठोस रूप दिया गया, उसके लिए पैदा हुए खतरे के बीच यह सवाल बेहद गंभीरता से उठा है कि आखिर इस भारत की रक्षा कैसे की जाए? यह विचार मंथन हमें उन रणनीतियों और सोच की अहमियत समझने की नई दृष्टि देता है, जो पंडित नेहरू ने प्रतिक्रियावादी, आधुनिकता विरोधी और अनुदार शक्तियों के खिलाफ अपनाई। उन्होंने इन ताकतों के खिलाफ वैचारिक संघर्ष जरूर जारी रखा, लेकिन उनकी खास रणनीति देश को विकास एवं प्रगित का सकारत्मक एजेंडा देने की रही, जिससे तब की पीढ़ी भविष्य की तरफ देख पाई और आर्थिक एवं सांस्कृतिक पिछड़पन की व्यापक पृष्ठभूमि के बावजूद एक नए एवं आधुनिक भारत का उदय हो सका।

पंडित नेहरू ने उस वक्त के मानव विकासक्रम की स्थिति, उपलब्ध ज्ञान और संसाधनों के आधार पर उस भारत की नींव रखी, जो आज दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। लेकिन नेहरू की रणनीतियों की नाकामी यह रही कि नए भारत में गरीबी, असमानता और व्यवस्थागत अन्याय को खत्म नहीं किया जा सका। नतीजतन, आज हम एक ऐसे भारत में हैं जहां संपन्नता और विपन्नता की खाई बढ़ती नजर आ रही है, और नेहरू ने समाजवाद के जिन मूल्यों की वकालत की वो आज बेहद खोखले नजर आते हैं। यह विसंगति निसंदेह पंडित नेहरू की विरासत पर बड़ा सवाल है।

लेकिन इस सवाल से उलझते हुए भी आज की पीढ़ी के पास सबसे बेहतरीन विकल्प संभवतः यह नहीं है कि नेहरू की पूरी विरासत को खारिज कर दिया जाए। बल्कि सबको समाहित कर और सबके साथ न्याय की जो बात नेहरू के भारत के सपने के बुनियाद में रही, वह आज भी इस राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, जिसकी जड़ें मजबूत किए जाने की जरूरत है। ये दोनों बातें विकास और प्रगति के एक खास स्तर के साथ ही हासिल की जा सकती हैं, नेहरूवाद की यह मूल भावना भी शायद विवाद से परे है। यह जरूर मुमकिन है कि विकास और प्रगति की नई अवरधारणाएं पेश की जाएं और उनकी रोशनी में पुरानी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार हो। बहरहाल, विश्व मंच पर भारत अपनी स्वतंत्र पहचान रखे और जिन मूल्यों पर भारतीय राष्ट्र की नींव डाली गई, उनकी इन मंचों पर वह वकालत करे, यह नेहरूवादी विरासत आज भी उतना ही अहम है, जितना जवाहर लाल नेहरू के जीवनकाल में था, इस बात पर भी शायद कोई मतभेद नहीं हो सकता।

दरअसल, बात जब नेहरू की होती है, तब ये विचार ही सबसे अहम हैं। इन पर आज सबसे ज्यादा चर्चा की जरूरत है। नेहरू की नाकामियां जरूर रेखांकित की जानी चाहिए, लेकिन उनके कुल योगदान का विश्लेषण वस्तुगत और तार्किक परिप्रेक्ष्य में ही होना चाहिए। वरना, हम उन ताकतों की ही मदद करते दिखेंगे जो नेहरू की छवि एवं विरासत का ध्वंस दरअसल भारत के उस नए विचार का ध्वंस करने के लिए करती हैं, जो आजादी की लड़ाई के दिनों में पैदा हुआ, आधुनिक समतावादी चितंकों ने जिसे विकसित किया, जो गांधी-नेहरू के नेतृत्व में अस्तित्व में आया और जिसे आज दुनिया भर में सहिष्णुता, सह-अस्तित्व एवं मानव विकास का एक बेहतरीन आदर्श माना जा रहा है। नेहरू इसी भारत के प्रतीक हैं, और इसीलिए वैचारिक मतभेदों के बावजूद उनकी विरासत की आज रक्षा किए जाने की जरूरत है।

Friday, May 9, 2008

डेमोक्रेटिक पार्टी का ‘ओन गोल’


सत्येंद्र रंजन
बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने की जंग लगभग जीत चुके हैं। बीते मंगलवार को इंडियाना और नॉर्थ केरोलीना राज्यों की डेमोक्रेटिक प्राइमरी के नतीजों का सभवतः यही पैगाम रहा। हालांकि अब भी छह राज्यों में उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया बाकी है, लेकिन वहां से डेमोक्रेटिक राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए महज २१७ प्रतिनिधि चुने जाने हैं, जबकि अब तक की सूची में ओबामा हिलेरी क्लिंटन पर १६५ प्रतिनिधियों की बढ़त बना चुके हैं। किसी भी हाल में उन छह राज्यों के सभी प्रतिनिधि हिलेरी क्लिंटन को नहीं मिल सकते और इस तरह अब यह तय है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की आखिरी सूची में ओबामा की बढ़त कायम रहेगी। उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में हुए मतदान में भी ओबामा की बढ़त जारी है। उन्हें अब तक ४९.६ फीसदी वोट मिले हैं, जबकि हिलेरी क्लिंटन ४७.३ प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई हैं और इस तरह ओबामा से २.३ फीसदी वोटों से पिछड़ी हुई हैं।

इस सूरत के बावजूद अगर हिलेरी क्लिंटन अब भी मैदान में डटी हुई हैं, तो इसके पीछे उनका अपना गणित है। दरअसल, अब यह भी तय हो गया है कि प्राइमरी और कॉकस के जरिए ओबामा या क्लिंटन दोनों में से कोई भी स्वतः उम्मीदवारी हासिल करने के लिए जरूरी २,०२५ प्रतिनिधियों की निर्णायक संख्या हासिल नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक भूमिका उन प्रतिनिधियों की होगी, जिन्हें सुपर डेलीगेट्स कहा जाता है। ये पार्टी के निर्वाचित जन प्रतिनिधि, पूर्व राष्ट्रपति, गवर्नर और पार्टी पदाधिकारी होते हैं और इनकी संख्या ६०१ है। इन प्रतिनिधियों में जिन लोगों ने अपनी पसंद अब तक जाहिर की है, उनमें हिलेरी क्लिंटन की बढ़त बनी हुई है। सुपर डेलीगेट्स के साथ सुविधा यह होती है कि वे आखिरी वक्त कर अपना रुख बदल सकते हैं। हिलेरी क्लिंटन की अब सारी जंग इन लोगों को यह समझाने की है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर बराक ओबामा ने भले भारी समर्थन हासिल किया हो, लेकिन जब बात नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की आएगी तो ओबामा आम अमेरिकी मतदाताओं के बीच इतना समर्थन हासिल नहीं कर पाएंगे, जिससे वे रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन को हरा सकें।

जनमत सर्वेक्षणों पर गौर करें तो क्लिंटन के दावे में दम नजर आता है। अमेरिकी राजनीति की तस्वीर पेश करने वाली वेब साइट रियल क्लीयर पॉलिटिक्स डॉट कॉम के मुताबिक मैकेन पर जहां ओबामा को २.६ फीसदी की बढ़त हासिल है, वहीं हिलेरी क्लिंटन मैकेन से ३.९ फीसदी अंतर से आगे हैं। यानी अगर क्लिंटन उम्मीदवार बनती हैं तो उनके जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी। असल में ओबामा भले ही ज्यादातर राज्यों में जीते हों, लेकिन अधिकांश बड़े राज्यों में, जो राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक होते हैं, वहां हिलेरी क्लिंटन को ज्यादा समर्थन मिला है। इसी तरह अगर अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों को छोड़ दें तो हिलेरी क्लिंटन को उन सभी समूहों में ज्यादा समर्थन मिला है जो डेमोक्रेटिक पार्टी का वोट आधार रहे हैं।

बराक ओबामा ने दरअसल निर्दलीय समूहों, कुछ पहले रिपब्लिकन पार्टी का समर्थक रहे समूहों और खासकर नौजवानों को ज्यादा आकर्षित किया है। ह्वाइट हाउस की होड़ में वे अपनी इराक युद्ध विरोधी छवि के साथ उतरे। जब इराक युद्ध अमेरिकी जन मानस में एक गहरा नासूर बन चुका था, उस समय बहुत से लोगों को शुरुआत से इस युद्ध का विरोधी होने की ओबामा की छवि ने आकर्षित किया। ओबामा एक ओजस्वी वक्ता के रूप में सामने आए और राजनीति की आम पेचीदगियों में न पड़ते हुए उन्होंने परिवर्तन का नारा दिया, जो सटीक बैठा। ‘वॉशिंगटन ऐस्टैबलिशमेंट’ को अपने निशाने पर लेते हुए उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। इससे उन्होंने जॉर्ज बुश जूनियर के प्रशासन से लोगों की गहरी नाराजगी का फायदा उठाया और साथ ही यह संदेश दिया कि हिलेरी क्लिंटन उसी पुरानी व्यवस्था की नुमाइंदा हैं, जिसकी वजह से आम नागरिकों के हाथ में अपने देश का नियंत्रण नहीं रह गया है।

इस दौर में ओबामा का सारा जोर मतभेद पाटने पर रहा है। नस्ल, वर्ग और क्षेत्र के विभाजनों से ऊपर उठ कर एक अमेरिका का अपना संदेश वे बहुत से लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। जब उनके पुराने पादरी जेरमी राइट ने अमेरिका में काले लोगों के साथ अन्याय के सवाल पर जोशीला भाषण दिया तो ओबामा ने फौरन उसकी निंदा करते हुए उनसे अपने को अलग करने का एलान किया। ओबामा के इस भाषण को कई हलकों में ऐतिहासिक में बताया गया है। खासकर धनी गोरे और सभ्रांत हलकों में, जहां नस्ल के सवालों पर परदा डालने की सहज प्रवृत्ति रहती है। लेकिन मुश्किल यह है कि ये तबके रिपब्लिकन पार्टी के वोटर हैं और उनका समर्थन असली मुकाबले में ओबामा के ज्यादा काम नहीं आ सकता है।

डेमोक्रेटिक पार्टी के असली समर्थक तबकों- मसलन, मेहनतकश और मध्य वर्ग के गोरे समुदायों और हिस्पैनिक समूहों में ओबामा ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं। इन तबकों ने हिलेरी क्लिंटन में अपना ज्यादा भरोसा जताया है। इसकी वजह यह है कि ठोस कार्यक्रमों की बात करें तो ओबामा बेहद हलके नजर आते हैं। उन्होंने लच्छेदार भाषा में जोशीले भाषण खूब दिए हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य देखभाल और यहां तक कि विदेश नीति के सवालों पर भी कोई वैकल्पिक कार्यक्रम या नीति पेश करने में नाकाम रहे हैं। इन बिंदुओं पर हिलेरी क्लिंटन कहीं ज्यादा ठोस नजर आती हैं। मसलन, स्वास्थ्य देखभाल के मुद्दे पर उन्होंने पूरी बारीकियों के साथ अपना कार्यक्रम रखा है, जबकि ओबामा यह कह कर इसका मजाक उड़ाते रहे हैं कि हिलेरी सब पर स्वास्थ्य बीमा जबरन थोपना चाहती हैं।

दरअसल, मुद्दों पर स्पष्ट रुख की वजह से ही हिलेरी क्लिंटन को बांटने वाली शख्सियत कहा गया है। जबकि ओबामा साफ रुख न लेकर मतभेदों को पाटने वाली अपनी छवि पेश करने में सफल रहे हैं। इससे उन्हें उन हलकों से खूब समर्थन मिला है, जो परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ नहीं रहे हैं। लेकिन यही उनकी उम्मीदवारी के सामने सबसे बड़ा सवाल है। हिलेरी क्लिंटन की कोशिश अब सुपर डेलीगेट्स को यह समझाने की है कि अफ्रीकी-अमेरिकियों को छोड़कर डेमोक्रेटिक पार्टी का बाकी असली समर्थन आधार उनके साथ है औऱ इसीलिए उनके जीतने की संभावना ज्यादा मजबूत है।

राष्ट्रपति चुनाव के इस साल में रिपब्लिकन पार्टी ने बेहद कमजोर संभावनाओं के साथ कदम रखा। लेकिन उसने जल्दी उम्मीदवार चुन कर अपने लिए एक अनुकूल स्थिति पैदा की। जॉन मैकेन चुनाव प्रचार में उतर चुके हैं और रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक दक्षिणपंथी धनी समूह और मीडिया उनकी छवि उभारने के अभियान में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी में होड़ लगातार तीखी होती गई है। इस क्रम में ओबामा और क्लिंटन दोनों ने एक दूसरे पर हमले करने के काफी हथियार अपने विरोधियों को खुद मुहैया कर दिए हैं। तमाम संभावनाएं इस ओर संकेत कर रही हैं कि यह होड़ अभी और लंबा खिंचेगी और यह मुमकिन है कि अगस्त में होने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिवेशन में ही जाकर उम्मीदवारी आखिरी रूप से तय हो।
अगर अंततः डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक हुसेन ओबामा ही होते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि रिपब्लिकन चुनाव मशीन नस्ल, और उनके अतीत के कई झूठे-सच्चे किस्से और सवाल जोरशोर से उठाकर मतदाताओं को भरमाने की कोशिश करेगी। बिना ठोस कार्यक्रम के वे डेमोक्रेटिक समर्थन आधार में कैसे उत्साह भरेंगे और ब्लैक समुदाय के एक नेता के राष्ट्रपति बनने की संभावना से भड़कने वाली गोरों की प्रतिक्रिया का तोड़ कैसे निकालेंगे, यह उनकी कामयाबी की असली कसौटी होगी। उधर मौजूदा हालात में अगर हिलेरी क्लिंटन उम्मीदवार बन जाती हैं तो उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं होंगी। इससे रिपब्लिकन पार्टी को यह प्रचार करने का मौका मिलेगा कि डेमोक्रेटिक पार्टी में आम जन के मत का कोई मोल नहीं है, सुपर डेलीगेट यानी पार्टी के मठाधीश वहां जनमत की अवहेलना कर अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिता सकते हैं। इससे पार्टी की लोकतांत्रिक छवि प्रभावित होगी।

लेकिन अब हकीकत यही है कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने शुरुआत में अपने लिए अनुकूल दिख रहे हालात को उलझा दिया है। ओबामा और हिलेरी क्लिंटन की होड़ में लोगों को मजा खूब आया है और इससे अमेरिकी राजनीति में एक तरह की रफ्तार भी आती नजर आई है, लेकिन चुनाव संभावनाओं के लिहाज से देखें तो यह पूरा दौर, अगर फुटबॉल की शब्दावली में कहें, तो डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए ‘ओन गोल’ करने जैसा है।