Saturday, March 28, 2009

भाजपा से और क्या उम्मीद?


सत्येंद्र रंजन
हरीला भाषण देने के लिहाज से वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी का अकेला चेहरा नहीं हैं। ना ही पहली बार राजनीतिक या चुनावी मंच से एक समुदाय विशेष के खिलाफ वैसी बातें कही गईं, जो वरुण गांधी के मुंह से पूरे देश ने सुना। नरेंद्र मोदी अपने ऐसे ही भाषणों की वजह से भाजपा के चमकते सितारे हैं। और योगी आदित्यनाथ, उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ, उमा भारती, ऋतंभरा जैसे नामों की शोहरत वैसी ही भाषा की वजह से रही है। बल्कि अगर रामरथ यात्रा के दिनों को याद किया जाए, तो लालकृष्ण आडवाणी के कई भाषण उस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। और २००२ में गोवा में दिया अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण भी अभी लोगों को भुला नहीं है। इन सभी भाषणों में सुर की ऊंचाई और शब्दों के चयन का फर्क हो सकता है, लेकिन उनकी विषयवस्तु में एक ही बात झलकती है।

इसलिए वरुण गांधी ने जो कहा, उसमें कोई नई बात नहीं है। ना ही ये ऐसा पहला मामला है। अगर इस प्रकरण में कोई नई बात है तो वो यह कि इस बार भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की संस्थाओं ने जिम्मेदारी की ज्यादा भावना के साथ प्रतिक्रिया दिखाई। चुनाव आयोग ने भाजपा को सलाह दी कि वो वरुण गांधी को उम्मीदवार न बनाए और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में दर्ज एफ़आईआर को रद्द करने की अर्जी पहली ही सुनवाई में ठुकरा दी। दिल्ली हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत की अवधि बढ़ने की उम्मीद न देखते हुए वरुण गांधी ने ये याचिका ही वापस ले ली।

इसके बाद वरुण गांधी और भाजपा ने नफरत फैलाने के आरोप का राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति पर चलना शुरू कर दिया है। वरुण गांधी के साथ पूरा संघ परिवार खड़ा है। इनमें उन संगठनों का जिक्र फिलहाल छोड़ देते हैं, जिनका कोई लोकतांत्रिक या संवैधानिक उत्तरदायित्व नहीं हैं। लेकिन एक वैध और पंजीकृत राजनीतिक दल के रूप में भाजपा इन जवाबदेहियों बच नहीं सकती। और भाजपा का दोहरापन फिर से सबके सामने है। उसका कहना है कि वरुण गांधी ने अगर वैसा कहा तो पार्टी उससे सहमत नहीं है, लेकिन उसे तमाम परिस्थितिजन्य सबूतों पर भरोसा नहीं है। चुनाव आयोग और पहली नजर में हाई कोर्ट को जो सच लगा है, उसके पीछे वह पूर्वाग्रह देखती है। इसलिए वह न सिर्फ वरुण गांधी को उम्मीदवार बनाए रखेगी, बल्कि वरुण गांधी, भले ही अघोषित रूप में, लेकिन अब पार्टी के स्टार प्रचारकों का हिस्सा बन जाएंगे।

संवैधानिक संस्थाओं के अनादर की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है? लेकिन यह भी कोई पहली बार नहीं है। इन संस्थाओं के प्रति अपमान का भाव भाजपा की पुरानी पहचान है। बल्कि भारतीय संविधान में, जिसकी मूल भावना लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है, भाजपा की आस्था पर सवाल हैं। भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आई तो उसके पास अपना बहुमत नहीं था, इसके बावजूद उसने भारतीय संविधान के अमल की समीक्षा के लिए एक समिति बना दी। उस समिति के पीछे छिपा एजेंडा दरअसल किसी से छिपा नहीं था। यहां यह भी याद कर लेने के लायक है, जब बाबरी मस्जिद ध्वंस से देश में सांप्रदायिकता की लहर आई हुई थी, तब विश्व हिंदू परिषद के नेता स्वामी वामदेव ने भाजपा नेताओं की पूरी संगति में भारत के वैकल्पिक संविधान का मसविदा जारी किया था। उसके मुताबिक भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना था और हिंदू राष्ट्र की राज्य-व्यवस्था कैसे चलेगी, इसका जिक्र था।

यह परियोजना तभी पूरी हो सकती है, जब भाजपा अपने बहुमत के साथ सत्ता में आए। और यह तभी मुमकिन होगा, जब हिंदुत्व के नाम पर देश के बहुसंख्यक समुदाय की उग्र गोलबंदी हो। इसलिए कि भाजपा के पास कभी ऐसे सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं रहे, जिसके आधार पर विभिन्न वर्गों और समुदायों का वह ऐसा गठबंधन बना सके, जिससे सत्ता में पहुंचना मुमकिन हो। भाजपा ने अब तक जो राजनीतिक गठबंधन बनाए हैं, उसके पीछे कोई कार्यक्रम या विचार नहीं रहा। यह सिर्फ वोट के फौरी समीकरणों पर आधारित रहा है। ऐसे समीकरण भाजपा भविष्य में भी बना सकती है, लेकिन इससे वह अपना असली मकसद हासिल नहीं कर सकेगी।

इसलिए उग्र हिंदुत्व, अल्पसंख्यक विद्वेष और दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों की वकालत पार्टी की स्वाभाविक रणनीति है। यह काम वरुण गांधी जैसे वक्ताओं के साथ ही किया जा सकता है। यानी ऐसे भाषणों के जरिए जिनसे इंसान की निकृष्टतम भावनाओं को भड़काया जाए और लोगों को मार-काट करने के लिए उकसाया जाए। विनाश की यह वही रणनीति है, जिसका दुनिया को नाजीवाद और फासीवाद के दौर में अनुभव हो चुका है। दरअसल ये प्रवृत्तियां मानव सभ्यता के विकास का प्रतिवाद (एंटी-थिसिस) हैं और इसीलिए इसके खतरे को हर व्यक्ति को समझना चाहिए।

भाजपा को एक समय देश के एक वरिष्ठ नेता ने असभ्य पार्टी कहा था। अगर उपरोक्त संदर्भ को ध्यान में रखा जाए, तो इस कथन से सहज ही सहमत हुआ जा सकता है। सभ्यता एक ऐसा क्रम है जो मनुष्य को उसकी आदिम प्रवृत्तियों से ऊंचा उठाती है। वह मतभेदों और आपसी विरोध को निपटाने के लिए खून-खराबे और भौतिक लड़ाई के बजाय वैचारिक संघर्ष और विचार-विमर्श को तरीका बनाने के लिए प्रेरित करती है। लोकतांत्रिक राजनीति के विकास के साथ ऐसे संघर्षों और विरोध की अभिव्यक्ति या समाधान का सबसे बड़ा जरिया वोट बन गया है। यही लोकतंत्र और आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा योगदान है।

सवाल है कि जिन ताकतों या दलों की इस प्रक्रिया में आस्था न हो, उन्हें क्या कहा जा सकता है? जो पार्टी जहरीली जुबान के बावजूद वरुण गांधी का बचाव करती हो, या अपने दंगाई इतिहास के बावजूद मायाबेन कोडनानी जिस पार्टी की बड़ी नेता बनी रहें, उसे किस परिभाषा के तहत सभ्य या लोकतांत्रिक कहा जा सकता है? भाजपा नेताओं से इन सवालों के जवाब की उम्मीद नहीं की जा सकती। दरअसल, उनसे विचार विमर्श की किसी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उनसे सिर्फ जुमलेबाज़ी, गंभीर से गंभीर सवालों का मखौल उड़ाने और गलाफाड़़ शोर की ही अपेक्षा की जा सकती है।

लेकिन राहत की बात यह है कि भारतीय लोकतंत्र लगातार परिपक्व हो रहा है। जिन बातों पर पहले संस्थागत रूप से प्रतिक्रिया नहीं होती थी, या हलकी प्रतिक्रिया होती थी, वहां भी अब एक रुख लिया जा रहा है। इसीलिए वरुण गांधी जमानत न लेने या गिरफ्तारी देने के तमाम ड्रामे के बावजूद शहादत का दर्जा नहीं पा सकते। न ही उनकी पार्टी और उसके एजेंडे के लिए संभावनाएं उज्ज्वल नजर आती हैं। उन सबका खतरा अब भी है, मगर अब उस खतरे के बारे में कहीं ज्यादा जागरूकता है। यह भारतीय लोकतंत्र एवं हमारी आज की सभ्यता के लिए उम्मीद की एक बड़ी किरण है।

Saturday, March 21, 2009

तीसरे मोर्चे से नफ़रत क्यों?


सत्येंद्र रंजन
म चुनाव से ठीक पहले तीसरे मोर्चे के एक खास शक्ल ग्रहण कर लेने से न सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकारों के लिए परेशानी खड़ी हो गई है, बल्कि देश की राजनीतिक असलियत और सामाजिक संरचना से नावाकिफ़ जानकार भी बौखलाए हुए लगते हैं। मीडिया की चर्चाओं में अक्सर तीसरे मोर्चे को अस्थिरता की जड़ बताया जा रहा है। यहां तक कि इसमें शामिल दलों को ब्लैकमेलर और अपनी ताकत से ज्यादा मलाई खाने की हसरत रखने वाले नेताओं का जमावड़ा भी कहा जा रहा है। इसी के बीच वह सुझाव भी फिर सामने गया है, जो भारतीय प्रभु वर्ग की बहुत पुरानी ख्वाहिश है। यानी यह कि १५वें आम चुनाव का नतीजा आने के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को आपस में मिलकर सरकार बनाने की संभावना पर विचार करना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता के कुछ स्वघोषित पैरोकार यहां तक कह चुके हैं, तीसरे मोर्चे की ब्लैकमेलिंग देखने के बजाय वो पांच साल का भाजपा शासन सहना पसंद करेंगे।

ये बातें इस हकीकत को मानने के बावजूद कही जा रही हैं कि कांग्रेस और भाजपा की ताकत लगातार गिरती जा रही है, पिछले आम चुनाव में दोनों दलों ने अपने वोट प्रतिशत गवाएं थे और इस बार यह मुमकिन है कि ये दोनों दल पिछले बार की सीटों की साझा संख्या २८३ (कांग्रेस १४५ और भाजपा १३८) से काफी कम पर सिमट जाएं। इस बार यह संभव है कि लोकसभा में आधे से ज्यादा सीटें कांग्रेस और भाजपा के अलावा दलों के पास हों। तो जो दल देश के आधे से ज्यादा जनमत की नुमाइंदगी करने की स्थिति में हैं, आखिर उनके प्रति यह हिकारत का भाव क्यों? आखिर इसके पीछे कैसी मानसिकता है? आखिर यह सोच क्यों है कि भले बाकी दलों के पास ज्यादा सीटें हों, लेकिन कांग्रेस या भाजपा में से किसी एक के नेतृत्व में ही सरकार बनानी चाहिए?

यह दरअसल देश में उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण से शासक वर्गों में पैदा हुई बेचैनी है। इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उभर रही नई ताकतों, नई जन आकांक्षाओं और नए वर्ग समूहों से आ रहे नेताओं पर यह लगाम कसने की एक चाहत है। शासक वर्गों को अभी भी यह लगता है कि बीते वर्षों में कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां जो उनके हितों के अनुरूप पूरी तरह ढल चुकी हैं, उनके जरिए वो जनतांत्रिक परिघटना को नियंत्रित कर सकते हैं। इस मकसद में इन वर्गों की पहली पसंद निश्चित रूप से भाजपा है, जो सांप्रदायिक, भड़काऊ और कंजरवेटिव एजेंटे से आम जन को उनके असली मुद्दों से ज्यादा आसानी से भटका सकती है। मगर कांग्रेस ने आम आदमी की बात करते हुए भी प्रभु वर्ग के हितों के मुताबिक शासन करने की कला में जैसी महारत हासिल कर रखी है, उससे इन वर्गों की वह स्वाभाविक रूप से दूसरी पसंद है।

इस कथन से यह भ्रम बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस और भाजपा के अलावा बाकी दलों ने मौका मिलने पर शासन का कोई अलग चरित्र दिखाया है या अलग नीतियां अपनाई हैं। वामपंथी दलों को छोड़ दें तो बाकी दलों ने वैकल्पिक नीतियों के मामले पूरा दीवालियापन ही दिखाया है और उनके नेताओं का आचार-व्यवहार अगर बदतर नहीं तो कांग्रेस और भाजपा के नेताओं से बेहतर भी नहीं रहा है। १९८० और ९० के दशक में उनसे देश को जैसी नई दिशा की उम्मीद थी, वह अब टूट चुकी है।

लेकिन इन दलों और उनके नेताओं के उभार का महत्त्व वैकल्पिक नीतियों और अलग राजनीतिक संस्कृति के संदर्भ में नहीं है। उनका महत्त्व इस संदर्भ में है कि ‘एक व्यक्ति, एक वोट और हर वोट के समान मूल्य’ के जिस सिद्धांत पर हमारे संविधान में संसदीय लोकतंत्र को अपनाया गया, उसने आम जन में अपने अधिकारों एवं सम्मान की अभूतपूर्व आकांक्षा जगाई है और इससे बीते दशकों में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली नई राजनीतिक ताकतें उभर कर सामने आई हैं। पहले राज्यों की सत्ता पर अधिकार जताने के बाद अब ये ताकतें देश की सत्ता पर अपना प्रभाव डाल सकने की स्थिति में हैं।

बहुत सी अलग राजनीतिक शक्तियों का उदय तो इसलिए भी हुआ कि उन्हें समाहित करने की क्षमता कांग्रेस पार्टी बरकरार नहीं रख सकी, जो कभी सभी तरह के विचारों और हितों का प्रतिनिधित्व करती थी। आज कांग्रेस का ढांचा ऐसा है कि उसमें किसी नए नेता के लिए अपने जनाधार और प्रतिभा के बल पर जगह बनाना और उम्मीदवारी का टिकट पाना मुश्किल है। वंशवाद और ऊपर से थोपे गए नेताओं की वहां ऐसी जकड़न है कि किसी इलाके की किसी नई ताकत के पास एकमात्र रास्ता यही बचता है कि वह अपनी अलग शुरुआत करे। इस परिघटना से कांग्रेस सिकुड़ती गई, जबकि नई ताकतें राजनीतिक फलक पर अपनी जगह बनाती गई हैं।

कांग्रेस को २००४ में अपनी इस विफलता की स्थितियों में सुधार का ऐतिहासिक मौका मिला। इससे वह नए भारत की लोकतांत्रिक एवं संघीय उम्मीदों के मुताबिक नई नीतियों और कार्यक्रम को अपनाते हुए एक वाम झुकाव रखने वाले धर्मनिरपेक्ष गठबंधन का स्वाभाविक नेता बन सकती थी। मगर प्रभु वर्ग की सेवा के अति उत्साह में उसने ये मौका गवां दिया। उसने नीतियों के सवाल पर वामपंथी दलों से विश्वासघात किया। इस क्रम में उसने अपना नैतिक कद गंवाया और साथ ही अपने नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन का राजनीतिक औचित्य भी खत्म कर दिया। ऐसे में क्या यह अस्वाभाविक है कि अब उसके सहयोगी दल उसे अपमानित कर रहे हैं?

भाजपा अपनी बुनियादी सोच में लोकतंत्र, संघवाद और हर प्रगतिशील मूल्य के खिलाफ है। वह विभिन्न दलों से गठबंधन सिर्फ गैर-कांग्रेसवाद के राजनीतिक समीकरण और मजबूरियों की वजह से बना सकी। लेकिन उड़ीसा की मिसाल अब यह जाहिर कर रही है कि यह समीकरण और मजबूरियां भी भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन कायम रहने की गारंटी नहीं है।

इन स्थितियों ने लोकसभा चुनाव के परिदृश्य को बेहद अनिश्चित कर दिया है। इस अनिश्चितता से प्रभु वर्गों में बेचैनी लाजिमी है और यही बौखलाहट मीडिया में उनके प्रवक्ता टीकाकारों के जरिए जाहिर हो रही है। लेकिन उनकी टिप्पणियों में देश की बदलती असलियत की नासमझी भी सामने आ रही है, और यह समझ सकने की अक्षमता भी कि समय की धारा अब उनके साथ नहीं है। नया जनादेश दरअसल नए भारत की नई आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करेगा।

Wednesday, March 4, 2009

क्रिकेट पर हमला क्यों?


सत्येंद्र रंजन
पाकिस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमले पर भावुक होकर सोचने के कई बिंदु हैं। मसलन, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के १३२ साल के इतिहास में यह पहला मौका है, जब क्रिकेट खिलाड़ियों को निशाना बनाया गया। दरअसल १९७२ के म्युनिख ओलिंपिक में ११ इजराइली एथलीटों की हत्या के बाद यह पहला मौका है, जब खिलाड़ी इस तरह के घातक आतंकवादी हमले का निशाना बने। यह बात किसी विवेकशील व्यक्ति के समझ के परे है कि किसी आतंकवादी संगठन को आखिर खिलाड़ियों से क्या दुश्मनी हो सकती है? खिलाड़ी किसी देश या समुदाय की नीति बनाने के काम से नहीं जुड़े होते हैं। वे अपने हुनर से टीम में जगह बनाते हैं और उनकी प्रतिभा का सौंदर्य पूरी मानवता की साझा विरासत होता है।

बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान के जानकारों का कहना है कि प्रतिद्वंद्विता या शत्रुता का भाव रखने वाले समाजों या देशों को खेल स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का बेहतरीन मौका उपलब्ध कराते हैं। खेल के मैदान पर होड़ से मन का गुबार निकल जाता है, जबकि इसमें कोई हिंसा या नुकसान नहीं होता। खुद एक दशक पहले तक भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मुकाबले ऐसी प्रतिस्पर्धा की मिसाल रहे हैं।

अभी हाल तक जब कई देशों की टीमें पाकिस्तान दौरे पर जाने से इनकार करती थीं, तो पाकिस्तान और असल में हर जगह बहुत से लोगों का यह तर्क होता था कि आज तक कभी खिलाड़ियों को निशाना नहीं बनाया गया है, इसलिए इन टीमों का डर निराधार है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड जैसी टीमों की ऐसी आशंकाओं के पीछे नस्लीय सोच के अवशेष भी तलाशे जाते थे। इस साल जनवरी में जब भारतीय टीम पाकिस्तान नहीं गई तो इन हलकों में माना गया कि इसके पीछे वजह हमलों के अंदेशे से ज्यादा दोनों के बीच मुंबई पर हमले के बाद पैदा हुआ तनाव है। दौरे को हरी झंडी न देने के भारत सरकार के कदम को एक राजनीतिक फैसला माना गया। यह जुमला एक बार फिर दोहराया गया कि राजनीति को खेल से अलग रखा जाना चाहिए।

मगर लाहौर में १२ आतंकवादियों ने श्रीलंका के क्रिकेटरों पर गोलीबारी कर इन सारी दलीलों को एक साथ ध्वस्त कर दिया है। सौभाग्य से श्रीलंका के प्रतिभाशाली क्रिकेटर मामूली चोट के साथ ही बच गए, लेकिन आतंकवादियों की गोलियों से क्रिकेट को पहुंचा जख्म बहुत गहरा है। इसके परिणाम संभवतः क्रमिक रूप से जाहिर होंगे। पाकिस्तान २००८ में एक भी टेस्ट मैच नहीं खेल सका। दरअसल, श्रीलंकाई टीम ने वहां जाकर खेलने का जब जोखिम उठाया तो पाकिस्तानी टीम १४ महीनों के बाद किसी टेस्ट मैच में उतरी। इस हमले के बाद पाकिस्तान का यह इंतजार अब कई वर्ष लंबा हो सकता है। यह भी लगभग तय है कि उसे २०११ के विश्व कप की मेजबानी से हाथ धोना पड़ेगा।

लेकिन यह असर सिर्फ पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। लाख टके का सवाल यह है कि क्या ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड जैसी टीमें अब भारतीय उपमहाद्वीप में आने को तैयार होंगी? गौरतलब है कि मुंबई हमले के बाद बड़ी मुश्किल से इंग्लैंड की टीम भारत आकर खेलने को राजी हुई थी, लेकिन तब यह भ्रम कायम था कि आतंकवादी खिलाड़ियों पर हमला नहीं करते हैं। अब यह भ्रम टूट चुका है। भारत भले स्थिर समाज हो और यहां की सुरक्षा व्यवस्था अपेक्षाकृत भरोसेमंद हो, लेकिन विदेशी खिलाड़ी इसे बेखौफ होकर खेलने के लायक मानेंगे, यह सवाल लंबे समय तक बना रहेगा। दस अप्रैल से शुरू होने वाली २०-२० क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग का कार्यक्रम अब खतरे पड़ चुका है। यहां यह गौरतलब है कि विश्व क्रिकेट आज भारतीय बाजार पर निर्भर है और भारतीय उपमहाद्वीप आज क्रिकेट का मुख्य केंद्र है। अगर इस केंद्र और बाजार को झटके लगते हैं तो अतंरराष्ट्रीय खेल के रूप में क्रिकेट के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो सकता है।

पाकिस्तान को अभी हाल तक क्रिकेट का ब्राजील कहा जाता था। इसलिए कि ब्राजील में जैसे फुटबॉल के कुदरती हुनर वाले खिलाड़ी पैदा होते हैं, वैसे ही क्रिकेटर पाकिस्तान पैदा करता था। बिना किसी स्थापित सिस्टम के उफनती प्रतिभा की बदौलत उभरे उन क्रिकेटरों ने न सिर्फ अपना और अपने देश का नाम रोशन किया, बल्कि दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया। लेकिन क्रिकेट की यह नर्सरी आज खतरे में है। अगर वहां दुनिया की टीमें नहीं आएंगी, क्रिकेट की स्पर्धाएं नहीं होंगी तो आखिर किन रोल मॉडल्स को सामने रख कर नई प्रतिभाएं उभरेंगी?

पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद की गहरी मार झेल रहा है। यह वो आतंकवाद है, जिसे पैदा करने में खुद पाकिस्तान के सत्ताधारी एक दौर में अमेरिका के सहभागी बने। अमेरिका का मकसद अफगानिस्तान से सोवियत फौज को हटाना था, तो पाकिस्तान उन्हीं मुजाहिदीन के जरिए भारत को हजार जख्म देकर खून बहाते हुए कश्मीर पर कब्जा करना चाहता था। अमेरिका का पहला मकसद तो पूरा हुआ, मगर अफगानिस्तान उन्ही नीतियों की वजह से जैसा नासूर बन गया, उसे वह आज भी भुगत रहा है। पाकिस्तान ने भारत का खून जरूर बहाया, लेकिन एक उदार और आधुनिक समाज के रूप में उसके उभरने की संभावना पर आज आतंकवाद का वह भस्मासुर हमले बोल रहा है। स्वात घाटी लेकर अब क्रिकेट तक की खूबसूरती को ये धर्मांध ताकतें नष्ट कर रही हैं।

जाहिर है, पाकिस्तान के आम लोगों के लिए यह जागने का वक्त है। पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना हुआ है, इस सच को अब वो सिर्फ अपनी कीमत पर ही झुठला सकते हैं। इसलिए कि दुनिया इस सच से वाकिफ है और इससे निपटने के लिए प्रभावित देश अपने ढंग से तैयारी कर रहे हैं। अगर पाकिस्तान में आज भी कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमला भारत ने कराया, तो पाकिस्तान के भविष्य के बारे में सोच कर उनसे सिर्फ सहानुभूति ही रखी जा सकती है।

बहरहाल, यह स्थिति भारत के नीति-निर्माताओं के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। उन्हें यह सोच कर खुश नहीं होना चाहिए कि आखिर उनकी बात सच साबित हुई। चुनौती आतंकवाद को परास्त करने की है। इसे भारत बनाम पाकिस्तान का रूप नहीं देना चाहिए। बल्कि पाकिस्तान के जिस किसी हिस्से में आतंकवाद से लड़ने की इच्छा नजर आए, उसे प्रोत्साहित करना और आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का सहयोगी बनाना ही इस समय सबसे सही नीति हो सकती है।

Saturday, February 21, 2009

स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा?


सत्येंद्र रंजन
तंक के खिलाफ अमेरिका की जंग मानवाधिकारों की कीमत पर लड़ी जा रही है, नागरिक अधिकार संगठन यह आरोप लंबे समय से लगाते रहे हैं। लेकिन अब इस बात की पुष्टि एक आधिकारिक रिपोर्ट से भी हो गई है। यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा बनाई गई जजों की समिति ने तैयार की है। समिति ने तीन साल तक ४० से ज्यादा देशों में विशेषज्ञों, सरकारी अधिकारियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार हनन के पीड़ित लोगों से बातचीत के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है।
रिपोर्ट में कहा गया है- ‘दुनिया के अग्रिम लोकतांत्रिक देशों में से एक अमेरिका ने आतंकवाद से लड़ने के लिए ऐसे तरीके अपनाए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानूनों के स्थापित सिद्धांतों से मेल नहीं खाते।’ १९९ पेज की इस रिपोर्ट में आठ न्यायविदों की समिति ने कहा है- ‘इसमें संदेह नहीं कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद का खतरा वास्तविक और भारी है और यह सरकारों का कर्त्तव्य है कि इस खतरे का मुकाबला करने के लिए वो प्रभावी कदम उठाएं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के सुस्थापित सिद्धांतों की अनदेखी कर दी जाए।’
रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए यातना, लोगों को गायब कर देने, गुप्त स्थान पर हिरासत में रखने में, निष्पक्ष सुनवाई न होने और सुरक्षा बलों द्वारा मा्नवाधिकारों के हनन को बर्दाश्त करने की घटनाएं बढ़ती गई हैं। रिपोर्ट ने इस खतरे के प्रति आगाह किया है कि जिन कदमों को आतंकवाद से लड़ने के क्रम में अपवाद और ‘अस्थायी’ बताया गया था, लोकतांत्रिक देशों में भी वो स्थायी होते जा रहे हैं।
आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अगर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं खुद गैर कानूनी कदम उठाने लगें और बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन करने लगें, तो समझा जा सकता है कि मानव सभ्यता के विकासक्रम को कितना बड़ा झटका लग रहा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस सवाल पर जागरूकता की बेहद कमी है। आतंकवाद का एक ऐसा हौव्वा खड़ा कर दिया गया है कि राजनीति से लेकर मीडिया तक के विमर्श में इसके खिलाफ लड़ाई के तरीकों पर कोई सवाल उठाना देशभक्ति के खिलाफ बता दिया जाता है। भारत में मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद जिस तरह आनन-फानन में राष्ट्रीय जांच एजेंसी और गैर कानूनी गतिविधि कानून में संशोधन विधेयक पास करा लिए गए, उससे बुनियादी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के औचित्य पर ही सवाल खड़ा हुआ। मगर मुख्यधारा राजनीति और मीडिया में किसी ने ये सवाल पूछने की जरूरत नहीं समझी।
मुंबई में आतंकवादी हमले से उमड़ी प्रतिक्रिया के आवेग के बीच भारत के प्रधान न्यायाधीश की चेतावनी की भी अनसुनी कर दी गई। न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन ने उस माहौल में भी इससे आगाह करना जरूरी समझा कि नागरिक अधिकारों को आतंकवाद विरोधी कानूनों की बलि न चढ़ाया जाए। अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा बनाई गई जजों की समिति की रिपोर्ट से दुनिया भर में जारी इस परिघटना की तरफ ध्यान खींचा गया है।
इस रिपोर्ट में दो बातें खास तौर पर गौरतलब हैं। पहली यह कि इस रिपोर्ट में ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ में अपनाई जा रही मौजूदा कसौटियों को ठुकरा देने की अपील की गई है और दूसरी यह कि इसमें बात पर जोर दिया गया है कि एक बेहतर आपराधिक न्याय प्रक्रिया से ही आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाए जा सकते है।
दरअसल, अब जरूरत इस रिपोर्ट के निष्कर्षों से भी आगे ले जाने की है। सवाल यह है कि क्या ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ का विचार सही है? यह शब्द ऐसी धारणा बनाता है कि जैसे आतंकवाद कोई एक इकाई हो, जिसका कोई एक मकसद हो और जो उस मकसद के लिए संगठित रूप से युद्ध लड़ रहा हो। जबकि वास्तव में बात ऐसी नहीं है। दुनिया में अलग-अलग तरह की चरमपंथी, उग्रवादी और आतंकवादी धाराएं हैं, जिनके पैदा होने की वजहें, मकसद और प्रेरणास्रोत अलग-अलग हैं। उन सबसे एक जैसे तरीकों से नहीं लड़ा जा सकता।
ध्यान देने की बात यह है कि हर तरह का गैर-सरकारी आतंकवाद इंसाफ न मिलने की भावना से ताकत प्राप्त करता है। यह इस भावना के गहराते जाने से पैदा होने वाली हताशा से उसे कार्यकर्ता मिलते हैं और इसी वजह से कुछ समुदायों का समर्थन हासिल होता है। बेशक, जैसाकि जजों की समिति ने कहा है, यह सरकारों का कर्त्तव्य है कि हिंसा और हमलों से अपने नागरिकों को बचाने का वो उपाय करें। लेकिन ये उपाय आतंकवाद की समस्या का हल नहीं हो सकते। टिकाऊ हल अन्याय की भावना को दूर करने से ही निकल सकता है, जबकि आतंकवाद विरोधी लड़ाई के लिए गैर कानूनी तरीके अपनाने से यह भावना और गहरी होती है।
लेकिन दुनिया भर में सरकारें कोई सबक लेती नजर नहीं आतीं। अमेरिका में बराक ओबामा के राष्ट्रपति से बनने से शुरुआत में जन्मी उम्मीद के कमजोर पड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगा है। ओबामा प्रशासन ने गुआंतानामो बे की गैर कानूनी जेल को बंद करने का फैसला तो किया, लेकिन उसके बाद वह गोपनीयता, यातना और आतंक से जंग की रुपरेखा पर बुश प्रशासन की नीतियों को अपनाते दिख रहा है। कंजरवेटिव अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल इस पर खुश होते हुए लिखा है- ‘ऐसा लगता है कि बुश प्रशासन की आतंक विरोधी रूपरेखा एक नई वैधता प्राप्त कर रही है।’ और इस पर अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के कार्यकारी निदेशक एंथनी डी रोमेरो का कहना है- ‘हाल की निराशाजनक घटनाओं से यह चिंता गहरी हो गई है कि ओबामा अंततः बुश प्रशासन की कुछ सबसे समस्याग्रस्त नीतियों को ही आगे बढ़़ाएंगे।’
जब दुनिया की विकसित चेतना के प्रतिनिधि जजों ने इंसान के बुनियाद हकों से जुड़ी एक बेहद गंभीर समस्या पर न सिर्फ रोशनी डाली है, बल्कि दुनिया को इसके खतरों से आगाह भी किया है, उस समय भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का उस पर ध्यान न देना मानव सभ्यता के सामने एक गंभीर चुनौती है। यह लोगों के यह कहने का समय है कि उनकी सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रताएं न छीनी जाएं। सरकारें खुद आतंकवादियों की तरह कानून और व्यवस्था की धज्जियां न उड़ाएं। यह हो सके इसके इसके लिए जरूरी यह है कि अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत की पहल से सामने आई सच्चाई आम जन तक पहुंचाई जाए।

Friday, February 20, 2009

भारत का पाकिस्तान विमर्श

सत्येंद्र रंजन
मुंबई पर २६ नवंबर को अचानक आतंकवादी हमले से सकते में रह जाने के बाद इस मामले में पाकिस्तान की जांच से भारत के लोग एक बार फिर अचंभित रह गए। पाकिस्तान सरकार सचमुच गंभीरता से जांच करेगी और हमले की साजिश की कुछ नई परतें उससे खुलेंगी, इसकी उम्मीद इस देश में बड़े से बड़े आशावादी को भी नहीं थी। पाकिस्तान ने इस मामले में जब भारत के डोज़ियर का जवाब दिया तो उस पर क्या प्रतिक्रिया जताई जाए, यह तय करना देर तक मुश्किल बना रहा।

फिर मीडिया और सिक्युरिटी एक्सपर्ट्स को समझ में आया कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तान के पास इसके अलावा कोई और चारा नहीं था। भारत सरकार ने पाकिस्तान की शुरुआती जांच को एक ‘सकारात्मक घटनाक्रम’ बताया, लेकिन इसके साथ ही विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में यह भी दोहरा दिया कि जब तक पाकिस्तान इस जांच को तार्किक नतीजे तक नहीं पहुंचाता और पाकिस्तान में आतंकवाद का ढांचा नष्ट नहीं होता, भारत चुप नहीं बैठेगा।

भारत में पाकिस्तान को लेकर होने वाले विमर्श को समझने के लिहाज से ये प्रतिक्रियाएं बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। मीडिया के ज्यादातर हिस्से में अब खबर की प्रस्तुति नाटक का रूप ले चुकी है। सनसनी इसका एक अहम पहलू है। इसके कथानक में नायक और खलनायक का होना अनिवार्य होता है। खलनायक जितना दैत्याकार हो, खबर उतनी सनसनीखेज़ हो सकती है। ऐतिहासिक कारणों से पाकिस्तान एक ऐसे खलनायक के स्वाभाविक किरदार के रूप में उपलब्ध होता है।

इसलिए मीडिया के विमर्श में पाकिस्तान का खौफ़नाक चेहरा उभारना और फिर उस पर बरसना खबर के नाम पर जारी ड्रामा या अब मेलोड्रामा का सहज हिस्सा बन गया है। सरकार भी इस नाटक के दर्शक और पाठक वर्ग की उपेक्षा नहीं कर सकती। तो उसे भी उनकी तुष्टि के लिए कुछ शब्द ज़रूर बोलने पड़ते हैं। और इस वक्त जब देश आम चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, राजनीतिक दलों के लिए पाकिस्तान एक बड़ा मुद्दा है। सत्ताधारी कांग्रेस आसानी से इस मुद्दे पर देशभक्ति का ज्वार उभार कर वोट पाने के लालच से नहीं बच सकती।

लेकिन इस विमर्श का नुकसान यह है कि देश की जनता एक बेहद पेचीदा हालत के बारे में जानने और उसके विभिन्न पहलुओं को समझने से वंचित हो गई है। पाकिस्तान की स्थितियां जटिल हैं। कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अपने वजूद के संकट से जूझ रहा है। उसका इतिहास और उसकी बुनियाद से जुड़े सवाल बेहद विकराल रूप में उसके सामने खड़े हैं। वह जिस इस्लाम के नाम पर बना, उसकी चरमपंथी धारा उसकी राज्य-व्यवस्था को चुनौती दे रही है। जिस अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहारे उसकी राज्य-व्यवस्था चलती रही, उससे अब देश के आम जन मानस का गहरा अंतर्विरोध खड़ा हो गया है। देश की असली सत्ता किसके हाथ में है, यह समझ पाना मुश्किल है।

यह परिस्थिति विस्फोटक रूप भी ले सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देश इसके खतरे से कहीं बेहतर वाकिफ नजर आते हैं। लेकिन हालात को संभावने के सूत्र उनके हाथ में भी नहीं हैं। एक बड़ी आबादी वाला देश, जिसके पास परमाणु हथियार हों, लेकिन जिसकी सत्ता का ढांचा बिखरता हुआ दिखे और जहां धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद तेजी से पांव फैला रहा हो, इसके परिणामों के बारे में सोचना भी डरावना है। मगर हर जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय ताकत को आज इसके बारे में सोचना पड़ रहा है।
अगर ऐसी सोच का कहीं अभाव दिखता है तो वह भारत ही है। हमारे विमर्श में पूरा पाकिस्तान एक इकाई है। और सारा पाकिस्तान भारत का दुश्मन है। लेकिन इस विमर्श में यह कोई नहीं बताता कि आखिर इस दुश्मन से कैसे निपटा जा सकता है? मीडिया और सियासतदां की जुबानी जंग को क्या असली जंग में बदला जा सकता है? क्या भारत सचमुच पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की अनदेखी कर पाकिस्तान से युद्ध का जोखिम मोल ले सकता है? या भारत के पास इस जटिल स्थिति से निकलने का कोई और भी विकल्प है?

अगर हम पिछले दो दशकों के विकासक्रम को समझने और मीडिया के मार्केट नैरेटिव (दर्शक या पाठक बढ़ाने की बाजार रणनीति) से निकल कर आगे देखने की क्षमता रखते हों, तो दूसरे विकल्प जरूर नजर आ सकते हैं। पाकिस्तान की बुनियाद और पहचान भले भारत विरोध के आधार पर खड़ी हुई हो, लेकिन पाकिस्तान की आज पीढ़ी ऐसी एकरूप सोच से नहीं चलती है। वहां चलने वाली बहस देश के भीतर देश के बुनियादी मुद्दों पर तेज होते अंतर्विरोधों की झलक देते हैं। जरूरत इस बारीकी को समझने की है। लेकिन भारत में इस समझ का साफ अभाव नजर आता है।

सवाल यह है कि आखिर हम चाहते हैं क्या हैं? हमारा लक्ष्य पाकिस्तान को नष्ट करना या उसकी परेशानियों पर खुश होना है, या हम शांति और प्रगति की ऐसी परिस्थितियां बनाना चाहते हैं, जिसमें पूरा दक्षिण एशिया और प्रकारातंर में पूरी दुनिया मानव विकास एवं स्वतंत्रता के उच्चतर स्तर हासिल कर सके? अगर हमारा लक्ष्य दूसरा है तो हमें पाकिस्तान के हालात को बारीकी से समझना चाहिए। वहां कट्टरपंथ और सिविल सोसायटी के बीच के अंतर्विरोधों को समझना चाहिए। वहां के सत्ता ढांचे के अंतर्विरोधों पर गौर करना चाहिए। और इनके बीच हमें ऐसी नीतियां अपनानी चाहिए, जिससे वहां प्रगति और स्थिरता की ताकतों को बल मिले।

अगर पाकिस्तान ने मुंबई हमले की शुरुआती जांच गंभीरता से की तो इसके पीछे मंसूबे तलाशने के बजाय उसे खुले दिल से हमें स्वीकार करना चाहिए। अगर इससे पाकिस्तन सरकार के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर सहयोग का कोई रास्ता निकलता है, तो उस पर चलने से भारत सरकार को नहीं हिचकना चाहिए। कट्टरपंथ और आतंकवाद दो ऐसे खतरे हैं, जिनके खिलाफ एकजुटता की आज बेहद जरूरत है। लेकिन यह एकजुटता दोमुंहेपन के साथ नहीं बन सकती। स्वात घाटी के तालिबान और भारत की राम, बजरंग और शिवसेनाओं के प्रति रुख में फर्क के साथ ये लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अगर आज देश पर तालिबान के कब्जे का अंदेशा जताते हैं, तो हमें इस खतरे से भी आगाह रहना चाहिए कि कभी भारत में भी संघ परिवार के कब्जे का खतरा पैदा हो सकता है।

दरअसल, आतंकवाद से संघर्ष में जितनी भूमिका सुरक्षा और खुफिया तंत्र की है, उससे कहीं ज्यादा विचारों और राजनीतिक नीतियों की है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि राजनीतिक दलों को इस लड़ाई में जैसा नेतृत्व देना चाहिए, वो नहीं दे रहे हैं। बल्कि उन्होंने आतंकवाद पर सारे विमर्श को संकीर्ण दायरे में समेट दिया है। यही भूमिका मीडिया भी निभा रहा है। पाकिस्तान को दैत्य के रूप में पेश करना और उसमें अंतर्निहित सांप्रदायिक मनोभावों का शोषण कर फायदा उठाना एक आसान रास्ता बना हुआ है। लेकिन यह रास्ता हमें अपने लक्ष्यों की तरफ नहीं ले जाता है। इसीलिए भारत को आज अपने पाकिस्तान विमर्श पर अनिवार्य रूप से पुनर्विचार करना चाहिए।

Saturday, February 7, 2009

कांग्रेस का आत्म-ध्वंस


सत्येंद्र रंजन
कांग्रेस का फैसला है कि वह अगले आम चुनाव में यूपीए गठबंधन के रूप में मैदान नहीं उतरेगी, बल्कि राज्यों के स्तर पर सिर्फ चुनावी समझौते करेगी। पार्टी दूसरा संकेत यह दे रही है कि वह फिर से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करेगी। ये दोनों फैसले सिर्फ इस बात की ही मिसाल हैं कि कांग्रेस के नेता जिस जनादेश के आधार पर पिछले पांच साल से केंद्र में सत्ता का सुख भोग रहे हैं, उसे समझने में वे नाकाम हैं। या यह कहा जा सकता है कि अहंकार उन्हें उस जनादेश का मतलब और देश के राजनीतिक यथार्थ को समझने नहीं दे रहा है। २००४ में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी एजेंडे के खिलाफ आम लोगों के आक्रोश से तैयार हुआ था। तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एनडीए के खिलाफ एक ऐसा गठबंधन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी, जो जनता के उस आक्रोश का वाहक बना।

भाजपा फिर उसी सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी एजेंडे के साथ चुनाव में उतरने को तैयार है। देश का व्यापक जनमत आज भी उस खतरे को समझता है और इसी वजह से मध्यमार्गी-धर्मनिरपेक्ष विकल्प के लिए स्थितियां काफी हद तक अनुकूल नज़र आती हैं। लेकिन कांग्रेस नेता इस तकाज़े को समझने में बिल्कुल अक्षम नजर आते हैं। उन्हें यह साधारण सी बात समझ में नहीं आती कि आज की परिस्थिति में ऐसा विकल्प कांग्रेसे अकेले नहीं बन सकती। वह महज उन दलों और ताकतों का नेतृत्व कर सकती है. जो आपस में मिलकर ऐसा विकल्प तैयार करते हैं।

शायद कांग्रेस नेताओं ने नवंबर के विधानसभा चुनावों के नतीजे का गलत निष्कर्ष निकाला है। यह ठीक है कि दिल्ली में कांग्रेस को आश्चर्चजनक जीत मिली और भाजपा का आतंकवाद का मुद्दा सिरे से नाकाम रहा, लेकिन यह किसी भी रूप में कांग्रेस के पक्ष में देश में चल रही किसी लहर का संकेत नहीं है। आखिर भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एंटी इन्कंबेंसी के पहलू को बेअसर करने में सफल रही और राजस्थान में भी कांग्रेस तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। इसलिए इन चुनाव नतीजों पर आह्लादित होने के बजाय कांग्रेस नेताओं के लिए इन्हें एक चुनौती के रूप में लेना ज्यादा उचित होता। जाहिर है, ऐसे में गठबंधन के महत्त्व के समझने औऱ मौजूदा गठबंधन के दलों के बीच पूरे तालमेल की जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी कांग्रेस नेतृत्व को अपने कंधे पर लेनी चाहिए थी। लेकिन वे उलटे रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं।

देश के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमे में २००४ में उभरी आम सहमति को कांग्रेस अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर पहले ही तोड़ चुकी है। उसने इस मुद्दे पर वामपंथी दलों से नाता तोड़ लिया, जो आम सहमति का खास हिस्सा थे। बल्कि इस आम सहमति को विश्वसनीय और उद्देश्यपूर्ण बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका वामपंथी दलों की ही थी। अब मनमोहन सिंह को फिर से अपना नेता बता कर कांग्रेस वामपंथी दलों से अपनी दूरी और बढ़ाने पर आमादा नजर आ रही है।

मनमोहन सिंह ने जिस तरह अमेरिका से परमाणु करार को अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया और उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए जिस रास्ते पर चले, उसके बाद देश के प्रगतिशाली समूहों में उनके लिए कोई सम्मान नहीं बचा है। खासकर सरकार के लिए बहुमत जुटाने के लिेए जिस तरह के तिकड़मों का सहारा लिया गया और राजनीतिक भ्रष्टाचार का जैसा खुला खेल हुआ, उसके बाद उनकी अपनी निजी छवि भी पहले जैसी नहीं बची। आज यह शायद ही कोई मानता हो कि मनमोहन सिंह एक टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्री हैं, जो आम नेताओं के कल्चर से ऊपर हैं और जिनकी अपनी छवि बेदाग है। यह मुमकिन है कि इसके बावजूद डॉ. सिंह पूंजीपतियों के प्रिय हों और देश के उच्च मध्यम और मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा उन्हें बाकी नेताओं से बेहतर मानता हो, लेकिन हकीकत यही है कि इस देश की राजनीतिक तस्वीर ये तबके तय नहीं करते। वैसे भी ये तबके कांग्रेस से ज्यादा भाजपा का समर्थन आधार हैं।

अपने सहयोगी दलों, और व्यापक रूप से अपने समर्थन आधार का निरादर कर कांग्रेस ने देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा दी है। उसके इस नजरिए से यूपीए के कई घटक दल चुनाव बाद के अपने विकल्पों पर अभी से सोचने लगे हैं। उधर वामपंथी दलों के पास कांग्रेस और भाजपा से अलग तीसरे विकल्प की संभावना तलाशने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है। दुर्भाग्य यह है कि इस तीसरे विकल्प के साथ भी ऐसे दल हैं, जिनकी अपनी निष्ठा संदिग्ध है। मायावती हों या जयललिता या फिर एचडी देवेगौड़ा अथवा चंद्रबाबू नायडू, ये सभी अतीत में भाजपा के सहयोगी रह चुके हैं। भविष्य में ये फिर उसी तरह का सहयोग भाजपा से नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जाहिर है, इसके साथ एक फौरी ताकत तो बनाई जा सकती है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशील नीतियों के आधार पर कोई भरोसेमंद विकल्प तैयार नहीं किया जा सकता।
ऐसे में अपना बहुमत न मिलने के बावजूद चुनाव के बाद भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बन जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। या फिर संयुक्त मोर्चा जैसे अस्थिर प्रयोगों की गुंजाइश भी निकल सकती है। लेकिन ऐसे प्रयोग का हश्र देश पहले भी देख चुका है, और उसका दोहराव देश के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील समूहों में सिर्फ असहाय होने का भाव ही पैदा करेगी।

यूपीए ने कोई ऐसा शासन नहीं दिया जिसकी सकारात्मक कसौटियों पर तारीफ की जाए। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, सूचना का अधिकार कानून और आदिवासी एवं अन्य वनवासी भू-अधिकार कानून जैसी कुछ पहल का श्रेय इसे है, लेकिन यह कितनी अनिच्छा से हुआ और अमल में कैसी ढिलाई बरती गई, वह भी देश के सामने है। अपनी अभिजात्यवादी आर्थिक और विदेश नीतियों से यूपीए सरकार ने देश के बहुत से तबकों को नाराज किया। और आखिरकार मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए तमाम अनैतिक तरीकों का सहारा लेते हुए पिछले जुलाई सत्ताधारी गठबंधन ने बचा-खुचा ऐतबार भी खो दिया।

इसके बाद इसके पास एक ही थाती बची, और वह इसके सहयोगी दल हैं। लेकिन अपनी नासमझी और अहंकार में वह इन्हें भी गंवाने को तैयार है। ठीक उसी तरह जैसे एक जड़विहीन प्रधानमंत्री की जिद को पूरा करने के लिए उसने वामपंथी दलों के सिद्धांतनिष्ठ समर्थन को गंवा दिया। निष्कर्ष यही है कि सोनिया गांधी ने २००४ की अपनी भूमिका से अपनी जो आदरणीय छवि बनाई थी, पिछले कुछ महीनों से खुद ही वो लगातार उसका ध्वंस कर रही हैं। और इससे उन्हीं ताकतों के लिए बेहतर स्थितियां बन रही हैं, जिनके खिलाफ पहल कर उन्होंने अपने और अपनी पार्टी के लिए नई प्रासंगिकता और राजनीतिक वैधता हासिल की थी।

Tuesday, January 27, 2009

स्लमडॉग्स और संकीर्ण सोच


सत्येंद्र रंजन
स्लमडॉग मिलिनेयर (या करोड़पति) तकनीक और सिनेमाई भाषा की अपनी खूबियों की वजह से दुनिया भर में तारीफ बटोर रही है। संभवतः ऑस्कर का सर्वोच्च सम्मान भी इसकी झोली में आ जाए। चूंकि फिल्म भारत की पृष्ठभूमि पर है, जिस उपन्यास पर यह आधारित है उसे एक भारतीय ने लिखा है, फिल्म के कलाकार भारतीय हैं और निर्माण से जुड़ी टीम में भी भारतीयों का बड़ा हिस्सा है, इसलिए मोटे तौर पर इस फिल्म को भारत की कामयाबी के रूप में देखा जा रहा है। खासकर इस फिल्म से संगीतकार एआर रहमान की दुनिया में जैसी पहचान बनी है, उस पर भारत में फख्र है, जो स्वाभाविक एवं उचित ही है।

लेकिन हकीकत यह है कि यह फिल्म दुनिया के सामने भारत की जैसी तस्वीर पेश करती है, उस पर फख्र करने लायक कुछ भी नहीं है। देश के उच्च एवं मध्य वर्ग, और उनको ध्यान में रख कर चलने वाला कॉरपोरेट मीडिया अक्सर इस हकीकत नजरअंदाज करते हैं। यहां यह गौरतलब है कि भारत में सिनेमा, खासकर गंभीर सिनेमा के दर्शक ज्यादातर उच्च और उच्च-मध्यम वर्गों से ही आते हैं। मल्टीप्लेक्स कल्चर आने के बाद तो यह बात और भी तय-सी हो गई है। अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी के अध्ययन की रोशनी में देखें तो ये तबके देश की आबादी के १० से १५ फ़ीसदी से ज्यादा नहीं हैं। यही देश के अप-मार्केट तबके हैं, और अगर राजनीतिक संदर्भ में कहें तो ‘इंडिया शाइनिंग’ (अथवा भारत उदय) की बनाई गई धारणा का समर्थन आधार हैं।

स्लमडॉग मिलिनेयर इस धारणा के सामने कोई सवाल खड़े नहीं करती। लेकिन वह एक हकीकत जरूर दिखाती है, जिससे यह धारणा स्वतः खंडित होती है। यह दुनिया के सामने ऐसी तस्वीर पेश करती है, जो बताती है कि भारत में सबकी जिंदगी चमक नहीं रही है और सबके उदय का रास्ता एक्सप्रेस वे से होकर नहीं गुजर रहा है। इस तस्वीर का चित्रण इतना शक्तिशाली है कि वह दर्शक के मन में अशांति जरूर पैदा करता है। हालांकि फिल्म की कहानी का क्लाइमैक्स मुख्य किरदार की ‘तकदीर’ से तय होता है। करोड़़पति बनने के गेम शो में जोखिम उठाकर बोला गया उसका दांव कामयाब रहता है और वो दो करोड़ रुपए जीत लेता है। इसके साथ ही उसका बचपन का प्यार भी उसे मिल जाता है और ‘जय हो...’ की धुन पर उनके नाच के साथ ड्रामा का सुखांत हो जाता है।

मगर दुर्भाग्य से सबकी तकदीर जमाल मलिक (मुख्य किरदार) जैसी नहीं होती। अगर फिल्म इस बात को याद दिलाते हुए खत्म होती तो वह यथार्थ से ज्यादा करीबी रिश्ता बनाए रख सकती थी। बहरहाल, यह बहस का मुद्दा नहीं है। विचार-विमर्श का मुद्दा वह पृष्ठभूमि है, जहां जमाल मलिक जैसी करोड़ों ज़िंदगियों के लिए आज भी कोई बेहतर संभावना नहीं है। करीब साठ साल पहले राज कपूर ने अपनी फिल्म आवारा में इन संभावनाविहीन जिंदगियों की तस्वीर दिखाई थी औऱ स्लमडॉग मिलिनेयर इस बात की तस्दीक करती है कि इतनी लंबी अवधि में भी वहां के हालात में कोई बदलाव नहीं हुआ है। आवारा ने अपराध के समाजशास्त्र का चित्रण किया था। उसके मुख्य पात्र ने बताया था कि कोई शख्स अपराध के कीड़े अपने भीतर लेकर पैदा नहीं होता, बल्कि जिन ‘गंदे नालों’ के पास उन्हें रहने को मजबूर कर दिया जाता है, वहां से उनके भीतर ये कीड़े प्रवेश करते हैं।

आतंकवाद के इस दौर में अपराध पर ऐसी चर्चा सिरे से गायब नज़र आती है। जब तक वो ‘गंदे नाले’ हैं, समाज सुरक्षित नहीं हो सकता, इस साधारण सी बात पर मीडिया से लेकर सियासत तक में आज चुप्पी है। आतंकवाद, अंडरवर्ल्ड और आम अपराध के रिश्तों पर तो खूब जोर दिया जाता है, लेकिन इनकी जड़ों को समझने में उतनी ही उदासीनता दिखाई जाती है। नतीजा इस चर्चा का लगातार संकीर्ण दायरे में सिमटते जाना है। इसका व्यावहारिक परिणाम है- सुरक्षा बलों पर संपूर्ण निर्भरता और युद्ध जैसी मानसिकता का प्रसार।

अगर इस सोच की तह में जाने की कोशिश करें तो ऐसा आभास होगा जैसे समाज में कुछ ‘अच्छे‘ लोग हैं जो आराम से अपनी जिंदगी गुजारना चाहते हैं, लेकिन उन पर ‘बुरे लोग‘ आक्रमण कर रहे हैं। ये ‘बुरे लोग‘ अपराधी, आतंकवादी, नक्सलवादी या और कुछ भी हो सकते हैं। इन पर काबू पाने का अकेला तरीका यही है कि इन्हें कुचल दिया जाए। इसलिए कानून को लगातार कड़ा किए जाने और सुरक्षा तैयारियों में लगातार ज्यादा ताकत झोंकने की जरूरत है। इस सोच के आर्थिक एवं सामाजिक आधारों की स्पष्ट पहचान की जा सकती है। जाहिर है, राजनीतिक स्तर पर बनने वाली ऐसी नीतियों के निहितार्थों को भी समझा जा सकता है। इसलिए इसमें कोई अचरज नहीं कि ऐसी नीतियों पर लगातार अमल के बावजूद समाज सुरक्षित नहीं बन पा रहा है।

स्लमडॉग मिलिनेयर बतौर फिल्म कोई संदेश नहीं देती है। आखिर में अगर वह कुछ कहती भी है तो वह भाग्यवाद है। लेकिन उसकी पृष्ठभूमि एक संवेदना पैदा करती है। यह संवेदना अपने देश का सच है। लेकिन चाहे सरकार हो, शासक समूह या उनसे संचालित मीडिया- वो अक्सर न सिर्फ इस सच से आंख चुराने की कोशिश करते हैं, बल्कि इस पर परदा डालने का प्रयास भी किया जाता है। अगर कभी संवेदना जगती भी हो तो करो़ड़ों लोगों की बदहाली को तकदीर का खेल मानकर आगे बढ़ जाया जाता है। इस जगह पर इस फिल्म और ऐसी आम सोच में एक मेल देखा जा सकता है। क्या इस फिल्म पर देश के प्रभुत्वशाली समूहों में गर्व की एक वजह यह भी है?

कुछ जानकारों ने कहा है कि आज का भारत एक आत्मविश्वास से भरा देश है। इसे अपनी कमियों और सामाजिक विद्रुपताओं को स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं है। यह १९६०-७० के दशक का भारत नहीं है, जब यथार्थ दिखाने वाली रचनाओं पर हाय-तौबा मचाई जाती थी और उसे देश की छवि बिगाड़ने का प्रयास समझा जाता था। बल्कि यह उभरता भारत है जिसकी छवि तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था और इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी की ताकत की है और इसलिए वह दुनिया के सामने अपनी विद्रुपताओं के साथ भी खड़ा हो सकता है।

इस बात में दम है। दरअसल, अगर भारतीय पृष्ठभूमि पर बनी फिल्म दुनिया के स्तर पर धूम मचा रही है तो इसके पीछे एक कारण भारत की नई छवि भी है। लेकिन भारत के करोडों लोगों के लिए मुद्दा विद्रुपताओं को महज स्वीकार करना नहीं, बल्कि उनसे मुक्ति पाना है। उनके लिए सबसे अहम सवाल है कि क्या यह मौजूदा व्यवस्था में मुमकिन है? यह व्यवस्था अपनी सोच को व्यापक सामाजिक आयाम दे तो वह इसका जवाब हां में दे सकती है। अगर यह संभव हो तो समाज को ज्यादा से ज्यादा सुरक्षित बनाना भी संभव हो सकता है। वरना, यह विद्रूपता देश के चमकते हिस्से पर अक्सर ग्रहण लगाती रहेगी। इसलिए कि देश के करोड़ों ‘स्लमडॉग्स’ की ‘तकदीर’ जमाल मलिक जैसी नहीं है!