Saturday, April 5, 2008

कितना कारगर है ये नुस्खा?


सत्येंद्र रंजन
हले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और फिर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महाअधिवेशन से वामपंथी राजनीति और रणनीति के मुद्दे बेहतर ढंग से उभर कर सामने आए हैं। जाहिर है, बड़ी और ज्यादा जवाबदेह पार्टी होने के नाते माकपा ने इन मुद्दों पर अपनी समझ को ज्यादा ठोस ढंग से व्यक्त किया। तीन साल पर होने वाले इन सम्मेलनों में दोनों पार्टियों ने अपनी सांगठनिक स्थिति, अपने सामने मौजूद चुनौतियों और अपने भावी लक्ष्यों पर भी विचार-विमर्श किया, लेकिन एक आम नागरिक की ज्यादा दिलचस्पी उन मुद्दों में है, जिनका देश की राजनीति पर आने वाले समय में असर हो सकता है। इस लिहाज से दोनों पार्टियों की मोटे तौर पर तीन कार्यनीति और रणनीतियों पर हम गौर कर सकते हैं।

माकपा ने अपनी उन्नीसवीं पार्टी कांग्रेस की समाप्ति के साथ यह साफ किया कि आज के राजनीतिक संदर्भ में उसके तीन खास मकसद हैं- नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध, भारत को अमेरिकी सामरिक परियोजना में जूनियर पार्टनर बनने से रोकना और भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता में दोबारा न आने देना। पार्टी ने अपनी ज्यादातर कार्यनीति और रणनीतियां इन्हीं तीन मकसदों से बनाई औऱ उनका एलान किया है। इनमें पहले दो मकसद दीर्घकालिक हैं, और उनके लिए लंबे संघर्ष की जरूरत है। जबकि तीसरा मकसद फौरी है और पार्टी की इस कार्यनीति का इम्तिहान एक साल के अंदर ही होने वाला है।
नव-उदारवाद दुनिया भर में जारी एक परिघटना है, जिसकी वैचारिक और राजनीति जमीन पिछली आधी सदी से ज्यादा समय में बहुराष्ट्रीय पूंजी की सक्रिय कोशशों से तैयार हुई है। करीब दो दशक पहले सोवियत खेमे के दुनिया के नक्शे से गायब हो जाने से इस परिघटना के रास्ते में मौजूद सबसे बड़ी रुकावट खत्म हो गई औऱ उसके बाद से यह तेजी से आगे बढ़ी है। भारत के भीतर धनी और खासकर कॉरपोरेट हितों से जुड़े समूहों और शक्तियों ने इस आर्थिक-राजनीतिक विचार और इससे जुड़ी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने में पूरी ताकत झोंक रखी है। नतीजा यह हुआ है कि दक्षिणपंथ से लेकर मध्यमार्गी राजनीतिक दलों में इन नीतियों पर आज आम सहमति नजर आती है।

दरअसल, अमेरिकी साम्राज्यवाद के पक्ष में भारतीय विदेश नीति का झुकना नव-उदारवादी राजनीतिक परिघटना का ही एक परिणाम है। यह स्वाभाविक ही है कि जो राजनीतिक ताकतें देश के अंदर गरीब औऱ कमजोर तबकों को बेलगाम पूंजीवाद की मर्जी पर छोड़ने की दलील स्वीकार कर लें, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को उस शक्ति के साथ जोड़ें, जो इस दलील को दुनिया भर में थोपने की कोशिश कर रही है। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार विदेश नीति के मामले में उसी रास्ते पर चलने को उतावली नजर आई है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार चली थी। यह दरअसल, देश के धनी और प्रभुत्वशाली तबकों का दुनिया के ऐसे ही समूहों के साथ अपने हित और अपनी आकांक्षाएं जोड़ने की परिघटना है, जिसे इस देश के जनतांत्रिक और प्रगतिशील समूहों को जरूर समझना चाहिए। इसीलिए नव-उदारवाद का विरोध और स्वतंत्र विदेश नीति के लिए संघर्ष इस वक्त दो बेहद अहम राजनीतिक मुद्दे हैं और असल में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

माकपा एवं भाकपा ने इन दोनों परिघटनाओं को चर्चा में लाकर एक तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाई है। इसके बावजूद यह जरूर कहा जा सकता है कि इन सवालों पर लंबे संघर्ष का कोई खाका इन दोनों पार्टियों ने पेश नहीं किया है। बल्कि इसके लिए जिस तीसरे विकल्प की कार्यनीति माकपा ने पेश की है, वह समस्याओं से भरी हुई है। तीन साल पहले खुद माकपा ने कहा था कि सिर्फ चुनावी गठबंधन या चुनाव बाद के समीकरणों के लिए तीसरा मोर्चा बनाने के हक में वह नहीं है। वह ऐसे तीसरे विकल्प के पक्ष में है, जो नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमति और साथ-साथ संघर्ष से उभरे। ऐसे तीसरे विकल्प के संकेत आज भी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर कहीं नजर नहीं आते। लेकिन अब माकपा और भाकपा ने समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी और उनके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के साथ अपना मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसमें दिक्कत यह है कि ये दल नीति, आकांक्षा और अपने वर्ग-चरित्र में कहीं से नव-उदारवाद या साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े नजर नहीं आते हैं।
१९८० के दशक में जब मध्य जातियों में आधार रखने वाले और क्षेत्रीय दलों का उभार शुरू हुआ, तब यह उम्मीद जरूर की गई थी कि ये पार्टियां सामाजिक जनतंत्र को आगे बढ़ाने का जरिया बनेंगी। एक हद तक ये भूमिका इन दलों ने तब निभाई। लेकिन जल्द ही ये दिशाहीन हो गए। ये महज अपने नेताओं की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा का माध्यम बन कर रह गए। १९९० के दशक में इनमें से ज्यादातर दल राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी जैसी सांप्रदायिक फासीवादी पार्टी के सहयोगी बन गए। उस अनुभव से इन दलों ने कोई सबक सीखा है, ऐसा कोई संकेत नहीं है। ऐसे में इन दलों के साथ किसी तीसरे विकल्प के उभरने की उम्मीद बेबुनियाद है। ये दल फौरी राजनीतिक फायदे के लिए चंद नव उदारवादी आर्थिक नीतियों या भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु करार जैसे विदेश नीति से जुड़े मुद्दों का विरोध कर सकते हैं, लेकिन उनका यह विरोध सैद्धांतिक या किसी राजनीतिक कार्यक्रम पर आधारित है, यह नहीं कहा जा सकता।

इसके बावजूद माकपा ने अगर इन दलों के साथ मेलजोल बढ़ाने और इनको साथ लेकर दो अहम मुद्दों पर लड़ाई को आगे बढ़ाने की बात की है, जाहिर है, इसे कोई रणनीति मानने के बजाय एक फौरी कार्यनीति ही कहा जा सकता है। यह मुमकिन है कि वामपंथी दलों की जितनी ताकत है, उसके बीच उन्हें इन अहम सवालों पर संघर्ष को आगे बढ़ाने का कोई और तरीका समझ में न आता हो। खासकर उस समय जब जन संघर्षों से जुड़ी ताकतों में आपसी होड़, ईर्ष्या भाव और एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने का भाव इतना गहरा है कि उनके बीच एकता की कोई सूरत फिलहाल नजर नहीं आती। आज देश में भले जन संघर्ष मजबूत हो रहे हों, और समान मकसद वाले संगठनों का दायरा फैल रहा हो, लेकिन उनके बीच संवाद और सहयोग की गुंजाइश बेहद कम बनी हुई है। बल्कि इन ताकतों पर एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति इतनी हावी है कि व्यापक वामपंथी, जनतांत्रिक और प्रगतिशील एकता एक सपना ही बना हुआ है। इस संदर्भ में फिर से भाकपा महासचिव चुने जाने के बाद एबी बर्धन का माओवादियों से संवाद बनाने की इच्छा जताना भले प्रशंसा के काबिल हो, लेकिन ऐसा हो सकने की कोई ठोस स्थिति फिलहाल मौजूद नहीं है। खासकर हाल के नंदीग्राम मसले के अनुभव के बाद तो ऐसी उम्मीदें औऱ दूर हो गई हैं।

वैसे भी संसदीय लोकतंत्र में उन ताकतों की अहमियत कभी कम नहीं आंकी जा सकती जो विधायिका में एक मजबूत मौजूदगी बनाने की हैसियत रखते हैं। इसलिए कथित तीसरे मोर्चे के दलों के साथ नजदीकी बढ़ाने के माकपा के फैसले का भले कोई सैद्धांतिक आधार नहीं हो, लेकिन इसे बिल्कुल अनुपयोगी नहीं कहा जा सकता। दरअसल, इसकी उपयोगिता का खुलासा करते हुए माकपा महासचिव प्रकाश करात ने यह कहा कि भाजपा की रणनीति क्षेत्रीय औऱ छोटे दलों को साथ लेकर अगले चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता में लौटने की है। करात ने कहा कि माकपा ऐसा नहीं होने देगी औऱ इसलिए उसने भाजपा के संभावित सहयोगी दलों से संवाद और सहयोग की प्रक्रिया पहले से शुरू कर दी है। बहरहाल, अगर बात इरादे और प्रयास की हो, तो माकपा की यह कोशिश जरूर फायदेमंद मानी जा सकती है। लेकिन इसमें भी मुश्किल यही है कि तीसरे मोर्चे के नाम पर जिन दलों को इकट्ठा करने की कोशिश हो रही है, वे सत्ता का लालच सामने होने पर भी एक अलग राजनीतिक समूह के रूप में बने रहेंगे, इस पर संदेह करने की पर्याप्त वजहें हैं। १९९८ से २००४ के मध्य तक अब यूएनपीए नाम से इकट्ठा होने वाले दलों ने भाजपा के साथ जिस तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग किया, वह अनुभव इस संदेह का सबसे बड़ा आधार है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी के सांप्रदायिक फासीवाद को आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में चिह्नित करना एक सही राजनीतिक समझ है। वामपंथी पार्टियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इस समझ को न सिर्फ सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है, बल्कि इसके मुताबिक भाजपा को रोकने की रणनीति पर अपनी ताकत और प्रभाव के मुताबिक अमल भी किया है। २००४ में कांग्रेस नेतृत्व वाले मोर्चे को समर्थन उनका एक अहम राजनीतिक फैसला था, जिससे देश को एक स्थिर धर्मनिरपेक्ष सरकार मिल सकी। यह सरकार अगर आम जनता के हित को सर्वोपरि मानकर चलती और मध्यमार्ग से वामपंथ तक के सहयोग को मजबूत करने की नीतियों पर अमल करती तो धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र आज ज्यादा सुरक्षित एवं मजबूत नजर आता। लेकिन नव-उदारवादी नीतियों के वर्चस्व की वजह से यूपीए ने यह मौका काफी हद तक गंवा दिया, जिसकी कीमत उसे अपनी सरकार की अलोकप्रियता के रूप में चुकानी पड़ रही है। ऐसे में वामपंथी दलों का नई संभावनाओं की तलाश करने की मजबूरी और व्यग्रता दोनों समझती जा सकती है। इसके बावजद हकीकत यही है कि ऐसी संभावनाएं बेहद सीमित हैं औऱ देश में आज भी कांग्रेस को छोड़कर किसी धर्मनिरपेक्ष विकल्प की गुंजाइश नहीं है। बल्कि यह बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि अगले आम चुनाव के बाद केंद्र में या तो यूपीए जैसा प्रयोग ही दोहराया जाएगा या फिर भारतीय जनता पार्टी की अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता में वापसी होगी। १९९६ की तरह संयुक्त मोर्चा जैसे प्रयोग की उम्मीद आज लगभग न के बराबर है। इसलिए कि संयुक्त मोर्चा के घटक रहे ज्यादातर दल कांग्रेस या भाजपा की धुरी पर आज गोलबंद हो चुके हैं। और यह भी गौरतलब है कि १९९६ का प्रयोग भी कांग्रेस के बाहर से समर्थन से ही मुमकिन हो सका था।

ऐसे में ज्यादा व्यावहारिक नीति शायद यह लगती है कि वाम मोर्चा अपनी ताकत बरकरार रखे और अपने वैचारिक एवं रणनीति प्रभाव क्षेत्र में समाजवादी पार्टी या यूपीए में शामिल डीएमके और कुछ दूसरे दलों को लाने की कोशिश करे। अगर इन दलों की संसद में ठोस उपस्थिति रहती है, तो नव-उदारवादी नीतियों में यकीन करने वाली पार्टियों को लेकर बनी सरकार पर भी लगाम रखी जा सकती है। भारत-अमेरिका परमाणु करार को रोकने में जैसे वामपंथी दल अब तक कामयाब रहे हैं, और जैसा कि पिछले चार साल का अनुभव है, वैसे ही जन हित और देश की संप्रभुता से जुड़ी बहुत सी नीतियों पर वे अपना असर डाल सकते हैं।

भारतीय राष्ट्र अभी विकास क्रम के जिस मुकाम पर है, वहां वामपंथी नीतियों पर चलने वाली सरकार का गठन मुमकिन नहीं है। राज्य-व्यवस्था के वर्ग आधार और राजनीति को संचालित करने वाली शक्तियों के चरित्र को देखते हुए अभी सर्वाधिक वांछित विकल्प एक ऐसी मध्यमार्गी सरकार ही है, जो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को कायम रखने और जनतांत्रिक प्रयोगों को आगे बढ़ाने में सहायक बने। इस बीच सभी जनतांत्रिक शक्तियों के बीच संवाद और सहयोग एक ऐतिहासिक जरूरत है। लेकिन ये शक्तियां इस जरूरत से नाकिफ नजर आती हैं। उनका अपना मनोविज्ञान इसमें आड़े आता है औऱ अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए उग्र नीतियां और कार्यक्रम अपनाकर वे एक ऐतिहासिक फर्ज़ के प्रति लापरवाही बरत रही हैं।

इसी परिस्थिति और संदर्भ में देश की दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना आगे का एजेंडा तय किया है। इस एजेंडे में शायद नई बात कोई नहीं है। बल्कि १९९० के दशक में भारतीय जनता पार्टी के उभार और उसके देश की एक राजनीतिक धुरी बन जाने के बाद वामपंथी दलों की रणनीति और कार्यनीतियों की जो दिशा तय हुई, उसी को इन पार्टियों ने अब ज्यादा साफ किया है औऱ उस पर आगे बढ़ने का इरादा जताया है। चूंकि यूपीए सरकार के गठन से पहले सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक सरकार को सत्ता से हटाना था, इसलिए तब नव-उदारवाद और राष्ट्रीय संप्रुभता के मुद्दे वामपंथी एजेंडे में मौजूद होने के बावजूद बहुत प्रमुख नहीं थे। लेकिन यूपीए सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों की दिशा को देखने और उसके परिणामों का अनुभव करने के बाद अब जाहिर है, सांप्रदायिकता के विरोध के साथ-साथ ये मुद्दे भी प्रमुख होकर उभरे हैं।

6 comments:

Rajesh Roshan said...

अगर यह केवल नुस्खा भर है तो इसका असर भी नुस्खा जैसा ही होगा क्योंकि नुस्खे जैसी चीज से देश को नही चलाया जा सकता है

ये अच्छा किया आपने की पैराग्राफ के बीच जगह देने लगे

Rajesh Roshan

परेश टोकेकर "कबीरा" said...

माकपा की रणनीति कहा तक सफल होती है ये तो समय ही बतायेगा। लेकिन ये बात तय है कि माकपा की उन्नीसवी पार्टी कांग्रेस मील का पत्थर साबित होने जा रहीं है। बंगाल, त्रिपुरा व केरल में चुनावो के स्थान पर नितीयो के आधार पर किये गये गठबंधन की सफलता उत्साहवर्धक है, कैंद्र में भी निती कार्यक्रम आधारित गठबंधन भविष्य के लिये रोल माडल बन सकता है। लेकिन एसा कोई भी गठबंधन बगैर साझा संघर्षो के संभव नहीं है, अब गेंद अन्य क्षेत्रिय दलो के पाले में है। देखना ये है कि छोटी क्षेत्रिय ताकते अपनी एतिहासिक भूमिका का निर्वाह करते हुवे वामपंथीयो के साथ कहा तक का रास्ता तय करती है।
अंतर्राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में देखा जाये तो आज निती आधारित, साझा संघर्षो से उपजे गठबंधन का दौर चल रहा है। लैटिन अमेंरिका, ग्रीक साइप्रस, नेपाल, दक्षिण अफ्रिका का अनुभव हमारे सामने है।

कुमार आलोक said...

सीपीआइ और सीपीएम के हालिया खत्म हुए पार्टी कांग्रेस के बाद उसके विश्लेषन राजधानी के प्रमुख अख्बारों में पढने को मिला. किसी ने कहा कि वाम्पंथी पार्टिया सत्ता मोह में पागल हो चुकी है तो किसी ने कहा कि समजवाद के बजाय सीपीएम बुधदेववाओ की तरफ़ बध रही है. नंदीग्राम के दर्द का एह्सास मेधा पाटेकर के दिल को चिर देता है लेकिन गुजरात के विभत्स दंगों मे मोदी के खिलाफ़ जाने की हिमाकत मेधा पाटेकर को नही होती. पहलीबार मैने आपका इमान्दार विश्लेशन दोनों पार्टियो के खत्म हुए अधिवेशन पर पढा. आपने बहुत कुच्छ लिखा है , मैं आपसे एक सवाल करना चाहता हूं कि आखिर क्या कारन है कि हिन्दी बेल्ट मे आज भी देश की सबसे बडी वाम्पंथी पार्टी ने अपने आधार को नही बढाया , आपको नही लगता कि जनसंघर्षो को और तेज़ करने की जरूरत है लाल झन्डे को. वाम पार्टियों को निश्चित रूप से तीसरे मोर्चे की गठन प्रक्रिया को और आगे बढाना चाहिये , क्योन्कि आर्थिक नितियों के मामले में कांग्रेस और भाजपा एक ही सिक्के के दो पहलू है.

आपका
कुमार आलोक
डीडी न्युज

अंशुमाली रस्तोगी said...

वामपंथी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के कब से समर्थक होने लगे? धर्मनिरपेक्ष शब्द तो अब तक राष्ट्रवादियों की बपौती हुआ करता था। क्या वामपंथी भी धर्म और राष्ट्रवाद को अपनी सुरक्षा का कवच बनाना चाहते हैं?

कुमार आलोक said...

anshumali jee samaj me koi ek vyaktee kaise ek pure organisation ki vishwasniyataa par sawal uthaa deta hai, marxwaad sidhhant nahee vigyaan hai. dharm aur rashtrawaad kaa jhoothaa dambh bharanewalo se poohiye ki iski duhai dekar kitano kaa inhone bhalaa kiyaa hai

rocky peace said...

dikkat ye hain ki dono left partyion mein kathani or karni ka phark dikhai deta hai is phark ko jitna jaldi mitayege to jandhaar bhi bdhega or taqat bhi ek baat or dhyan deni ki hai yey parti vicharon par tiki hai bhawnao par nahin time to lagega hi