Tuesday, April 15, 2008

अब पहले खाने के बारे में सोचिए!


सत्येंद्र रंजन
दुनिया जिस समय विकास के एक नए स्तर पर पहुंची मानी जा रही है और ये मान लिया गया था कि अब इंसान की बुनियादी समस्याएं देर सबेर हल हो जाएंगी, उसी समय मानव समाज को सबसे बुनियादी समस्या ने घेर लिया है। समस्या खाने की है। अनाज का गहरा संकट सारी दुनिया में पैदा हो गया है और उसका सीधा असर लगभग हर समाज पर पड़ रहा है। जाहिर है, हर मसले की तरह इस संकट का भी सबसे बुरा असर गरीबों पर पड़ रहा है। विश्व बैंक का अनुमान है कि अगर इस समस्या का जल्द हल नहीं निकला तो निम्न मध्य वर्ग के दस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे। लेकिन सवाल है कि आखिर ये हल कैसे निकलेगा? क्या दुनिया भर की सरकारें इसके लिए जरूरी संकल्प दिखाएंगी?
बहरहाल, किसी समाधान पर चर्चा के पहले समझने की सबसे जरूरी बात यह है कि आखिर ये समस्या पैदा क्यों हुई? बीसवीं सदी में खेतों की पैदावार बढ़ाने की नई तकनीक सामने आई, जिससे भूख पर विजय की वास्तविक संभावनाएं पैदा हुईं। खेती में उत्पादकता में भारी बढ़ोतरी ने आबादी बढ़ने के बावजूद अतिरिक्त अनाज की उपलब्धता को संभव बनाया। लेकिन २१वीं सदी के पहले दशक में मानव समाज की वह उपलब्धि कहीं खोती नज़र आ रही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? स्पष्टतः इसकी इंसानी और आसमानी दोनों वजहें हैं, लेकिन इंसानी वजहें ज्यादा हैं और ये वजहें तब तक दूर नहीं होंगी, जब तक सरकारों की नीतियों और प्रभावशाली तबकों की सोच में बुनियादी बदलाव नहीं आता है।

पहले इस संकट के आसमानी यानी कुदरती वजहों पर गौर करते हैं। हालांकि इसमें एक खास पहलू यह है कि आसमानी वजहों के पीछे भी एक हद तक इंसान का ही हाथ है। अभी दुनिया को जिस खाद्य संकट का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे एक कारण ऑस्ट्रेलिया में पिछले दो साल से पड़ रहा अकाल है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। वहां से निर्यात न हो पाने की वजह से विश्व बाजार में गेहूं की भारी कमी हो गई है। मलेशिया और फिलीपीन्स जैसे पूर्वी एशियाई देशों में चावल की पैदावार घटने से ऐसी ही स्थिति चावल को लेकर बनी है।

लेकिन कुदरत की मार पर आसानी से काबू पाया जा सकता था, अगर अमेरिका और लैटिन अमेरिका के कुछ देशों में अनाज की खेती के लिए उतनी जमीन मौजूद रहती जितनी अभी हाल तक रहती थी और वहां अनाज का इस्तेमाल खाने के बजाय दूसरे मकसद के लिए नहीं होता। दरअसल, कच्चे तेल के बढते दाम और तेल के भंडार खत्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव-ईंधन पर जोर देना शुरू कर दिया है। वहां मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल इथोनेल जैसे बायो-फ्यूयल यानी जैव ईंधन बनाने के लिए होने लगा है। अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों की सरकारें जैव ईंधन के लिए काम आने वाली फसलों की खेती के लिए सब्सिडी दे रही हैं और किसानों को इसकी खेती में ज्यादा फायदा नज़र आ रहा है। इससे खाने के अनाज के लिए उपलब्ध जमीन और अनाज की मात्रा दोनों घट रही है। इससे विश्व बाजार में अनाज की कमी हो गई है और उसकी कीमत बढ़ रही है।

भारत जैसे बडी आबादी वाले देश में जहां अनाज की आत्म-निर्भरता महज तकनीकी तौर पर ही हासिल की जा सकी थी, हाल के वर्षों में अनाज के बजाय कपास और ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढता गया है, जिसे बाजार में बेच कर पैसा कमाया जा सके। किसान ऐसी खेती करने पर इसलिए मजबूर होते हैं, क्योंकि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उपजाने वाले किसान गरीबी में दम तोड़ते रहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि बिक्री के लिए उपजाई जाने वाली गैर अनाज फसल में नुकसान होने का अंदेशा सामान्य से ज्यादा रहता है और इसीलिए विदर्भ जैसे इलाके में किसान सबसे गहरे संकट में हैं। लेकिन इस अनुभव से कोई सबक लेने के बजाय अब भारत भी जैव ईंधन की दौड़ में शामिल होने को तैयार होता दिख रहा है। इसके लिए ऐसी नीति का खाका तैयार कर लिया गया है और खबर है कि मई के आखिर तक कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की एक समिति इसे अंतिम रूप देने वाली है। इस खाके मुताबिक २०१७ तक देश की परिवहन ईंधन की कुल जरूरत का दस फीसदी जैव ईंधन से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए एक करोड़ २० लाख हेक्टेयर में जैव ईंधन तैयार करने में काम आने वाली फसलें उपजाई जाएंगी। गौरतलब है कि देश में बायो डीजल तैयार करने पर पहले ही काम शुरू हो चुका है। आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसके लिए छह लाख एकड़ जमीन पर एक खास पौधे की खेती की जा रही है।

जाहिर है, खाद्य संकट का सीधा रिश्ता अब तेल से जुड़ गया है। ऐसे में इसमें कोई हैरत की कोई बात नहीं कि तेल और अनाज की महंगाई साथ-साथ दुनिया को झेलनी पड़ रही है। विश्व बाजार में कच्चे तेल का भाव ११० डॉलर प्रति बैरल की सीमा को लांघ चुका है। तेल का दाम बढ़ने से परिवहन महंगा होता है, उससे अनाज की आपूर्ति महंगी होती है। उधर धनी-मानी तबकों की जीवन शैली महंगी होती है और उनमें भविष्य में ऊर्जा की उपलब्धता को लेकर आशंकाएं पैदा होती है। इससे वे विकल्प की तलाश में जुटते हैं और उन्होंने एक विकल्प जैव ईंधन के रूप में चुना है। इस दुश्चक्र से दुनिया भर के गरीबों के मुंह से आहार छीने जाने की हालत पैदा हो गई है।

अगर सिर्फ भारत के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां गेहूं, मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की खेती वाली जमीन में लगातार गिरावट आ रही है। मसलन, पिछले साल देश में दो करोड़ ८२ लाख १४ हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की खेती हुई थी, तो इस साल यह खेती सिर्फ दो करोड़ ७७ लाख ४८ हजार हेक्टेयर जमीन पर हुई है। मोटे अनाजों की पिछले साल ७० लाख ५७ हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई थी, जो इस साल ६८ लाख १६ हजार हेक्टेयर रह गई है। यही हाल दालों और तिलहन का भी है। साफ है कि अनाज की पैदावार देश की कृषि नीति में प्राथमिकता नहीं रह गई है, औऱ इसका नतीजा अब सामने आने लगा है।

लेकिन अनाज संकट की वजहें यहीं तक सीमित नहीं हैं। इसका संबंध बिगड़ते जलवायु और विकासशील देशों में खान-पान की बदलती आदतों से भी है। धरती के बढ़ते तापमान के साथ बारिश का चक्र बिगड़ गया है और इससे कहीं ज्यादा बारिश, तो कहीं सूखा पड़ने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। उधर समुद्र में जलस्तर बढ़ने से कई तटीय इलाकों के डूबने का खतर बढ़ता जा रहा है। इससे भी खेती की काफी जमीन इनसान के हाथ से निकल सकती है। जानकारों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में पड़े अकाल के पीछे जलवायु परिवर्तन की खास भूमिका है। चीन, भारत और कई दूसरे विकासशील देशों में तेजी से औद्योगिक विकास ने जलवायु परिवर्तन की वह रफ्तार तेज कर दी है, जो पहले ही पश्चिम की उपभोक्तावादी जीवनशैली की वजह से खतरनाक रूप ले रही थी। इन देशों में औद्योगिक विकास का एक और परिणाम यहां के धनी तबकों में पश्चिमी ढंग की जीवनशैली का प्रसार है। क्रयशक्ति में इजाफे और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति के साथ इन देशों में अनाज की खपत भी तेजी से बढ़ी है। मसलन, अब लोग यहां मांसाहार ज्यादा करने लगे हैं। जानकारों के मुताबिक १०० कैलोरी के बराबर बीफ (गोमांस) तैयार करने के लिए ७०० कैलोरी के बराबर का अनाज खर्च करना पड़ता है। इसी तरह बकरे या मुर्गियों के पालन में जितना अनाज खर्च होता है, उतना अनाज अगर सीधे खाना हो तो वह कहीं ज्यादा लोगों को उपलब्ध हो सकता है।

ऊर्जा की बढ़ती मांग और बढ़ते उपभोग के साथ-साथ बढ़ती आबादी ने संकट में एक नया आयाम जोड़ दिया है। खासकर एशिया के देशों में आबादी के स्थिर होने का लक्ष्य अभी दूर की बात है। इस बीच एक बार फिर यह हालत पैदा हो गई है कि आबादी में इजाफे की दर अनाज की पैदावार बढ़ने की दर से आगे निकल गई है। ऐसे में अनाज की किल्लत एक स्वाभाविक परिघटना है। बहरहाल, अब उम्मीद की एक वजह यही नजर आती है कि भले ही देर से लेकिन अब सरकारें इस संकट के प्रति जागरूक होती लग रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जैव ईंधन के लिए अनाज की जमीन के इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी देना इस बात का प्रमाण है कि आम तौर पर उद्योग जगत के हितों को तरजीह देने वाले नेता भी अब यह समझने लगे हैं कि अगर पर्याप्त अनाज उपलब्ध नहीं रहा तो औद्योगिक सभ्यता की जड़ें भी हिल जाएंगी। इसके अलावा लोकतांत्रिक समाजों के बढ़ते दायरे के साथ अब आम जन की बुनियादी समस्याओं से बिल्कुल मुंह मोड़े रखना सरकारों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है। विश्व बैंक जैसी अंतराष्ट्रीय पूंजी की हितैषी संस्था का भी खाद्य संकट को लेकर चिंतित होना यह बताता है कि इस संकट ने आखिरकार सभी स्तरों पर हलचल पैदा की है।

लेकिन क्या हलचल वास्तव में नीतियों में किसी आमूल बदलाव की शुरुआत कर सकेगी, इस वक्त यह सबसे बड़ा सवाल है। इसलिए कि ये ऐसी समस्या नहीं है जो कुछ फ़ौरी कदमों से हल कर ली जाए। इसके लिए सोच में बड़े बदलाव की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि दुनिया चाहे विकास की जिस मंजिल पर पहुंच जाए, खेती उसकी बुनियादी आवश्यकता बनी रहेगी। बिना भोजन किए न तो अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकती है और न इंटरनेट और सूचना तकनीक के जरिए सारी दुनिया से जुड़े रहने का आनंद लिया जा सकता है। इसलिए खेती और किसानों को सम्मान देना, किसानों की मेहनत का पूरा दाम देना और उन्हें विज्ञान एवं तकनीक के विकास से उपलब्ध हर सुख-सुविधा मुहैया कराना हर विकास नीति के केंद्र में होना चाहिए।

खासकर यह संकट भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए एक बड़ा सबक है। जिस देश में खाने के लिए एक अरब दस करोड़ मुंह हों, वहां खेती की अनदेखी सिर्फ विनाश को निमंत्रण देते हुए ही की जा सकती है। मुख्य रूप से उस समय जब विश्व बाजार से अनाज के आयात का विकल्प बेहद संकुचित होता जा रहा है। इस मौके पर १९६० के दशक में सीखा गया वो सबक सबको जरूर याद कर लेना चाहिए कि अगर देश की संप्रभुता कायम रखनी है और देश को स्वाभिमान के साथ दुनिया में खड़ा रहना है तो अनाज पैदावार में आत्मनिर्भरता उसकी बुनियादी शर्त है। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने 'जय किसान' का जो नारा दिया था, उसकी अहमियत आज एक बार फिर समझे जाने की जरूरत है।

इसके साथ ही देश के राजनेता अगर कई देशों के हाल के घटनाक्रम पर गौर करें और उससे जरूरी सबक लें तो वे अपने देश के साथ-साथ अपना भी कुछ भला कर सकते हैं। हैती में अनाज की महंगाई की वजह से भड़के दंगों पर पुलिस फायरिंग के बाद आखिरकार वहां के प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है। उधर मिस्र, कैमरून, सेनेगल, बर्किना फासो के साथ-साथ अपने पड़ोसी बांग्लादेश में भी अनाज के लिए दंगों की खबरें मिली हैं। अर्जेंटीना में इस खतरे से जागी वामपंथी सरकार ने अनाज के निर्यात पर पाबंदी लगा दी तो इस संकट में अपनी उपज से ज्यादा पैसा कमाने की उम्मीद लगाए बड़े किसानों के विरोध प्रदर्शनों का उसे सामना करना पड़ा।

फिलहाल भारत में महंगाई का खूब शोर है। विपक्ष के लिए सरकार पर हमला बोलने का यह एक असरदार मुद्दा है। कॉपोरेट मीडिया के पास जन हितैषी का लाबादा ओढ़ने का इससे मौका मिला है। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे सरकार दबाव में आई है और वह महंगाई रोकने के कुछ कदम उठाने को मजबूर हुई है। लेकिन इस सारी चर्चा में संकट की असली गंभीरता, उससे जुड़े तथ्य और उसके व्यापक आयाम गायब हैं। जरूरत इन सभी पहलुओं पर सभी संभव नजरिए से विचार करने और समाधान के कदम उठाने की है। इसमें सबकी बराबर की जिम्मेदारी है। और सबके लिए आजादी के तुरंत बाद कहा और उसके बाद सैकड़ों बार दोहराया गया जवाहर लाल नेहरू का यह कथन सर्वाधिक प्रासंगिक हो गया है कि फिलहाल बाकी सब कुछ इंतजार कर सकता है, लेकिन कृषि नहीं। उसके बारे में तुरंत सोच बदले जाने और कदम उठाने की जरूरत है।

5 comments:

अतुल said...

पहले तो यही तय हो जाए कि अनाज आदमी खाएगा कि उसका ईंधन बनकर गाड़ी चलेगी.

दिनेशराय द्विवेदी said...

आपका यह आलेख हिन्दी ब्लॉगिंग का सब से महत्वपूर्ण, सामयिक है। यह पूरी की पूरी व्यवस्था को बदले जाने की आवश्यकता की ओर संकेत कर रहा है।
मुझे लगता है कि अब इन विषयों पर सोचने का समय भी शेष नहीं है। कुछ करने की जरूरत है।

Udan Tashtari said...

वक्त के अनुरुप एक सार्थक आलेख.

Celular said...

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neelima sukhija arora said...

सत्येन्द्रजी, ये वही लैटिन अमरीकी देश हैं जहां के लोग मिट्टी में नमक मिलाकर उसके बने बिस्कुट खाकर पेट भर रहे हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लुईस इनासियो लूला डी सिल्वा कहते हैं कि भारतीय और एशियाई लोग ज्यादा खाते हैं दिन में तीन समय। उनके आसपास के लोग मिट्टी खाकर पेट भरते हैं पर वो अमरीका की तरह अपने किसानों को बायो फ्यूल के लिए फसलें पैदा करने पर सब्सिडी देते हैं। ये इस समाज का दोहरा चेहरा है। ये उस बाजार के लिए कुछ भी पैदा करेंगे पर गरीबों के मुंह में रोटी नहीं डाल सकेंगे।
भारत भी कुछ कम नहीं है केंद्र सरकार के एक काबीना मंत्री कहते हैं कि गरीब भारतीयों ने अब दो वक्त खाना शुरू कर दिया है इसलिए खाद्य संकट आया है। सही है भाई , जो गरीब कभी एक वक्त रोटी खाता था अब वो दो वक्त रोटी खाने लगा है तो ये अमीर मंत्रियों को पचता नहीं है।