Tuesday, August 12, 2008

चीन क्यों चमक रहा है!


सत्येंद्र रंजन
चीन की चमक से दुनिया चकाचौंध है। बीजिंग ओलंपिक के उद्घाटन समारोह में भव्यता और सुंदरता का जैसा अभूतपूर्व नजारा देखने को मिला, उससे सारी दुनिया हतप्रभ रह गई। पश्चिमी मीडिया ने भी आखिरकार ये मान लिया कि चीन में कुछ खास है। भारत में तो खैर, चीन को लेकर एक विचित्र का तरह अंतर्विरोध हाल के वर्षों में देखने को मिलता रहा है। एक तरफ हमारे नेता और भारतीय प्रभुवर्ग आर्थिक एवं विकास के क्षेत्रों में चीन की सफलता पर मोहित नजर आते हैं, वहीं चीन जनवादी गणराज्य जिस बुनियाद पर खड़ा है, उसको लेकर एक वैर-भाव भी उनमें मौजूद देखा जा सकता है। पिछले महीने मनमोहन सिंह सरकार के विश्वास मत पर बहस के दौरान वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने चीन की सफलता का जी खोलकर बखान किया। और लगे हाथों यह इल्जाम भी मढ़ दिया कि इस देश में कुछ लोग नहीं चाहते कि भारत चीन की बराबरी करे। जाहिर है, उनका निशाना भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु सहयोग समझौते का विरोध कर रहे समूहों की तरफ था।

बहरहाल, भारत अगर चीन की बराबरी नहीं कर पा रहा है, तो इसके लिए चिदंबरम या मनमोहन सिंह या उनके जैसी नीतियां अपनाने वाले दल एवं समूह तथा उनके समर्थक तबकों की कितनी जिम्मेदारी है, जाहिर है, इस पर उनसे हम कुछ सुनने की उम्मीद नहीं कर सकते। लेकिन आखिर चीन ने यह चमत्कार कैसे किया, इसका गंभीर विश्लेषण उन सभी लोगों के लिए बेहद अहम है, जो दुनिया के नक्शे पर भारत को भी उसी शान के साथ देखना चाहते हैं, जैसे चीन आज खड़ा है।
भारत और चीन में कई समानताएं हैं। दोनों सबसे बड़ी आबादी वाले देश हैं। एक आधुनिक राष्ट्र के रूप में दोनों का सफ़र लगभग एक ही समय शुरू हुआ। दोनों ने अलग, लेकिन अपने ढंग से खास एक विचारधारा पर अपने राष्ट्र की बुनियाद डाली। १९७० के दशक तक दोनों विकास दर और दूसरे कई आर्थिक मानदंडों पर लगभग बराबर थे। लेकिन उसके बाद तस्वीर बदल गई।

१९८४ के लॉस एंजिल्स ओलंपिक में साम्यवादी चीन ने व्यावहारिक रूप में पहली बार हिस्सा लिया और तब वह सिर्फ एक स्वर्ण पदक जीत सका था। तब तक भारत ओलंपिक में अपने एक निश्चित माने जाने वाले हॉकी के स्वर्ण पदक को जीतने की हैसियत गवां चुका था। उसके बाद चीन का ग्राफ लगातार इतनी तेजी से ऊपर की तरफ चढ़ा कि आज वह स्वर्ण पदकों की सूची में पहले नंबर पर होने का दावेदार है, जबकि भारत में अभिनव बिंद्रा के जीते स्वर्ण पदक से अभी महज शुरुआत भर हुई है। दूसरे क्षेत्रों में चीन की जो सफलताएं हैं, वह मुख्यधारा मीडिया के विमर्श में शामिल है, इसलिए उसे साबित करने के लिए अलग से कोई आंकड़े देने की जरूरत नहीं है।

तो प्रश्न आखिर वही है कि आखिर चीन ऐसा कैसे कर पाया? दरअसल, चीन ऐसा उन्हीं नीतियों के सहारे कर पाया है, जिन्हें लेकर देश के शासक समूहों में गहरा वैर-भाव देखा जाता है। १९४९ की जनवादी क्रांति के बाद चीन ने अपने बुनियादी सामाजिक और आर्थिक ढांचे में आमूल बदलाव की जो पहल की, उसका फल मिलने में कई दशक लगे। लेकिन उस पहल ने समाज और अर्थव्यवस्था की सुसुप्त ऊर्जा को सदियों के बंधनों से मुक्त किया। यहां हम उस पहल के तरीकों, उनकी वजह से हुई उथल-पुथल और उसके फौरी नतीजों पर अपना कोई फैसला नहीं दे रहे हैं। यह ऐतिहासिक विमर्श का विषय है। लेकिन जो तथ्य हैं और उनके जो परिणाम अब सामने हैं, उनकी चर्चा जरूर बेहिचक की जा सकती है।

माओ जे दुंग के नेतृत्व में १९६६ में शुरू हुई सांस्कृतिक क्रांति एक गहरे विवाद का विषय रही है। एक दशक तक चली इस प्रक्रिया को जैसे अंजाम दिया गया, उस पर अलग-अलग राय रही है। लेकिन सांस्कृतिक क्रांति ने चीन को सदियों पुराने सांस्कृतिक अवरोधों से मुक्त कर दिया, यह बात आज तथ्यों की रोशनी में निसंदेह कही जा सकती है। इससे बनी नई संस्कृति ने चीन के लोगों में नई सोच और नया मनोविज्ञान पैदा किया, जिसके सहारे वो मानव संभावनाओं को एक नई ऊंचाई तक ले जा सकने में सफल हो रहे हैं।

माओ जे दुंग ने सतत् क्रांति और क्रांति के भीतर क्रांति की अवधारणाएं पेश की थीं। उनके उत्तराधिकारियों ने इसे व्यावहारिक रूप देने की कोशिश की। तंग श्याओ फिंग ने ‘सोच के उद्धार’ का जब नारा दिया और चीनी क्रांति से पैदा ऊर्जा का विकास और प्रगति के लिए इस्तेमाल की नीतियां अपनाईं, तो बहुत से हलकों में इसे माओवाद का खंडन माना गया। जियांग जेमिन और हू जिन ताओ के जमाने में अपनाई नीतियों को लेकर खुद साम्यवादी खेमे में गहरे मतभेद रहे हैं। लेकिन अगर इस पूरे घटनाक्रम को एक विकासक्रम के चरणों के तौर पर देखा जाए तो हम आज के चीन को बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। चीन ने अपनी व्यवस्था में आमूल परिवर्तन के बाद उसकी बुनियाद पर विकास और सफलताओं की नींव रखी और आज उसकी उपलब्धियां न सिर्फ खेल, बल्कि हर क्षेत्र में सोने के तमगे के रूप में उसके सीने पर सजी नजर आती हैं।

बेशक चीन की मौजूदा पर व्यवस्था पर कई सवाल उठाए जा सकते हैं। मसलन, उसकी राजनीतिक व्यवस्था में लोकतंत्र के कई पहलुओं की कमी है। हाल के दशकों में वहां एक बार फिर गैर बराबरी बढ़ी है और भ्रष्टाचार को कभी खत्म नहीं किया जा सका। वहां फिर से उस संस्कृति का असर बढ़ रहा है, जिसे माओ ने पतनशील कहा था और जिसके खिलाफ मुहिम चलाई थी। लेकिन यह भी देखा जा सकता है कि चीनी समाज और वहां का राजनीतिक नेतृत्व नई समस्याओं से निपटने के लिए नए प्रयोग कर रहे हैं। उनका परिणाम अभी भविष्य के गर्भ में है। मगर, वहां का नेतृत्व नई समस्याओं के नए हल निकालने की कोशिशों में गंभीरता से जुटा है, इसके संकेत भी देखे जा सकते हैं।

दूसरी तरफ भारत में मनमोहन सिंह एंड चिदंबरम एंड कंपनी गैर बराबरी पर आधारित व्यवस्था को छूने की कोशिश करने से गुरेज करती नजर आती है। बात चाहे रोजगार गारंटी कानून या आदिवासियों को वन भूमि पर अधिकार देने के कानून की हो, या पिछड़ों को आरक्षण देने की बात हो, किसी मुद्दे पर शासक वर्ग और उनके नुमाइंदे आस्था के साथ मजबूती से खड़े नजर नहीं आते। लोकतांत्रिक दबावों में वो जो कुछ सकारात्मक कदम उठाते हैं, उसे भी कमजोर कर देने का कोई मौका वो हाथ से नहीं जाने देते। जबकि धनवान तबकों को मदद पहुंचाने वाले कदमों पर उनका उत्साह देखते ही बनता है। जब बात चीन की तरक्की होती है, तो ये तथ्य सहज ही नजरअंदाज कर दिए जाते हैं कि वहां भुखमरी मिटाने, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे मानव विकास के पहलुओं पर कितना निवेश किया गया और सामाजिक बराबरी लाने की योजनाओं पर किस तरह अमल किया गया।

इन योजनाओं ने चीन की दबी ऊर्जा को आजादी दी, जिसकी चमक से आज वह जगमगा रहा है। भारत ने अपनी ऐसी ऊर्जाओं को आज भी सदियों के सामाजिक अन्याय, आर्थिक शोषण और सांस्कृतिक पिछड़ेपन से दबा रखा है। इसी फर्क की वजह से चीन आज दुनिया में अपनी शर्तों के साथ खड़ा है, जबकि भारत को असैनिक परमाणु सहयोग का करार करने के लिए अपनी विदेश नीति की स्वतंत्रता का सौदा करना पड़ता है। इसलिए आज सबसे अहम बात चीन से चमत्कृत होने की नहीं, बल्कि वहां हुए अनुभवों से कुछ सबक लेने की है।

6 comments:

Rajesh Roshan said...

सबका जिन्हें लेना है वो नोट काण्ड को कभी सच तो कभी झूठ और उसको तोड़ मरोड़ में व्यस्त हैं..... यह भारत है केवल इस पर गर्व किया जा सकता है इसे ठीक नही किया जा सकता

Udan Tashtari said...

बढ़िया आलेख..आभार.

दिनेशराय द्विवेदी said...

चलो हम रास्ता भूल गए। मगर अब क्या करें?

Neetesh said...

काफी परिष्कृत व्याख्या है......मैं आपसे पूरी तरह सहमत हूँ......आपने सही कहा, की भारत देश तो स्वतंत्र हो गया है, परन्तु सामाजिक स्वतंत्रता स्वतंत्रता शायद आज तक नहीं हुई है.........
मई द्विवेदी जी के प्रश्न से भी सहमती रखता हूँ, की जो हुआ सो हुआ, अब हम ऐसा क्या कर सकते है, जिससे की हम एक उत्कृष्ट और ताक़तवर भारत को देखें? ऐसे उपायों पे विचार होना चाहिए.........

Manish said...

Few Years back , USSR was enjoying the same status what China has now , But is USSR now ?
India Can not be China , India can only be India , very simple .

anju said...

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