Thursday, August 28, 2008

खेल में आगे निकलना खेल नहीं


सत्येंद्र रंजन
ओलिंपिक में चीन की सफलता से दुनिया अचंभित नजर आती है। सफलता ओलिंपिक के आयोजन में भी रही और खेलों के मुकाबलों में भी। आयोजन इतना शानदार रहा कि कहीं किसी को नुक्स निकालने का कोई मौका नहीं मिला, बल्कि इसी मकसद से बीजिंग पहुंचे बहुत से पश्चिमी मीडियाकर्मी इसकी तारीफ करते हुए वहां से वापस गए। और खेल मुकाबलों का आलम यह रहा कि चीन पदक तालिका के शिखर पर पहुंच गया। वहां इतने भारी अंतर से पहुंचा कि दूसरे नंबर पर रहे अमेरिका से १५ स्वर्ण पदकों का फासला रहा। सोवियत संघ के विखंडन के बाद पहली बार कोई देश ५० से ज्यादा स्वर्ण पदक हासिल कर पाया।

चार साल पहले एथेंस ओलिंपिक में चीन ३२ स्वर्ण पदक जीत कर अमेरिका से तीन स्वर्ण पदक पीछे रह गया था। उसके बाद यह उसकी जबरदस्त तैयारियों की ही मिसाल है कि बीजिंग ओलिंपिक शुरू होने से दो दिन पहले ही अमेरिका की ओलिंपिक समिति के अधिकारियों ने यह सार्वजनिक बयान दे दिया कि इस बार चीन उन्हें पीछे छोड़ देगा। बढ़ोतरी अमेरिका ने भी की। उसकी झोली में एक स्वर्ण पदक ज्यादा आया। लेकिन चीन ने १९ स्वर्ण पदकों का इजाफा किया। जिमानास्टिक जैसे कई खेलों, जिनमें पहले चीन का बड़ा दांव नहीं रहता था, उनमें भी इस बार चीन ने कामयाबी के झंडे गाड़े। और अब यह खुद महान तैराक मार्क स्पिट्ज का कहना है कि अगले दस साल में तैराकी में भी चीन का दबदबा कायम हो जाएगा।

चीन की इस सफलता को खासकर भारत में बड़ी हैरत और ललचाई निगाहों से देखा जा रहा है। भारत के सामने फिलहाल चुनौती २०१० के कॉमनवेल्थ खेलों के आयोजन की है, जिसकी तैयारियों पर कई संदेह हैं। इसे देखते हुए भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के उपाध्यक्ष और कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला ने एक दिलचस्प सुझाव दिया। उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को लिखे एक पत्र में कहा कि ओलिंपिक के बाद कई अस्थायी ढांचे तोड़ दिए जाते हैं। शुक्ला बीजिंग में तैयार उन खेल सुविधाओं से इतने प्रभावित थे कि उन्होंने प्रधानमंत्री से ऐसी पहल करने की अपील की जिससे बीजिंग के उन ढांचों को दिल्ली ले आया जाए। जहां खेलों में प्रदर्शन की बात है तो उसमें भारत और चीन के बीच फासला तो जगजाहिर है।

सवाल है कि आखिर क्यों चीन आज उस मंजिल पर है, जो भारत की पहुंच से बाहर नजर आती है? भारत जैसी ही बड़ी आबादी, प्राचीन संस्कृति और पिछड़ी अर्थव्यवस्था के साथ बीसवीं सदी के मध्य में ‘नियति से अपने मिलन’ की यात्रा शुरू करने वाला चीन आखिर कैसे आज दुनिया की सबसे बड़ी खेल महाशक्ति बन गया? अगर भारत सचमुच दुनिया में एक बड़ी ताकत बनना चाहता है, तो इस सवालों के जवाब उसके लिए बेहद महत्त्वपूर्ण और प्रासंगिक हैं। इस जवाब की तलाश करते हुए हमें सबसे पहले सामने मौजूद तथ्यों पर गौर करना चाहिए और फिर उन बारीकियों तक पहुंचने की कोशिश चाहिए, जिससे यह संभव हो सका है।

पहले बात खेल तक ही सीमित रखते हैं। भारत के एक राष्ट्रीय अखबार के इनसाइट ग्रुप के शोध के मुताबिक चीन के पास आज साढ़े आठ लाख खेल के मैदान, छह लाख २० हजार स्टेडियम, ४४ हजार स्पोर्ट्स स्कूल, साढ़े ४६ हजार से ज्यादा प्रोफेशनल एथलीट और २५ हजार कोच हैं। वहां हर साल ४० हजार से ज्यादा खेल प्रतियोगिताओं का आयोजन होता है। स्पोर्ट्स स्कूलों में तकरीबन पौने चार लाख छात्र ट्रेनिंग लेते हैं। इनके बीच प्रोफेशनल एथलीट, फिर उनके बीच से नेशनल एथलीट्स और उसके बाद उनके बीच से अंतरराष्ट्रीय एथलीट्स का चयन होता है। बीजिंग ओलिंपिक से पहले चीन के पास ३,२२२ अंतरराष्ट्रीय एथलीट थे, जिनके बीच से ओलिंपिक के लिए टीम का चयन किया गया। बीजिंग ओलिंपिक के लिए टीमें तैयार करने पर ४ अरब ८० करोड़ डॉलर खर्च किए गए। इन तथ्यों की रोशनी में अगर चीन की कामयाबी को देखा जाए तो क्या तब भी वह आश्चर्य की बात रह जाती है?

ये तो दरअसल, पेशेवर खेल की तैयारियों से जुड़े तथ्य हैं। आम जन के लिए चीन सरकार की जो खेल नीति है, वह इसके अलग है। देश भर में खेल सुविधाएं मुहैया कराने पर चीन सरकार ने करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं। १९९५ में तंदुरुस्ती को बढ़ावा देने का एक कानून बनाया गया, जिसके तहत लोगों को कसरत और खेलों में भाग लेने की व्यापक सुविधाएं मुहैया कराई गईं। तब से नियमित सर्वेक्षण कर यह देखा जाता है कि कितने लोग शारीरिक तौर पर फिट हैं और लगातार व्यायाम में हिस्सा लेते हैं। २००५ के सर्वे का नतीजा रहा कि चीन की आबादी का ३० फीसदी हिस्सा खेल-कूद की गतिविधियों में हिस्सा लेता है। देश की राष्ट्रीय तंदुरुस्ती नीति का लक्ष्य इस संख्या को ४० फीसदी तक पहुंचाने का है।

जाहिर है, चीन ने खेल को अपनी सार्वजनिक संस्कृति का अहम हिस्सा बना लिया है, जैसा पहले सोवियत संघ और समाजवादी खेमे के दूसरे देशों में हुआ था। गौरतलब है कि सोवियत संघ लंबे समय तक लगातार ओलिंपिक में अमेरिका को पछाड़ता रहा। यहां तक कि छोटे से देश जर्मन जनवादी गणराज्य (पूर्वी जर्मनी) ने खेलों में इतनी तरक्की की कि दूसरे यूरोपीय देशों पर वह लंबे समय तक भारी पड़ता रहा। आज चीन ने उसी परंपरा को नई ऊंचाई तक पहुंचा दिया है।
चीन की यह नई संस्कृति माओ त्से तुंग के नेतृत्व में हुई सांस्कृतिक क्रांति की कोख से निकली। उस क्रांति के दौरान सामंती अवशेषों पर हमला करते हुए पुरातन संस्कृति के शिकंजे से देश, खासकर उसके नौजवानों को निकाला गया और उनकी दबी-सोयी पड़ी ऊर्जा को मुक्त कर दिया गया। उसका परिणाम अब सामने है।

बहरहाल, अगर आर्थिक और सामाजिक क्षेत्रों में चीन नए सिरे से अपनी व्यवस्था को नहीं ढालता और इसमें नई परिस्थितियों के मुताबिक लगातार बदलाव नहीं करता तो निश्चित रूप से नई संस्कृति की जमीन तैयार नहीं होती। खेलों के संदर्भ में यह सवाल बेहद अहम है कि आखिर समाजवादी व्यवस्थाएं और विकसित अर्थव्यवस्थाएं क्यों खेलों की दुनिया में अपना वर्चस्व बना लेती हैं, जबकि दूसरी व्यवस्थाएं खेलों की दुनिया में पहचान बनाने के लिए कुछ निजी खिलाड़ियों की प्रतिभा और मेहनत पर निर्भर बनी रहती हैं? निसंदेह जमैका जैसा देश उसेन बोल्ट की कामयाबी पर इतरा सकता है, या इथियोपिया और केन्या जैसे गरीब देशों से कुछ ऐसे एथलीट निकल कर आ सकते हैं, जो दुनिया को चकत्कृत कर दें, लेकिन वे देश व्यापक रूप से खेल की बड़ी शक्ति के रूप में कभी नहीं उभर पाते।

इसकी वजह यह है कि खेल में किसी का मन तब लगता है, जब उसकी बुनियादी जरूरतें पूरी हो गई हों। अगर किसी नौजवान के मन में अपने भविष्य को लेकर संशय है, रोजगार उसकी पहली चिंता है तो वह ओलिंपिक में स्वर्ण पदक जीतने का सपना नहीं देख सकता। भारत जैसे देश में हकीकत यही है कि अधिकांश नौजवान खेलों में नौकरी या आर्थिक बेहतरी की उम्मीद करते हुए आते हैं। उनके सामने यही छोटा लक्ष्य रहता है। इसके लिए भी उन्हें अपनी प्रतिभा और अपनी मेहनत पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इसीलिए यह कड़वी हकीकत है कि इतने बड़े देश के पास गर्व करने के लिए सिर्फ एक अभिनव बिंद्रा या विजेंद्र कुमार या सुशील कुमार हैं।

यह बात अक्सर बड़े दुख के साथ कही जाती है कि ११० करोड़ आबादी वाले देश में पदक विजेताओं का इतना अभाव है! लेकिन असली बात यह है कि पदक जीतने का आबादी से शायद ही कोई संबंध है। खेलों में विभिन्न देशों के प्रदर्शन पर हुए अध्ययनों के निष्कर्ष के मुताबिक खास बात यह है कि आबादी का कितना हिस्सा वास्तव में खेलों में हिस्सा लेता है। कई अध्ययनकर्ताओं ने इस संदर्भ में अमर्त्य सेन की अर्थव्यवस्था के संदर्भ में कही गई इस बात का हवाला दिया है- ‘हिस्सेदारी की क्षमता कई सामाजिक शर्तों से तय होती है। बाजार तंत्र की विस्तार प्रक्रिया में भाग लेना मुश्किल है, अगर आप निरक्षर हों और आपको स्कूल जाने का मौका न मिला हो, या आप कुपोषण या खराब सेहत की वजह से कमजोर हों या फिर आपके रास्ते में सामाजिक अवरोध, भेदभाव, पूंजी की कमी की रुकावटें हों...।’ यह पूरा उद्धरण खेलों के संदर्भ में भी उतना ही लागू होता है।

ओलिंपिक का आदर्श खुद को ज्यादा तेज, ज्यादा ऊंचा और ज्यादा मजबूत साबित करने की स्वस्थ होड़ है। लेकिन यह काम एक हद तक दुस्साहस की मांग करता है जिसमें शारीरिक जोखिम शामिल रहता है। अगर मन में लगातार संशय हो या परिवार का दबाव हो कि अगर जख्मी हुए तो सारा भविष्य अंधकारमय हो जाएगा, तो उस हालत में कोई नौजवान बहुत आगे नहीं जा सकता। समाजवादी व्यवस्थाएं इसलिए बेहतरीन खिलाड़ी पैदा कर पाती हैं, क्योंकि वहां इलाज की चिंता किसी के मन में नहीं होती और यह आश्वासन होता है कि रोजगार या जीवन यापन समाज मुहैया करा देगा। तो वैसी हालत में दुस्साहस की हद तक जोखिम उठाने की होड़ में नौजवान अपने को झोंक देते हैं। जिन समाजों ने समृद्धि का एक ऊंचा स्तर हासिल कर लिया है और जहां अपने आर्थिक भविष्य को लेकर आश्वस्ति है, वहां पढ़ाई-लिखाई और करियर बनाने की चिंता छोड़ कर नौजवान खेल में अपनी प्रतिभा को झोंक पाते हैं। जहां ये स्थितियां नहीं हैं, वहां खेल महज निजी जुनून बनकर रह जाता है, जिससे कभी-कभार सफलता तो मिल जाती है, लेकिन यह एक निरंतर चलने वाली प्रक्रिया नहीं बन पाती।

अध्ययनकर्ताओं का मानना है कि समृद्धि निसंदेह खेलों में प्रगति का एक अहम आधार है, लेकिन इसके साथ-साथ खेलों में भागीदारी और खेलों के बारे में सूचना की उपलब्धता दो बेहद अहम पहलू हैं। दरअसल, खेलों के बारे में सूचना के प्रसार से भागीदारी बढ़ती है और इससे वे प्रतिभाएं सामने आती हैं, जिनके बीच राष्ट्र्यी और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी चुने जा सकें। एक अध्ययन का निष्कर्ष है कि जिन समाजों में रेडियो नेटवर्क की ज्यादा पहुंच है, वहां खेलों की लोकप्रियता भी ज्यादा है। विकासशील देशों में अखबार आज भी कमोबेस शहरी माध्यम हैं। जिस दौर में भारत में रेडियो सूचना का मुख्य माध्यम था, उस दौर में यहां भी दूरदराज के इलाकों तक विभिन्न खेलों के बारे में ज्यादा जागरूकता थी।

लेकिन प्राइवेट मीडिया (टीवी, अखबार, और अब रेडियो भी) का दबदबा बढ़ने के साथ सूचना के कमोडिटी बनने की परिघटना सामने आई। इसमें जोर तुरत-फुरत चीज बेचकर ग्राहक बढ़ाने पर रहता है। जाहिर है, जिस चीज के बने-बनाए ग्राहक हैं, सिर्फ उन्हें ही बेचा जाता है। क्रिकेट इसकी एक मिसाल है। इसका परिणाम यह है कि दूसरे खेलों की सूचना फैलाने की कोशिश छोड़ दी गई है। नतीजा यह है कि जिसे हम सूचना का युग कहते हैं, उसमें ओलिंपिक स्पोर्ट्स जैसे खेलों को लेकर देश में अज्ञानता और अरुचि का माहौल है। यह इसी बात का परिणाम है कि टेलीविजन चैनलों पर बनावटी क्रिकेट की खबरों या प्रोग्राम को जितनी टीआरपी मिलती है, उतनी ओलिंपिक या विश्व कप फुटबॉल जैसे आयोजनों पर बनाए गए क्वालिटी प्रोग्राम को नहीं मिलती। जब हम भारत की खेल संस्कृति और खेल की दुनिया में अपनी हैसियत की बात करते हैं तो इन सारे पहलुओं पर जरूर गौर किया जाना चाहिए। खास कर उस मौके पर जब अभिनव बिंद्रा, विजेंद्र कुमार और सुशील कुमार की सफलताओं से देश के जागरूक तबकों में उम्मीद का एक माहौल बना हुआ है। उम्मीद का यह माहौल तभी आगे बेहतर नतीजे दे सकता है, जब हम देश के हर गली कूचे से प्रतिभाओं को सामने लाने, उनके मन से आर्थिक भविष्य की चिंता दूर करने, उन्हें विश्वस्तरीय सुविधाएं मुहैया कराने और पुरातन मनोविज्ञान से मुक्त कर उनमें दुनिया के मंच पर कुछ कर दिखाने का जज्बा भरने के इंतजाम करें। अगर ऐसा नहीं होता है तो अभी का फील गुड माहौल अल्पजीवी ही साबित होगा।

3 comments:

Udan Tashtari said...

अच्छा विश्लेषण एवं विचारणीय मुद्दा!!

कुमार आलोक said...

पहले तो खेल संघो पर कुंडली मारकर बैठे सियासत के खिलाडियों को बाहर कर आरिजनल खिलाडियों को बैठाया जाय।खेल का बजट वर्तमान से कम से कम २० गुना करो । फिर देखते है आगे क्या होता है । सत्येन्द्र जी एक बात बताइये अभिनव विंद्रा को जो खेल संघ जर्मनी से बीजींग तक का फ्लाइट का टिकट ना दे सकें ...सुशील कुमार के साथ मलिशिये को ना भेज सकें ...ऐसे शर्मनाक और भ्रष्ट व्यवस्था के बीच आप चीन से क्या जमैका और केन्या तक से टक्कर नही ले सकते ।

anju said...

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