Saturday, February 7, 2009

कांग्रेस का आत्म-ध्वंस


सत्येंद्र रंजन
कांग्रेस का फैसला है कि वह अगले आम चुनाव में यूपीए गठबंधन के रूप में मैदान नहीं उतरेगी, बल्कि राज्यों के स्तर पर सिर्फ चुनावी समझौते करेगी। पार्टी दूसरा संकेत यह दे रही है कि वह फिर से मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री के उम्मीदवार के रूप में पेश करेगी। ये दोनों फैसले सिर्फ इस बात की ही मिसाल हैं कि कांग्रेस के नेता जिस जनादेश के आधार पर पिछले पांच साल से केंद्र में सत्ता का सुख भोग रहे हैं, उसे समझने में वे नाकाम हैं। या यह कहा जा सकता है कि अहंकार उन्हें उस जनादेश का मतलब और देश के राजनीतिक यथार्थ को समझने नहीं दे रहा है। २००४ में कांग्रेस की सत्ता में वापसी का रास्ता भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी एजेंडे के खिलाफ आम लोगों के आक्रोश से तैयार हुआ था। तब कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने एनडीए के खिलाफ एक ऐसा गठबंधन तैयार करने में अहम भूमिका निभाई थी, जो जनता के उस आक्रोश का वाहक बना।

भाजपा फिर उसी सांप्रदायिक और धुर दक्षिणपंथी एजेंडे के साथ चुनाव में उतरने को तैयार है। देश का व्यापक जनमत आज भी उस खतरे को समझता है और इसी वजह से मध्यमार्गी-धर्मनिरपेक्ष विकल्प के लिए स्थितियां काफी हद तक अनुकूल नज़र आती हैं। लेकिन कांग्रेस नेता इस तकाज़े को समझने में बिल्कुल अक्षम नजर आते हैं। उन्हें यह साधारण सी बात समझ में नहीं आती कि आज की परिस्थिति में ऐसा विकल्प कांग्रेसे अकेले नहीं बन सकती। वह महज उन दलों और ताकतों का नेतृत्व कर सकती है. जो आपस में मिलकर ऐसा विकल्प तैयार करते हैं।

शायद कांग्रेस नेताओं ने नवंबर के विधानसभा चुनावों के नतीजे का गलत निष्कर्ष निकाला है। यह ठीक है कि दिल्ली में कांग्रेस को आश्चर्चजनक जीत मिली और भाजपा का आतंकवाद का मुद्दा सिरे से नाकाम रहा, लेकिन यह किसी भी रूप में कांग्रेस के पक्ष में देश में चल रही किसी लहर का संकेत नहीं है। आखिर भाजपा मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में एंटी इन्कंबेंसी के पहलू को बेअसर करने में सफल रही और राजस्थान में भी कांग्रेस तमाम अनुकूल स्थितियों के बावजूद पूर्ण बहुमत हासिल नहीं कर सकी। इसलिए इन चुनाव नतीजों पर आह्लादित होने के बजाय कांग्रेस नेताओं के लिए इन्हें एक चुनौती के रूप में लेना ज्यादा उचित होता। जाहिर है, ऐसे में गठबंधन के महत्त्व के समझने औऱ मौजूदा गठबंधन के दलों के बीच पूरे तालमेल की जमीन तैयार करने की जिम्मेदारी कांग्रेस नेतृत्व को अपने कंधे पर लेनी चाहिए थी। लेकिन वे उलटे रास्ते पर चलते नजर आ रहे हैं।

देश के प्रगतिशील और धर्मनिरपेक्ष खेमे में २००४ में उभरी आम सहमति को कांग्रेस अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर पहले ही तोड़ चुकी है। उसने इस मुद्दे पर वामपंथी दलों से नाता तोड़ लिया, जो आम सहमति का खास हिस्सा थे। बल्कि इस आम सहमति को विश्वसनीय और उद्देश्यपूर्ण बनाने में सबसे महत्त्वपूर्ण भूमिका वामपंथी दलों की ही थी। अब मनमोहन सिंह को फिर से अपना नेता बता कर कांग्रेस वामपंथी दलों से अपनी दूरी और बढ़ाने पर आमादा नजर आ रही है।

मनमोहन सिंह ने जिस तरह अमेरिका से परमाणु करार को अपनी प्रतिष्ठा का मुद्दा बनाया और उसे अंजाम तक पहुंचाने के लिए जिस रास्ते पर चले, उसके बाद देश के प्रगतिशाली समूहों में उनके लिए कोई सम्मान नहीं बचा है। खासकर सरकार के लिए बहुमत जुटाने के लिेए जिस तरह के तिकड़मों का सहारा लिया गया और राजनीतिक भ्रष्टाचार का जैसा खुला खेल हुआ, उसके बाद उनकी अपनी निजी छवि भी पहले जैसी नहीं बची। आज यह शायद ही कोई मानता हो कि मनमोहन सिंह एक टेक्नोक्रेट प्रधानमंत्री हैं, जो आम नेताओं के कल्चर से ऊपर हैं और जिनकी अपनी छवि बेदाग है। यह मुमकिन है कि इसके बावजूद डॉ. सिंह पूंजीपतियों के प्रिय हों और देश के उच्च मध्यम और मध्य वर्ग का एक बड़ा हिस्सा उन्हें बाकी नेताओं से बेहतर मानता हो, लेकिन हकीकत यही है कि इस देश की राजनीतिक तस्वीर ये तबके तय नहीं करते। वैसे भी ये तबके कांग्रेस से ज्यादा भाजपा का समर्थन आधार हैं।

अपने सहयोगी दलों, और व्यापक रूप से अपने समर्थन आधार का निरादर कर कांग्रेस ने देश में राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति पैदा दी है। उसके इस नजरिए से यूपीए के कई घटक दल चुनाव बाद के अपने विकल्पों पर अभी से सोचने लगे हैं। उधर वामपंथी दलों के पास कांग्रेस और भाजपा से अलग तीसरे विकल्प की संभावना तलाशने के अलावा कोई और चारा नहीं बचा है। दुर्भाग्य यह है कि इस तीसरे विकल्प के साथ भी ऐसे दल हैं, जिनकी अपनी निष्ठा संदिग्ध है। मायावती हों या जयललिता या फिर एचडी देवेगौड़ा अथवा चंद्रबाबू नायडू, ये सभी अतीत में भाजपा के सहयोगी रह चुके हैं। भविष्य में ये फिर उसी तरह का सहयोग भाजपा से नहीं करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। जाहिर है, इसके साथ एक फौरी ताकत तो बनाई जा सकती है, लेकिन धर्मनिरपेक्षता और प्रगतिशील नीतियों के आधार पर कोई भरोसेमंद विकल्प तैयार नहीं किया जा सकता।
ऐसे में अपना बहुमत न मिलने के बावजूद चुनाव के बाद भाजपा नेतृत्व वाली सरकार बन जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। या फिर संयुक्त मोर्चा जैसे अस्थिर प्रयोगों की गुंजाइश भी निकल सकती है। लेकिन ऐसे प्रयोग का हश्र देश पहले भी देख चुका है, और उसका दोहराव देश के लोकतांत्रिक-धर्मनिरपेक्ष एवं प्रगतिशील समूहों में सिर्फ असहाय होने का भाव ही पैदा करेगी।

यूपीए ने कोई ऐसा शासन नहीं दिया जिसकी सकारात्मक कसौटियों पर तारीफ की जाए। राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, सूचना का अधिकार कानून और आदिवासी एवं अन्य वनवासी भू-अधिकार कानून जैसी कुछ पहल का श्रेय इसे है, लेकिन यह कितनी अनिच्छा से हुआ और अमल में कैसी ढिलाई बरती गई, वह भी देश के सामने है। अपनी अभिजात्यवादी आर्थिक और विदेश नीतियों से यूपीए सरकार ने देश के बहुत से तबकों को नाराज किया। और आखिरकार मनमोहन सिंह की सरकार बचाने के लिए तमाम अनैतिक तरीकों का सहारा लेते हुए पिछले जुलाई सत्ताधारी गठबंधन ने बचा-खुचा ऐतबार भी खो दिया।

इसके बाद इसके पास एक ही थाती बची, और वह इसके सहयोगी दल हैं। लेकिन अपनी नासमझी और अहंकार में वह इन्हें भी गंवाने को तैयार है। ठीक उसी तरह जैसे एक जड़विहीन प्रधानमंत्री की जिद को पूरा करने के लिए उसने वामपंथी दलों के सिद्धांतनिष्ठ समर्थन को गंवा दिया। निष्कर्ष यही है कि सोनिया गांधी ने २००४ की अपनी भूमिका से अपनी जो आदरणीय छवि बनाई थी, पिछले कुछ महीनों से खुद ही वो लगातार उसका ध्वंस कर रही हैं। और इससे उन्हीं ताकतों के लिए बेहतर स्थितियां बन रही हैं, जिनके खिलाफ पहल कर उन्होंने अपने और अपनी पार्टी के लिए नई प्रासंगिकता और राजनीतिक वैधता हासिल की थी।

2 comments:

कुमार आलोक said...

अच्छा लगता है आपके इमानदार विश्लेषण को पढकर । पिछले चुनाव में अगर भाजपा फील गुड में डूबी थी उसी तरह कांग्रेस को भी कुछ इसी तरह की गलतफहमी हो गइ है । एक ऐसा फ्रंट जो साल में तैयार हुआ था वो बिखरकर रह गया है । तीसरे मोर्चे के बारे में भी स्थितियां अंधकारमय ही लगती है । लेकिन चाहे जो भी हो ्गामी आम चुनावों के परिणाम दोनों प्रमुख दल कांग्रेस और भाजपा के लिये चौंकानेवाले होंगे ।

anju said...

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