Saturday, February 21, 2009

स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा?


सत्येंद्र रंजन
तंक के खिलाफ अमेरिका की जंग मानवाधिकारों की कीमत पर लड़ी जा रही है, नागरिक अधिकार संगठन यह आरोप लंबे समय से लगाते रहे हैं। लेकिन अब इस बात की पुष्टि एक आधिकारिक रिपोर्ट से भी हो गई है। यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा बनाई गई जजों की समिति ने तैयार की है। समिति ने तीन साल तक ४० से ज्यादा देशों में विशेषज्ञों, सरकारी अधिकारियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार हनन के पीड़ित लोगों से बातचीत के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है।
रिपोर्ट में कहा गया है- ‘दुनिया के अग्रिम लोकतांत्रिक देशों में से एक अमेरिका ने आतंकवाद से लड़ने के लिए ऐसे तरीके अपनाए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानूनों के स्थापित सिद्धांतों से मेल नहीं खाते।’ १९९ पेज की इस रिपोर्ट में आठ न्यायविदों की समिति ने कहा है- ‘इसमें संदेह नहीं कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद का खतरा वास्तविक और भारी है और यह सरकारों का कर्त्तव्य है कि इस खतरे का मुकाबला करने के लिए वो प्रभावी कदम उठाएं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के सुस्थापित सिद्धांतों की अनदेखी कर दी जाए।’
रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए यातना, लोगों को गायब कर देने, गुप्त स्थान पर हिरासत में रखने में, निष्पक्ष सुनवाई न होने और सुरक्षा बलों द्वारा मा्नवाधिकारों के हनन को बर्दाश्त करने की घटनाएं बढ़ती गई हैं। रिपोर्ट ने इस खतरे के प्रति आगाह किया है कि जिन कदमों को आतंकवाद से लड़ने के क्रम में अपवाद और ‘अस्थायी’ बताया गया था, लोकतांत्रिक देशों में भी वो स्थायी होते जा रहे हैं।
आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अगर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं खुद गैर कानूनी कदम उठाने लगें और बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन करने लगें, तो समझा जा सकता है कि मानव सभ्यता के विकासक्रम को कितना बड़ा झटका लग रहा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस सवाल पर जागरूकता की बेहद कमी है। आतंकवाद का एक ऐसा हौव्वा खड़ा कर दिया गया है कि राजनीति से लेकर मीडिया तक के विमर्श में इसके खिलाफ लड़ाई के तरीकों पर कोई सवाल उठाना देशभक्ति के खिलाफ बता दिया जाता है। भारत में मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद जिस तरह आनन-फानन में राष्ट्रीय जांच एजेंसी और गैर कानूनी गतिविधि कानून में संशोधन विधेयक पास करा लिए गए, उससे बुनियादी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के औचित्य पर ही सवाल खड़ा हुआ। मगर मुख्यधारा राजनीति और मीडिया में किसी ने ये सवाल पूछने की जरूरत नहीं समझी।
मुंबई में आतंकवादी हमले से उमड़ी प्रतिक्रिया के आवेग के बीच भारत के प्रधान न्यायाधीश की चेतावनी की भी अनसुनी कर दी गई। न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन ने उस माहौल में भी इससे आगाह करना जरूरी समझा कि नागरिक अधिकारों को आतंकवाद विरोधी कानूनों की बलि न चढ़ाया जाए। अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा बनाई गई जजों की समिति की रिपोर्ट से दुनिया भर में जारी इस परिघटना की तरफ ध्यान खींचा गया है।
इस रिपोर्ट में दो बातें खास तौर पर गौरतलब हैं। पहली यह कि इस रिपोर्ट में ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ में अपनाई जा रही मौजूदा कसौटियों को ठुकरा देने की अपील की गई है और दूसरी यह कि इसमें बात पर जोर दिया गया है कि एक बेहतर आपराधिक न्याय प्रक्रिया से ही आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाए जा सकते है।
दरअसल, अब जरूरत इस रिपोर्ट के निष्कर्षों से भी आगे ले जाने की है। सवाल यह है कि क्या ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ का विचार सही है? यह शब्द ऐसी धारणा बनाता है कि जैसे आतंकवाद कोई एक इकाई हो, जिसका कोई एक मकसद हो और जो उस मकसद के लिए संगठित रूप से युद्ध लड़ रहा हो। जबकि वास्तव में बात ऐसी नहीं है। दुनिया में अलग-अलग तरह की चरमपंथी, उग्रवादी और आतंकवादी धाराएं हैं, जिनके पैदा होने की वजहें, मकसद और प्रेरणास्रोत अलग-अलग हैं। उन सबसे एक जैसे तरीकों से नहीं लड़ा जा सकता।
ध्यान देने की बात यह है कि हर तरह का गैर-सरकारी आतंकवाद इंसाफ न मिलने की भावना से ताकत प्राप्त करता है। यह इस भावना के गहराते जाने से पैदा होने वाली हताशा से उसे कार्यकर्ता मिलते हैं और इसी वजह से कुछ समुदायों का समर्थन हासिल होता है। बेशक, जैसाकि जजों की समिति ने कहा है, यह सरकारों का कर्त्तव्य है कि हिंसा और हमलों से अपने नागरिकों को बचाने का वो उपाय करें। लेकिन ये उपाय आतंकवाद की समस्या का हल नहीं हो सकते। टिकाऊ हल अन्याय की भावना को दूर करने से ही निकल सकता है, जबकि आतंकवाद विरोधी लड़ाई के लिए गैर कानूनी तरीके अपनाने से यह भावना और गहरी होती है।
लेकिन दुनिया भर में सरकारें कोई सबक लेती नजर नहीं आतीं। अमेरिका में बराक ओबामा के राष्ट्रपति से बनने से शुरुआत में जन्मी उम्मीद के कमजोर पड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगा है। ओबामा प्रशासन ने गुआंतानामो बे की गैर कानूनी जेल को बंद करने का फैसला तो किया, लेकिन उसके बाद वह गोपनीयता, यातना और आतंक से जंग की रुपरेखा पर बुश प्रशासन की नीतियों को अपनाते दिख रहा है। कंजरवेटिव अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल इस पर खुश होते हुए लिखा है- ‘ऐसा लगता है कि बुश प्रशासन की आतंक विरोधी रूपरेखा एक नई वैधता प्राप्त कर रही है।’ और इस पर अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के कार्यकारी निदेशक एंथनी डी रोमेरो का कहना है- ‘हाल की निराशाजनक घटनाओं से यह चिंता गहरी हो गई है कि ओबामा अंततः बुश प्रशासन की कुछ सबसे समस्याग्रस्त नीतियों को ही आगे बढ़़ाएंगे।’
जब दुनिया की विकसित चेतना के प्रतिनिधि जजों ने इंसान के बुनियाद हकों से जुड़ी एक बेहद गंभीर समस्या पर न सिर्फ रोशनी डाली है, बल्कि दुनिया को इसके खतरों से आगाह भी किया है, उस समय भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का उस पर ध्यान न देना मानव सभ्यता के सामने एक गंभीर चुनौती है। यह लोगों के यह कहने का समय है कि उनकी सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रताएं न छीनी जाएं। सरकारें खुद आतंकवादियों की तरह कानून और व्यवस्था की धज्जियां न उड़ाएं। यह हो सके इसके इसके लिए जरूरी यह है कि अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत की पहल से सामने आई सच्चाई आम जन तक पहुंचाई जाए।

1 comment:

anju said...

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