Tuesday, April 20, 2010

यह क्रिकेट तो कतई नहीं है

सत्येंद्र रंजन

शि थरूर गए। उन्हें जाना ही चाहिए था। थरूर ने अपने मंत्री पद के प्रभाव का इस्तेमाल इंडियन प्रीमियर लीग में कोच्चि की टीम रेंडवू नामक ग्रुप को दिलवाने में किया किया। इसके बदले रेंडवू ने उनकी दोस्त सुनंदा पुष्कर को ७५ करोड़ रुपए की ‘स्वीट इक्विटी’ यानी पुरस्कार स्वरूप शेयर दिए। यह बात तकनीकी रूप से भले घूस के दायरे में न आती हो, लेकिन वास्तविक अर्थ में इसे रिश्वत ही माना जाएगा। गौरतलब है कि थरूर और सुनंदा के जल्द ही शादी करने की चर्चा है। बहरहाल, यह मामला यह खुलासा भी कर गया है कि फ्रेंचाइजी कंपनियों ने पाक-साफ ढंग से आईपीएल की टीमें नहीं हासिल की हैं। इसके पीछे सत्ता के दुरुपयोग और बड़े पैसे का खेल रहा है।

कहा जा रहा है कि शशि थरूर ने अपने प्रभाव के इस्तेमाल से रेंडवू को कोच्चि की टीम दिलवा दी और इस तरह आईपीएल के कमिश्नर ललित मोदी की अडानी और वीडियोकॉन ग्रुपों को अहमदाबाद की टीम देने की मंशा नकाम हो गई। मोदी ने इसका बदला रेंडवू के शेयरधारियों का खुलासा ट्विटर पर अपने संदेश से कर दिया। इस तरह सुनंदा पुष्कर का नाम सामने आ गया और मोदी ने थरूर से बदला ले लिया। इस पर मोदी जरूर खुश होंगे।

लेकिन इस क्रम में आईपीएल के भीतर चल रहा सारा गड़बड़झाला भी सार्वजनिक चर्चा में आ गया है। इसके पहले कि आगे बढ़ें, इन बातों पर गौर कीजिए- “.... बीसीसीआई (पदाधिकारियों) के मालिकों के रूप में (आईपीएल) टीमों में सीधे हित जुड़े हुए हैं, इन लोगों का इसमें (आईपीएल) में सीधा लाभ है और यह एक खतरनाक बात है।.... जो लोग सबके लिए, खेल के सभी पहलुओं के बारे में खेल एवं देश के हित में और दीर्घकाल के लिए नियम बनाते हैं, उन्हें वैसे भी आईपीएल में शामिल होने से अलग रहना चाहिए।”

सोचिए, यह किसका बयान है। यह बयान है देश के खेल मंत्री एमएस गिल का। और ये बातें थरूर-मोदी विवाद सामने आने से काफी पहले कही गईं। इन बातों का मतलब समझने के लिए इस पर गौर कीजिए कि ललित मोदी आईपीएल के अध्यक्ष और कमिश्नर हैं और वे भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के उपाध्यक्ष भी हैं। एन श्रीनिवासन बीसीसीआई के सचिव हैं और इंडिया सीमेंट्स के बड़े पदाधिकारी भी हैं। इंडिया सीमेंट्स कंपनी आईपीएल की टीम चेन्नई सुपर किंग्स की मालिक है। के श्रीकांत भारतीय टीम के मुख्य चयनकर्ता हैं और वे चेन्नई की टीम के एबेंसडर भी हैं।

जब खेल मंत्री ने यह बयान दिया था, उस वक्त यह मालूम नहीं था कि आईपीएल की दो टीमों -राजस्थान रॉयल्स और किंग्स इलेवन पंजाब– में ललित मोदी के दो निकट रिश्तेदारों की हिस्सेदारी है। उस वक्त यह इल्जाम भी सामने नहीं आया था कि मोदी ने टीमों की बिडिंग प्रक्रिया के दौरान गोपनीय जानकारियां अपने लोगों को दीं, जिससे उन्होंने निविदा में आए दामों से थोड़ी ज्यादा रकम का दांव लगा दिया और टीम पाने में सफल हो गए। तब यह भी मालूम नहीं था कि मोदी के एक रिश्तेदार कंपनी को आईपीएल के मोबाइल अधिकार बेचे गए।

लेकिन कोई इस भ्रम में ना रहे कि शशि थरूर इन्हीं बातों से परेशान थे, इसलिए उन्होंने मोदी से लोहा लिया। नहीं, थरूर ने मोदी से कोई लोहा नहीं लिया। बल्कि एक दौर में मोदी से उनकी खूब छनती थी। अब सरसरी तौर पर जो बातें सामने आई हैं, उसके आधार पर यह कहा जा सकता है कि दोनों के बीच इस बात पर ठनी कि रेंडवू को टीम मिले या नहीं। मोदी नहीं चाहते थे, थरूर यह करवाने में सफल हो गए। सुनंदा पुष्कर को पुरस्कार दिलवाना इसके पीछे उनकी कितनी बड़ी प्रेरणा थी, कुछ ठोस ढंग से नहीं कहा जा सकता। लेकिन ऐसा करने के बदले सुनंदा को पुरस्कार मिला, यह साफ है।

अब इस भ्रम में भी रहने की जरूरत नहीं है कि इतना बड़ा गड़बड़झाला साफ हो जाने के बाद देश की व्यवस्था आईपीएल को दुरुस्त बनाने और बीसीसीआई को संदेहों के दायरे से बाहर लाने में लग जाएगी। गौर कीजिए कि जिस वक्त मीडिया में ललित मोदी द्वारा नियम-कायदों के उल्लंघन की खबरें जोरदार ढंग से छप रही हैं, उसी वक्त एक टीवी चैनल पर आकर केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने उनका बचाव किया। पवार कुछ समय पहले तक बीसीसीआई के अध्यक्ष थे और जल्द ही अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद (आईसीसी) के अध्यक्ष बनने वाले हैं। बीसीसीआई के मौजूदा अध्यक्ष शशांक मनोहर उनके ही आदमी माने जाते हैं। बीसीसीआई में नेताओं की मौजूदगी देखनी हो, तो इस सूची में केंद्रीय मंत्री फारूक अब्दुल्ला और सीपी जोशी से लेकर राज्यसभा में विपक्ष के नेता अरुण जेटली, गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी, कांग्रेस नेता राजीव शुक्ला और राष्ट्रीय जनता दल अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव तक नजर आएंगे। कई नेताओं के रिश्तेदार वहां मौजूद हैं। उद्योगपतियों के लोग वहां हैं। और पिछले तीन साल में आईपीएल के साथ देश के क्रिकेट से बॉलीवुड का ग्लैमर भी जुड़ा है।

इसलिए खेल मंत्री एमएस गिल संभवतः विवेक की ऐसी आवाज हैं, जो नक्कारखाने में तूती की तरह है। जहां देश के कई ताकतवर नेता, सबसे बड़े उद्योगपति एवं निवेशक, सबसे सफल फिल्म स्टार और तमाम क्रिकेटर एक पक्ष में हों, वहां सही-गलत की चेतावनी कौन सुनेगा? यह ठीक है कि आज थरूर-मोदी विवाद से उछले कीचड़ की वजह से ललित मोदी का धन एवं सफलता के दर्प से चमकता चेहरा धूमिल हो गया है। यह भी सच है कि कल तक जिस आईपीएल को क्रिकेट की नई लोकप्रियता और क्रिकेट के कारोबार में कामयाबी का प्रतीक माना जा रहा था, वह आयोजन आज संदेह के गहरे घेरे में है। इसके बावजूद आय कर विभाग द्वारा शुरू की गई कार्रवाई जांच के दायरे को व्यापक करते हुए किसी तार्किक परिणाम तक जाएगी, ऐसा सोचना उम्मीद के खिलाफ जैसे उम्मीद करने जैसा है।

बहरहाल, आशंकाओं का दायरा इतना बड़ा है कि अब मेनस्ट्रीम मीडिया में भी इस आयोजन की तुलना अमेरिकन बेसबॉल के ब्लैक सॉक्स घोटाले से की जा रही है। एक दौर में उस टूर्नामेंट में काले धन, अंडरवर्ल्ड, सट्टेबाजों, और मैच फिक्सिंग करने वाले खिलाड़ियों का ऐसा जमावड़ा हो गया था कि उसकी सफाई के लिए प्रशासन को कड़े कदम उठाने पड़े। क्रिकेट में कुछ ऐसा ही नज़ारा १९८० के दशक में शारजाह में देखने को मिला, जहां अब्दुल रहमान बुखातिर ने दाऊद इब्राहिम समेत दूसरे अंडरवर्ल्ड डॉन्स, फिल्मी सितारों, सट्टेबाजों और मैच फिक्सिंग का ऐसा तालमेल रचा, जिससे क्रिकेट की पूरी दुनिया कलंकित हो गई। उस दौर में केसी सिंह संयुक्त अरब अमीरात में भारत के राजदूत थे। थरूर-मोदी का ताजा विवाद उभरने के बाद उन्होंने एक टीवी चैलन पर कहा कि उस दौर में जो शारजाह में हो रहा था, वह अब उससे भी बड़े स्तर पर आईपीएल में देखने को मिल रहा है।

इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि समस्या कितनी गंभीर है। ललित मोदी ने कोच्चि टीम में निवेश के स्वरूप को बेनकाब किया, तो दूसरी टीमों के मालिकाने पर भी सवाल उठ खड़े हुए हैं। मोदी पर आरोप लगा है कि टीमों के लिए बिडिंग (निविदा) के दौरान वे गोपनीय सूचनाएं लीक करते रहे हैं और कोच्चि की टीम मैदान से हट जाए, इसके लिए उन्होंने सवा दो अरब रुपए घूस देने की पेशकश की थी। टीमों में निवेश के लिए धन कैसे जुटाया गया, इस पर इससे भी गंभीर सवाल हैं। क्या मॉरीशस रूट से पैसा लाकर मनी लॉन्ड्रिंग (काले धन को गैर कानूनी रूप से सफेद करना) के मकसद से उनका कई टीमों में निवेश हुआ है? अगर ऐसा हुआ है तो जाहिर है कि पैसा लगाने वालों का उद्देश्य क्रिकेट की सेवा या खेल से लगाव नहीं, बल्कि अपने काले कारोबार को आगे बढ़ाना ही होगा।

शशि थरूर से सुनंदा पुष्कर का नाम जुड़ा है, तो यह संगीन सवाल भी सामने है कि दक्षिण अफ्रीका की मॉडल गैब्रियला दिमित्रिए़दस के साथ आखिर ललित मोदी के क्या संबंध रहे हैं? आखिर मोदी क्यों चाहते थे कि ग्रैबियला भारत ना आए? ग्रैब्रियला को वीजा न मिले इसके लिए वो थरूर के दफ्तर को भेजे गए उनके ई-मेल उजागर हो चुके हैं। क्या ये बातें यह बयान नहीं करतीं कि आईपीएल हर तरह के भ्रष्ट आचरण, मर्यादा की अनदेखी और संभवतः कानून के उल्लंघन का भी अखाड़ा बना हुआ है?

सब कुछ ठीक-ठाक नहीं है, इसके संकेत तो लगातार मिल रहे थे। मगर आईपीएल की सफलता का मीडिया में महिमामंडन इस कदर होता रहा है कि सामने दिख रही गड़बड़ियों पर सवाल उठाना अभी तक मुश्किल लगता था। मसलन, आईपीएल के मैच शबाब के डांस और शराब में डूबे धनाढ्य दर्शकों के साथ नाइट क्लब जैसा नजारा पेश करते हैं। एसएमएस से खेले जाने वाले कई खेल बिल्कुल जुआ हैं और ये आईपीएल मैचों में कसिनों का अंदाज जोड़ते रहे हैं। मगर इन सबको एक साथ जोड़ कर आईपीएल द्वारा पेश की जा रही संस्कृति पर किसी हलके से सवाल नहीं पूछे गए।
तेज म्यूजिक, चीयर गर्ल्स के डांस और आतिशबाजियों की चमक एवं शोर के बीच इस बात पर कौन ध्यान देता कि इन सबके बीच क्रिकेट के साथ क्या हो रहा है? बीच-बीच में कभी सौरव गांगुली, तो कभी शेन वॉर्न यह कहते रहे हैं कि चौकों और छक्कों को आसान बनाने के लिए बाउंड्री लगातार छोटी की जा रही है। कभी हरभजन सिंह यह शिकायत जताते रहे कि क्रिकेट के इस नए रूप में गेंदबाज बलि का बकरा बन गए हैं, जिन्हें रोज कटना ही होता है। मदमत्त दर्शक ऊंचे छक्कों पर उछलते हैं, इसलिए छक्के खूब लगें, इसे सुनिश्चित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई है। मैचों के बीच में खिलाड़ियों से कमेंटेटर्स की बातचीत का उनकी एकाग्रता और इस लिहाज से खेल पर क्या असर हो सकता है या अंपायर से बातचीत के बीच कोई उनका अहम फैसला प्रभावित हो सकता है, इस पर भी सोचने की फुर्सत किसी को नहीं रही है।
क्रिकेट गेंद और बल्ले के बीच मुकाबले का खेल है। प्रतिस्पर्धा बराबरी की हो, तभी इस खेल का असली आनंद है। लेकिन आईपीएल में गेंदबाजी को जैसे अप्रसांगिक ही कर देने की कोशिश देखने को मिल रही है। क्रिकेट से लगाव रखने वाले लोग दुनिया भर में इससे चिंतित हैं, मगर आईपीएल के शोर-शराबे में उनकी बात कौन सुनता है?

एक बार फिर खेल मंत्री गिल के बयान की तरफ लौटते हैं। गिल तब आरोप लगाया था कि आईपीएल में नियम बदले जा रहे हैं और मनोरंजन के नाम पर खेल की स्थितियों को बल्लेबाजों के मुताबिक ढाला जा रहा है, जिससे खेल में गेंदबाजों की भूमिका घट रही है। उन्होंने कहा- “गेंदबाज सिर्फ शिकार है और और बल्लेबाजों के लिए अब म़ॉन्गूज बैट है.. मैं कोबरा बैट का इंतजार कर रहा हूं। मैंने सुना है कि बाउंड्रीज छोटी कर दी गई हैं। यह सब लोगों के मनोरंजन के लिए किया जा रहा है। गेंदबाज इस प्रोमोशन में सिर्फ एक हथकंडा बनकर रह गए हैं।” गिल ने कहा- “पांच दिन के टेस्ट मैचों के लिए चुनौती पैदा हो गई है, आप देखते हैं कि उन्हें देखने को कोई नहीं आता। यहां तक कि ५० ओवरों के मैच को भी घटाकर २० ओवरों का कर दिया गया है। कभी-कभी मैं मजाक में कहता हूं कि टी-५ या टी-१ खेलो या फिर आधे ओवर में मैच निपटा दो।”

गिल की इन बातों में हजारों क्रिकेट प्रेमियों का दर्द है। जब ये क्रिकेट प्रेमी नए खेल के कर्ता-धर्ताओं के खेल की समझ पर नजर डालते हैं तो तरस खाने के अलावा उनके पास और कुछ करने को नहीं होता। मसलन, खिलाड़ियों की लगाई गई कीमतों पर ध्यान दीजिए। जब ईशांत शर्मा ग्लेन मैक्ग्रा से महंगे बिकें या काइरन पोलार्ड को रिकी पॉन्टिंग या राहुल द्रविड़ से ज्यादा पैसे मिलें, तो समझा जा सकता है कि आईपीएल में प्रतिभा, खेल की गहराई और उपलब्धियों की कितनी अहमियत है। मगर ये सवाल कौन पूछे? धनी-मानी निवेशकों, प्रचार के भूखे एवं अपनों को फायदे पहुंचाने पर आमादा राजनेताओं, मोदी मार्का क्रिकेट प्रशासकों और प्रायोजकों ने एक ऐसा आभामंडल बुन रखा है, जिसमें बनावटी चीज असली से भी ज्यादा ठोस दिख सकती है।

यह ठीक है कि आईपीएल ने अपना नया बाजार बनाया है। उसने क्रिकेट के दर्शक बनाए हैं। इनके बूते पर आईपीएल मैचों को अपेक्षाकृत ऊंची टीआरपी मिल रही है। इससे प्रसारक टीवी चैनल को ऊंची दरों पर विज्ञापन मिल रहे हैं। साथ ही विज्ञापन का पैसा इलेक्ट्रॉनिक और प्रिंट समाचार माध्यमों में भी बह रहा है। यानी जिनके बड़े दांव हैं, उन सबको फायदा है।

तो सूरत आखिर कैसे बदलेगी? जैसाकि हमने ऊपर देखा है, इस गोरखधंधे के चलते रहने में बड़े-बड़े रसूखदार लोगों के हित हैं। खिलाड़ियों को भी इस धंधे की वजह से उतना पैसा मिल रहा है, जो पहले वे सपने में भी नहीं सोच सकते थे। खिलाड़ियों को पैसा मिले, यह अच्छी बात है। आखिर उनकी ही प्रतिभा से तो यह पूरा धंधा चल रहा है। लेकिन समस्या तब होती है, जब खेल से पैसा मिलने के बजाय खिलाड़ी पैसे के लिए ही खेलने लगते हैं। इसका तार्किक परिणाम सट्टेबाजों के शिकंजे और मैच फिक्सिंग के रूप में सामने आता है, ऐसा कई खेलों का इतिहास हमें बताता है। क्या खेल और दर्शकों के साथ ऐसे विश्वासघात की आशंका को कोई आज बेबुनियाद बता सकता है?

क्रिकेट का यह आईपीएल दौर खिलाड़ियों के नजरिए को कैसे बदल रहा है, इस समझने के लिए हमें राहुल द्रविड़ जैसे दिग्गजों की राय पर गौर करना चाहिए। द्रविड़ एक थिंकिंग (सोचने-समझने वाले) क्रिकेटर माने जाते रहे हैं। कुछ समय पहले क्रिकइन्फो डॉट कॉम की एक चर्चा में उन्होंने कहा कि सुरेश रैना और रोहित शर्मा जैसे आज के प्रतिभाशाली खिलाड़ियों में टेस्ट खेलने की वैसी बेताबी नज़र नहीं आती, जैसी उनकी (द्रविड़ की) पीढ़ी के खिलाड़ियों में होती थी। द्रविड़ ने कहा कि फिर भी वे इन खिलाड़ियों को लेकर चिंतित नहीं हैं, जिनके सामने सचिन तेंदुलकर, सौरव गांगुली, वीरेंद्र सहवाग जैसे रोल मॉडल्स थे। द्रविड़ की इस सूची में खुद उनका, अनिल कुंबले और वीवीए लक्ष्मण का नाम भी जोड़ा जा सकता है। बहरहाल, द्रविड़ ने भविष्य की पीढ़ी को लेकर गहरी चिंता जताई, जिसके सामने ये रोल मॉडल्स नहीं होंगे। उनके सामने वैसे रोल मॉडल्स होंगे, जिन्हें टेस्ट क्रिकेट अहम नहीं लगता, क्योंकि उनके लिए क्रिकेट खेलने का मतलब तुरत-फुरत में पैसा कमाना है।

पैसे के इस खेल में क्रिकेट को साढ़े तीन घंटे की फिल्म के फॉर्मेट में ढाल दिया गया है। हर शॉट के परिमाण की झलक आप प्रिटी जिंटा, शिल्पा शेट्टी, या शाहरुख खान के चेहरे पर देखते हैं। उनके साथ अर्धनग्न नाचती चीयरगर्ल्स हैं। यानी पूरा मनोरंजन! मनोरंजन के इस कारोबार ने नए दर्शक बनाए हैं। इस कथित क्रिकेट का एक नया बाजार बनाया है। वैसे लोगों का जिन्हें क्रिकेट की बारीकियां बोरिंग लगती हैं, लेकिन धन-दौलत एवं सेक्सी चेहरों का ग्लैमर क्रिेकट लगता है।
भारत में क्रिकेट की गहरी जड़ें रही हैं। इसका आधार औपनिवेशिक समाज की कसौटियों के मुताबिक सभ्रांत होने की दबी-छिपी आकांक्षाओं में छिपा रहा है। १९८३ में विश्व कप में जीत के बाद इस खेल ने लोकप्रियता की जैसे हदें तोड़ दीं। ललित मोदी का नया फॉर्मेट इसी लोकप्रियता को आज भुना रहा है और इसमें नए तत्व जोड़ कर उनकी मार्केटिंग कर रहा है। लेकिन इसमें जो चीज शिकार हो गई है, वह है क्रिकेट और उसकी भावना।

बहरहाल, सरकार अगर अब भी जागे तो क्रिकेट और इसकी भावना को बचाया जा सकता है। ललित मोदी एवं बीसीसीआई के खिलाफ आयकर विभाग की शुरू हुई कार्रवाई सही दिशा में है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अंजाम तक पहुंचेगी? सवाल यह भी है कि सरकार आखिर आयकर विभाग के साथ-साथ सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय आदि जैसी एजेंसियों से इस पूरे प्रकरण की जांच क्यों नहीं कराती, ताकि जिस खेल को देश के करोड़ों लोग मजहब का दर्जा देते हैं, उसकी पवित्रता बहाल की जा सके?

ये सब कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका संबंध क्रिकेट और क्रिकेट प्रेमियों से है, और देश के कानून से भी। इसीलिए इस वक्त बड़ी चिंता की बात यह है कि कहीं यह सारा विवाद थरूर बनाम मोदी बनकर न रह जाए। अगर ऐसा हुआ तो क्रिकेट में लग रहे घुन की सफाई का एक बड़ा मौका हाथ से निकल जाएगा।

जब क्रिकेट इंग्लैंड के सभ्रांत वर्ग का खेल था, तब अंग्रेजी का यह मुहावरा बना कि इट्स नॉट क्रिकेट। यानी यह क्रिकेट नहीं है। यह मुहावरा आम जिंदगी में तब बोला जाता है, जब कोई स्थापित मर्यादा या शिष्ट शैली का आचरण नहीं करता। इसलिए कि क्रिकेट में ये ही दो बातें - मर्यादा और शिष्टता- सर्वोपरि रही हैं। क्रिकेट कभी विश्वव्यापी खेल नहीं रहा। लेकिन अमेरिका और बहुत से देशों में जहां लोग इस खेल को नहीं जानते थे, वहां भी अंग्रेजी भाषी लोग इस मुहावरे का इस्तेमाल करते थे। यह क्रिकेट की महिमा थी। वह महिमा आज खतरे में है। आज हम बेशक और बेहिचक यह कह सकते हैं कि जो हो रहा है, वह क्रिकेट नहीं है।

2 comments:

Suman said...

nice

arfa said...

thoroughly researched and well woven.. A complete picture of the controversy built around the past glory.. Yes it is not cricket..