Saturday, May 23, 2009

अब उस मोर्चे को भूल जाइए


सत्येंद्र रंजन
मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने लोकसभा चुनाव में अपनी हार के बाद यह स्वीकार कर लिया है कि उसने तीसरे मोर्चे का जो विकल्प देश के सामने पेश किया, वह विश्वससनीय नहीं था, और देश की जनता ने उसे ठुकरा दिया। हालांकि माकपा ने अपनी यह राय दोहराई है कि देश को गैर कांग्रेस-गैर भाजपा विकल्प की जरूरत है, लेकिन साथ ही उसने अपनी यह नई समझ भी जताई है कि ऐसा विकल्प चुनाव से ठीक पहले जोड़-तोड़ कर नहीं बन सकता। ऐसा विकल्प साझा कार्यक्रम और सहमति के मुद्दों पर लगातार संघर्ष से ही विकसित हो सकता है।

पश्चिम बंगाल और केरल में माकपा, या वाम मोर्चे की क्यों हार हुई, इस पर पार्टी अभी अपनी राज्य शाखाओं के जायजे का इंतजार कर रही है, इसलिए अभी उसने कोई ठोस राय नहीं जताई है। बहरहाल, माकपा महासचिव प्रकाश करात की इस बात में दम है कि वाम मोर्चे की श्रद्धांजलि लिख रहे लोग, जल्दबाजी कर रहे हैं। करात के मुताबिक वाम दल पहले भी ऐसे संकट से गुजरे हैं और हर बार ज्यादा मजबूत होकर उभरे हैं। बदले हालात में यह दावा कितना कारगर होगा, इस सवाल को हम भविष्य पर छोड़ सकते हैं। लेकिन देश में वामपंथ की राजनीति की एक विस्तृत जगह है, यह बात बेहिचक कही जा सकती है।

तीन झलकियों से इस बात को आगे बढ़ाया जा सकता है। एमजे अकबर देश के वरिष्ठ पत्रकार हैं। एक समय कांग्रेस में रहे और पिछले कुछ समय से उन्हें भाजपा के करीब माना जाता है। यानी किसी भी स्थिति में उन्हें वाम मोर्चे का समर्थक या उससे हमदर्दी रखने वाला नहीं माना जा सकता। लेकिन इस बार जब चुनाव नतीजे आ रहे थे, एक टीवी न्यूज चैनल पर उन्होंने कहा- लेफ्ट की हार का मुझे दुख है। ये चेक एंड बैलेंस (अवरोध और संतुलन) की बड़ी ताकत थे और इनकी वो हैसियत बने रहना देश के हित में था।

तकरीबन १६ साल पहले जब पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व में मनमोहन सिंह नव-उदारवाद एवं भूमंडलीकरण की नीतियों को तेजी से आगे बढ़ा रहे थे, तभी भविष्य निधि में जमा रकम पर ब्याज दर घटाने और कथित श्रम सुधारों के जरिए मजदूरों की छंटनी को आसान बनाने की कोशिश की जा रही थी। उन दिनों मैं एक अखबार में नौकरी करता था। वहां पेस्टिंग विभाग में एक कर्मचारी था, जो भाजपा के उग्र हिंदुत्व का समर्थक और भाजपा का मतदाता था। जब सरकार वह कानून बनाने पर आमादा नजर आई तो एक दिन उन्होंने उम्मीद जताई कि लेफ्ट वाले कुछ करेंगे। मुझसे पूछा- क्या लेफ्ट सरकार को नहीं रोकेगा? हालांकि उनके पास मेरे इस सवाल का कोई जवाब नहीं था कि वोट तो आप भाजपा को देते हैं, तो ऐसे मामलों में उम्मीद कम्युनिस्टों से क्यों जोड़ते हैं!

चो रामास्वामी मशहूर पत्रकार हैं। दक्षिणपंथी रुझान रखते हैं। १९९० के दशक के उत्तरार्द्ध से भाजपा के करीब हैं। माना जाता है कि एनडीए सरकार के लिए सहयोगी जुटाने में अहम भूमिका निभाई थी। कुछ साल पहले पत्रकारों को दिए जाने वाले एक पुरस्कार के समारोह में वक्ता थे। वहां उन्होंने एक गौरतलब टिप्पणी की। कहा, इन दिनों ईमानदार नेता सिर्फ कम्युनिस्ट पार्टियों में पाए जाते हैं, लेकिन उनकी विचारधारा इतनी दोषपूर्ण है कि कंट्री कैन नॉट बी लेफ्ट ऑन द लेफ्ट (यानी देश को वामपंथी दलों के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता)।

प्रबुद्ध वर्ग से लेकर आम जन में वामपंथी दलों के बारे में मौजूद धारणाओं के ये तीन उदाहरण हैं। ये धारणाएं भारतीय राजनीति के क्षितिज पर वामपंथी दलोँ को एक अलग स्थान प्रदान करती हैं। यह स्थान छोटा है, तथा फिलहाल और सिकुड़ गया है, लेकिन इससे वामपंथी दलों को वह नैतिक ऊंचा स्थल प्राप्त होता है, जहां से वो अपनी बातें जनता के सामने आत्मविश्वास के साथ कह सकें। जारी आर्थिक मंदी के बीच दुनिया भर में वामपंथी विमर्श को नई विश्वसनीयता मिली है। यहां तक कि भारत के कॉरपोरेट मीडिया में भी यह बात स्वीकार की गई है कि अगर लेफ्ट का दबाव न होता और मनमोहन सिंह सरकार कई नव-उदारवादी कदमों को उठाने में सफल हो गई होती, तो मंदी की भारत पर मार और गहरी पड़ी होती।

राज्य-व्यवस्था में आम जन की तरफ से हस्तक्षेप की लोगों की उम्मीद राष्ट्रीय राजनीति में वाम मोर्चे को भूमिका को प्रासंगिक बनाए हुए है। ईमानदारी की उनकी छवि उनकी एक ऐसी थाती है, जिससे वो इस भूमिका में अपनी धार को और तेज बना सकते हैं। लेकिन ऐसा करने में वे तभी कामयाब होगें, जब तीसरे मोर्चे जैसे हाल के प्रयोग से अंतिम रूप से नाता तोड़ लें। अब यह बात स्वीकार किए जाने की जरूरत है कि जयललिता से लेकर मायावती, मुलायम से लेकर लालू यादव, और करुणानिधि से लेकर देवेगौड़ा नीतिगत रूप में कहीं भी एक अलग पहचान या विकल्प पेश नहीं करते। ना ही उनमें बुनियादी वैचारिक ईमानदारी है और ना कोई दीर्घकालिक राजनीतिक निष्ठा। बल्कि इस अर्थ में कांग्रेस की भूमिका ज्यादा स्पष्ट है। भले ही मजबूरी में, लेकिन राजनीतिक सिद्धांत के दायरे में वह एक धर्मनिरपेक्ष ताकत है।

वाम मोर्चा अगर सचमुच तीसरी ताकत उभारना चाहता है, तो उसे देश भर में फैले जन संगठनों और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों की तरफ निगाह दौड़ानी चाहिए। कुछ साल पहले माकपा ने ऐसा इरादा जताया था। यह बात ठीक है कि इन संगठनों और आंदोलनों में भी अहंकार एवं सोच की संकीर्णता का प्रभाव अक्सर पाया जाता है, लेकिन माकपा या वाम मोर्चे ने भी संसदीय दायरे से निकल कर उन्हें साथ लेने और उनके साथ असली मोर्चा बनाने की गंभीर कोशिश नहीं की। लंबे समय बाद इस लोकसभा चुनाव में बिहार में यूनाइटेड लेफ्ट ब्लॉक उसने जरूर बनाया, लेकिन उसका दायरा व्यापकतम नहीं था। लेकिन अगर उसे एक शुरुआत माना जाए, मोर्चे को सिर्फ चुनावी मकसदों तक सीमित न रखा जाए, और जिन मुद्दों पर जनता वाम दलों से संघर्ष को नेतृत्व देने की उम्मीद रखती है, उसका एक कार्यक्रम पेश किया जाए तो १५ वीं लोकसभा के चुनाव में लगा झटका दरअसल, देश में वामपंथी राजनीति के लिए एक नया अवसर साबित हो सकता है।

इतिहास के इस मौके पर वामपंथी दलों के पास यही भूमिका है। केंद्र में सरकार को बाहर संचालित करने की महत्त्वाकांक्षा फिलहाल उन्हें छोड़ देनी चाहिए। फिलहाल उन्हें सरकार बनाने वाला नहीं, बल्कि संघर्ष करने वाला तीसरा मोर्चा बनाना चाहिए।

Monday, May 18, 2009

झटका तगड़ा और चोट गहरी है


सत्येंद्र रंजन
वामपंथ को लगा झटका तगड़ा है। खासकर पश्चिम बंगाल में। भूगोल की भाषा में जिसे टेक्टोनिक शिफ्ट यानी जमीन के अंदर चट्टान का दरकना कहा जाता है, मामला कुछ वैसा है। राज्य के उद्योगीकरण का उत्साह लेफ्ट फ्रंट को महंगा पड़ा। नंदीग्राम और सिंगूर से उठी कंपन जमीन के नीचे फ्रंट की जड़ों तक पहुंच गई। यह साफ है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी और उसके सहयोगी दल पहले से इस बात का अंदाजा नहीं लगा सके, हालांकि पंचायत चुनाव और कई उपचुनावों से इसके संकेत मिल रहे थे।

नंदीग्राम और सिंगूर ने कुछ वैसे तबकों को नाराज किया, जो वाम मोर्चे का पिछले तीन दशक से आधार थे। चूंकि नंदीग्राम में मुस्लिम समुदाय के किसान ज्यादा थे, इसलिए इस मुद्दे ने मुस्लिम समुदाय में गुस्सा भर दिया। उधर वाम मोर्चा विरोधी सभी ताकतें एकजुट हो गईं। यह ममता बनर्जी से लेकर माओवादियों तक का गठबंधन था, जिसमें सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर जैसी ताकतों को भी अपनी भूमिका और प्रासंगिकता ढूंढने का मौका मिल गया। कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस में चुनावी गठजोड़ हो जाने से वाम मोर्चा विरोधी वोटरों को एक ठोस विकल्प मिल गया। नतीजा ऐसे चुनाव परिणाम हैं, जिसका अगर वाम मोर्चा को अंदेशा नहीं था, तो उसके विरोधियों को भी इसकी उम्मीद नहीं थी।

अगर पश्चिम बंगाल में यह झटका नहीं लगता तो केरल में पराजय को हर पांच साल में वहां से आने वाले उलटे नतीजों की बात कह कर वामपंथी पार्टियां गहरे आत्म मंथन से बच सकती थीं। लेकिन अब उनके पास ऐसा कोई बहाना नहीं है। इसलिए उन्हें अब यह सोचना पड़ रहा है कि आखिर क्यों उनका अपना जनाधार खिसक गया। बहरहाल, स्थानीय कारणों के अलावा कुछ और वजहें हैं, जिन पर इन दलों के सिद्धांतकारों को अब सोचना चाहिए।

वामपंथी दलों ने २००४ में एक सुविचारित राजनीतिक लाइन के तहत कांग्रेस नेतृत्व वाली सरकार को केंद्र में बाहर से समर्थन दिया था। २००८ में उन्होंने सिद्धांत के आधार यह समर्थन वापस लिया। इन दोनों कदमों के राजनीतिक तर्क थे और इससे लेफ्ट की छवि उसके समर्थक और उससे सहानुभूति रखने वालों तबकों में ऊंची हुई। लेकिन इसके बाद वामपंथी दलों ने तीसरा मोर्चा बनाने की जो राजनीतिक लाइन ली, वह उसके बहुत से समर्थकों के भी गले नहीं उतरी।

कांग्रेस और भाजपा का विकल्प तैयार किया जाए, देश में बहुत से लोग चाहते हैं। लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या मायावती, जयललिता, चंद्रबाबू नायडू, भजनलाल, बाबूलाल मरांडी और नवीन पटनायक ऐसा विकल्प दे सकते हैं? गैर कांग्रेस- गैर भाजपा विकल्प धुर दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता की विरोधी ताकतें ही मुहैया करा सकती हैं। ऊपर जिन नेताओं का जिक्र आया है, उनमें सभी उस दौर में भाजपा से हाथ मिला चुके हैं, जब वह आक्रामक सांप्रदायिकता की सियासत कर रही थी, और उन नेताओं के दलों की आर्थिक नीतियां किसी भी रूप में कांग्रेस या भाजपा से अलग हैं, यह बात कोई विवेकशील व्यक्ति नहीं कह सकता।

तो क्या ये दल सिर्फ इसलिए कांग्रेस और भाजपा का विकल्प हो सकते थे कि वामपंथी दलों के साथ उन्होंने कार्यनीतिक (टैक्टिकल) समझौता कर लिया? चुनाव नतीजों से जाहिर है कि वामपंथी दल उन दलों को तो जनता की निगाह में वैधता तो नहीं दिला सके, खुद उनकी साख पर सवाल जरूर उठ खड़े हुए। अब वामपंथी दलों के सामने चुनौती खोयी साख को फिर से वापस पाने की है। इन दलों को अब इस सवाल पर विचार करना चाहिए कि क्या सिद्धांतहीन तीसरा विकल्प देने की राह पर चलना अब भी उचित है? क्या बेहतर यह नहीं होगा कि वो सिद्धांतनिष्ठ वामपंथी विकल्प तैयार करें? भले यह देश की राजनीति में छोटी ताकत रहे, लेकिन उसका नैतिक कद और रुतबा ज्यादा प्रभावशाली हो सके?

यह विडंबना ही है कि २००४ से साढ़े चार साल तक रचनात्मक और सकारात्मक भूमिका निभाने के बाद लेफ्ट फ्रंट बेहद कमजोर होकर १५वीं लोकसभा में लौटा है, जबकि यूपीए सरकार ने जो कदम लेफ्ट के दबाव में उठाए उसका फायदा उठाते हुए कांग्रेस १८ साल में सबसे बेहरतीन प्रदर्शन कर पाई है। कांग्रेस की सफलता के पीछे मनमोहन सिंह सरकार के प्रदर्शन को एक बड़ी वजह बताया जा रहा है। इस प्रदर्शन में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, आदिवासी एवं अन्य वनवासी भू-अधिकार कानून, सूचना का अधिकार कानून और किसानों के लिए कर्ज माफी को अहम बताया गया है। राजनीति पर निगाह रखने वाले किसी भी शख्स को यह कहने में शायद ही कोई हिचक हो कि यूपीए सरकार ने इनमें से हर कदम लेफ्ट के दबाव में उठाया।

जबकि लेफ्ट के दबाव की वजह से रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता, बैंकों में विदेशी निवेश, और कई सरकारी कारखानों में विनिवेश रोके जा सके। अगर ऐसा नहीं होता विश्वव्यापी मंदी की भारत पर मार और गहरी होती। यानी जिन कदमों के लिए यूपीए सरकार में उत्साह नहीं था वो उसे उठाने पड़े और जिन कई कदमों के लिए अति उत्साह था, उन्हें वह नहीं उठा सकी। इसका सीधा श्रेय वामपंथी दलों को था। लेकिन इसका फायदा कांग्रेस को मिला, जबकि वामपंथी दलों की कमर टूट गई। वामपंथी दलों के लिए यह भी गहरे विचार-विमर्श का विषय है कि आखिर वो अपने राजनीतिक संघर्षों का फायदा क्यों नहीं उठा सके?

२००९ के जनादेश ने वामपंथी दलों को मनमोहन सिंह सरकार को समर्थन देने या ना देने की दुविधा से बचा दिया है। इस जनादेश ने उनकी संभवतः वैसी हैसियत भी नहीं छोड़ी है कि वो कोई बड़ी राष्ट्रीय भूमिका निभाने का भ्रम पाल सकें। ताजा जनादेश ने भाजपा को भी १९९१ से पहले की हालत में पहुंचा दिया है, इसलिए सांप्रदायिकता विरोधी कार्यनीति को अपनाने की मजबूरी भी फिलहाल उनके सामने नहीं है। ऐसे में यह झटका लेफ्ट के लिए एक अवसर भी साबित हो सकता है। वो गंभीर मंथन करें तो २०११ से पहले ऐसे सुधार के कदम उठा सकते हैं, जिससे पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में वो अपना गढ़ बचा सकें। अगर वो तीसरा मोर्चे जैसे विकल्प का भ्रम छोड़ दें और वाम मोर्चे को वैचारिक एवं सांगठनिक रूप से मजबूत करें तो कम से कम नीतियों में वो देश के सामने वामपंथी विकल्प जरूर पेश कर सकते हैं। लेकिन केंद्र सरकार पर ऐसी नीतियों का दबाव बन सके, इसके लिए अब उन्हें कम से कम पांच साल इंतजार करना होगा।

Sunday, May 17, 2009

एक संतोष ओर ढेरों आशंकाएं


सत्येंद्र रंजन
विजेता का जयगान मीडिया और बुद्धिजीवियों का स्वभाव है, इसलिए इसमें कोई हैरत नहीं कि लोकसभा चुनाव के अप्रत्याशित नतीजों के बाद कांग्रेस और उसके नेताओं के उन पहलुओं में भी गुण ढूंढे जा रहे हैं, जिनकी सामान्य स्थितियों में आलोचना की जाती। बहरहाल, अंग्रेजी की कहावत- Nothing succeeds like success- (यानी सफल होने से ज्यादा बड़ी सफलता कोई और नहीं होती) के चरितार्थ होने को अगर दरकिनार कर दें, तो हम ताजा जनादेश के मतलब को व्यापक और दूरगामी लोकतांत्रिक संदर्भों में कहीं बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। इस जनादेश ने कुछ मिथकों को तोड़ा है, सकारात्मक राजनीति के लिए अनुकूल स्थितियां पेश की हैं, लेकिन जनतांत्रिक आकांक्षाओं के लिए नई चुनौतियां भी इससे सामने आई हैं।

सबसे बड़ा मिथक उत्तर प्रदेश से आए नतीजों से टूटा है। ये मिथक यह था कि जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बीच जिस पार्टी या नेता का कोई जातिगत वोट बैंक नहीं है, वह चुनाव नहीं जीत सकता। कांग्रेस के बारे में आम धारणा थी कि देश के सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य में उसका सांगठनिक ढांचा नष्ट हो चुका है, ऐसे में उसके वोट तो बढ़ सकते हैं, लेकिन वे वोट सीटों में तब्दील नहीं हो सकते। जानकार पत्रकारों ने चुनाव रिपोर्टिंग के दौरान लिखा कि इस बार उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए काफी सद्भभावना है। लेकिन यह भविष्यवाणी वो भी नहीं कर पाए कि यह सद्भभावना चुनावी सफलता में बदलेगी। संभवतः यूपी में कांग्रेस के पुनरुद्धार का संदेश यह है कि कोई पार्टी अपने नेता एवं एजेंडे के नाम पर भी वोट पा सकती है और अगर वह बुद्धिमानी से उम्मीदवार चुने तो उन वोटों से जीत भी हासिल कर सकती है। इस लिहाज से यूपी के ताजा नतीजों का बिहार के लिए भी एक संदेश है, जहां भी कांग्रेस के फिर से खड़ा हो सकने की संभावना को न्यूनतम माना जाता है।

यह साफ है कि कांग्रेस के लिए समर्थन की एक अंतर्धारा कुछ अपवादों को छोड़ कर पूरे देश में थी। तभी २५ साल बाद कोई राजनीतिक पार्टी लोकसभा की २०० से ऊपर सीटें जीत पाई है। इसका एक दूसरा परिणाम यह है कि भारतीय जनता पार्टी १८ साल में अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर पहुंच गई है। भाजपा के वोटों में भी गिरावट साफ है। और यही रुझान एक सकारात्मक संभावना पैदा करता है। बहुसंख्यक समुदाय में उत्पीड़ित होने का भाव भरने, उसकी आशंकाओं को भुनाने और हिंदुत्व के नाम पर राजनीतिक गोलबंदी करने की भाजपा और संघ परिवार की रणनीति को २००४ में देश की जनता ने बुद्धि के साथ मतदान से ठुकराया था। २००९ में यह परिघटना और आगे बढ़ी है।

देश के भूगोल में ऐसे इलाके सिकुड़े हैं, जहां भाजपा प्रमुख ताकत है। यानी अब ऐसे राज्यों की संख्या बढ़ी है जहां लोगों के पास दो धर्मनिरपेक्ष विकल्प हों। दूरगामी राजनीति के लिहाज से यह एक संतोषजनक घटनाक्रम है। कहा जा सकता है कि १९८०-९० के दशकों में भारतीय राजनीति में क्रमिक रूप से उभरा से सांप्रदायिक फासीवाद का खतरा ताजा चुनाव परिणामों के साथ काफी घट गया है और अब धर्मनिरपेक्ष भारत के भविष्य के प्रति ज्यादा आश्वस्त हुआ जा सकता है।

लेकिन शायद ऐसी ही आश्वस्ति अब जनतांत्रिक आकांक्षाओं को लेकर नहीं हो सकती। कहा जा रहा है कि कांग्रेस पार्टी को यह जीत इसलिए मिली कि मनमोहन सिंह सरकार ने पिछले पांच साल में बेहतर प्रदर्शन किया। सवाल है कि वह प्रदर्शन क्या था? कुछ उपलब्धियां गिनाई जा सकती हैं। मसलन, राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, सूचना का अधिकार कानून, आदिवासी एवं अन्य वनवासी भूमि अधिकार कानून, किसानों की कर्ज माफी, वगैरह। इस बात की तरफ भी ध्यान खींचा गया है कि विश्वव्यापी आर्थिक मंदी का भारत पर उतना बुरा असर नहीं पड़ा, जितना दुनिया के बहुत के देशों पर पड़ा है। कांग्रेस के नेता कहते हैं कि अमेरिका में १६ बैंक ध्वस्त हो गए, जबकि भारत में एक भी बैंक के साथ ऐसा नहीं हुआ।

ये तमाम बातें सही हैं। लेकिन यह भी उतना ही सच है कि मनमोहन सिंह सरकार के इन सभी कदमों के पीछे असली प्रेरक कारण वामपंथी दलों का दबाव था। रोजगार गारंटी हो या सूचना का अधिकार कानून, मनमोहन-चिदंबरम की जोड़ी कभी उसके लिए उत्साहित नजर नहीं आई। यह जोड़ी रुपये की पूर्ण परिवर्तनीयता को लागू पर अड़ी हुई थी और इसके लिए सारी तैयारियां कर ली गई थीं, यह हम सभी जानते हैं। यह सिर्फ वामपंथी दलों का दबाव था कि ऐसा नहीं हुआ। अगर ऐसा हो गया होता और भारतीय बैंकों में विदेशी निवेश की इजाजत मिल गई होती तो कोई बैंक ध्वस्त नहीं हुआ, जैसे दावे करने की स्थिति में कांग्रेस के नेता नहीं होते। इसी तरह बहुत से सार्वजनिक प्रतिष्ठानों का विनिवेश वामपंथी दलों के दबाव में रुका।

यह एक विडंबना ही है कि जिन दलों ने आर्थिक सुरक्षा और सार्वजनिक निवेश पर सरकार को मजबूर किया, उन्हें इस चुनाव में अनपेक्षित हार का सामना करना प़ड़ा है और जिस सरकार ने अनिच्छा से उन कदमों को अपनाया, उसे उसका फायदा मिला है। जिस पार्टी ने पश्चिम बंगाल के औद्योगिकरण की संभावनाओं को रोका, उसके साथ गठजोड़ कर कांग्रेस पार्टी ने विकास करने वाली पार्टी के रूप में कामयाबी हासिल कर ली है। बहरहाल, यहां सवाल श्रेय लेने का नहीं है। असली सवाल यह है कि मनमोहन-चिदंबरम की जोड़ी जिन नव-उदारवादी नीतियों की प्रतीक है, अब उन पर कोई सियासी या संसदीय ब्रेक नहीं होगा।

इस लिहाज से ताजा चुनाव नतीजे देश के उच्च और उच्च मध्यवर्ग के हसीन सपनों को पूरा करने वाले हैं। इसलिए इसमें कोई संदेह नहीं कि अपनी नई पारी में मनमोहन सिंह की सरकार कॉरपोरेट मीडिया की डार्लिंग होगी। वहां एक ऐसा आवरण बुना जाएगा जिसमें बहुत से जनतांत्रिक सवाल दब सकते हैं। नई सरकार के गठन के साथ यह जनतांत्रिक ताकतों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है। क्या ये ताकतें संसद के बाहर विरोध और संघर्ष की कोई रणनीति और व्यावहारिक कार्यक्रम अपना सकती हैं, जिससे मनमोहन सिंह को यह पैगाम दिया जा सके कि देश की जनता ने उन्हें कोई ब्लैंक चेक नहीं दे दिया है।

देश की प्रगतिशील शक्तियां शायद इसी रूप में इन चुनाव परिणामों को देख सकती हैं। धर्मनिरपेक्षता के ज्यादा सुरक्षित होने का संतोष और आर्थिक एवं विदेश नीतियों के ज्यादा दक्षिणपंथी होने की आशंका इस मौके पर की संभवतः सबसे ठोस तस्वीर है।

Sunday, May 3, 2009

संदर्भ लेफ्ट-कांग्रेस सहयोग का


सत्येंद्र रंजन
क्या कांग्रेस और वामपंथी दलों में फिर सहयोग होगा, यह इस समय देश के सामने शायद सबसे अहम राजनीतिक सवाल है। १५वीं लोकसभा की जैसी तस्वीर उभरने का अनुमान लगाया जा रहा है, उसके मद्देनजर यह सवाल लगातार ज्यादा प्रासंगिक होता जा रहा है। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कभी कहा था कि वामपंथी दल उन्हें ‘बंधुआ मजदूर’ बनाना चाहते थे, लेकिन अब उन्होंने खुले तौर पर कहा है कि वे एक बार फिर वामपंथी दलों के साथ मिल कर काम करने को तैयार हैं। कांग्रेस पार्टी ने तो पिछले जुलाई में नाता टूटने के बाद भी कभी वामपंथी दलों के साथ सहयोग की संभावना से इनकार नहीं किया।

वामपंथी दल जरूर भविष्य में सरकार बनाने के लिए कांग्रेस को समर्थन देने की संभावना से इनकार करते रहे हैं। लेकिन पिछले महीनों के दौरान उन्होंने जो तीसरा मोर्चा बनाया है, उसकी सरकार बनाने के लिए कांग्रेस का समर्थन लेने की संभावना से उन्होंने कभी इनकार नहीं किया। हालांकि वामपंथी दलों का घोषित लक्ष्य कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनों का विकल्प तैयार करना है, लेकिन विडंबना यह है कि ऐसी वैकल्पिक सरकार कांग्रेस के समर्थन के बिना नहीं बन सकती। वैसे गैर कांग्रेस- गैर भाजपा सरकार की संभावना को लेकर मुश्किल सिर्फ इतनी ही नहीं है।

सबसे बड़ी मुश्किल तीसरा मोर्चे का राजनीतिक परिप्रेक्ष्य है। मोर्चे में वामपंथी दलों के साथ जो राजनीतिक दल हैं, उनमें किसी का कांग्रेस और भाजपा का विकल्प तैयार करने का वैचारिक आग्रह नहीं है। उनका नजरिया सीमित और कार्यनीतिक (tactical) है। वामपंथी दल भाजपा के सांप्रदायिक फासीवाद और कांग्रेस के नव-उदारवाद एवं साम्राज्यवाद समर्थक नीतियों का विकल्प तैयार करना चाहते हैं। लेकिन तीसरे मोर्चे के उसके सहयोगियों में भी ऐसी कोई इ्च्छा या इसके लिए उत्साह है, इसका कोई संकेत नहीं है। बल्कि तेलंगाना राष्ट्र समिति के नेता के चंद्रशेखर राव अभी से कहने लगे हैं कि जो भी पार्टी तेलंगाना राज्य बनाने के हक में होगी, वो उसके साथ जा सकते हैं, भले वो पार्टी भाजपा हो।

चंद्रबाबू नायडू और नवीन पटनायक वामपंथी दलों के एजेंडे के साथ दूर तक चलेंगे, यह शायद वामपंथी नेता भी नहीं मानते होंगे। उन दोनों का अपने राज्यों में मुख्य मुकाबला कांग्रेस से है, जाहिर है धर्मनिरपेक्षता चाहे जितने संकट में हो, वे कांग्रेस के साथ वैसा सहयोग नहीं करेंगे, जैसा २००४ से जुलाई २००८ तक वामपंथी दलों ने किया। जयललिता कब क्या कहें और करे, इसका अंदाजा आखिर कौन लगा सकता है? एलटीटीई के विरोध से तमिल ईलम के समर्थन तक का सफर उन्होंने इसी चुनाव अभियान में पूरा कर लिया है। मायावती वैसे भी अभी तीसरे मोर्चे के साथ नहीं हैं। एचडी देवेगौड़ा, भजनलाल और बाबूलाल मरांडी के साथ कैसी नीतियां और दीर्घकालिक रणनीति बनाई जा सकती है, इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है।

इसके बावजूद अगर वामपंथी नेता कांग्रेस को समर्थन देने की संभावना से इनकार कर रहे हैं, तो इसकी वजह राजनीतिक और वैचारिक दोनों है। १९९० के दशक में भाजपा की बढ़ती ताकत और राज्य-व्यवस्था पर उसका शिकंजा कस जाने की गहराती आशंकाओं के बीच वामपंथी दलों ने कांग्रेस से सहयोग की नीति अपनाई। मकसद भारत के धर्मनिरपेक्ष चरित्र और देश की संवैधानिक व्यवस्था की रक्षा करना था। इसी सहयोग का ठोस और व्यावहारिक परिणाम रहा २००४ में मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार को उनका समर्थन। वामपंथी दलों ने इस मौके का लाभ उठा कर सरकार की नीतियों को मध्य से वामपंथ की तरफ झुकाने की कोशिश की। यह बात यूपीए के साझा न्यूनतम कार्यक्रम में झलकी। लेकिन कांग्रेस पर नरसिंह राव के जमाने में प्रचलित हुई नव-उदारवादी नीतियां हावी रहीं। नजरिए का यह फर्क बार-बार टकराव का रूप लेता रहा और आखिरकार इसकी परिणति भारत अमेरिका परमाणु सहयोग करार के मुद्दे पर वामपंथी दलों की समर्थन वापसी के रूप में हुई।

लेकिन प्रश्न है कि क्या तीसरा मोर्चा नीतियों के दायरे में वामपंथी एजेंडे को अपना सकेगा? और अगर तीसरे मोर्चे की सरकार कांग्रेस के समर्थन से बननी है तो कांग्रेस अपनी नीतियों की शर्तें उस पर नहीं थोप नहीं सकती है? ये वामपंथी दलों के लिए गंभीर विचार-विमर्श के सवाल हैं।

बहरहाल, ऐसे सवाल कांग्रेस के सामने भी हैं। मनमोहन सिंह ने अमेरिका से परमाणु करार को जैसे अपनी प्रतिष्ठा का सवाल बनाया, विश्वासमत के समय जैसी सियासी जोड़तो़ड़ की, सत्ता और पैसे का जैसा दुरुपयोग किया, और संदिग्ध तरीकों से हासिल जीत पर उनकी पार्टी जैसे इतराई, उससे भारत के राष्ट्रीय विमर्श में लंबे समय के संघर्ष और संवाद से पैदा हुई धर्मनिरपेक्ष आम सहमति को गहरी क्षति पहुंची। इसका परिणाम खुद सत्ताधारी यूपीए को भी भुगतना पड़ा है। जब इस आम सहमति के टूटने की शुरुआत हो गई तो यह स्वाभाविक ही था कि सभी दल पहले अपने चुनावी स्वार्थ पर गौर करें। नतीजतन, यूपीए से निकल कर एक चौथा मोर्चा सामने आ गया।

क्या कांग्रेस पार्टी को इस घटनाक्रम, इसकी वजहों और इसके परिणामों का अहसास है? अगर इसका जवाब ‘हां’ में है तो कांग्रेस नेतृत्व एक नई शुरुआत कर सकता है। हकीकत यह है कि धर्मनिरपेक्ष दायरे में आज भी कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी है, और इस लिहाज से सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ उसकी एक बड़ी भूमिका है। लेकिन अब वह इतनी बड़ी पार्टी भी नहीं है कि इस भूमिका को वह अकेले निभा सके। इसके लिए उसे विभिन्न क्षेत्रीय और छोटे दलों को साथ लेना होगा, और फिलहाल ऐसी कोई सूरत नहीं है, जिसमें वह वामपंथी दलों को नजरअंदाज कर यह भूमिका निभा सके।

आज यह ऐतिहासिक जरूरत है कि कांग्रेस और वामपंथी दल दोनों सहयोग की इस अनिवार्यता और अपरिहार्यता को समझें। यह जिम्मेदारी दोनों पर है कि वे नीतियों और कार्यक्रमों पर ऐसी सहमति तैयार करें, जिससे ऐसे सहयोग की व्यावहारिक जमीन तैयार हो सके। अगर वामपंथी दलों को शिकायत है कि कांग्रेस उन बातों पर कायम नहीं रही, जिस पर वह साझा न्यूनतम कार्यक्रम में सहमत हुई थी, तो भविष्य के लिए कोई ऐसा मेकनिज्म बनाया जाना चाहिए, जिससे आगे ऐसा न हो सके। साथ ही धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आम सहमति भंग होने और वामपंथी दलों से रिश्ते में टूट के जो प्रतीक हैं, अगर उनकी कुर्बानी जरूरी हो तो कांग्रेस को देश के दीर्घकालिक भविष्य के लिए इस पर तैयार होना चाहिए।

धर्मनिरपेक्ष दायरे में आने वाली तमाम शक्तियों को यह समझना चाहिए भारत का वह विचार किसी व्यक्ति या पार्टी से ज्यादा अहम है, जो स्वतंत्रता आंदोलन के दिनों में पैदा हुआ, जो दादा भाई नौरोजी, रवींद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी और पंडित जवाहर लाल नेहरू की देखरेख में फूला-फला और जिसका मूर्त रूप में हमारा संविधान है। विभिन्न नामों से धर्म आधारित राष्ट्रवाद की बात करने वाली ताकतें भारत के इस विचार के लिए सबसे बड़ा खतरा हैं, इसलिए उन्हें रोकने के लिए दी गई कोई भी कुर्बानी बड़ी नहीं है। अगर कांग्रेस और वामपंथी दल इस बात को समझें और व्यवहार में भी मानें तो १६ मई के बाद देश को न सिर्फ राजनीतिक अस्थिरता से बचाया जा सकता है, बल्कि आम जन की भलाई वाली नीतियों के साथ सकारात्मक पहल करने वाली एक सरकार भी अस्तित्व में आ सकती है।

Friday, May 1, 2009

एक सहयोग, जो मजबूरी है


सत्येंद्र रंजन
म चुनाव जब अपने अंतिम दौर में पहुंच रहा है, राजनीतिक दलों में अगली लोकसभा की तस्वीर को लेकर एक मोटी समझ बनने के संकेत मिलने लगे हैं। कांग्रेस अब वामपंथी दलों के साथ एक बार फिर से पुल जोड़ना चाहती है। उधर वामपंथी दल भी मानने लगे हैं कि उनका गैर कांग्रेस- गैर भाजपा सरकार का सपना अगर पूरा हो सका तो यह कांग्रेस के समर्थन से ही होगा। निष्कर्ष यह है कि अगर भारतीय जनता पार्टी ने कोई आश्चर्यजनक जीत हासिल नहीं की तो कांग्रेस और वामपंथी दलों में सहयोग अनिवार्य हो जाएगा।

भाजपा की संभावनाओं में आश्चर्यजनक उभार सिर्फ उत्तर प्रदेश से हो सकता है। क्या पार्टी यहां अपनी सीटों की संख्या २००४ की तुलना में तीन गुना या ढाई गुना बढ़ा सकेगी? यह दूर की कौड़ी है, लेकिन असंभव नहीं है। बहरहाल, अगर ऐसा होता है तो भाजपा सबसे बड़े दल के रूप में उभर सकती है। उस हाल में उसके लिए नए सहयोगी पाना आसान हो जा सकता है और उसके तथाकथित मजबूत नेता के नेतृत्व में एक कमजोर सरकार बन सकती है। लेकिन यह एक बहुत ही दूर की संभावना है।

ज्यादा ठोस संभावना यही लगती है कि कांग्रेस, उसके सहयोगी दल, यूपीए के बिखरे उसके सहयोगी और तीसरे मोर्चे के दल मिल कर लोकसभा की ३०० से ज्यादा सीटें जीत लें। उस स्थिति में एक नए ढंग के समीकरण का रास्ता तैयार होगा। कांग्रेस बेशक सबसे बड़ी पार्टी होगी और अगली सरकार का नेतृत्व करने पर उसका मजबूत दावा होगा। लेकिन वा्मपंथी दलों के लिए उसे २००४ की तरह समर्थन देना शायद मुमकिन नहीं है। बात सिर्फ नीतियों में मतभेद की नहीं है। बल्कि वामपंथी दलों ने जो तीसरा मोर्चा बनाया है, उसमें तेलुगू देशम पार्टी और बीजू जनता दल जैसे घटक भी हैं, जिनका अपने-अपने राज्यों में सीधा मुकाबला कांग्रेस से है। उनके लिए कांग्रेस को समर्थन देना बेहद मुश्किल है।

वामपंथी दल अपने मौजूदा सहयोगी दलों को अधर में नहीं छोड़ सकते। ऐसा वे अपनी दीर्घकालिक साख पर बट्टा लगाते हुए ही करेंगे। इसीलिए उनका जोर १९९६ के संयुक्त मोर्चा सरकार जैसे प्रयोग पर रहेगा। लेकिन यह संख्याओं का खेल है और जब तक संख्याओं की तस्वीर साफ नहीं होती, इस बारे में कोई अनुमान लगाना कठिन है। बहरहाल, इस परिप्रेक्ष्य में यह बात साफ होती जा रही है कि भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता की रक्षा लगातार एक अहम और प्रभावी मुद्दा है। धर्मनिरपेक्ष राजनीति के दायरे में आने वाले दलों के बीच आर्थिक और विदेश नीतियों पर चाहे जितने गहरे मतभेद हों, सांप्रदायिक-फासीवाद के खिलाफ उनके बीच सहयोग की जरूरत अभी लंबे समय तक बनी रहेगी।

अगर कांग्रेस ने इस बात को समझा होता तो २००८ में वह २००४ के जनादेश से विश्वासघात करने की हद तक नहीं जाती। लेकिन इससे भी ज्यादा दुर्भाग्य की बात यह है कि इस बात को राष्ट्रीय जनता दल, द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी, और समाजवादी पार्टी जैसे क्षेत्रीय दलों ने भी नहीं समझा। इन पार्टियों के नेताओं के स्वार्थ, अहंकार और तुच्छ गणनाओं ने एक बेहद अहम मौके पर उन्हें कांग्रेस का पिछलग्गू बन जाने को मजबूर कर दिया। भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग के करार के सवाल पर अगर वे मजबूत रुख लेते तो आज शायद चुनावी मुकाबले की तस्वीर कुछ और होती। इन दलों को तब यह समझना चाहिए था कि मुद्दा सिर्फ करार का नहीं था। सवाल यह था कि क्या वह करार इतना अहम था, जिसके लिए धर्मनिरपेक्षता के सवाल पर बनी राष्ट्रीय आम सहमति को तोड़ दिया जाए? तब एक सैद्धांतिक मुद्दे पर विश्वासघात करने में वे कांग्रेस के सहभागी बने और फिर बाद में खुद कांग्रेस के विश्वासघात के शिकार बने।

अब उस करार की प्रासंगिकता और फायदे पर खुद वो लोग सवाल उठा रहे हैं, जो उस वक्त मीडिया में उसके बड़े पैरोकार थे। वे मान रहे हैं कि इस करार से ना तो देश की ऊर्जा की जरूरतें हल होंगी और ना ही अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक मामलों में अमेरिका का भारत को कोई बिना शर्त समर्थन मिल रहा है। करार के पैरोकार अब लिखने लगे हैं कि इस मुद्दे पर जितना ऊंचा और महंगा दांव प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और कांग्रेस पार्टी ने खेला, वह उसके योग्य नहीं था। लेकिन मुश्किल यह है कि केंद्र में पहले भाजपा और फिर कांग्रेस नेतृत्व वाली जो दो गठबंधन सरकारें सत्ता में रहीं, उनमें शामिल क्षेत्रीय दलों ने कभी नीति और सिद्धांत के सवाल पर ठोस रुख नहीं अपनाया। वो सत्ता के फायदों के बंटवारे में ही मशगूल रहे और गठबंधन का नेतृत्व कर रही पार्टी को मनमानी करने दिया।

क्या २००९ में यह स्थिति बदलेगी? क्या १५वीं लोकसभा के गठन के साथ गठबंधन की संसदीय राजनीति का कोई नया विकासक्रम देखने को मिलेगा? दरअसल, वामपंथी दलों के सामने इन सवालों के जवाब खोजना ही शायद इस वक्त की सबसे बड़ी चुनौती है। क्या वे एक ऐसा राजनीतिक संवाद बना सकते हैं, जिससे सत्ता के बंटवारे के साथ-साथ देश के दूरगामी भविष्य और हमारी राज्य-व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों की रक्षा का कोई व्यावहारिक कार्यक्रम सामने आ सके? और क्या अब क्षेत्रीय दलों में यह समझ ज्यादा ठोस रूप लेगी कि अहम मुद्दों पर किसी बड़े दल का पिछलग्गू बन जाने का नुकसान अंततः उन्हें भी झेलना पड़ता है?

क्षेत्रीय और स्थानीय हितों का प्रतिनिधित्व करने वाली पार्टियों की राष्ट्रीय स्तर पर बढ़ती मौजूदगी देश में गहरे और मजबूत हो रहे लोकतंत्र की मिसाल है। इससे सत्ता और सुविधाओं पर पुराने प्रभु वर्गों का शिकंजा कुछ ढीला हुआ है। लेकिन यह परिघटना सामाजिक ढांचे में जितना जाहिर होती है, उतनी आर्थिक या व्यापक वैचारिक दायरे में नहीं झलकती। नई उभरी ताकतें आसानी से पुराने आर्थिक हितों और पुरातन विचारों के साथ घुलमिल जाती हैं। नतीजा यह होता है कि लोकतंत्र के गहरा होने के साथ प्रगतिशील और आधुनिक विचारों एवं नीतियों को लेकर जैसा भरोसा होना चाहिए, वह नहीं हो पाया है।

अगर वामपंथी दल अब किसी ऐसे संवाद की धुरी बनते हैं, जिससे ऐसा भरोसा पैदा हो सके तो यह आम चुनाव भारतीय लोकतंत्र को विकास की एक नई मंजिल तक ले जा सकेगा। लेकिन फौरी तौर पर १६ मई के बाद कांग्रेस और वामपंथी दलों को संभवतः किसी समीकरण का हिस्सा बनना पड़ेगा। जब तक धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र का ठोस और प्रगतिशील सामाजिक आधार तैयार नहीं होता, धर्मनिरपेक्षता की रक्षा के लिए वामपंथी दलों और कांग्रेस दोनों के सामने ऐसी मजबूरी बनी रहेगी।

Saturday, April 25, 2009

क्या चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है?

सत्येंद्र रंजन
भारतीय लोकतंत्र जब अपने एक सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव से गुजर रहा है, देश के एक प्रमुख अखबार ने इसे ‘Dance of Democracy’ नाम दिया है। मेनस्ट्रीम मीडिया में आम चुनाव की चर्चा क्रिकेट की शब्दावली में होना एक सामान्य बात है। मीडिया (कुछ अपवादों को छोड़ कर) में अक्सर यह चर्चा भी सुनी जा सकती है कि इस बार चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। तो मीडिया की चर्चाएं अक्सर नेताओं के भड़काऊ भाषणों, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले बयान, और सतही तथा अप्रसांगिक सवालों पर टिकी हुई नज़र आती है। बात अगर कुछ आगे बढ़ी तो जातीय समीकरण और गठबंधनों की जोड़-तोड़ तक यह चली जाती है। राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों को बेकार की चीज मान लिया गया है, इसलिए अक्सर मीडिया में इनकी कोई चर्चा नहीं होती। लोगों के सामने निष्कर्ष यह पेश किया जाता है कि ‘सब एक जैसे हैं‘। जब ‘सब एक जैसे हैं‘ तो फिर विकल्प की बात कहां है? इसलिए यह चुनाव एक राजनीतिक ड्रामा या जैसाकि वह देश का प्रमुख अखबार कह रहा है- एक डांस है यानी नाच। इसके मजे लीजिए, इससे आगे की कोई बात सोचने या समझने की जरूरत नहीं है!

यह नजरिया लोकतंत्र के उस आयोजन के प्रति है, जिसकी प्रक्रिया में देश के करोड़ों लोग शामिल हैं। देश के करोड़ों लोग जिससे अपनी सामाजिक-आर्थिक बेहतरी की उम्मीद जोड़े हुए हैं, और जिससे समाज के उन करोड़ों को लोगों के लिए इतिहास में पहली बार रोशनी की उम्मीद पैदा हुई है, जिन्हें सामाजिक निरंकुशता के दौर में सदियों तक जाति और आर्थिक हैसियत के आधार पर दबाए रखा गया। क्या सचमुच भारतीय लोकतंत्र कुछ नेताओं की महत्त्वाकांक्षा और कुर्सी की लालसा के अलावा कुछ और नहीं है? क्या सचमुच यह सिर्फ थैलीशाहों और अपराधियों का एक खेल है, जिसमें आम जन महज खामोश दर्शक है? और इन दर्शकों की दिलचस्पी चुनाव के नाम पर होने वाले ड्रामे और मनोरंजक बयानबाजियों तक में सामित है?

इन सवालों के जवाब इस पर निर्भर करते हैं कि आप इन्हें कहां से देख रहे हैं और आपके अपने स्वार्थ क्या हैं? लोकतंत्र बेशक उन लोगों के लिए बेमायने है, जो आराम की जिंदगी जी रहे हैं, या जिनके हित सामाजिक निरंकुशता की विरासत से जुड़े हुए हैं। ऐसे तबकों के लिए लोकतंत्र एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक खतरनाक प्रक्रिया है, और जिसे नियंत्रित करना उनका उद्देश्य है। इसके उलट इस देश के उन करोड़ों लोगों के लिए जो अपनी बुनियादी जरूरतों और मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित हैं, यह व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाने का जरिया है, जिससे वो बेहतर भविष्य की उम्मीद जोड़ सकते हैं। बीते साठ साल की अविध इन तबकों में भले ही धीमी गति से, मगर निरंतर बढ़ी जागरूकता का इतिहास है। भारतीय संविधान में एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट एक मूल्य का जो सिद्धांत अपनाया गया, उसका असर सामने आने में कुछ वक्त लगा। लेकिन इस सिद्धांत ने उन समूहों को अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया, जो जिनके पास अपना अधिकार जताने के लिए सिर्फ संख्या बल का सहारा था।

बीते दशकों में भारत की राजनीतिक संरचना के सामाजिक आधार में व्यापक बदलाव आया है। इससे उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया एक मजबूत परिघटना बन गई है। लेकिन यही परिघटना शासक समूहों के लिए परेशानी की वजह बनी हुई है। उनकी चिंता है कि इसे कैसे रोका जाए? संसद और राजनीति के प्रति अक्सर इन समूहों में जाहिर होने वाला अपमान भाव दरअसल इसी प्रतिक्रिया का बढ़ते कदम को बाधित करने की कोशिश की जाती है, प्रचार माध्यमों से जनतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया जाता है, और राजनीतिक विमर्श को भटकाने की कोशिश की जाती है। इन सबके बावजूद लोकतंत्र का कारवां आगे बढ़ता गया है।

यह कारवां इस चुनाव के साथ एक नए मुकाम पर पहुंचेगा, यह अनुमान भरोसे के साथ लगाया जा सकता है। यह मुमकिन है कि भारतीय पूंजीवाद की दो सबसे प्रमुख प्रतिनिधि पार्टियां- कांग्रेस और भाजपा- इस बार मिल कर भी लोकसभा की आधी सीटें न जीत पाएं। ऐसे में छोटी और क्षेत्रीय पार्टियां- जिनका पूंजीवाद से कोई वैचारिक मतभेद नहीं है, लेकिन जो अपने जनाधार के चरित्र की वजह से नई उभरी सामाजिक ताकतों की नुमाइंदगी करती हैं, एक महत्त्वपूर्ण हैसियत में हो सकती हैं। वाम मोर्चा के साथ मिल कर ये पार्टियां नई दिल्ली से पूरे देश और पूरी व्यवस्था को नियंत्रित करने की शासक वर्गों की इच्छा में एक अड़चन साबित हो सकती हैं। लोकतांत्रिक नजरिए से यह एक स्वागतयोग्य घटना होगी, लेकिन शासक वर्गों के लिए यह गहरी चिंता का विषय है, जिसे वो राजनीतिक अस्थिरता के भय के रूप में पेश करते हैं। सवाल है कि क्या मीडिया के लिए यह विमर्श का गंभीर मुद्दा नहीं है?

१९८० के दशक में भारत में सांप्रदायिक राजनीति का जोरदार उभार हुआ। १९९० के दशक में हालत यहां तक पहुंच गई कि धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक भारत का विचार खतरे में पड़ गया। २००४ के चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश से यह खतरा टला। लेकिन यह खतरा आज भी उतनी ही गंभीरता से मौजूद है, क्योंकि सांप्रदायिक राजनीतिक का सामाजिक आधार और राजनीतिक स्वार्थ ना तो तब कमजोर पड़े थे और ना आज कमजोर हुए हैं। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी लगातार एक मजबूत ताकत बनी हुई है। दरअसल, इस चुनाव में और आने वाले कई चुनावों में यह एक प्रासंगिक मुद्दा रहेगा कि भाजपा को कैसे सत्ता में आने से रोका जाए। इसके बावजूद अगर मीडिया का बड़ा हिस्सा यह घोषणा करता दिखता है कि इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है, तो जाहिर है कि खुद मीडिया के अपने रुझान गहरे विचार-विमर्श का विषय हैं।

देश गहरी आर्थिक मंदी में है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। कृषि क्षेत्र में तो संकट अब वर्षों पुराना हो चुका है। किसानों की आत्महत्याएं अब खबर नहीं बनतीं। इंडिया शाइनिंग का भ्रम टूट चुका है। खुद मनमोहन सिंह सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी ने यह तथ्य सामने रखा कि आज भी देश के ७७ फीसदी लोग हर व्यावहारिक अर्थ में गरीब हैं। अल्पसंख्यक समुदाय अपनी सुरक्षा और बुनियादी नागरिक अधिकारों के हनन को लेकर चिंतित हैं। अगर राजनीतिक दल इन्हें मुद्दा नहीं बनाते तो क्या समाज के प्रबुद्ध वर्ग का यह कर्त्तव्य नहीं है कि चुनाव जैसे मौके पर वो इन असली मुद्दों की चर्चा करें? लेकिन इन बातों की चर्चा सही संदर्भ में मीडिया में (कुछ अपवादों को छोड़ कर) कहीं देखने को नहीं मिलती। क्या यह महज एक चूक है?

यह चूक नहीं है। यह मीडिया के ढांचे से जुड़ा एक पहलू है, जिस पर जनतांत्रिक शक्तियों को अब जरूर चर्चा करनी चाहिए? आखिर मीडिया का एजेंडा कैसे तय होता है और कौन तय करता है? दरअसल किसी भी उद्यम का चरित्र कैसे तय होता है? जाहिर है, यह उसे नियंत्रित करने वाली पूंजी तय करती है। मीडिया आज एक बड़ा उद्यम है, और वह इस आम सिद्धांत से अलग नहीं है। इसीलिए अगर बौद्धिकता या प्रबुद्धता का मतलब परिस्थितियों के वस्तुगत विश्लेषण और ईमानदार निष्कर्ष से है, तो उस अर्थ में आज के दौर में मीडिया एक प्रबुद्ध माध्यम नहीं रह गया है। यह समाज के निहित स्वार्थों का प्रवक्ता बन गया है, क्योंकि ये शक्तियां ही इसे नियंत्रित करती हैं। अगर इन शक्तियों का हित असली मुद्दों को उलझाने या उन पर परदा डालने में है, तो स्पष्ट है, मीडिया अपनी तमाम रिपोर्टिंग और बहस को इसी मकसद से अंजाम देगा। इस अर्थ में मेनस्ट्रीम मीडिया वही कर रहा है, जो उसका मकसद और काम है।

ऐसे में क्या इसमें कोई आश्चर्य है कि जुलाई २००८ में अपनी सरकार के विश्वास मत के समय तमाम भ्रष्ट तरीके अपनाने और तिकड़म के बावजूद मीडिया में मनमोहन सिंह की छवि ‘स्वच्छ‘ बनी हुई है। आखिर मनमोहन सिंह नव-उदारवाद के उपकरण और भारत में अमेरिकन ड्रीम के प्रतीक हैं, जिसका फायदा देश के उच्च और उच्च मध्यम वर्ग ने खूब उठाया है। मनमोहन सिंह ने वामपंथी दलों के समर्थन से चार साल सरकार चलाने के बाद उनसे टकराव लिया, इस पर इन तबकों ने खूब तालियां पीटीं, इसलिए कि जिन वामपंथी दलों को नव-उदारवादी नीतियों के रास्ते में रुकावट माना जाता था, आखिरकार मनमोहन सिंह ने उनसे पीछा छुड़ा लिया। अब मेनस्ट्रीम मीडिया यही चाहता है कि एक ऐसी सरकार बने जो वामपंथी दलों पर निर्भर न हो

लेकिन भारत ऐसी इच्छाओं के दायरे से बहुत बड़ा है। लोकतंत्र का दायरा अब ऐसी इच्छाओं की पहुंच से ज्यादा बड़ा हो चुका है। आम जन की अपेक्षाएं अब दिल्ली और मुंबई में बैठ कर नियंत्रित नहीं की जा सकतीं। इसलिए १५वें आम चुनाव का परिणाम अभी अनिश्चित होने के बावजूद यह जरूर अनुमान लगाया जा सकता है कि अगली लोकसभा में देश की नई उभर रही ताकतों के प्रतिनिधियों की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति होगी। मेनस्ट्रीम मीडिया आरामदेह ड्राइंग रूम में बैठकर देश-दुनिया की चर्चा करने वाले अपने दर्शकों और पाठकों को नई स्थितियों से भयाक्रांत कर सकता है, उन्हें खुश करने के लिेए इन स्थितियों का मजाक उड़ा सकता है, और चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है- जैसी बातें कह कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की साख कम करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन इससे देश की हकीकत नहीं बदल जाएगी। इससे लोकतंत्र का आगे बढ़ता कारवां नहीं थमेगा और न ही इससे उन वर्गों का उत्साह थमेगा, जिनक लिए लोकतंत्र की सफलता उनके बेहतर भविष्य की गारंटी है।

Friday, April 10, 2009

मुद्दा वही, विकल्प धुंधला


सत्येंद्र रंजन
लोकसभा चुनाव के लिए लड़ाई की लकीरें अब साफ हो गई हैं। जितने राज्य, उतने तरह के समीकरण। इन समीकरणों के परिणाम के कुल योग से अगली लोकसभा का स्वरूप बनेगा और देश को नई सरकार मिलेगी। सबसे अहम सवाल यही है कि वह सरकार कैसी होगी? एक ऐसी सरकार जिसकी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में आस्था होगी, या सांप्रदायिक फासीवाद के नुमाइंदे फिर से देश की सत्ता पर सवार हो जाएंगे?

इस बार सांप्रदायिक फासीवाद का मुखौटा लालकृष्ण आडवाणी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने ११ साल बाद फिर से अपना अलग चुनाव घोषणापत्र जारी किया है। उसमें हिंदू राष्ट्रवाद को मौजूदा संदर्भ में सबसे स्पष्ट रूप से व्यक्त करने वाले तीन मुद्दों- राम जन्मभूमि, समान नागरिक संहिता और संविधान की धारा ३७० के खात्मे- को फिर से खुल कर राजनीतिक वादे के रूप में शामिल किया गया है। इससे पहले फरवरी में नागपुर में हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक से भी यही संदेश मिला कि भाजपा बार अपने मुख्य जनाधार की ज्यादा चिंता करते हुए हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठाएगी। चुनाव अभियान शुरू होते ही वरुण गांधी के प्रकरण से हिंदुत्व के मुद्दे में नई जान आ गई।

बहरहाल, अगर भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति पर चल रही है तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है। यह भाजपा का घोषित उद्देश्य है। वह अल्पसंख्यक द्वेष, बहुसंख्यक समुदाय के भीतर असुरक्षा की फर्जी भावना और आधुनिक मुल्यों के प्रति हिकारत फैला कर ही यह उद्देश्य पूरा कर सकती है। लालकृष्ण आडवाणी ने कुछ दिन पहले कहा- ‘मंदिर मुद्दे की वजह से ही भाजपा केंद्र और कई राज्यों में सत्ता आ सकी। इस मुद्दे ने भारतीय राजनीति की धारा बदल दी।’

मंदिर का मुद्दा आखिर क्या था? यह मुस्लिम समुदाय के प्रति नफ़रत फैलाने की एक ऐसी मुहिम थी, जिसका मकसद हिंदु समुदाय के एक बड़े हिस्से के मन में बैठे पूर्वाग्रहों को उभारना और उसकी बदौलत राजनीतिक गोलबंदी करना था। १९८० और ९० के दशकों में देश में मौजूद माहौल के बीच यह तरीका काफी कामयाब रहा। भाजपा एक बार फिर वही माहौल बनाना चाहती है। तनाव और दंगों का माहौल। पिछले २० साल के अनुभव ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा के पास कोई ऐसा खास सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं है, जिसके आधार पर वह राजनीतिक बहुमत जुटा सके। उसकी जीत की सिर्फ दो स्थितियां हैं- एक, कांग्रेस या किसी अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टी की सरकार के खिलाफ एंटी इन्कबेंसी, और दो- उग्र हिंदुत्व की लहर।

इसलिए भाजपा हिंदुत्व की लहर उभारने की कोशिश में रहती है। इसी से उसका मुख्य आधार उत्साहित होता है। यह संघ परिवार और उससे प्रभावित आधार है। इस आधार के मुख्य प्रवक्ता मोहन भागवत, प्रवीण तोगड़िया, अशोक सिंघल, प्रमोद मुत्तालिक, योगी आदित्यनाथ और अब वरुण गांधी हैं। इसकी नायिका साध्वी प्रज्ञा और साध्वी ऋतंभरा हैं। जिस बात को ये लोग भदेस ढंग से कहते हैं, उसी को लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, अरुण शौरी ज़हीन भाषा में बोलते हैं। और वही बात भाजपा के घोषणापत्र एवं दूसरे दस्तावेजों में जाहिर होती है। अगर यह विचार और ये शक्तियां कभी सफल हो गईं तो ‘भारत का वह विचार‘ परास्त हो जाएगा, जो स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों से पैदा हुआ, जो दादा भाई नौरोजी-रवींद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की देखरेख में फूला-फला।

छह साल के एनडीए राज में सबको समाहित करके चलने और सबके लिए न्याय पर आधारित इस ‘भारत के विचार‘ के लिए हमने क्रमिक रूप से गहराती चुनौतियां देखीं। वह अकेले भाजपा का शासन नहीं था। लेकिन शिक्षा, संस्कृति और आम विमर्श का भगवाकरण उस दौर की सबसे खास परिघटना रही। राज्य-व्यवस्था पर अनुदारवाद हावी रहा। इनकी आड़ में अभिजात्यवादी और धुर दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियां अपनाई गईं। इन सबके खिलाफ ही मतदाताओं की वह गोलबंदी हुई, जिससे २००४ में एनडीए पराजित हो सका।

तब यह गोलबंदी इसलिए भी मुमकिन हुई कि देश के सामने एक उद्देश्य से बना एक विकल्प था। तब सोनिया गांधी ने इस विकल्प की रूपरेखा तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इस विकल्प को देश का जनादेश मिला। लेकिन उसके बाद की यह त्रासदी है कि सत्ता में आया गठबंधन- यूपीए- खासकर कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी, उस जनादेश के मूल स्वर को भूल गए। धर्मनिरपेक्षता को आधार बना कर जनपक्षीय नीतियों पर अमल की ऐतिहासिक जिम्मेदारी वो नहीं निभा सके। साम्राज्यवाद परस्त और जन विरोधी नीतियों को अपना कर उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आम सहमति से विश्वासघात किया। नतीजा यह है कि २००९ के चुनाव के पहले धर्मनिरपेक्ष विकल्प बिखरा हुआ है।

जबकि देश के सामने मुख्य मुद्दा वही है, यानी सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों को देश की राज्य-व्यवस्था पर काबिज होने से कैसे रोका जाए। क्या १६ मई को आने वाले नतीजों से यह मुमकिन हो पाएगा? फिलहाल लालकृष्ण आडवाणी और हिंदुत्व मंडली के लिए संकेत बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। मगर, अपनी जोखिम पर ही उनकी संभावना को बिल्कुल खत्म माना जा सकता है। अभी उम्मीद का एक पहलू यह है कि भाजपा के पास सहयोगी दलों की कमी है। जनता दल (यू) को छोड़कर उसके किसी सहयोगी को बड़ी कामयाबी मिलने की सूरत नजर नहीं आ रही है। लेकिन चुनाव के बाद के समीकरणों में उसके साथ नए सहयोगी नहीं जुट जाएंगे, यह भी कोई पूरी तरह आश्वस्त होकर नहीं कह सकता।

जाहिर है, ऐसे में देश के जागरूक लोगों के सामने सिर्फ एक विकल्प बचता है। वह है, बुद्धिमानी से मतदान। इसके पीछे सबसे प्रभावी सोच यही होनी चाहिए कि भाजपा को कैसे पराजित किया जाए। कौन सा उम्मीदवार यह करने में सबसे ज्यादा सक्षम है, इसकी पहचान उनकी राजनीतिक बुद्धि की शायद सबसे बड़ी परीक्षा होगी। देश में प्रगतिशील जमात का एक बड़ा हिस्सा यूपीए के विश्वासघात को अभी नहीं भूला है। वह इसका बदला लेना चाहेगा। मगर, देश के बड़े हिस्से में ऐसे लोगों को संभवतः इसका मौका नहीं मिले। जहां तीसरा विकल्प नहीं है, वहां ऐसे मतदाता आखिर क्या करें? उन्हें यूपीए के घटक दलों, बल्कि यहां तक कि कांग्रेस को भी वोट देने का अप्रिय फ़ैसला लेना होगा। आखिर दांव पर देश का भविष्य है। देश के आम जन की बेहतरी निसंदेह सबसे बड़ा सवाल है, मगर यह काम सांप्रदायिक शासन के तहत तो बिल्कुल मुमकिन नहीं है। इसीलिए भाजपा को हराना पहली प्राथमिकता है।