Tuesday, October 2, 2007

ये तीन कदम जरूरी हैं

सत्येंद्र रंजन
मिलनाडु सरकार के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में न्यायमूर्ति बीएन अग्रवाल की टिप्पणियों ने आखिरकार विभिन्न राजनीतिक दलों को न्यायपालिका द्वारा कार्यपालिका एवं विधायिका के अधिकार क्षेत्र के अतिक्रमण के सवाल पर बोलने को मजबूर कर दिया है। अच्छी बात यह है कि अब कानून की दुनिया के कुछ मशहूर नाम भी इस सवाल पर खुल कर अपनी राय दे रहे हैं।
पूर्व कानून मंत्री और मशहूर वकील राम जेठमलानी ने एक टीवी चैनल की चर्चा में साफ कहा कि न्यायपालिका अपनी हद से बाहर जा रही है। उन्होंने कहा कि इसका जवाब देने के लिए बड़े नैतिक साहस और निष्ठा की जरूरत है, जिसके अभाव में केंद्र सरकार ने न्यायपालिका के आगे समर्पण किया हुआ है।
इसी चर्चा में केंद्रीय संसदीय कार्यमंत्री प्रियरंजन दासमुंशी ने कहा कि विधायिका के सदस्य मूर्ख नहीं हैं और वे जानते हैं कि उन्हें क्या करना है। जब सुप्रीम कोर्ट के जज तमिलनाडु सरकार की बर्खास्तगी की सिफारिश करने की चेतावनी दे चुके थे, उसके बाद दासमुंशी ने प्रेस कांफ्रेंस में तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम करुणानिधि की खुली तारीफ की। उन्होंने कहा- दलितों, आदिवासियों, अल्पसंख्यकों और पिछड़े तबकों का लगातार समर्थन कर और उनके लिए चिंता जता कर करुणानिधि एक मिसाल पेश कर चुके हैं। बंद पर सुप्रीम कोर्ट के रोक के बाद करुणानिधि का भूख हड़ताल पर बैठना विरोध जताने का गांधीवादी तरीका है और इससे राज्य में संवैधानिक व्यवस्था भंग नहीं हुई है।
एक अन्य टीवी चैनल के कार्यक्रम में मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की नेता वृंदा करात ने कहा- सुप्रीम कोर्ट की तानाशाही नहीं चलेगी। विरोध जताने के बुनियादी हक से राजनीतिक दलों और आम लोगों को वंचित नहीं किया जा सकता। चर्चा के दौरान आवेश के एक क्षण में उन्होंने कहा- तो सारी विधायिका भंग कर दीजिए, सभी दलों को समाप्त कर दीजिए, सरकार को खत्म कर दीजिए और सुप्रीम कोर्ट को ही देश चलाने दीजिए! माकपा और दूसरे वामपंथी दलों ने सार्वजनिक बयान जारी कर ऐसी ही भावनाएं जताई हैं।
अगर पूरे संदर्भ पर गौर करें तो ऐसी प्रतिक्रिया खुद न्यायपालिका ने आमंत्रित की है। लोकतंत्र की शासक और संपन्न समूहों के हितों के मुताबिक व्याख्या कर और उसके मुताबिक विधायिका और कार्यपालिका के दायरे में लगातार कदम फैलाते हुए न्यायपालिका ने अब यह स्थिति पैदा कर दी है, जब वंचित और व्यवस्था में अपना हिस्सा पाने के लिए संघर्ष कर रहे समूहों की नुमाइंदगी करने वाले राजनीतिक संगठनों के पास इस स्थिति का सीधा मुकाबला करने के अलावा कोई और चारा नहीं है। लेकिन यह लड़ाई आसान नहीं है। चूंकि न्यायपालिका के पीछे देश के समृद्ध समूहों की शक्ति खड़ी है, इसलिए उसे उसके संवैधानिक दायरे में वापस पहुंचाने के किसी संघर्ष को लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ बता दिए जाने की पूरी स्थितियां मौजूद हैं। इस काम में सुविधा-संपन्न समूहों की सबसे बड़ी ताकत कॉरपोरेट मीडिया है, जिस पर उनका पूरा नियंत्रण है।
लेकिन इस संघर्ष में इससे भी बड़ी बाधा नैतिक साहस और निष्ठा का अभाव है, जिसकी चर्चा राम जेठमलानी ने की। कांग्रेस जैसी यथास्थितिवादी पार्टी, जिसने कानून मंत्रालय का जिम्मा हंसराज भारद्वाज जैसे लोकतंत्र के प्रति संदिग्ध निष्ठा वाले व्यक्ति के हाथ में सौंप रखा है, उससे एक मजबूत, निरंतर और परिणामों की चिंता किए बिना प्रतिबद्ध संघर्ष की उम्मीद नहीं की जा सकती।
बहरहाल, जो राजनीतिक दल वास्तव में विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र की रक्षा के लिए आगे आना चाहते हैं, उन्हें तुरंत तीन मुद्दों पर कदम उठाने चाहिए
१- संसद के अगले सत्र में संविधान के बुनियादी ढांचे पर चर्चा की शुरुआत की जानी चाहिए। यह संसद को तय करना चाहिए कि संविधान का बुनियादी ढांचा क्या है, जिसमें संशोधन नहीं हो सकता। साथ ही पहल के उस दायरे को भी तय किया जाना चाहिए जो सबको समान अवसर देने की संवैधानिक वचनबद्धता को पूरा करने के लिए जरूरी है। इस दायरे को न्यायिक समीक्षा से ऊपर कर दिया जाना चाहिए और इस तरह संविधान की नौवीं अनुसूची की प्रासंगिकता फिर से बहाल की जानी चाहिए।
२- दूसरी बात यह कि मोनिटरिंग कमेटियों के दखल को सिरे से नकार दिया जाना चाहिए। ये कमेटिया कार्यपालिका के काम को बिना आमजन के प्रति संवेदनशील हुए अंजाम दे रही हैं, जिससे लाखों लोगों, खासकर कमजोर तबकों के लोगों के लिए मुश्किलें पैदा हो रही हैं। दिल्ली में सीलिंग से जुडी मोनिटरिंग कमेटी इसकी सबसे उम्दा मिसाल है।
यह लोकतंत्र में कैसे मुमकिन है कि जो कानून संसद मुख्य विपक्षी दल समेत सभी पार्टियों की सहमति से बनाती है, उसे कोर्ट खारिज कर दे और किसी मोनिटरिंग कमेटी को निर्वाचित सरकार या नगर निगम से ज्यादा शक्तिशाली बना दे?
३- संसद को अगले सत्र में कानून बनाकर शांतिपूर्ण बंद और आम हड़ताल को विरोध जताने के बुनियादी और वैध अधिकार के रूप में मान्यता देनी चाहिए। इस तरह १९९८ के सुप्रीम कोर्ट के आदेश को निष्प्रभावी कर देना चाहिए।
अगर राजनीतिक पार्टियां इन कदमों को उठाने का इरादा जताएं तो वे आम जन के लोकतांत्रिक अधिकारों को सीमित करने और लोकतंत्र को समृद्ध समूहों के आपसी द्वंद्व तक सीमित करने के प्रयासों को न सिर्फ रोक सकती हैं, बल्कि पिछले डेढ़ दशकों में हुई ऐसी कोशिशों के परिणामों को बेअसर भी कर सकती हैं।

5 comments:

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sharad said...

Strike is very contoversial topic.
Strike is part of Right to express or protest but do you really think that Party like DMK requires ant strike when they are part of Government in the country and Ruling party in Tamil nadu.Same are left parties they ruling west Bengal from around three decades and supporting UPA in Centre. Do they really need any strike??
Thanx
Sharad

सत्‍येंद्र रंजन said...

yes sharad, they need. when u have to show the people's wish, this is a way, a democratic process. when judiciary is working as an anti-thesis to democracy, political parties are forced to adopt these means. tx

PD said...

Mere paas itani budhdhi to hai nahi ki main sahi aur galat ka faisla kar sakoon.. par main itna to jaroor jaanta hun ki us din jab Tamil Nadu band nahi tha tab bhi yahaan ki saari vyavasthaa Thap thi.. aur kuch Software Companies ne apna office khula rakhne ki ghoshana kar di thi.. main bhi vaise hi ek S/w company me kaam karta hun.. aur main office kaise pahuncha tha vo main hi jaanta hun..
kahne ko to band me sabhi jaroorat ki chije band se door rahti hai, jaise dawa ki dukane, hospitals.. par ye sab kahne ki baat hi hoti hai, kyonki jab us din Supreme Court ke aadesh ke baad jab band ko wapas le liya gaya tha tab bhi ayesa afra-tafri ka mahul tha, to agar band hota to logo ko kitni paresani hoti??

mere chhote se dimag me to bas itna hi khyaal aata hai ki apne vyaktigat ya rajnitik swarth ke liye kisi rajya me band karna kabhi uchit nahi ho sakta hai..

Dhanyavaad..

Dhiraj chaurasia said...

वाह सतेन्द्र जी वाह शायद आप जैसे लोगो के कारण ही हमारे देश की यह दुर्द्शा है। आपका वश चले तो शायद आप ईस देश मे पुरी तरह से वामपन्थी सरकार बना दे, और देश की सारे सम्मान को चीन के पास गिरवी रख दे । मुझे यह बात समझ मे नही आती की करोडो लोगो की जनसन्ख्या वाले शहर को आप जैसे लोग बन्द को कैसे तर्कपुर्ण कह सकते है। चन्द गन्दी मानसीकता वाले लोग पुरे शहर का जीना हराम कर दे आप यही चाहते है ना! मेरे समझ से आपके नजर मे नक्सलीयो द्वारा निरीह लोगो की हत्या भी जायज लगती होंगी । शायद आप भुल रहे है की ईसी महान न्यायपालीका के कारण ही आप भारत में जी रहे है वरना चीन जैसे जगह पर सत्ता विरोधी बोलने के आरोप में कहा होते वो आपको भी पता है धन्य है प्रभु आप जैसे लोगो को रह्ते किसी मीरकासीम के औलाद या फिर जयचन्द या विभीश्ण को खोजने की जरुरत नही है।