Friday, May 9, 2008

डेमोक्रेटिक पार्टी का ‘ओन गोल’


सत्येंद्र रंजन
बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने की जंग लगभग जीत चुके हैं। बीते मंगलवार को इंडियाना और नॉर्थ केरोलीना राज्यों की डेमोक्रेटिक प्राइमरी के नतीजों का सभवतः यही पैगाम रहा। हालांकि अब भी छह राज्यों में उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया बाकी है, लेकिन वहां से डेमोक्रेटिक राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए महज २१७ प्रतिनिधि चुने जाने हैं, जबकि अब तक की सूची में ओबामा हिलेरी क्लिंटन पर १६५ प्रतिनिधियों की बढ़त बना चुके हैं। किसी भी हाल में उन छह राज्यों के सभी प्रतिनिधि हिलेरी क्लिंटन को नहीं मिल सकते और इस तरह अब यह तय है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की आखिरी सूची में ओबामा की बढ़त कायम रहेगी। उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में हुए मतदान में भी ओबामा की बढ़त जारी है। उन्हें अब तक ४९.६ फीसदी वोट मिले हैं, जबकि हिलेरी क्लिंटन ४७.३ प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई हैं और इस तरह ओबामा से २.३ फीसदी वोटों से पिछड़ी हुई हैं।

इस सूरत के बावजूद अगर हिलेरी क्लिंटन अब भी मैदान में डटी हुई हैं, तो इसके पीछे उनका अपना गणित है। दरअसल, अब यह भी तय हो गया है कि प्राइमरी और कॉकस के जरिए ओबामा या क्लिंटन दोनों में से कोई भी स्वतः उम्मीदवारी हासिल करने के लिए जरूरी २,०२५ प्रतिनिधियों की निर्णायक संख्या हासिल नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक भूमिका उन प्रतिनिधियों की होगी, जिन्हें सुपर डेलीगेट्स कहा जाता है। ये पार्टी के निर्वाचित जन प्रतिनिधि, पूर्व राष्ट्रपति, गवर्नर और पार्टी पदाधिकारी होते हैं और इनकी संख्या ६०१ है। इन प्रतिनिधियों में जिन लोगों ने अपनी पसंद अब तक जाहिर की है, उनमें हिलेरी क्लिंटन की बढ़त बनी हुई है। सुपर डेलीगेट्स के साथ सुविधा यह होती है कि वे आखिरी वक्त कर अपना रुख बदल सकते हैं। हिलेरी क्लिंटन की अब सारी जंग इन लोगों को यह समझाने की है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर बराक ओबामा ने भले भारी समर्थन हासिल किया हो, लेकिन जब बात नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की आएगी तो ओबामा आम अमेरिकी मतदाताओं के बीच इतना समर्थन हासिल नहीं कर पाएंगे, जिससे वे रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन को हरा सकें।

जनमत सर्वेक्षणों पर गौर करें तो क्लिंटन के दावे में दम नजर आता है। अमेरिकी राजनीति की तस्वीर पेश करने वाली वेब साइट रियल क्लीयर पॉलिटिक्स डॉट कॉम के मुताबिक मैकेन पर जहां ओबामा को २.६ फीसदी की बढ़त हासिल है, वहीं हिलेरी क्लिंटन मैकेन से ३.९ फीसदी अंतर से आगे हैं। यानी अगर क्लिंटन उम्मीदवार बनती हैं तो उनके जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी। असल में ओबामा भले ही ज्यादातर राज्यों में जीते हों, लेकिन अधिकांश बड़े राज्यों में, जो राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक होते हैं, वहां हिलेरी क्लिंटन को ज्यादा समर्थन मिला है। इसी तरह अगर अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों को छोड़ दें तो हिलेरी क्लिंटन को उन सभी समूहों में ज्यादा समर्थन मिला है जो डेमोक्रेटिक पार्टी का वोट आधार रहे हैं।

बराक ओबामा ने दरअसल निर्दलीय समूहों, कुछ पहले रिपब्लिकन पार्टी का समर्थक रहे समूहों और खासकर नौजवानों को ज्यादा आकर्षित किया है। ह्वाइट हाउस की होड़ में वे अपनी इराक युद्ध विरोधी छवि के साथ उतरे। जब इराक युद्ध अमेरिकी जन मानस में एक गहरा नासूर बन चुका था, उस समय बहुत से लोगों को शुरुआत से इस युद्ध का विरोधी होने की ओबामा की छवि ने आकर्षित किया। ओबामा एक ओजस्वी वक्ता के रूप में सामने आए और राजनीति की आम पेचीदगियों में न पड़ते हुए उन्होंने परिवर्तन का नारा दिया, जो सटीक बैठा। ‘वॉशिंगटन ऐस्टैबलिशमेंट’ को अपने निशाने पर लेते हुए उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। इससे उन्होंने जॉर्ज बुश जूनियर के प्रशासन से लोगों की गहरी नाराजगी का फायदा उठाया और साथ ही यह संदेश दिया कि हिलेरी क्लिंटन उसी पुरानी व्यवस्था की नुमाइंदा हैं, जिसकी वजह से आम नागरिकों के हाथ में अपने देश का नियंत्रण नहीं रह गया है।

इस दौर में ओबामा का सारा जोर मतभेद पाटने पर रहा है। नस्ल, वर्ग और क्षेत्र के विभाजनों से ऊपर उठ कर एक अमेरिका का अपना संदेश वे बहुत से लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। जब उनके पुराने पादरी जेरमी राइट ने अमेरिका में काले लोगों के साथ अन्याय के सवाल पर जोशीला भाषण दिया तो ओबामा ने फौरन उसकी निंदा करते हुए उनसे अपने को अलग करने का एलान किया। ओबामा के इस भाषण को कई हलकों में ऐतिहासिक में बताया गया है। खासकर धनी गोरे और सभ्रांत हलकों में, जहां नस्ल के सवालों पर परदा डालने की सहज प्रवृत्ति रहती है। लेकिन मुश्किल यह है कि ये तबके रिपब्लिकन पार्टी के वोटर हैं और उनका समर्थन असली मुकाबले में ओबामा के ज्यादा काम नहीं आ सकता है।

डेमोक्रेटिक पार्टी के असली समर्थक तबकों- मसलन, मेहनतकश और मध्य वर्ग के गोरे समुदायों और हिस्पैनिक समूहों में ओबामा ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं। इन तबकों ने हिलेरी क्लिंटन में अपना ज्यादा भरोसा जताया है। इसकी वजह यह है कि ठोस कार्यक्रमों की बात करें तो ओबामा बेहद हलके नजर आते हैं। उन्होंने लच्छेदार भाषा में जोशीले भाषण खूब दिए हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य देखभाल और यहां तक कि विदेश नीति के सवालों पर भी कोई वैकल्पिक कार्यक्रम या नीति पेश करने में नाकाम रहे हैं। इन बिंदुओं पर हिलेरी क्लिंटन कहीं ज्यादा ठोस नजर आती हैं। मसलन, स्वास्थ्य देखभाल के मुद्दे पर उन्होंने पूरी बारीकियों के साथ अपना कार्यक्रम रखा है, जबकि ओबामा यह कह कर इसका मजाक उड़ाते रहे हैं कि हिलेरी सब पर स्वास्थ्य बीमा जबरन थोपना चाहती हैं।

दरअसल, मुद्दों पर स्पष्ट रुख की वजह से ही हिलेरी क्लिंटन को बांटने वाली शख्सियत कहा गया है। जबकि ओबामा साफ रुख न लेकर मतभेदों को पाटने वाली अपनी छवि पेश करने में सफल रहे हैं। इससे उन्हें उन हलकों से खूब समर्थन मिला है, जो परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ नहीं रहे हैं। लेकिन यही उनकी उम्मीदवारी के सामने सबसे बड़ा सवाल है। हिलेरी क्लिंटन की कोशिश अब सुपर डेलीगेट्स को यह समझाने की है कि अफ्रीकी-अमेरिकियों को छोड़कर डेमोक्रेटिक पार्टी का बाकी असली समर्थन आधार उनके साथ है औऱ इसीलिए उनके जीतने की संभावना ज्यादा मजबूत है।

राष्ट्रपति चुनाव के इस साल में रिपब्लिकन पार्टी ने बेहद कमजोर संभावनाओं के साथ कदम रखा। लेकिन उसने जल्दी उम्मीदवार चुन कर अपने लिए एक अनुकूल स्थिति पैदा की। जॉन मैकेन चुनाव प्रचार में उतर चुके हैं और रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक दक्षिणपंथी धनी समूह और मीडिया उनकी छवि उभारने के अभियान में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी में होड़ लगातार तीखी होती गई है। इस क्रम में ओबामा और क्लिंटन दोनों ने एक दूसरे पर हमले करने के काफी हथियार अपने विरोधियों को खुद मुहैया कर दिए हैं। तमाम संभावनाएं इस ओर संकेत कर रही हैं कि यह होड़ अभी और लंबा खिंचेगी और यह मुमकिन है कि अगस्त में होने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिवेशन में ही जाकर उम्मीदवारी आखिरी रूप से तय हो।
अगर अंततः डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक हुसेन ओबामा ही होते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि रिपब्लिकन चुनाव मशीन नस्ल, और उनके अतीत के कई झूठे-सच्चे किस्से और सवाल जोरशोर से उठाकर मतदाताओं को भरमाने की कोशिश करेगी। बिना ठोस कार्यक्रम के वे डेमोक्रेटिक समर्थन आधार में कैसे उत्साह भरेंगे और ब्लैक समुदाय के एक नेता के राष्ट्रपति बनने की संभावना से भड़कने वाली गोरों की प्रतिक्रिया का तोड़ कैसे निकालेंगे, यह उनकी कामयाबी की असली कसौटी होगी। उधर मौजूदा हालात में अगर हिलेरी क्लिंटन उम्मीदवार बन जाती हैं तो उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं होंगी। इससे रिपब्लिकन पार्टी को यह प्रचार करने का मौका मिलेगा कि डेमोक्रेटिक पार्टी में आम जन के मत का कोई मोल नहीं है, सुपर डेलीगेट यानी पार्टी के मठाधीश वहां जनमत की अवहेलना कर अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिता सकते हैं। इससे पार्टी की लोकतांत्रिक छवि प्रभावित होगी।

लेकिन अब हकीकत यही है कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने शुरुआत में अपने लिए अनुकूल दिख रहे हालात को उलझा दिया है। ओबामा और हिलेरी क्लिंटन की होड़ में लोगों को मजा खूब आया है और इससे अमेरिकी राजनीति में एक तरह की रफ्तार भी आती नजर आई है, लेकिन चुनाव संभावनाओं के लिहाज से देखें तो यह पूरा दौर, अगर फुटबॉल की शब्दावली में कहें, तो डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए ‘ओन गोल’ करने जैसा है।

1 comment:

anju said...

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