Monday, May 26, 2008

नेहरू को ना भूलें


सत्येंद्र रंजन
वाहर लाल नेहरू ने आज से ४४ वर्ष पहले दुनिया को अलविदा कहा। तब से उनकी विरासत गंभीर विचार-विमर्श के साथ-साथ गहरे मतभेदों का भी विषय रही है। अपने जीवनकाल में, खासकर आजादी के बाद जब वो भारतीय राजनीति के शिखर पर थे, पंडित नेहरू ने अभूतपूर्व लोकप्रियता हासिल की। इसके बूते उन्होंने अपनी ऐसी हैसियत बनाई कि कहा जाता है, १९६२ के चीन युद्ध में भारत की हार तक राष्ट्रीय मुख्यधारा में उन्हें आलोचना से परे माना जाता था। लेकिन निधन के बाद उनके व्यक्तित्व, उनके योगदान और उनके विचारों पर तीखे मतभेद उभरे। इतने कि यह बात बेहिचक कही जा सकती है कि नेहरू स्वतंत्र भारत में सबसे ज्यादा मत-विभाजन पैदा करने वाली शख्सियत नजर आते हैं। यह बात भी लगभग उतने ही ठोस आधार के साथ कही जा सकती है कि पिछले साढ़े चार दशकों में नेहरू के विरोधी विचारों को देश में लगातार अधिक स्वीकृति मिलती गई है, और आज जिस कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार के प्रति वफादारी आगे बढ़ने का सबसे बड़ा पैमाना है, वह भी पंडित नेहरू के रास्ते पर चल रही है, यह कहना मुश्किल लगता है।

नेहरू के विरोध के कई मोर्चे हैं। एक मोर्चा दक्षिणपंथ का है, जो मानता है कि जवाहर लाल नेहरू ने समाजवाद के प्रति अपने अति उत्साह की वजह से देश की उद्यमशीलता को कुंद कर दिया। एक मोर्चा उग्र वामपंथ का है, जो मानता है कि नेहरू का समाजवाद दरअसल, पूंजीवाद को निर्बाध अपनी जड़ें जमाने का मौका देने का उपक्रम था। एक मोर्चा लोहियावाद का रहा है, जिसकी राय में नेहरू ने व्यक्तिवाद और परिवारवाद को बढ़ावा दिया और पश्चिमी सभ्यता का अंध अनुकरण करते हुए देसी कौशल और जरूरतों की अनदेखी की। लेकिन नेहरू के खिलाफ सबसे तीखा मोर्चा सांप्रदायिक फासीवाद का है, जिसकी राय में देश में आज मौजूद हर बुराई के लिए नेहरू जिम्मेदार हैं।

नेहरू विरोधी इन तमाम ज़ुमलों को इतनी अधिक बार दोहराया गया है कि आज की पीढ़ी के एक बहुत बड़े हिस्से ने बिना किसी आलोचनात्मक विश्लेषण के इन्हें सहज स्वीकार कर लिया है। संभवतः इसीलिए आजादी के पहले महात्मा गांधी के बाद कांग्रेस के सबसे लोकप्रिय नेता और देश के पहले प्रधानमंत्री के प्रति आज सकारात्मक से ज्यादा नकारात्मक राय मौजूद है। चूंकि ऐसी राय अक्सर बिना ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य को ध्यान में रखे और वर्तमान के पैमानों को अतीत पर लागू करते हुए बनाई जाती है, इसलिए सामान्य चर्चा में इसे चुनौती देना आसान नहीं होता।

इस संदर्भ में सबसे अहम पहलू यह समझना है कि आज जिन चीजों और स्थितियों को को हम तयशुदा मानते हैं, वह हमेशा से ऐसी नहीं थीं। मसलन, देश की एकता, लोकतंत्र का मौजूदा स्वरूप, विकास का ढांचा, प्रगति की परिस्थितियां आज जितनी सुनिश्चित सी लगती हैं, १९४७ में वो महज सपना ही थीं। देश बंटवारे के जलजले और बिखराव की आम भविष्यवाणियों के बीच तब के स्वप्नदर्शी नेता राज्य व्यवस्था के आधुनिक सिद्धांतों पर अमल और व्यक्ति की गरिमा एवं स्वतंत्रता के मूलमंत्र को अपनाने का सपना देख पाए, इस बात की अहमियत को सिर्फ यथार्थवादी ऐतिहासिक नजरिए से ही समझा जा सकता है। नेहरू उन स्वप्नदर्शी नेताओं में एक थे, अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने संघर्ष किया और प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच अपने विचारों पर अमल का जोखिम उठाया, संभवतः इस बात से कोई असहमत नहीं होगा।
असहमति की शुरुआत अमल के परिणामों को लेकर होती है। यह असहमति एक स्वस्थ बहस का आधार बनी है और निश्चित रूप से आज भी इस बहस को आगे बढ़ाने की जरूरत है। पंडित नेहरू के नेतृत्व में जो विकास नीति अपनाई गई, वह अपने मकसद को कितना हासिल पाई कर पाई, जो नाकामियां उभरीं उसकी कितनी वजह नेहरू के विचारों में मौजूद थी औऱ उनमें कैसे सुधारों की जरूरत है, यह एक सकारात्मक चर्चा है, जो खुद नेहरू के सपने को साकार करने के लिए जरूरी है। लेकिन गौरतलब यह है कि नेहरू का विरोध हमेशा सिर्फ ऐसे ही सवालों की वजह से नहीं होता। नेहरूवाद का एक बड़ा प्रतिवाद सांप्रदायिक फासीवाद है, जिसका मकसद प्रगति और विकास नहीं, बल्कि पुरातन सामाजिक अन्याय और जोर-जबरदस्ती को कायम रखना है।

देश में मौजूद कई विचारधाराओं का सांप्रदायिक फासीवाद से टकराव रहा है। लेकिन यह एक ऐतिहासिक सच है कि सवर्ण और बहुसंख्यक वर्चस्व की समर्थक इन ताकतों के खिलाफ सबसे मजबूत और कामयाब बुलवर्क पंडित नेहरू साबित हुए। देश विभाजन के बाद बने माहौल में भी ये ताकतें अगर कामयाब नहीं हो सकीं, तो उसकी एक प्रमुख वजह नेहरू की धर्मनिरपेक्षता में अखंड आस्था और इसके लिए अपने को दांव पर लगा देने का उनका दमखम रहा। जाहिर है, ये ताकतें आज भी अपना सबसे तीखा हथियार नेहरू पर हमला करने के लिए सुरक्षित रखती हैं। पिछले दो-ढाई दशकों में दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों के ज्यादा प्रचलित होने, संपन्न और सवर्ण पृष्ठभूमि से उभरे मध्य वर्ग के मजबूत होने और अमेरिका-परस्त जमातों का दायरा फैलने के साथ सांप्रदायिक ताकतों को नया समर्थक आधार मिल गया है। नेहरू अपने सपने और आर्थिक एवं विदेश नीतियों की वजह से इन सभी ताकतों के स्वाभाविक निशाने के रूप में उभरते हैं। और ये ताकतें जानती हैं कि जब तक नेहरूवाद को एक खलनायक के रूप में स्थापित नहीं कर दिया जाता, उनकी अंतिम कामयाबी संदिग्ध है।

पिछले डेढ़ दशक में इन ताकतों के बढ़ते खतरे ने बहुत से लोगों को नेहरू की प्रासंगिकता पर नए सिरे से सोचने के लिए प्रेरित किया है। स्वतंत्रता संग्राम के दिनों में जिस आधुनिक भारत की कल्पना विकसित हुई और जिसे आजादी के बाद पंडित नेहरू के नेतृत्व में ठोस रूप दिया गया, उसके लिए पैदा हुए खतरे के बीच यह सवाल बेहद गंभीरता से उठा है कि आखिर इस भारत की रक्षा कैसे की जाए? यह विचार मंथन हमें उन रणनीतियों और सोच की अहमियत समझने की नई दृष्टि देता है, जो पंडित नेहरू ने प्रतिक्रियावादी, आधुनिकता विरोधी और अनुदार शक्तियों के खिलाफ अपनाई। उन्होंने इन ताकतों के खिलाफ वैचारिक संघर्ष जरूर जारी रखा, लेकिन उनकी खास रणनीति देश को विकास एवं प्रगित का सकारत्मक एजेंडा देने की रही, जिससे तब की पीढ़ी भविष्य की तरफ देख पाई और आर्थिक एवं सांस्कृतिक पिछड़पन की व्यापक पृष्ठभूमि के बावजूद एक नए एवं आधुनिक भारत का उदय हो सका।

पंडित नेहरू ने उस वक्त के मानव विकासक्रम की स्थिति, उपलब्ध ज्ञान और संसाधनों के आधार पर उस भारत की नींव रखी, जो आज दुनिया में एक बड़ी आर्थिक ताकत के रूप में उभर रहा है। लेकिन नेहरू की रणनीतियों की नाकामी यह रही कि नए भारत में गरीबी, असमानता और व्यवस्थागत अन्याय को खत्म नहीं किया जा सका। नतीजतन, आज हम एक ऐसे भारत में हैं जहां संपन्नता और विपन्नता की खाई बढ़ती नजर आ रही है, और नेहरू ने समाजवाद के जिन मूल्यों की वकालत की वो आज बेहद खोखले नजर आते हैं। यह विसंगति निसंदेह पंडित नेहरू की विरासत पर बड़ा सवाल है।

लेकिन इस सवाल से उलझते हुए भी आज की पीढ़ी के पास सबसे बेहतरीन विकल्प संभवतः यह नहीं है कि नेहरू की पूरी विरासत को खारिज कर दिया जाए। बल्कि सबको समाहित कर और सबके साथ न्याय की जो बात नेहरू के भारत के सपने के बुनियाद में रही, वह आज भी इस राष्ट्र का सबसे महत्त्वपूर्ण पहलू है, जिसकी जड़ें मजबूत किए जाने की जरूरत है। ये दोनों बातें विकास और प्रगति के एक खास स्तर के साथ ही हासिल की जा सकती हैं, नेहरूवाद की यह मूल भावना भी शायद विवाद से परे है। यह जरूर मुमकिन है कि विकास और प्रगति की नई अवरधारणाएं पेश की जाएं और उनकी रोशनी में पुरानी रणनीतियों पर नए सिरे से विचार हो। बहरहाल, विश्व मंच पर भारत अपनी स्वतंत्र पहचान रखे और जिन मूल्यों पर भारतीय राष्ट्र की नींव डाली गई, उनकी इन मंचों पर वह वकालत करे, यह नेहरूवादी विरासत आज भी उतना ही अहम है, जितना जवाहर लाल नेहरू के जीवनकाल में था, इस बात पर भी शायद कोई मतभेद नहीं हो सकता।

दरअसल, बात जब नेहरू की होती है, तब ये विचार ही सबसे अहम हैं। इन पर आज सबसे ज्यादा चर्चा की जरूरत है। नेहरू की नाकामियां जरूर रेखांकित की जानी चाहिए, लेकिन उनके कुल योगदान का विश्लेषण वस्तुगत और तार्किक परिप्रेक्ष्य में ही होना चाहिए। वरना, हम उन ताकतों की ही मदद करते दिखेंगे जो नेहरू की छवि एवं विरासत का ध्वंस दरअसल भारत के उस नए विचार का ध्वंस करने के लिए करती हैं, जो आजादी की लड़ाई के दिनों में पैदा हुआ, आधुनिक समतावादी चितंकों ने जिसे विकसित किया, जो गांधी-नेहरू के नेतृत्व में अस्तित्व में आया और जिसे आज दुनिया भर में सहिष्णुता, सह-अस्तित्व एवं मानव विकास का एक बेहतरीन आदर्श माना जा रहा है। नेहरू इसी भारत के प्रतीक हैं, और इसीलिए वैचारिक मतभेदों के बावजूद उनकी विरासत की आज रक्षा किए जाने की जरूरत है।

9 comments:

Neeraj Rohilla said...

बेहद संतुलित और विचारोत्तेजक आलेख.

इसे पढ़वाने के लिए आभार,

Anonymous said...

बिलकुल चर्चा होनी चाहिये जी नेहेरौ जी पर आखिर नेहरु जी भारत के क्या विश्व के पहले प्रधान मंत्री थे जो सिफ़लिस जैसी बिमारी से मरे थे
वो वाकी महान थे
वैसे केवल रेडलाईट एरिये मे ही सिफ़लिस से मौते होती थी वो वाकई महान थे जी इस बात से् भी उनकी महानता जाहिर होती है
उनका एक नाजायज भाइ आज भी भारत के लिये नासूर बना हुआ है (शेख मुहम्मद इब्राहिम) बाकी किस्से भी इस मौके पर याद कर लेने चाहिये आखिर यही तो काग्रेस का असली चरित्र है जी
बिलकुल सेकुलर लोग थे तभी तो वे तो इतने महान प्रधानमंत्री थे कि उनकी बेटी एक मुसलमान से सेट हो गई, भागकर शादी भी कर ली और उन्हें पता ही नहीं चला, देश की समस्याओं में व्यस्त रहे होंगे महान व्यक्ति , जो बाद मे उन्हे हिंदू /पारसी घोषित कराना पडा देश को बेवेकूफ़ बनाने के लिये ,वैसे रौल के बारे मे क्या विचार है जी
इन सभी पर चिंतन करने का अच्छा मौका है जी
बुरा ना माने तो बस इतना बतादे क्या आपका परिवार भी इसी लाईन पर है क्या जी :)

अनुनाद सिंह said...

नेहरू उस व्यक्ति का नाम है जिसने स्वतन्त्रता संग्राम में कोई पसीना नहीं बहाया; एक डण्डा तक नहीं खाया।

ऐसे व्यक्ति को भारत का प्रधानमन्त्री बना दिया गया। यह सबसे अनैतिक काम हुआ जिसका खामियाजा आज तक देश भुगत रहा है - काम मत करो, बद मलाई चाटने का 'शार्टकट' ढ़ूंढ़ो !

संक्षेप में कहा जाय तो नेहरू ने भारत की स्वतन्त्रता को जन्म लेते ही 'हाइजैक' कर लिया जो आज तक भारत की आम जनता को नहीं मिली।

Suresh Chiplunkar said...

नेहरू खानदान के खूब कसीदे काढ़े हैं आपने, मैं बेनामी टिप्पणियों के खिलाफ़ रहा हूँ इसलिये नाम के साथ लिख रहा हूँ… सुब्र्ह्मण्यम स्वामी ने जो और जितना भी गाँधी परिवार के खिलाफ़ लिखा है, आज तक उन पर किसी कांग्रेसी ने मानहानि का मुकदमा दायर नहीं किया (क्योंकि बगैर आग के धुँआ नहीं होता) मैंने उनका काफ़ी अनुवाद किया है, देख लें…

Srijan Shilpi said...

धन्य हैं आप और आपका यह विश्लेषण!

आप याद रखिए नेहरू को और हमें बख्श दीजिए !

Anonymous said...

अच्छा लेख लिखा है सत्येंद्र जी। देश को नेहरु जैसे दूरअंदेश नेता की आज भी ज़रुरत है

arfa said...

अच्छा लेख लिखा है सत्येंद्र जी। देश को नेहरु जैसे दूरअंदेश नेता की आज भी ज़रुरत है. arfa

arfa said...

अच्छा लेख लिखा है सत्येंद्र जी। देश को नेहरु जैसे दूरअंदेश नेता की आज भी ज़रुरत है. arfa

anju said...

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