Thursday, January 31, 2008

एडवर्ड्स के हटने के मतलब


अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी की होड़ से जॉन एडवर्ड्स के हट जाने के बाद यह तय हो गया है कि बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन में से ही कोई एक अगले राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार होगा। दरअसल, जॉन एडवर्ड्स को साउथ कैरोलाइना राज्य से काफी उम्मीदें थीं, इसलिए कि यह उनके अपने राज्य नॉर्थ कैरलाइना का पड़ोसी राज्य है। लेकिन यहां वो सिर्फ १८ फीसदी वोट हासिल कर सके। अब सारी निगाहें सुपर ट्यूजडे यानी पांच फरवरी पर है, जिस दिन २२ राज्यों में डेमोक्रेटिक प्राइमरी या कॉकस होंगे। उस रोज जिसने बाज़ी मारी, उसकी संभावना बेहद मजबूत हो जाएगी।
बहरहाल, जॉन एडवर्ड्स का पिछड़ना यह जरूर जाहिर करता है कि अमेरिका में भले इस वक्त बदलाव की लहर चल रही हो, लेकिन यह बदलाव ठोस नीतियों के दायरे में कम औऱ भावावेश में ज्यादा है। एडवर्ड्स अकेले ऐसे उम्मीदवार थे, जिन्होंने नीतियों के स्तर पर रिपब्लिकन पार्टी का विकल्प पेश किया। सबको स्वास्थ्य सुरक्षा देने की उन्होंने विस्तृत और व्यावहारिक योजना रखी। देश का नियंत्रण बहुराष्ट्रीय कंपनियों से वापस आम जनता के हाथ में लाने की राजनीतिक रणनीति भी लोगों के सामने पेश की। लेकिन ये नीतियां लोगों को प्रभावित नहीं कर सकीं। इसके उलट बराक ओबामा का ओजस्वी भाषण डेमोक्रेटिक पार्टी के परंपरागत और नए समर्थकों को ज्यादा लुभा रहा है।
अमेरिका के राजनीतिक रुझान पर गौर करें तो फिलहाल संकेत यही है कि इस बार राष्ट्रपति चुनाव में जीत डेमोक्रेटिक पार्टी के हाथ लगेगी। जॉर्ज बुश जूनियर की आर्थिक औऱ विदेश नीतियां बेहद अलोकप्रिय हो चुकी हैं, जिसका संकेत २००६ के अमेरिकी कांग्रेस के चुनाव में भी मिला, जब १९९२ के बाद पहली बार डेमोक्रेटिक पार्टी को संसद के दोनों सदनों में बहुमत हासिल हुआ। तभी स्थायी रिपब्लिकन बहुमत का दावा खोखला साबित हो गया। यह जाहिर हो गया कि बड़ी कंपनियों, चर्च, दक्षिणी राज्यों के सामंतों और रूढ़िवादी समूहों की साझा ताकत इतनी नहीं है कि वे हमेशा के लिए एक राजनीतिक बहुमत का निर्माण कर सके। उसके बाद से अर्थव्यवस्था में आई मंदी, बढ़ती बेरोजगारी, उलझता इराक का मकड़जाल और बुश प्रशासन के अधिकारियों की खराब हुई छवि ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रति आम लोगों की नाराजगी और बढ़ाई है।
बराक ओबामा की खूबी यह है कि उन्होंने ऐसे बहुत से लोगों को अपनी तरफ खींचा है, जो परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के समर्थक नहीं रहे हैं। खासकर नौजवान तबकों में उनका नारा- चेंज, येस वी कैन (यानी- परिवर्तन हम ला सकते हैं) तेजी से लोकप्रिय हुआ है। ओबामा जब परिवर्तन की बात करते हैं तो उनका प्रत्यक्ष निशाना जरूर रिपब्लिकन पार्टी और जॉर्ज बुश होते हैं, लेकिन परोक्ष रूप से वे हिलेरी क्लिंटन पर भी वार करते हैं। बिल क्लिंटन के राष्ट्रपति रहते हुए क्लिंटन परिवार की राजनीति और आर्थिक सत्ता केंद्रों पर मजबूत पकड़ बनी। इसीलिए आम चर्चा में यह कहा जाता है कि वाशिंगटन ऐस्टैबिलिशमेंट हिलेरी क्लिंटन के साथ है। ओबामा इसी ऐस्टैबलिशमेंट से देश को मुक्ति दिलाने का वादा कर रहे हैं और उस पर राजनीति से अलग रहने वाले लोग भी खूब तालियां पीट रहे हैं।
ओबामा का यह प्रतीकात्मक महत्त्व जरूर है कि उन्होंने नस्लभेद को काफी हद तक डेमोक्रेटिक राजनीति में अप्रासंगिक बना दिया है। ओबामा के पिता केन्याई मूल के थे और उनके बीच का नाम हुसैन है, जो मुस्लिम अर्थ लिए हुए है। लेकिन ये पहलू उनकी चुनावी संभावनाओं को कमजोर नहीं बना रहे हैं। यहां शायद यह याद कर लेना प्रासंगिक है कि अतीत में जैकी जैक्सन जैसे सिविल लिबर्टी के मशहूर नेता सिर्फ इसलिए राष्ट्रपति पद की उम्मीदवारी हासिल नहीं कर सके, क्योंकि डेमोक्रेटिक पार्टी को यह भरोसा नहीं था कि काले समुदाय का कोई व्यक्ति अमेरिका में राष्ट्रपति के चुनाव में जीत सकता है। लेकिन वह बाधा इस बार नजर नहीं आती।
बल्कि इस बार यह मान कर चला जा रहा है कि अमेरिका या तो नस्ल की बेड़ी तोड़ेगा या लिंग की। एडवर्ड्स के पिछड़ जाने के बाद ओबामा या हिलेरी क्लिंटन में से एक को उम्मीदवारी मिलना तय है और इनमें से जो भी उम्मीदवार बने उसके राष्ट्रपति बनने की प्रबल संभावना है। यह निश्चित रूप से एक ऐतिहासिक महत्त्व की घटना होगी। लेकिन अगर एक बार फिर हम नीतियों के दायरे में लौटें तो इन दोनों उम्मीदवारों की नीतियों में ऐसा कुछ नजर नहीं आता जो अमेरिका सरकार का कामकाज पर कोई बुनियादी फर्क डाल सके। मसलन, हम इराक का सवाल लें। ओबामा इस बात का श्रेय जरूर लेते हैं कि उन्होंने शुरू से इराक युद्ध का विरोध किया। लेकिन बतौर सीनेटर उन्होंने इराक में मौजूद अमेरिकी फौज के लिए धन का प्रावधान करने के विधेयक का समर्थन किया और ईरान के खिलाफ सैनिक कार्रवाई की संभावना से उन्होंने इनकार नहीं किया है। हिलेरी क्लिंटन ने २००३ में इराक पर हमले का समर्थन किया था और ईरान के खिलाफ बुश प्रशासन की उग्र नीतियों की भी वो समर्थक रही हैं। इजराइल और फिलस्तीन पर भी दोनों के रुख में कोई फर्क नहीं है।
अंदरूनी मामलों में हिलरी क्लिंटन की मुश्किल यह है कि उनके साथ वही शक्तियां खड़ी हैं, जो हमेशा सत्ता के साथ होती हैं। ओबामा के साथ जरूर एक नई और आम लोगों की ताकत दिखती है, लेकिन जिस वाशिंगटन ऐस्टैबलिशमेंट की आलोचना करते हैं, उस पर वे लगाम कैसे लगाएंगे, इसका कोई कार्यक्रम उन्होंने जनता के सामने नहीं रखा है। इस तरह बात बात-घूम फिर कर यहीं आ जाती है कि बुश प्रशासन की अलोकप्रियता का फायदा डेमोक्रेटिक उम्मीदवार को जरूर मिल रहा है, लेकिन इससे अमेरिकी प्रशासन की मूल दिशा पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। बहरहाल, दुनिया सिर्फ इसी उम्मीद में है कि डेमोक्रेटिक प्रशासन के तहत जॉर्ज बुश की एकतरफा कार्रवाई, अंतरराष्ट्रीय कानूनों की अनदेखी और नंगे साम्राज्यवाद की नीतियों पर रोक लगेगी और यही एक बड़े राहत की बात होगी।

Tuesday, January 15, 2008

समाजवादः आस्था या नारा?


सत्येंद्र रंजन
पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य के इस बयान ने वामपंथी हलके में काफी हलचल पैदा की है कि उनकी सरकार के सामने पूंजीवादी विकास के रास्ते पर चलने के अलावा कोई और विकल्प नहीं है। भट्टाचार्य का जब ये बयान आया तो मीडिया में ऐसी अटकलें लगाई गईं कि उन्होंने पार्टी लाइन से हट कर कोई बात कही है, जिस पर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी सफाई पेश कर देगी। मगर ठीक इसके उलट पार्टी के सबसे वरिष्ठ नेता और पश्चिम बंगाल के पूर्व मुख्यमंत्री ज्योति बसु ने बुद्धदेब भट्टाचार्य के बयान का समर्थन किया। फिर पार्टी महासचिव प्रकाश करात ने भी इन दोनों नेताओं की राय से सहमति जताई। इस घटनाक्रम पर भारतीय जनता पार्टी और कांग्रेस जैसी पार्टियों और कॉरपोरेट मीडिया को चुटकी लेने का मौका जरूर मिला। लेकिन इसमें कोई हैरत की बात नहीं है। हैरत आरएसपी जैसी वामपंथी पार्टी की प्रतिक्रिया से हुई। इस प्रतिक्रिया का सार यह है कि माकपा अपनी मूल आस्था हट रही है औऱ अब वह खुल कर पूंजीवाद का गुणगान करने लगी है। माकपा अपनी बुनियादी आस्थाओं पर कितनी अडिग है, यह एक सार्वजनिक परीक्षण का विषय है। आस्था के परीक्षण की सबसे बेहतरीन कसौटी किसी सिद्धांत या विचारधारा के प्रति किसी पार्टी या संगठन के नेताओं और कार्यकर्ताओं की निष्ठा है। यह निष्ठा उनके व्यवहार में झलकनी चाहिए। जो पार्टी समाजवाद की बात करती हो, उसके नेताओँ और कार्यकर्ताओँ से यह अपेक्षा जरूर रहेगी कि वे अपनी निजी जिंदगी में ईमानदार रहें, सादगी बरतें और उस आम जन के साथ एक सामंजस्य कायम करें, जिसकी बेहतरी के लिए वे राजनीति में होने का दावा करते हैं। इस लिहाज से शायद महात्मा गांधी का जीवन सबके लिए आदर्श हो सकता है। और संभवतः ऐसी ही जीवनशैली की वजह से गांधीजी यह कहने का साहस जुटा पाए कि, ‘मेरा जीवन मेरा संदेश है।’
बहरहाल, माकपा नेताओं के ताजा बयान से पर चर्चा इस व्यापक संदर्भ में कम, और राजनीतिक नारेबाजी के संदर्भ में ज्यादा हो रही दिखती है। पश्चिम बंगाल के औद्योगीकरण, सिंगूर और नंदीग्राम जैसे मुद्दों पर माकपा के रुख से उसके विरोधियों को उस पर डंडा चलाने का जो एक मौका मिला, उसमें इन ताजा बयानों से कुछ और ताकत जुड़ गई है। आखिरकार अपने बचाव में माकपा को यह सफाई देनी पड़ी है कि वह ‘वर्गविहीन, शोषण-मुक्त और समाजवादी राज्य-व्यवस्था’ कायम करने के लिए काम करने पर अडिग है, लेकिन सिर्फ तीन राज्यों में सत्ता में रहते हुए समाजवाद कायम कर पाना मुमकिन नहीं है, इसलिए फिलहाल उसकी नीति वामपंथी एजेंडे को आगे बढ़ाना है। यानी पूंजीवादी विकास के क्रम में मजदूर, किसान और गरीब तबकों के हितों की रक्षा फिलहाल उसकी रणनीति है।
इस घटनाक्रम ने समाजवाद शब्द को एक बार फिर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श में चर्चित कर दिया है। ये शायद संयोग ही हो, लेकिन इसी मौके पर सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका ने भी इस चर्चा को आगे बढ़ाने में अपना योगदान दिया है। इस याचिका में यह अपील की गई कि संविधान की प्रस्तावना में इमरजेंसी के दौरान जोड़े गए ‘समाजवाद’ शब्द को इससे हटा दिया जाए। साथ ही जन प्रतिनिधित्व कानून में संशोधन कर सभी राजनीति दलों के लिए समाजवाद में आस्था रखने की लगाई गई शर्त को भी रद्द कर दी जाए। सुप्रीम कोर्ट ने पहली अपील तो ‘समाजवाद’ की अपनी व्याख्या पेश करते हुए खारिज कर दी, लेकिन जन प्रतिनिधित्व कानून के संदर्भ में संबंधित पक्षों को नोटिस जरूर जारी कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने ‘समाजवाद’ की अपनी व्याख्या में कहा कि यह लोकतंत्र का ही एक और चेहरा है। हमें ‘समाजवाद’ को व्यापक और मानवीय संदर्भ में लेना चाहिए, न कि कम्युनिस्टों द्वारा पेश की जाने वाली व्याख्या के रूप में।
यह कहा जा सकता है कि सुप्रीम कोर्ट ने ‘समाजवाद’ की एक अराजनीतिक व्याख्या पेश की है और इसे एक दशक से पहले ‘हिंदुत्व’ की पेश व्याख्या के क्रम में रखा जा सकता है, जब सुप्रीम कोर्ट ‘हिंदुत्व’ को एक जीवन प्रणाली करार दिया था और जिससे दक्षिणपंथी-सांप्रदायिक राजनीति को एक कानूनी आवरण मिला था। बहरहाल, समाजवाद का सवाल कहीं गंभीर है। खासकर उन लोगों के लिए जो एक वैकल्पिक व्यवस्था बनाना चाहते हैं। एक ऐसी व्यवस्था जिसमें जन्म के आधार पर सुविधाएं तय नहीं हों और सबको अपनी क्षमता और प्रतिभा के विकास का समान अवसर मिले। एक ऐसी व्यवस्था में जिसमें जिंदगी की बुनियादी सुविधाएं मूल मानव अधिकार मानी जाएं और इन्हें उपलब्ध कराना सरकार, राज्य व्यवस्था या समाज की जिम्मेदारी हो। एक ऐसी व्यवस्था जो आम जन के प्रति जवाबदेह हो और जिसमें किसी स्त्री-पुरुष के बौद्धिक एवं आत्मिक विकास पर कोई प्रतिबंध नहीं हो। इसीलिए इस बहस को मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की आस्था, रणनीति और कार्यनीतियों से अलग कर देखने की जरूरत है।
मगर इस बहस को अराजनीतिक संदर्भ में भी नहीं देखा दा सकता। यह एक विशुद्ध राजनीतिक सवाल है। असल में समाजवाद की अवधारणा राजनीतिक चिंतन के विकासक्रम का हिस्सा है औऱ इस पर इसी संदर्भ में विचार होना चाहिए। यहां पर सबसे अहम सवाल यह है कि आखिर समाजवाद कोई व्यवस्था है, या नारा या फिर एक ऐसा आदर्श जिसे व्यवहार में पूरी तरह कभी हासिल नहीं किया जा सकता? मार्क्सवाद से अलग सोच में अक्सर समाजवाद को एक विचारधारा और एक आदर्श माना गया है, हालांकि ज्यादातर मौकों पर यह मान्यता नारेबाजी में तब्दील होकर रह गई है। कुछ मामलों में यह आस्था की एक ऐसी अमूर्त धारणा रही है, जिस अमल उतराने की रणनीति के बारे में सोचना तो दूर, बल्कि उसकी वस्तुगत व्याख्या भी मुश्किल रही है। इसलिए इसमें कोई अचरज की बात नहीं कि आज भी बहुत से समूहों, संगठनं और चिंतकों के लिए समाजवाद एक ऐसी धार्मिक आस्था की तरह है, जिस पर कोई तार्किक बहस उन्हें मंजूर नहीं होती। मार्क्सवादी चिंतन में समाजवाद कभी आदर्श नहीं रहा। अगर कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एगंल्स के ऐतिहासिक भौतिकवाद पर गौर करें तो समाजवाद, साम्यवाद से पहले का एक चरण है। एक ऐसा मुकाम, जहां से साम्यवाद के लिए यात्रा शुरू होगी। सोवियत संघ के जमाने में वहां की कम्युनिस्ट पार्टी का यह दावा था कि सोवियत खेमे में समाजवाद की स्थापना हो गई है, और वहां से साम्यवाद की तरफ जाने का सफर शुरू हो गया है। लेकिन १९९० तक आते-आते यह सफर उलटी दिशा में नजर आया। १९१७ की बोल्शेविक क्रांति के बाद सोवियत संघ में जिस समाजवाद की स्थापना हुई थी, वह बिखर गया और सोवियत खेमे में शामिल रहे देशों में खुला पूंजीवाद लौट आया। इसी दौर में चीन ने विकास की जो राह पकड़ी और उसमें जिस तरह उत्पादक शक्तियों की व्याख्या की गई, उसे भी समाजवाद की शास्त्रीय मार्क्सवादी समझ पर कुछ सवाल उठे। जाहिर है, इन दोनों घटनाक्रमों से पूरी दुनिया में समाजवाद के विमर्श में भारी बदलाव आया।
मार्क्सवादी व्यवस्थाओं ने समाजवाद का जो मॉडल पेश किया, उसकी एक बड़ी आलोचना यह रही है कि उनमें लोकतंत्र का अभाव था औऱ जहां वे व्यवस्थाएं वजूद में आईं, वहां के लोगों को नागरिक और राजनीतिक अधिकार नहीं मिले। कभी जोसेफ स्टालिन ने भले ये दावा किया कि समाजवाद ही लोकतंत्र का सर्वश्रेष्ठ रूप है, लेकिन अब इस आलोचना को मार्क्सवादी विचारकों का एक समूह पूरी गंभीरता से स्वीकार कर रहा है। ये विचारक यह मान रहे हैं कि समाजवाद की स्थापना के किसी चरण में लोकतंत्र से इनकार नहीं किया जाना चाहिए। यानी मानव के संपूर्ण विकास के लिए आर्थिक अधिकार जितने अहम हैं, राजनीतिक अधिकार भी उतने ही अहम हैं।
इस सिद्धांत पर दुनिया भर में (जाहिर है भारत में भी) अनेक विचारकों और राजनेताओं ने उसी दौर में जोर दिया था, जब सोवियत संघ एक मजबूत ताकत के रूप में उभर रहा था। सोवियत प्रयोग की एक दूसरी आलोचना वहां अपनाई गई विकास नीति भी थी। एक समय के बाद कहा जाने लगा कि सोवियत संघ ने राज्य के मालिकाने में दरअसल, पूंजीवादी नीति ही अपना ली है। आलोचकों ने सोवियत व्यवस्था को सरकारी पूंजीवाद करार दिया। आखिरकार, वह व्यवस्था अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों से ढह गई। चीन आज ऐसी ही आलोचनाओं के रू-ब-रू है। वहां हम एक विशिष्ट प्रयोग होता देख रहे हैं, लेकिन इसका अंतिम परिणाम क्या होगा, यह अभी भविष्य की गर्त में है।
भारत में बाकी दुनिया से अलग एक नया प्रयोग यह हुआ कि यहां वोट की ताकत से कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आई- पहले केरल में और फिर पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में। पूरी पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर किसी एक या एक से ज्यादा राज्य में किसी कम्युनिस्ट पार्टी का सत्ता में रहना अपने आप में एक वैचारिक विसंगति है। यह कहा जा सकता है कि मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी इस विसंगति के बीच अब तक अपने लिए सटीक रास्ता और रणनीति तैयार करने में कामयाब रही है। वामपंथी ताकतों के साथ व्यापक एकता बनाना और भूमि-सुधार जैसे कार्यक्रमों को लागू अपने लिए ठोस जनाधार बनाना, और पंचायती व्यवस्था पर प्रभावी अमल कर इस जनाधार को कायम रखना उसकी कामयाबी के सूत्र रहे हैं। लेकिन पिछले एक साल के दौरान पश्चिम बंगाल के औद्योगीकरण के सवाल पर लंबे समय से कायम इस वामपंथी एकता और जनाधार में दरारें पड़ती नजर आई हैं।
वामपंथी एकता में दरार की वजह शायद समाजवादी और वामपंथी राजनीति की समझ को लेकर पैदा हुए मतभेद ही हैं। एक तरफ माकपा ऐतिहासिक विकासक्रम की अपनी समझ पर आगे बढ़ती दिख रही है तो दूसरी तरफ इसे अपनी समाजवादी आस्थाओं के खिलाफ मानते हैं। निजी पूंजी के निवेश, निवेशकों को कुछ जरूरी सुविधाएं और सुरक्षा देना और बड़े उद्योगों की स्थापना मतभेद के खास मुद्दे हैं। इस जारी बहस के बीच माकपा का सार्वजनिक तौर पर यह कहना अहम है कि भारत समाज अभी विकास के जिस स्तर पर है, उसमें पूंजीवादी विकास को अपनाना और वामपंथी राजनीति को आगे बढ़ाना एक अनिवार्यता है।
माकपा की इस लाइन के विरोधियों के आगे यह सवाल है कि अगर यह समझ गलत है तो आखिर इसका विकल्प है क्या है? पश्चिम बंगाल सरकार को राज्य के विकास की कैसी नीति अपनानी चाहिए, जिससे राज्य में रोजगार के अवसर पैदा हों और राज्य का आधुनिकीकरण हो? क्या उद्योगों का समाजवाद से कोई विरोध है? और क्या पूंजीवाद हर हाल में एक बुरी व्यवस्था है? गौरतलब है कि खुद मार्क्सवादी विचारधारा के तहत पूंजीवाद को सामंतवादी गुलामी और शोषण से मुक्ति दिलाने वाली व्यवस्था माना गया है औऱ इतिहास के एक दौर में इसकी भूमिका प्रगतिशील मानी गई है। सवाल है कि भारत की मौजूदा हालत के बीच क्या पूंजीवाद की यह भूमिका पूरी तरह खत्म हो गई है?
यहां एक अहम सवाल खुद वामपंथ की राजनीति पर है। अगर पूंजीवाद का खात्मा वामपंथी दलों का मकसद है तो पूंजीवादी व्यवस्था के भीतर उनके संसदीय राजनीति में हिस्सा लेने और सरकार बनाने का क्या तर्क है? अगर सरकार पूंजीवादी माहौल में बनेगी, तो उसे पूंजीवादी विकास के कई पहलुओं को स्वीकार करना होगा। अगर वामपंथी दल इसे स्वीकार नहीं कर सकते तो क्या यह उनके लिए उचित नहीं होगा कि वे इस व्यवस्था से अलग होकर माओवादियों के रास्ते का अनुकरण करें और बंदूक के जोर से सत्ता पर काबिज होने के रास्ते पर चलें? यहां यह गौरतलब है कि वामपंथ दरअसल पूंजीवादी संदर्भ में ही एक प्रासंगिक शब्द है। जब समाजवाद की स्थापना हो जाएगी, यानी व्यवस्था ही समाजवादी हो जाएगी तब वामपंथ यानी आम जन के हितों की वकालत की क्या प्रासंगिकता रहेगी?
दरअसल, समाजवाद भले मकसद हो, लेकिन वहां तक पहुंचने की राह में मौजूद चुनौतियों से कोई प्रगतिशील ताकत मुंह नहीं मोड़ सकती। जनता के लंबे संघर्षों से लोकतंत्र के जिस मुकाम तक भारत पहुंचा है, उसकी रक्षा और वहां से आगे बढ़ने की राह तैयार करना हर प्रगतिशील शक्ति की फर्ज है। इस लिहाज से माकपा की रणनीति प्रासंगिक लगती है, लेकिन अगर उसके साथियों के मन में कोई सवाल है तो विश्वसनीय तर्कों से उन्हें संतुष्ट करने की जिम्मेदारी भी उसकी है। बहरहाल, इस बहस का एक पैगाम उन लोगों के लिए भी है जो पूंजीवाद के विकास के साथ इतिहास का अंत मानते हैं। पैगाम यह है कि इतिहास की विकास यात्रा पूंजीवाद के साथ खत्म नहीं हुई है। मानव की स्वतंत्रता औऱ सबके लिए समान अवसर एवं अधिकार प्राप्त करना इस यात्रा की मंजिल है, औऱ उस मंजिल तक पहुंचने की प्रक्रिया तेज करने की कोशिश में जुटी शक्तियां लगातार इसके नए उपाय ढूंढ रही हैं।

Tuesday, January 8, 2008

बंदर कहना नस्लवाद है


सत्येंद्र रंजन
हरभजन सिंह ने सिडनी टेस्ट के दौरान एंड्र्यू साइमंड्स को बंदर कहा या नहीं, यह विवादास्पद है। अगर भज्जी कह रहे हैं कि उन्होंने ऐसा नहीं कहा तो भारतीय टीम मैनेजमेंट और बीसीसीआई को इस पर भरोसा करना चाहिए, और जिन सबूतों के आधार पर उनके ऊपर तीन टेस्ट मैचों की पाबंदी लगाई गई है, उसके खिलाफ मजबूत प्रमाण पेश करते हुए आईसीसी मैच रेफरी के इस फैसले को रद्द करवाने की कोशिश करनी चाहिए। बल्कि अगर यह साबित हो जाता है कि भज्जी ने ऐसा नहीं कहा तो उन पर झूठी तोहमत लगाने के लिए ऑस्ट्रेलियाई खिलाड़ियों को कानूनी नोटिस भेजा जाना चाहिए। लेकिन अगर भज्जी या कोई दूसरा खिलाड़ी खेल के बीच आवेश में आकर किसी दूसरे के लिए इस शब्द का इस्तेमाल करता है, तो इसका कोई बचाव नहीं हो सकता। दरअसल, किसी को ऐसे बचाव की कोशिश करनी भी नहीं चाहिए। भज्जी-साइमंड्स के मौजूदा विवाद में यह बात इसलिए अहम हो गई है, क्योंकि मीडिया और कई दूसरे हलकों से भज्जी के बचाव में अजीबोगरीब दलीलें पेश की गई हैं। इन दलीलों का सार यह है कि बंदर कहना कोई गाली नहीं है, और न ही इसमें कोई नस्लवाद है। बचाव की एक और दलील यह है कि अगर बंदर कहना नस्लवादी टिप्पणी हो, तो भी भज्जी शायद इससे वाकिफ न रहे हों औऱ अनजाने में उन्होंने यह बात कह दी हो। दूसरी बात के संदर्भ में सिर्फ कानून के क्षेत्र का यह सर्वमान्य सिद्धांत याद कर लेने की जरूरत है कि किसी सभ्य कानूनी व्यवस्था में अज्ञानता या जानकारी न होना कोई बचाव नहीं है। यानी आप कोई अपराध करने के बाद अपने बचाव में यह दलील पेश नहीं कर सकते कि आपको यह जानकारी नहीं थी कि वह काम अपराध है।
जहां तक बंदर कहने की बात है, तो इसका एक ऐतिहासिक संदर्भ है। बंदर भारत में पूजे जाते हैं, आखिर सबके पूर्वज बंदर थे या लोग प्यार से अपने बच्चों को भी बंदर कह देते हैं, ये बातें उस ऐतिहासिक संदर्भ की अज्ञानता में ही कही जा सकती हैं। भज्जी ने साइमंड्स को बंदर कहा या नहीं, हम नहीं जानते। लेकिन अगर उन्होंने कहा, तो जाहिर है, वे इस शब्द के जरिए साइमंड्स के प्रति श्रद्धा या प्यार नहीं जता रहे थे। अगर उन्होंने कहा तो इसके पीछे अपमान का ही भाव था। इस शब्द के साथ अपमान की भावना कैसे नस्लवादी संदर्भ ग्रहण कर लेती है, इसे समझने की जरूरत है।
पहली बात तो यह कि जब आप अपमान भाव के साथ किसी को बंदर कहते हैं, तो उसमें यह अंतर्निहित होता है कि आप उसे मानव के विकासक्रम में खुद से नीचे के स्तर पर बता रहे हैं। यह बात बहुत से मूलवासी समुदायों को इसलिए ज्यादा चुभती है, क्योंकि उनके साथ सदियों तक वास्तव में ऐसा ही व्यवहार किया गया है और इतिहास में इसकी उन्होंने बहुत महंगी कीमत चुकाई है। औद्योगिक क्रांति के बाद जब यूरोपीय साम्राज्यवाद ने कदम पसारने शुरू किए तभी यूरोप के गोरे नस्ल की जातियों ने ह्वाइटमेन बर्डन का सिद्धांत पेश किया, जिसका सारतत्व यह था कि दुनिया को ‘सभ्य’ बनाने की जिम्मेदारी गोरे लोगो के कंधों पर है। ‘सभ्य’ बनाने की इस मुहिम में एशिया, अफ्रीका औऱ लैटिन अमेरिका के बहुत से देशों ने इन जातियों ने गुलाम बना लिया। इस दौर में लैटिन अमेरिका की माया और अज़तेक जैसी कई सभ्यताएं लगभग नष्ट हो गईं, भारी कत्ले-आम हुआ और रेड इंडियन्स कहे जाने वाले मूलवासियों को उनकी ही जमीन और संसाधनों से खदेड़कर अमानवीय स्तर पर जीने को मजबूर कर दिया गया। अफ्रीका के काले समुदाय के लोगों को गुलाम बनाकर गोरे नस्ल के लोगों ने अपनी सुविधा के मुताबिक दुनिया में जहां चाहा, वहां ले जाकर उन्हें बसाया औऱ उनका मनमाना शोषण किया। यह सारा अत्याचार यही कहते हुए किया गया कि यूरोपीय गोरे समुदायों के अलावा बाकी सभी नस्ल और जातियां विकासक्रम में पिछड़ी हुई हैं। काले और मूलवासी समूहों को आम तौर पर जानवर के जैसा समझा गया। बंदर जैसे शब्द उनके लिए लगातार इस्तेमाल किए गए। यूरोपीय साम्राज्यवाद और नस्लीय भेदभाव के खिलाफ जब लंबा संघर्ष चला और तब जाकर कहीं उससे एक हद तक मुक्ति मिली। इसी विश्वव्यापी संघर्ष से नस्लवाद के खिलाफ जागरूकता आई। इस संघर्ष ने नस्ल, रंग और जाति के आधार पर भेदभाव के तमाम सिद्धांतों को चुनौती दी और आखिरकार विश्व व्यवस्था में यह बात स्वीकार की गई कि हर जाति, नस्ल, रंग, राष्ट्रीयता और संस्कृति के लोग समान हैं। उनके बीच नज़र आने वाला शारीरिक फर्क भौगोलिक और ऐतिहासिक कारणों से है। मानव सभ्यता का भविष्य इसी में है कि इंसान की मूलभूत एकता पर जोर दिया जाए। इसीलिए आज पश्चिम से लेकर पूरब तक हर जगह किसी को बंदर कहना या बंदर के बोलने जैसी आवाज निकालकर किसी को चिढ़ाना एक अपराध माना जाता है। नई जागरूकता के साथ पश्चिमी समाज अब अपने ऐतिहासिक अपराधों का प्रायःश्चित करता नजर आता है। अभी हाल ही में ऑस्ट्रेलिया में सत्ता में आई लेबर पार्टी की सरकार ने देश की मूलवासी आबादी से बीती सदियों में हुए अत्याचार के लिए अफसोस जताया है। यूरोप में फुटबॉल के मैदानों पर मंकी कहना या मंकी चैंट करना स्थापित अपराध है, जिसकी साफ सजा का प्रावधान है।
यह हो सकता है कि बंदर कहने के अर्थ की गंभीरता भारतीय समाज में बहुत से लोग महसूस न कर सकें। इसलिए कि भारत में उस प्रकार के नस्लीय भेदभाव और अत्याचार का इतिहास नहीं रहा है, जैसा अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में रहा है। ठीक उसी तरह जैसे यूरोप या अफ्रीका में किसी के लिए यह समझना मुश्किल हो कि मोची या महार शब्दों का इस्तेमाल क्यों कुछ खास संदर्भों में अपमानजनक है। हाल में फिल्म आजा नचले के एक गाने में मोची शब्द के इस्तेमाल पर दलित समूहों ने जो एतराज जताया, उसे समझना जातीय अत्याचार के इतिहास से नावाकिफ लोगों के लिए मुश्किल हो सकता है। लेकिन भारतीय संदर्भ में इन शब्दों के पीछे हजारों साल के अन्याय का इतिहास छिपा है और इसीलिए सार्वजनिक विमर्श में इनका इस्तेमाल अब लगभग प्रतिबंधित हो गया है।
शब्दों के अर्थ का खास संदर्भ होता है औऱ बदलते वक्त औऱ संदर्भ के साथ ये अर्थ बदलते रहते हैं। मसलन, १९३० के दशक में हरिजन शब्द दलितों को सामाजिक प्रतिष्ठा दिलाने की कोशिश का हिस्सा हो सकता था, लेकिन आज इस शब्द के इस्तेमाल पर दलितों को ही गहरा एतराज होता है। यह एतराज इसलिए है कि वे समाज में अपनी प्रतिष्ठा अपने बुनियादी मानव अधिकारों के साथ पाना चाहते हैं, न कि किन्हीं दूसरे समुदायों की मेहरबानी से। हरिजन शब्द में यह संदेश देने की कोशिश थी कि दलित भी ईश्वर की संतान हैं, इसलिए उनसे मानवीय व्यवहार किया जाए। यह संदेश दलितों से ज्यादा सवर्ण जातियों के लिए था। लेकिन अपने अधिकारों के प्रति जागरूक दलित दूसरों की कृपा से मानवीय व्यवहार की अपेक्षा नहीं रखते। उन्होंने अपने लिए दलित शब्द इसलिए अपनाया है कि इससे यह जाहिर होता है कि इन समुदायों को सदियों तक दबा कर रखा गया। अत्याचार का यह बोध उनमें अपने बुनियादी हक और स्वाभाविक मानवीय प्रतिष्ठा पाने का मनोबल पैदा करता है।
अगर हम जाति और समुदायों के लिए शब्दों के इस ऐतिहासिक अर्थ को समझ सकें तो बंदर कहने का क्या मतलब है, इसे बेहतर ढंग से समझ सकते हैं। और अगर हम यह समझ लें तो शायद ऐसा कहने वाले किसी व्यक्ति की बचाव में बेमतलब की दलीलें नहीं गढ़ेंगे, जैसा हरभजन-साइमंड्स विवाद में हुआ है।

Tuesday, January 1, 2008

सानिया से सवाल क्यों?


सत्येंद्र रंजन
सानिया मिर्जा आधुनिकता की एक वक्तव्य हैं, इस कथन पर शायद ही किसी को एतराज हो। दरअसल, सानिया में ऐसी कई खूबियां हैं, जिनके आधार पर इस कथन की व्याख्या की जा सकती है। मसलन, सानिया ने एक बेहद प्रतिस्पर्धी खेल में दुनिया में अपनी जगह बनाई है, वे खेल को खेल की भावना से खेलती हैं, वे सोच-समझ कर और अर्थपूर्ण बातें बोलती हैं, असल में उनका हर इंटरव्यू उनकी बुद्धिमत्ता की मिसाल होता है, और भटकाव की तमाम परिस्थितियों के बावजूद उनका ध्यान अपने मकसद, यानी खेल पर अब तक टिका रहा है। शायद इन्हीं खूबियों की वजह से वे टेनिस की दुनिया में ‘बिग लीग’ तक पहुंच सकी हैं। सानिया की ये तमाम खूबियां ऐसी हैं, जिनकी वजह से किसी समाज और राष्ट्र को सहज ही उन पर फख्र हो सकता है। इसीलिए भारत में उन पर करोड़ों लोगों को फख्र है। जिस खेल में गिने-चुने मौकों को छोड़ कर भारत का नाम हाशिये पर ही रहा है, बल्कि महिला टेनिस की बात करें तो शायद हाशिये पर भी कभी नाम नहीं रहा, उसमें उन्होंने ग्रैंड स्लैम जैसे मुकामों तक इस देश का दांव पहुंचा दिया है। यह उनकी प्रतिभा और उनके पक्के इरादे का ही नतीजा है कि इस देश के खेल प्रेमी अब सचमुच इस खेल में भी सफलता के सपने देखने लगे हैं। अपनी सफलताओं के साथ सानिया ने बहुत छोटी उम्र में पूरे मुल्क का ध्यान अपनी तरफ खींचा। हमेशा ही अपने उत्पाद के इश्तहार के लिए मॉडल की तलाश में रहने वाले कारपोरेट जगत को उनमें एक आदर्श मॉडल की संभावनाएं नजर आईं। इसलिए उन पर पैसों की बरसात की खबरें मीडिया में छायी रही हैं। लेकिन इसके साथ ही ऐसी आशंकाएं भी उभरीं कि इस चमक-दमक में सानिया ऐसे खो और उलझ सकती हैं, जिससे खेल की उनकी संभावनाएं धूमिल हो जाएं। मगर साल २००७ इन आशंकाओं को गलत साबित करते हुए खत्म हुआ। इसके पहले के साल में डगमगाने के बाद गुजरे वर्ष में सानिया ने अपना फॉर्म फिर हासिल किया और बड़े विश्व मुकाबलों में भी अपनी छाप छोड़ी। इस तरह उन्होंने यह दिखाया कि खेल और कारोबार दोनों में संतुलन बनाए रखने के गुर उन्होंने सीख लिए हैं। अगर खेल के मैदान पर सानिया मिर्जा की खूबियों पर गौर करें तो संघर्ष भावना, और गलतियों से सीखने के साथ-साथ शांत बने रहना उनके बड़े सकारात्मक पहलू माने जा सकते हैं। सानिया वैसे नाज-नखरे नहीं दिखातीं, जैसा कई टेनिस खिलाड़ियों की आदत में शुमार होता है। न जीत में उनके चेहरे पर घमंड की झलक मिलती है और न हार में हताशा। कहा जा सकता है कि हर लिहाज से सानिया मिर्जा एक ऐसी खिलाड़ी हैं, जिनका अनुकरण करने के लिए दूसरे खिलाड़ियों को कहा जा सकता है। उनकी एक खूबी यह भी है कि अपने अब तक करियर में सानिया मिर्जा ने अपनी तरफ से कोई विवाद खड़ा नहीं किया है। इसके बावजूद अक्सर विवाद उन्हें घेर लेते हैं, यह शायद एक विडंबना ही है। यह इससे भी बड़ी विडंबना है कि इन विवादों का खेल से कोई संबंध नहीं होता।
अभी हाल में हैदराबाद की एक मस्जिद में एक इश्तहार की शूटिंग को लेकर उन्हें विवाद में घेरने की कोशिश हुई। इसे उनकी तेज बुद्धि की ही मिसाल माना जाएगा कि बिना ज्यादा वक्त गंवाए इस मजहबी मुद्दे पर माफी मांग कर उन्होंने विवाद से अपना पीछा छुड़ाया। और यह बात भी बहुत पुरानी नहीं हुई जब स्कर्ट पहनकर टेनिस कोर्ट में उनके उतरने के खिलाफ मजहबी फतवा जारी किया गया। यह बात बड़ी विचित्र लगती है कि जिस युवती पर उसके समुदाय को बेहद फख्र होना चाहिए, वह उसके ध्यान को ऐसे गैर जरूरी मुद्दे उठा कर भटकाने की कोशिश करे। एक बार फिर यहां सानिया के जज्बे और हिम्मत की दाद देनी होगी कि ऐसी कोशिशों के बावजूद वे अपना संतुलन कायम रखने में कामयाब रही हैं। बहरहाल, सानिया पर उठने वाले ऐसे सवाल सिर्फ उनसे ही संबंधित नहीं हैं। ये सवाल एक पूरी सोच की नुमाइंदगी करते हैं। इस सोच को समझने, बेनकाब करने और उससे संघर्ष करने की आज बेहद जरूरत है। इसलिए कि ये सवाल किसी एक व्यक्ति पर नहीं, बल्कि आधुनिक औऱ इंसानी उसूलों पर आधारित समाज बनाने की तमाम जद्दोजहद के रास्ते की रुकावट हैं। गौरतलब है कि सिडनी ओलंपिक के समय पश्चिम एशिया के एक इस्लामी संगठन ने बीच (समुद्र तटीय) वॉलीबॉल खेल के खिलाफ ही फतवा जारी कर दिया था। शिकायत यह थी कि उस खेल की खिलाड़ी बहुत कम कपड़े पहनती हैं और वो भड़काऊ नजर आती हैं। उनके वैसे अंग नजर आते हैं जिन्हें अगर उस संगठन या उसके जैसी सोच वाले लोगों की मानें तो, ढक कर रखे जाने चाहिए।
बात सिर्फ कुछ अंगों की नहीं है। दरअसल, इस सोच ने सदियों तक स्त्रियों को परदे में रहने को मजबूर किया। तब बात किसी खास अंग तक नहीं, बल्कि पूरी की पूरी स्त्री को ही बाहरी दुनिया की निगाहों से अलग रखने की रही। यह रवायत या सोच आज के दौर में भी खत्म हो गई हो, ऐसा नहीं है। और इस सोच पर किसी एक मजहब का एकाधिकार हो, ऐसा भी नहीं है। असल में ऐसे सवालों ने इंसान की सोच, उसकी स्वतंत्र चेतना और उसके व्यक्तित्व को बेड़ियों में जकड़े रखा है। इसलिए जब सानिया मिर्जा पर ऐसे सवाल उठते हैं तो उनका मुकाबला करने के लिए इस २० साल की लड़की को अकेले नहीं छोड़ा जा सकता। बल्कि यह संघर्ष सानिया का दायरा नहीं है। सानिया अपने रहन-सहन और अपने व्यक्तित्व से इन सवालों को चुनौती दे रही हैं तो उनसे यह अपेक्षा भी नहीं रखनी चाहिए कि वे एक सामाजिक कार्यकर्ता की तरह विचार और राजनीति के मैदान में उतर कर कठमुल्लों और कट्टरपंथियों से संघर्ष करें। यह संघर्ष असल में उन तमाम लोगों का है, जो स्वतंत्रता, समता और लोकतंत्र के आधुनिक मूल्यों में यकीन करते हैं।
इसलिए यह विचारणीय प्रश्न है कि सानिया का व्यक्तित्व आखिर क्या कहता है? सानिया का व्यक्तित्व असल में यह कहता है कि एक लड़की अपनी स्वतंत्र इच्छा से अपनी जिंदगी की दायरा तय कर सकती है। वह उस दायरे की जरूरतों के मुताबिक वस्त्र चुन सकती है और कामयाबी से बनी अपनी हैसियत को अपने ढंग से जी सकती है। सवाल है कि ऐसे वक्तव्य से आखिर किसे परेशानी होती है? इससे परेशानी उन समूहों को होती है जो स्त्री, उसके व्यक्तित्व, खास कर उसके यौन व्यक्तित्व (सेक्सुएलिटी) और उसकी इच्छाओं पर नियंत्रण कायम रखना चाहते हैं। वे यह नियंत्रण इसलिए कायम रखना चाहते हैं कि बिना इसके पितृ-सत्तात्मक व्यवस्था कायम नहीं रह सकती औऱ अगर ऐसा नहीं रहा तो गैर-बराबरी और दूसरों के शोषण पर आधारित व्यवस्था की जड़ें हिल सकती हैं।
इस व्यवस्था ने सामाजिक मानसिकता में कई कुंठाएं भर रखी हैं। इसके रिवाजों ने इंसान की बहुत सी स्वाभाविक भावनाओं को दमित कर रखा है। इन रिवाजों न सिर्फ स्त्री, बल्कि पुरुष के व्यक्तित्व के संपूर्ण विकास की संभावनाएं भी कुंद कर रखी हैं। जाहिर है, ऐसा रहते समाज में स्त्री और पुरुष के सहज एवं स्वाभाविक रिश्ते नहीं बन पाते औऱ इससे कुंठाएं लगातार गहरी होती जाती हैं। ये कुंठाएं कभी सानिया को स्कर्ट में देख कर भड़क सकती हैं तो कभी बीच वॉलीबॉल के मुकाबलों को देख कर। ऐसी कुंठाओं से भरी सोच यह नहीं समझ सकती कि स्वीमिंग पूल में कोई बुर्का पहन कर नहीं उतर सकता!
वास्तव में यह सोच ऐसी कई साधारण और सहज बातें नहीं समझ पाती। उसके लिए यह स्वीकार करना मुश्किल होता है कि स्त्री और पुरुष दोनों समान हैं और इनमें किसी के यौन पहलू के साथ परिवार या समाज की इज्जत का कोई संबंध नहीं है। अगर मैच खेलते वक्त सानिया मिर्जा के पांव नजर आते हैं तो इससे किसी समुदाय की इज्जत नहीं जाती। या अगर कोई लड़की किसी दूसरे समुदाय में शादी कर ले तो यह लड़के के समुदाय की जीत और लड़की के समुदाय की हार नहीं है। लेकिन क्या आज के दौर तक बॉलीवुड की अंतर-धर्मीय प्रेम और विवाह पर बनी एक भी ऐसी मुख्यधारा की फिल्म बताई जा सकती है, जिसमें लड़की मुस्लिम रही हो? ऐसा इसलिए नहीं है क्योंकि देश के बहुसंख्यक समुदाय की मानसिकता यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उसके यहां की कोई लड़की अपनी इच्छा से किसी मुस्लिम से प्रेम या विवाह कर ले। सानिया पर बार-बार उठने वाले सामाजिक सवाल ऐसी पारंपरिक सोच की झलक हैं। चूंकि सानिया सफल हैं, उन पर मीडिया की नजर होती है, इसलिए उन पर सवाल उठा कर यह सोच अपने इजहार का एक मौका तलाशती है। यह सोच यह दिखाना चाहती है कि सानिया अगर आधुनिकता की एक प्रतीक हैं तो उन्हें बार-बार पुरातन सोच के आगे झुकना होगा। इसके पीछे संदेश यह होता है कि कोई यह न मान ले कि पुरातनता कमजोर पड़ गई है या आज के नौजवान अपनी इच्छा से जी सकते हैं।
इसी वजह से सानिया मिर्जा को बार-बार विवाद में घेरने की कोशिश होती है। चूंकि सानिया की मंजिल कहीं और है, इसलिए उनका ऐसे विवादों से बच कर निकल जाने की कोशिश उनकी बुद्धिमत्ता की ही निशानी है। लेकिन आधुनिक भारतीय समाज इस चुनौती का सीधे मुकाबला करने से नहीं बच सकता। जो कट्टरपंथी मानसिकता सानिया की जीवन शैली पर सवाल खड़े करती है, उसे यह खुल कर चुनौती देने का वक्त है। उसे यह बताने की जरूरत है कि मजहब और परंपराओं के नाम पर अब किसी के व्यक्तित्व पर बेड़ियां नहीं लगाई जा सकतीं। अगर कोई मजहब या परंपरा किसी इंसान की स्वतंत्र शख्सियत और अपनी राह खुद तय करने के उसके बुनियादी हक को नही मानती, तो उसकी आज के दौर में कोई अहमियत नहीं है। सानिया इस दौर की, यानी आधुनिक जीवन शैली की एक सहज मिसाल हैं। वे भारत की दुनिया में उभरती ताकत की एक प्रतीक हैं और इस आधार पर इस देश के नौजवानों में आत्म विश्वास भरने वाली एक शख्सियत बन गई हैं। इसीलिए हम सबको उन पर नाज़ है। यह कहा जा सकता है कि उन पर उठने वाली तमाम अंगुलियां दरअसल, हमारे गर्व, हमारे आत्म-विश्वास औऱ भारत की आधुनिक छवि पर संशय पैदा करने की कोशिश का हिस्सा हैं। इसलिए इन्हें चुपचाप स्वीकार नहीं किया जा सकता। ठीक उसी तरह जैसे एमएफ हुसैन की कला और तसलीमा नसरीन की विचार की आजादी पर हिंसक हमलों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।
सानिया, हुसैन, तसलीमा- ये उस भारत के प्रतीक हैं, जिसकी अवधारणा उपनिवेशवाद से संघर्ष करते हुए पैदा हुई और जिसे पिछले साठ साल में व्यवहार में उतारने की कोशिश हुई है। इंसान की बुनियादी आजादी, विरोध के प्रति सहनशीलता और लोकतांत्रिक संवाद भारत की इस अवधारणा में के आधार हैं। इसके हक में उन सभी लोगों को मजबूती से खड़ा होना होगा, जिन्हें इस भारत से प्यार है। इसीलिए सानिया का सवाल हम सबसे जुड़ा हुआ है, कट्टरपंथ के कुंठित हमलों से हम अपनी इस प्रतिभा को बर्बाद नहीं होने दे सकते।

Saturday, December 29, 2007

गुजरात में हार के सबक

सत्येंद्र रंजन
गुजरात विधानसभा के चुनाव की संभवतः एक ही सही व्याख्या हो सकती है और वह है मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी की बेलाग जीत। २००४ के लोकसभा चुनाव नतीजों के आधार पर इस बार के विधानसभा चुनाव के परिणामों के जो अनुमान लगाने की कोशिशें हुईं, वो मुंह के बल गिरीं। गौरतलब है कि २००४ के लोकसभा चुनाव में राज्य की २६ में से १२ सीटें कांग्रेस के हक में गई थीं। और तब कांग्रेस ने १८२ में से ९१ विधानसभा सीटों पर बढ़त बना ली थी। उस चुनाव परिणाम को इस बात का संकेत माना गया कि २००२ में गोधरा और गुजरात दंगों से हुए सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के बाद गुजरात में सामान्य राजनीतिक स्थिति बहाल हो गई है।
लेकिन २००७ के नतीजों का संदेश यह है कि जब मुद्दा नरेंद्र मोदी बने तो २००२ का नज़ारा वापस आ गया। मोदी ने तब जो सांप्रदायिक ध्रुवीकरण किया था, उसे आज तक कायम रखने में वे सफल हैं। यह बात इस चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मिली सीटों और वोट प्रतिशत दोनों से जाहिर होती है। इसलिए इन चुनाव नतीजों को समझने के लिए इन पहलुओं की चर्चा का शायद कोई महत्त्व नहीं है कि तकरीबन ११ सीटों पर बहुजन समाज पार्टी ने कांग्रेस की संभावनाओं को नुकसान पहुंचाया या कांग्रेस ने भाजपा के बागियों को टिकट देकर बड़ी राजनीतिक भूल की। इसके उलट यह बात कहीं ज्यादा सटीक लगती है कि ये सारे पहलू नहीं होते, तब भी मोदी लगभग इतनी ही बड़ी जीत दर्ज करते। दरअसल, देश का धर्मनिरपेक्ष खेमा इस तथ्य को स्वीकार कर और गुजरात के ठोस हालात को समझते हुए अगर गुजरात में हार से कुछ सबक ले तो शायद यह भविष्य के लिए ज्यादा फायदेमंद हो सकता है। इनमें सबसे पहली बात यह है कि देश में सांप्रदायिकता का एक ठोस सामाजिक आधार है, जिसका मजबूत ध्रुवीकरण अगर मुमकिन हो जाए तो वह बड़ी राजनीतिक ताकत बन जाता है। हालांकि १९८४ में राष्ट्रीय स्तर पर या १९९० के दशक में उत्तर प्रदेश में हुए ऐसे ध्रुवीकरण टिकाऊ नहीं हो सके, लेकिन गुजरात में यह गोलबंदी फिलहाल एक अभेद्य किले की तरह नजर आती है। यह गोलबंदी १९८० के दशक में आरक्षण विरोधी आंदोलन से शुरू हुई और तब से पटेल समुदाय गुजरात में भाजपा का लगभग स्थायी जनाधार बना हुआ है। इस बार केशुभाई पटेल की बगावत से यह उम्मीद बांधी गई कि शायद पटेल समुदाय का एक बड़ा हिस्सा भाजपा को वोट न दे। असल में, मोदी की हार से जुड़े अनुमानों के पीछे यह एक बड़ा पहलू था। कोली समुदाय में मोदी से नाराजगी की चर्चाओं ने ऐसी उम्मीदों को और बल दिया।
मगर चुनाव नतीजों ने यह जाहिर किया कि किसी समुदाय के अपने वर्ग और जातीय रुझान किसी एक नेता की इच्छा औऱ अनिच्छाओं से ज्यादा मजबूत होते हैं। पटेलों के सामने जब अपने एक नेता की इज्जत और जातीय हित के बीच चुनाव का सवाल आया तो उन्होंने जातीय हित को ज्यादा तरजीह दी। पटेलों को उस कांग्रेस को न जिताने में ही अपना हित दिखा जो क्षत्रिय-दलित-आदिवासी-मुस्लिम के सामाजिक गठबंधन को फिर से खड़ा करने की कोशिश में थी। वह गठबंधन जिसकी वजह से उनके सामाजिक औऱ राजनीतिक वर्चस्व को एक जमाने में चुनौती मिली थी। इसी तरह कोली समुदाय के एक-दो नेताओं की नाराजगी को पूरे समुदाय की नाराजगी के रूप में देखकर धर्मनिरपेक्ष समुदाय ने अपना ही नुकसान किया। गुजरात के चुनाव नतीजों का पैगाम यही है कि सामाजिक समीकरण और गठबंधन लंबी प्रक्रिया से तय होते हैं। फौरी राजनीतिक वजहों से इनमें बदलाव की उम्मीद करना महज एक सदिच्छा ही हो सकती है। दूसरी तरफ आदिवासी वोटों की जरूर कांग्रेस की तरफ वापसी हुई। लेकिन यह प्रक्रिया भी इतनी जोरदार नहीं थी जिससे आदिवासी बहुल मध्य गुजरात में कांग्रेस की लहर चल जाती। मध्य गुजरात के नतीजे भी दरअसल यही साफ करते हैं कि फौरी वजहों से जाति और वर्गों का जो राजनीतिक गठबंधन बनता है, वह टिकाऊ नहीं होता। आदिवासी २००२ के दंगों के बाद भाजपा खेमे में चले गए थे, लेकिन वहां पटेल और कुछ ओबीसी जातियों के वर्चस्व के बीच उनके लिए टिकाऊ जगह नहीं बन पाई।
इसके साथ ही भाजपा का शहरी मध्य वर्गीय आधार है, जो मोदी के आक्रामक नेतृत्व से ज्यादा मजबूती से गोलबंद हो गया। दक्षिणपंथी और लोकतंत्र विरोधी मानसिकता को मोदी जिस अशिष्ट भाषा में अभिव्यक्ति देते रहे हैं, वह मध्य वर्ग की अपनी इच्छाओं से काफी मेल खाती है। इसलिए मोदी न सिर्फ गुजरात, बल्कि देश के बाकी हिस्सों में भी इस वर्ग के एक बड़े हिस्सों के नायक हैं। इस तरह मोदी ने देहाती इलाकों में दबदबा रखने वाले समूहों और शहरों में दक्षिणपंथ के आधार समूहों का एक ऐसा प्रतिक्रियावादी राजनीतिक गठबंधन तैयार कर रखा है, जिसकी ताकत का सही अंदाजा गुजरात से बाहर बैठे बहुत लोग पहले नहीं लगा पाए। यह साफ है कि ऐसे राजनीतिक गठबंधन का कोई क्विक फिक्स जवाब नहीं हो सकता। इसका मुकाबला धर्मनिरपेक्ष औऱ प्रगतिशील ताकतों के दीर्घकालिक एवं प्रतिबद्ध सहयोग और साफ कार्यक्रम एवं एजेंडे के साथ ही किया जा सकता है। इस बात से शायद खुद कांग्रेस नेता भी इनकार नहीं कर सकते कि ऐसा संघर्ष उनकी पार्टी ने नहीं किया। चुनाव के ठीक वक्त पर उन्होंने पूरा जोर जरूर लगाया, लेकिन एक मजबूत आधार वाले नेता और पार्टी के ठोस वोट आधार के आगे यह नाकाफी साबित हुआ। यहां इस बात भी नजरअंदाज नहीं की जा सकती कि कांग्रेस की सारी रणनीति नकारात्मक वोटों को हासिल करने की टिकी थी। एंटी इन्कबेंसी से निसंदेह कई चुनावों के नतीजे तय होते रहे हैं। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने गुजरात में इस पर काफी भरोसा किया। साथ ही उन्होंने भाजपा के बागियों की ताकत पर संभवतः जरूरत से ज्यादा यकीन कर लिया। लेकिन जब पार्टी गुजरे वर्षों के दौरान धर्मनिरपेक्ष राजनीति का कोई सकारात्मक एजेंडा लोगों के सामने नहीं रख पाई थी, तो ठीक चुनाव के वक्त पर आखिर वह कर भी क्या सकती थी? कांग्रेस के सामने यह समस्या अब सारे देश में आनी है। इसलिए कि २००४ में उसे फिर से अपनी तलाश करने का जो ऐतिहासिक मौका मिला, उसे उसने गवां दिया है। इसकी एक मिसाल आदिवासी कानून ही है, जो गुजरात के आदिवासी इलाकों में एक अहम मुद्दा बना। इस कानून को लागू करने में मनमोहन सिंह सरकार ने जैसी हिचक दिखाई है और उस मामले में कांग्रेस नेतृत्व की जैसी छवि उभरी है, उससे आदिवासियों के बीच उसकी साख बनाने का सवाल लगभग खत्म सा हो गया है। यही बात इस सरकार की दूसरी पहलकदमियों के साथ भी रही है। सरकार ने रोजगार गारंटी कानून और सूचना का अधिकार देने संबंधी कानून बनाने के आम जन के हित में जो काम किए भी अपनी वैचारिक दुविधा से उसने उसका राजनीतिक लाभ लेने के मौके गंवा दिए हैं। नतीजतन, आज वह सिर्फ सांप्रदायिकता विरोधी नकारात्मक वोटों के आसरे ही चुनाव मैदान में उतरने की उम्मीद कर सकती है।
इस सारी परिघटना से धर्मनिरपेक्षता, लोकतंत्र औऱ दूसरे संवैधानिक मूल्यों के लिए भारी संकट खड़ा होता नजर आ रहा है। दरअसल, गुजरात के चुनाव पर इसलिए इतनी ज्यादा नजर थी, क्योंकि वह एक आम चुनाव नहीं था। वहां दांव पर सीधे लोकतंत्र और भारतीय संविधान के बुनियादी उसूल लगे हुए थे। हमें यह स्वीकार करने में कोई हिचक नहीं होनी चाहिए कि इन संवैधानिक उसूलों की वहां हार हुई है। मोदी की विजय कि घड़ी में भी हम यह नहीं भूल सकते कि फरवरी २००२ में गोधरा कांड के बाद नरेंद्र मोदी ने देश को हिंदुत्व के शासन का नमूना दिखाया था। उन्होंने भौतिकशास्त्र के न्यूटन के क्रिया औऱ प्रतिक्रिया के सिद्धांत को राजनीति और सांप्रदायिक संबंधों के बीच ला कर कानून के शासन का खुला मखौल उड़ाया था। समुदायों के आपसी झगड़ों के बीच सरकार की निष्पक्षता की संवैधानिक अपेक्षा की उन्होंने धज्जियां उड़ा दीं। मोदी को अपनी इस करनी के लिए कभी अफसोस नहीं हुआ। बल्कि हमेशा वो गर्व से अपनी सरकार औऱ अपने दंगाई साथियों के पराक्रम का बखान करते रहे हैं। सिविल सोसायटी के भीतर इसीलिए नरेंद्र मोदी का नाम एक खास ढंग की प्रतिक्रिया पैदा करता रहा है। वो भारत की आधुनिक चेतना के आगे एक ऐसा सवाल बन कर खड़े हैं, जिसका जवाब संभवतः नागरिक समाज के पास नहीं है। एक ऐसा व्यक्ति जो आधुनिक राज्य-व्यवस्था के मूल सिद्धांतों को न मानता हो, जो अपनी संवैधानिक व्यवस्था के बुनियादी सिद्धांतों के लिए चुनौती बना हुआ हो, लेकिन वह इन्हीं सिद्धांतों के तहत चुनाव जीत कर एक प्रदेश के सबसे बड़े पद पर बना रहे, यह एक ऐसी दुविधा है, जिसका हल क्या हो, यह एक यक्ष प्रश्न रहा है। ताजा चुनाव नतीजों के साथ यह प्रश्न कहीं ज्यादा गहरा गया है।

Tuesday, December 18, 2007

शुक्रिया, न्यायमूर्ति!



सत्येंद्र रंजन
अदालतों के अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर दखल देने की बढ़ती की शिकायत के बीच सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश एके माथुर और मार्कंडेय काटजू ने सामयिक दखल दिया, जब उन्होंने जजों को उनकी संवैधानिक सीमा याद दिलाई। दोनों जजों ने यह बेलाग शब्दों में कहा कि अगर कोई काम सरकारें नहीं कर पातीं, तो उनका हल यह नहीं है कि न्यायपालिका संसद और सरकारों का काम अपने हाथ में ले ले, क्योंकि इससे न सिर्फ संविधान से तय शक्तियों का नाजुक संतुलन बिगड़ जाएगा, बल्कि न्यायपालिका के पास न तो इन कार्यों को अंजाम देने की महारत है और न ही उसके पास इसके लिए जरूरी संसाधन हैं। न्यायमूर्ति माथुर और न्यायमूर्ति काटजू ने न्यायपालिका के अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर दखल की कई मिसालें अपने इस फैसले में गिनाईं और जजों को सलाह दी कि वो अपनी सीमाओं को समझें एवं सरकार चलाने की कोशिश न करें। उन्होंने कहा कि जजों में विनम्रता होनी चाहिए और उन्हें सम्राटों जैसा व्यवहार नहीं करना चाहिए। संभवतः न्यायिक सक्रियता या अदालतों के अपनी हद लांघने की शिकायत पर इससे कड़ी टिप्पणी कोई और नहीं हो सकती। इन टिप्पणियों के साथ सुप्रीम कोर्ट की इस खंडपीठ ने राज्य-व्यवस्था के तीनों अंगों के बीच शक्तियों के संतुलन को लेकर चल रही बहस को एक नया आयाम दिया। हालांकि यह फैसला आने के दो दिन बाद प्रधान न्यायाधीश केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली एक बेंच ने यह कह कर कि अदालत दो जजों की टिप्पणियों से बंधी हुई नहीं है, इस फैसले को बेअसर करने की कोशिश की, लेकिन एक साधारण मामले में आए न्यायमूर्ति माथुर औऱ न्यायमूर्ति काटजू के फैसले ने इस विषय पर जारी बहस की प्रासंगिकता और उसके महत्त्व पर नए सिरे से ज़ोर जरूर डाल दिया है।
दरअसल, न्यायमूर्ति बालकृष्णन की टिप्पणी यह जाहिर करती है कि यह बहस अब ज्यादा तेज हो रही है औऱ खुद न्यायपालिका के भीतर एक हिस्सा ऐसा है जो न्यायपालिका के जरूरत से ज्यादा सक्रिय होने पर चिंतित है। निसंदेह न्यायमूर्ति काटजू इस हिस्से का प्रतिनिधित्व करते रहे हैं। असल में यह पहला मौका नहीं है जब उन्होंने लोकतांत्रिक संदर्भ में न्यायापालिका के अधिकारों पर बेलाग राय जताई हो। इसके पहले वे अदालत की तौहीन के सवाल पर आम तौर पर न्यायिक क्षेत्र में पाई जाने वाली राय से अलग समझ सार्वजनिक रूप से रख चुके हैं। न्यायमूर्ति काटजू उन जजों में हैं जो मानते हैं कि लोकतंत्र के युग में अदालत की अवमानना के कानून की कोई जरूरत नहीं है। उनकी राय में अदालत की अवमानना का मामला सिर्फ तभी चलाया जाना चाहिए जब कोई भौतिक रूप से अदालत के कामकाज में रुकावट डाले। वरना, अदालत के फैसलों की आलोचना के एक आम नागरिक के अधिकार का पूरा सम्मान किया जाना चाहिए।
बहरहाल, इस फैसले पर व्यापक प्रतिक्रिया देखने को मिली है। समाज के सभ्रांत तबकों के साथ कथित जन हित के लिए संघर्ष करने वाले सभ्रांत कार्यकर्ताओं में भी इसको लेकर चिंता देखने को मिली कि कहीं इससे जन हित याचिकाओं की पूरी परिघटना पर ही विराम न लग जाए। इसीलिए कई ऐसी बड़ी शख्सियतों ने, जिन्हें जन आंदोलनों के दायरे में इज्जत से देखा जाता है, न्यायमूर्ति माथुर और न्यायमूर्ति काटजू की राय के समर्थन में आने के बजाय न्यायमूर्ति बालकृष्णन की टिप्पणी के पक्ष में राय जताई। यह ध्यान दिलाया गया है कि १९८० के दशक में जन हित याचिकाओं को कानूनी मान्यता मिलने के बाद से इनके जरिए सरकारों औऱ प्रशासन को ज्यादा जिम्मेदार बनाया जा सका तथा कमजोर तबकों के हितों की रक्षा की जा सकी।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जन हित याचिकाएं न्याय व्यवस्था के विकास का एक अहम मुकाम हैं, इसलिए उन्हें बिल्कुल खत्म कर देने का समर्थन किसी को नहीं करना चाहिए। लेकिन सवाल है कि न्यायमूर्ति माथुर और न्यायमूर्ति काटजू के फैसले से जन हित याचिकाओं के खत्म होने की आशंका आखिर कहां से पैदा होती है? उस फैसले का सार-तत्व सिर्फ यह है कि अदालतें अपने दायरे में रहें औऱ संविधान के तहत उन्हें जो जिम्मेदारी दी गई है, उसे निभाएं। इस जिम्मेदारी के तहत नागरिक के मूल अधिकारों की रक्षा शामिल है। इस कसौटी पर सरकार एवं संसद के कार्यों की न्यायिक समीक्षा का अधिकार उन्हें संविधान से मिला हुआ है। इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट ने संविधान के बुनियादी ढांचे की अवधारणा स्थापित कर अपना दायरा और बढ़ा लिया है। यानी अदालत जिस सरकारी या विधायी कार्य को संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ माने, उसे वह रद्द कर सकती है।
असल में जब अदालतें इस सीमा में काम करती हैं और इसी दायरे में जन हित को परिभाषित करती हैं, तब उन पर कोई सवाल नहीं उठाया जाता। समस्या तब खड़ी होती है, जब वो मॉनिटरिंग कमेटियां बना कर सीधे प्रशासन का काम अपने हाथ में लेने लगती हैं, जैसा कि दिल्ली में अवैध निर्माणों के सिलसिले में हुआ, या अचानक कोई जज यह टिप्पणी करने लगता है कि वह किसी राज्य में चुनी हुई सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू करवा देगा। राज्य-व्यवस्था के बाकी दोनों अंगों के प्रति जब अपमान का भाव न्यायिक टिप्पणियों का हिस्सा बन जाता है तो जाहिर है, न्यायपालिका न सिर्फ सार्वजनिक बहस के केंद्र में आ जाती है, बल्कि वह खुद अपने लिए आलोचना को न्योता देती है। संसद और सरकारों के प्रति अपमान का जो भाव आम जन तक राजनीतिक अधिकारों के प्रसार से बेचैन सभ्रांत तबकों में है, वही भाव न्यायपालिका में भी झलकने लगता है, तो यह सवाल खुद खड़ा हो जाता है कि आखिर न्यायपालिका सदियों से वंचित तबकों में बढ़ रही लोकतांत्रिक चेतना के साथ है, या वह लोकतंत्र को कुंद रखने की अभिजात्यवादी मानसिकता का साथ दे रही है? जन हित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए न्यायपालिका ने अपनी जो नई भूमिका बनाई, उसे न्यायिक सक्रियता का नाम दिया गया। इस परिघटना के समर्थक समूहों का कहना है कि न्यायिक सक्रियता के जरिए अदालतों ने कमजोर और गरीब तबकों के हित में दखल दिया और सरकारों को जवाबदेह बनाया। लेकिन अगर हम पिछले ढाई दशकों भारतीय न्यायपालिका के इतिहास पर समग्र रूप से विचार करें तो यह कथन एक अर्धसत्य नजर आता है। अदालतों ने जन हित याचिकाओं पर बंधुआ मजदूरी जैसे कई मामलों में जरूर ऐसे फैसले दिए, जिन्हें प्रगतिशील कहा जा सकता है। लेकिन ऐसी ही याचिकाओं पर अदालतों ने बंद को असंवैधानिक, एवं हड़ताल को गैर कानूनी घोषित कर दिया और नौकरी संबंधी कई स्थितियों में मजदूरों के हितों पर करारी चोट की। १९९० के बाद जैसे-जैसे नव-उदारवादी आर्थिक नीतियां शासन व्यवस्था का हिस्सा बनती गईं, न्यायपालिका के ऐसे फैसलों का सिलसिला बढ़ता गया, जिनसे मजदूर एवं कर्मचारी तबकों के लिए व्यक्तिगत या सामूहिक सौदेबाजी मुश्किल होती गई। पर्यावरण रक्षा की अभिजात्यवादी समझ को न्यायिक समर्थन मिलता गया, जिससे हजारों परिवार उजड़ गए। विकास परियोजनाओं से विस्थापित हुए समूह अदालती चिंता के दायरे से बाहर होते गए।
साथ ही अदालतें सार्वजनिक नीतियों में खुलेआम दखल देने लगीं। मिसाल के तौर पर, असम में लागू गैर कानूनी आव्रजक (ट्रिब्यूनल से निर्धारण) कानून को रद्द करने से लेकर आंध्र प्रदेश में अल्पसंख्यकों को आरक्षण देने के सरकारी फैसलों पर न्यायपालिका का रुख समाज में मौजूद एक खास ढंग के पूर्वाग्रह को मजबूत करने वाला रहा है। शैक्षिक संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए आरक्षण के प्रस्ताव पर रोक लगा कर सुप्रीम कोर्ट ने यही संदेश दिया कि उसे संसद की गरिमा की कोई परवाह नहीं है। गौरतलब है कि इस आरक्षण के लिए पास कानून पर सभी दलों में सहमति की दुर्लभ मिसाल देखने को मिली। ऐसा ही संदेश दिल्ली में अवैध निर्माणों की सीलिंग रोकने के संदर्भ में भी दिया गया, जब संसद में आम सहमति से पास कानून सुप्रीम कोर्ट की कसौटी पर खरा नहीं उतरा। जब कोई ऐसी सार्वजनिक नीति बने, जिस पर देश की जनता की नुमाइंदगी करने वाले सभी दल एकमत हों, तो उस पर रोक लगाकर आखिर अदालत किसके हित की रक्षा करती है, यह एक विचारणीय प्रश्न है। सुप्रीम कोर्ट संविधान की नौवीं अनुसूचि को असंवैधानिक ठहरा चुका है, जिसके जरिए संसद उन फैसलों को न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखती थी, जिन पर आम सहमति होती थी, लेकिन जिन्हें संवैधानिक प्रावधानों, अनुच्छेद और धाराओं की यांत्रिक न्यायिक व्याख्या से रद्द किए जाने की आशंका होती थी। न्यायपालिका अपना अधिकार क्षेत्र बढ़ाते हुए यह फैसला दे चुकी है कि संसद का कोई भी कानून या संविधान संशोधन अब न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर नहीं है। अगर अदालत समझती है कि उस कानून या संशोधन से किसी के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन होता है तो उसे वह रद्द कर देगी। इस तरह संविधान के बुनियादी ढांचे की अवधारणा स्थापित करने के बाद बुनियादी अधिकारों को आधार बनाते हुए न्यायपालिका ने शासन व्यवस्था के भीतर खुद के सर्वोच्च होने की स्थिति बना ली है, जो संविधान की मूल भावना के अनुरूप नहीं है। दरअसल, अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम और फ्रांस की क्रांति के दौरान शासन के जिन मूल्यों का विकास हुआ और जिन्हें लोकतंत्र के मूल सिद्धांत के रूप में अपनाया गया, यह उसके भी खिलाफ है। शक्तियों के अलगाव, राज्य-व्यवस्था के अंगों के बीच अवरोध एवं संतुलन की व्यवस्था, और जन भावना की सर्वोच्चता के इन मूल्यों के बिना कोई भी लोकतंत्र महज एक ढांचा ही हो सकता है, वह वास्तविक लोकतंत्र नहीं हो सकता। इसलिए मौजूद बहस में सभी लोकतांत्रिक एवं प्रगतिशील ताकतों को स्वाभाविक रूप से जस्टिस माथुर और जस्टिस काटजू के विचारों के साथ होना चाहिए, जिन्होंने लोकतंत्र और संविधान के आधारभूत सिद्धांतों की व्याख्या की है। भारत में लोकतंत्र के जब जमीन तक पहुंचने की अभी शुरुआत हुई है, तो सत्ता औऱ सुविधाओं पर सदियों से कब्जा जमाए तबकों की बेचैनी समझी जा सकती है। भले ही धीमी गति से, लेकिन आगे बढ़ रही इस क्रांति के खिलाफ उनकी प्रति-क्रांति यानी काउंटर रिवोल्यूशन की मंशा को भी समझा जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र के नाम पर चलने वाली संस्थाएं खुद इसमें यथास्थितिवादी ताकतों का हथियार बन जाएं, इसे स्वीकार नहीं किया जा सकता। लेकिन दुर्भाग्य से न्यायपालिका के एक हिस्से और कई दूसरी संवैधानिक संस्थाओं में ऐसा रुझान हाल के वर्षों में बढ़ता गया है। इसीलिए इस मौके पर यह बात जोर देकर कहे जाने की जरूरत है कि संविधान के तहत राज्य-व्यवस्था के तीनों अंगों के बीच संतुलन की जो व्यवस्था है, उसे बहाल किया जाना चाहिए। यह कह कर न्यायमूर्ति माथुर और न्यायमूर्ति काटजू ने लोकतंत्र की बड़ी सेवा की है। लेकिन हैरत यह है कि अपने को लोकतंत्र और मानव अधिकारों का रक्षक बताने वाले बहुत से बुद्धिजीवियों और कार्यकर्ताओं को यह बात गले नहीं उतर रही है। उन्हें लगता है कि संसद, राजनीतिक दल और सरकारें लोकतंत्र के रास्ते में बाधा हैं, जबकि अदालतें उन्हें रास्ते पर रखने का उपक्रम हैं। साफ है, ऐसा नासमझी में ही सोचा जा सकता है, या फिर तब सोचा जा सकता है, जब लोकतंत्र और जन अधिकारों की बात महज शौक के तहत की जाती हो और अपनी असली सोच संभ्रांत वर्ग के पूर्वाग्रहों से तय होती हो।
वरना, यह साधारण समझ की बात है कि लोकतंत्र की रक्षा की गारंटी सिर्फ लोग हैं। सिर्फ वे लोग जिनका हित इससे जुड़ा हुआ है। सिर्फ वे लोग जिनका सब कुछ लोकतंत्र के भविष्य के साथ दांव पर लगा हुआ है। वे लोग नहीं, जो बिना लोकतंत्र के भी सुख और सुविधा के साथ जी सकते हैं औऱ वे लोग तो कतई नहीं जिनके विशेषाधिकारों और खास सुविधाओं पर लोकतंत्र के बढ़ते कदम के साथ चोट पहुंचने का खतरा है। सवाल है कि आज न्यायपालिका इनमें से किन लोगों के हक में खड़ी नजर आती है? या दुनिया भर की लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के इतिहास में उसकी क्या भूमिका रही है? अगर हम इन सवालों पर गौर करें तो यह साफ होने में देर नहीं लगती कि आज न्यायपालिका को उसके संवैधानिक दायरे तक सीमित रखना एक ऐतिहासिक जरूरत बन चुकी है।
इसके लिए विधायिका के अधिकारों की नए सिरे से व्याख्या जरूरी है। विधायिका संविधान के बुनियादी ढांचे की व्याख्या का अधिकार अपने हाथ में लेकर और नौवीं अनुसूची की वैधानिकता बहाल करने की पहल कर इस दिशा में खास कदम बढ़ा सकती है। हालांकि विधायिका के भीतर दक्षिणपंथी और यथास्थितिवादी शक्तियों की मजबूत उपस्थिति को देखते हुए इसकी तुरंत उम्मीद नहीं की जा सकती, लेकिन देश की असली लोकतांत्रिक और प्रगतिशील शक्तियां उस मकसद पर जोर डालकर और इसके लिए जन समर्थन जुटाकर एक दबाव जरूर बना सकती हैं।

Friday, December 14, 2007

क्योंकि हर शब्द के पीछे है एक सोच


सत्येंद्र रंजन
फि
ल्म आजा नचले के गाने को लेकर उठा विवाद फिल्म निर्माता के जाति सूचक शब्दों को गाने से हटा देने और माफी मांग लेने के साथ खत्म हो गया। लेकिन इससे एक बड़ा सवाल आम चर्चा में सामने आया। यह बहुत से लोगों को समझ में नहीं आया कि आखिर मोची शब्द के इस्तेमाल पर क्या एतराज है? दलील दी गई कि मोची कोई जाति नहीं, बल्कि एक पेशा है। जैसे अंग्रेजी में कॉबलर शब्द है, वैसा ही हिंदी में मोची है। चूंकि इस गाने पर सबसे पहले रोक उत्तर प्रदेश सरकार ने लगाई, इसलिए वहां की मुख्यमंत्री मायावती को घेरने के लिए मीडिया के एक हिस्से यह सवाल भी उठा दिया कि मायावती खुद जातियों के नाम जनसभाओं में लेती रही हैं औऱ इसलिए इस गाने पर उनकी सरकार की प्रतिक्रिया उनके दोहरे मानदंडों को दिखाती है। फिर यह सवाल भी उठा कि क्या आम चर्चा में जातियों के नाम नहीं लिए जाने चाहिए?
चूंकि इस गाने में यह कहा गया था कि मोची खुद के सोनार होने का दावा कर रहा है, इसलिए इस विशेष संदर्भ में बहस की ज्यादा गुंजाइश नहीं थी। गाने के बोल में यह साफ था कि इसमें जातीय क्रम में मोची को निचले स्थान पर मानने की मानसिकता साफ झलकती है। यानी सारे पेशे समान हैं, अंतर सिर्फ उनके प्रकार और सेवा देने के क्षेत्र में है, इस आदर्श का यह गाना खुलेआम उल्लंघन कर रहा था। शायद यह बात जल्द ही फिल्म निर्माताओं, मीडिया और आम लोगों को भी समझ में आ गई, इसलिए इस विशेष संदर्भ में ज्यादा बखेड़ा खड़ा नहीं किया गया। लेकिन इस संदर्भ से जो बड़े सवाल उठे हैं, उन पर खुल कर चर्चा नहीं हुई है, जिसकी आज बेहद जरूरत है। यह जरूरत इसलिए है कि लोकतंत्र और कानून के शासन के जिस मकसद को लेकर भारतीय संवैधानिक व्यवस्था खड़ी की गई है, जिसमें हर नागरिक को समान माना गया है और उसे समान अवसर देने की बात की गई है, उस उद्देश्य के आगे ये सवाल एक बड़ी बाधा बन कर खड़े हैं। दरअसल, इस बहस के सवाल सिर्फ जाति व्यवस्था से नहीं जुड़े हैं, बल्कि इनके पीछे इंसान औऱ इंसान में फर्क मानने और इंसान की मौजूदा हालत के पीछे किसी दैवी व्यवस्था का हाथ समझने की गहरी एवं व्यापक सोच हैं। अब जबकि सदियों से शोषित और उत्पीड़ित जन समूहों में अपने अधिकारों और अपनी मानवीय गरिमा के प्रति नई चेतना आ रही है, तो इन सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आजा नचले के गाने के संदर्भ में कहा गया कि जूता बनाने और मरम्मत करने का पेशा करने वालों को मोची नहीं कहा जाए, तो फिर क्या कहा जाए? यह हवाला दिया गया कि जूतों के एक बड़े शोरूम ने खुद अपना नाम ‘मोचीज’ रखा हुआ है। तो फिर ये सारा शोर क्यों? ऐसे सवाल आम तौर पर उन हलकों से आते हैं, जिनमें मुमकिन है कि बहुत से लोगों का मकसद बुरा न हो। लेकिन इतना जरूर कहा जा सकता है कि ऐसे लोग भारतीय समाज के ऐतिहासिक ढांचे और उसमें अंतर्निहित उत्पीड़न से नावाकिफ हैं। आबादी के एक बड़े हिस्से को मूलभूत मानव अधिकारों से वंचित रखने की कैसी व्यवस्था यहां बनी, वह कैसे चलती रही औऱ आधुनिकता के तमाम आगमन के बावजूद आज भी वह कैसे जारी है, इसकी समाजशास्त्रीय दृष्टि अपनाने में संभवतः वे लोग नाकाम हैं। वरना, मोची औऱ कॉबलर की तुलना किसी भी रूप में नहीं हो सकती। अंग्रेजों के समाज में कॉबलर कोई रूढ़ पेशा नहीं है। कॉबलर का बेटा आसानी से अपनी क्षमता और योग्यता के मुताबिक किसी नए पेशे को अपना सकता है। लेकिन सदियों तक ऐसा करना भारत में संभव नहीं था। यहां मोची का बेटा मोची ही हो सकता था। जब हम मोची कहते हैं तो एक दीन-हीन ऐसे व्यक्ति की छवि दिमाग में उभरती है जो जूता मरम्मत करने के सामान लेकर कहीं सड़क के किनारे बैठा हो। बेशक उसका पेशा भी उतना ही गरिमामय है, जितना वेद पाठ करने वाले पंडित, या लेख लिखने वाले पत्रकार का, लेकिन वर्ण व्यवस्था इस इंसानी सिद्धांत को नहीं मानती।
वरना, मोची का छुआ पानी पीने से धर्म भ्रष्ट होने की व्यवस्था क्यों बनाई जाती? जिस जातीय मानसिकता में हम जीते रहे हैं, उसमें अक्सर मोची को उसकी ईमानदारी की मेहनत का पैसा ऐसे दिया जाता है, जिससे उसका स्पर्श न हो जाए। क्या लंदन के किसी पेशेवर कॉबलर का भी ऐसा ही अपमान या उसकी मानवीय गरिमा का ऐसा उल्लंघन होता है? दरअसल, जब आप मोची कहते हैं, तो भारतीय संदर्भ में इससे किसी एक पेशेवर इंसान का नहीं, बल्कि एक जाति, एक पूरे समाज का बोध होता है, जिसके लिए सवर्ण मानसिकता में कोई इज्जत नहीं है। जाहिर है, बिल्कुल यही हालत सोनार के साथ नहीं है। सोनार के जहां जेवरात खरीदने गया कोई व्यक्ति वहां बैठता है, पानी पीता है। अगर वह सवर्ण जाति का हो, तो अपने को श्रेष्ठ जरूर समझेगा, लेकिन सोनार को वैसे ही अपमान के भाव से नहीं देखेगा, जैसा वह मोची को देखता है।
इसलिए गाने में मोची शब्द आने और उसके खुद को सोनार मानने की लाइन पर दलितों में गुस्सा भड़का तो यह बेवजह नहीं था। इसके पीछे सामाजिक अन्याय से लड़ने एवं आगे औऱ अपमान न सहने की उनकी नवजाग्रत संघर्ष भावना है। अगर हम इंसानियत की बुनियाद पर समाज बनाने का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं, तो हमें इस भावना का जरूर सम्मान करना चाहिए। इसके बजाय किसी शोरूम का नाम ‘मोचीज’ होने या मायावती के खुद जातियों का जिक्र करने की मिसाल इस नवजाग्रत भावना से जन्मी प्रतिक्रिया को गलत साबित करने के लिए दी जाती है, तो यह समझने की जरूरत है कि इसके पीछे मानसिकता यथास्थितिवादी ताकतों को मजबूती देना है।
हम नहीं जानते कि ‘मोचीज’ शोरूम किसका है। लेकिन अगर वह सचमुच किसी मोची का भी हो तो यह समाज के सामने अपनी पुरानी पहचान के साथ बिना किसी शर्म के खड़े होने की एक कोशिश मानी जा सकती है। लेकिन इससे यह हकीकत नहीं बदल सकती कि देश के लाखों मोची आज भी जिंदगी की मानवीय परिस्थितियों और बुनियादी नागरिक अधिकारों से वंचित हैं। एक ऐसी मिसाल पूरे समाज की विसंगतियों को नहीं ढक सकती। और अगर मायावती ने किसी जन सभा में महार शब्द का इस्तेमाल किया हो, यह कहते हुए कि इस जाति के किसी व्यक्ति को किसी राज्य के मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बैठाना है, तो इसकी तुलना नफरत औऱ हेय हृष्टि के साथ महार शब्द का इस्तेमाल करने वाले लोगों के साथ नहीं की जा सकती। किसी जाति या समुदाय के लोगों का नाम उन्हें ऐतिहासिक अन्याय से मुक्ति दिलाने के लिए लेने की तुलना उस अन्याय की भावना से भरे रहकर उस जाति के उल्लेख से नहीं की जा सकती। ठीक उसी तरह जैसे सामाजिक न्याय के मान्य एवं संवैधानिक सिद्धांत के तहत आरक्षण देने के लिए जातियों की सूची बनाना, और जाति के परंपरागत ढांचे में कैद रहने या दूसरों को रखने के लिए जाति का जिक्र एक ही बात नहीं है। जहां एक के पीछे भावना ऐतिहासिक अन्याय को खत्म करने की है, वहीं दूसरी सोच का मकसद उस अन्याय को जारी रखना है। इसीलिए आजा नचले के गाने से उठी बहस को विराम देने की जरूरत नहीं है। बल्कि इसे एक अंजाम तक ले जाने की आवश्यकता है। आखिर ऐसी बहसों से आम सामाजिक चेतना का विस्तार होता है और उससे एक बेहतर समाज बनाने के मकसद में मदद मिलती है। मसलन, हम विकलांगों से जुड़े शब्दों पर गौर कर सकते हैं। अभी बहुत लंबा वक्त नहीं गुजरा, जब आम बोलचाल में अंधा, बहरा, लंगड़ा, काना, लूल्हा जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर एतराज नहीं किया जाता था। अपने रूढ़ अर्थ में ये शब्द शारीरिक रूप से किसी अंग से कमजोर व्यक्ति के प्रति एक तिरस्कार का भाव दिखाते हैं। प्रकरांतर में ये शब्द इस सामाजिक अंधविश्वास की पुष्टि करते हैं कि पिछले जन्म का पाप या किसी दैवी शक्ति के प्रकोप की वजह से कोई व्यक्ति विकलांग हुआ है। इसलिए उससे सहानुभूति रखने या उसे विशेष अवसर देने की जरूरत नहीं है। बल्कि ईश्वर या प्रकृति ने उसे सजा दी है तो लोगों को भी उससे वैसा ही सलूक करना चाहिए। लेकिन स्वास्थ्य विज्ञान के विकास और सामाजिक चेतना के विस्तार के साथ ऐसी सोच को चुनौती मिली। इससे छिड़ी बहस का ये परिणाम हुआ कि विकलांग लोगों के प्रति सामाजिक क्रूरता घटी और धीरे-धीरे उनके प्रति समाज ने अपनी जिम्मेदारी समझी। उनके लिए क्रूरता और अपमान का भाव रखने वाले शब्दों का इस्तेमाल न हो, यह जरूरत भी तब समझी गई। इसका नतीजा यह है कि आज पहले के किसी युग की तुलना में हम विकलांगों के प्रति ज्यादा मानवीय नजरिया देख सकते हैं।
ठीक यही स्थिति नस्ल या रंगभेद के सिलसिले में भी है। पश्चिमी समाजों में इस बारे में चली बहस का नतीजा यह है कि वहां आज नस्लीय टिप्पणी को एक बड़ा अपराध मान लिया गया है। साम्राज्यवाद के दौर में पश्चिम समाजों ने कुछ खास नस्लों के साथ जो ज्यादती की, कम से कम आम चर्चा में उनके प्रति एक क्षमा याचना का भाव आज वहां जरूर देखने को मिलता है। इसीलिए मंकी चैंट यानी बंदर की आवाज निकालना अब काले समुदाय के प्रति अपमानजनक माना जाता है और इसलिए उसे रोकने के बाकायदा कानून बनाए गए हैं। लेकिन इस मोर्चे पर भारतीय समाज अभी भी बहुत पिछड़ा हुआ है। हाल में जब ऑस्ट्रेलियाई क्रिकेट टीम भारत दौरे पर आई, तो वहां के मूलवासी खिलाड़ी एंड्र्यू साइमंड्स को चिढ़ाने के लिए स्टेडियम्स में जैसे मंकी चैंट्स किए गए, उससे भारतीय आबादी के एक बड़े हिस्से में बैठी नस्ल और रंगभेदी मानसिकता की झलक मिली। दरअसल, यह सिर्फ गलतफहमी है कि भारत के लोग नस्ल या रंगभेदी नहीं हैं। अगर फिल्मी गानों की ही बात करें तो उनमें गोरे रंग का जैसा महिमामंडन होता है, वह परेशान करने वाला है। आजा पिया तोहे प्यार दूं, गोरे बहियां तो पे वार दूं, जैसे गाने लिखने वाले गीतकार के मन में यह सवाल कभी नहीं उठा कि जिस स्त्री की बाहें गोरी नहीं हैं, क्या वह अपने पिया से कम प्यार करती है? और अगर वह अपने प्यार का इजहार करना चाहे तो आखिर कैसे करे? या सिर्फ प्यार करना गोरी स्त्रियों का ही अधिकार है? दरअसल, यह तो सिर्फ एक मिसाल है। हिंदी फिल्मों के गाने गोरे रंग पर गुमान की भावना से भरे पड़े हैं। और जब गोरा रंग गुमान करने की बात हो तो इसमें कोई हैरत नहीं कि गोरापन बढ़ाने वाले कॉस्मेटिक्स से आज बाजार भर गए हैं। उनके इश्तहार गोरेपन का आम मीडिया पर गुणगान कर रहे हैं।
सवाल है कि यह रंग भेद नहीं तो और क्या है? क्या इंसान की भावनाएं उसके शरीर के रंग औऱ रूप से तय होती हैं, या रंग किसी की प्रतिभा का पैमाना है? आखिर भारतीय क्रिकेट दर्शक रिकी पोन्टिंग को उनके रंग के आधार पर क्यों नहीं चिढ़ाते, क्यों साइमंड्स ही उन्हें मखौल का पात्र नजर आते हैं? क्यों वैवाहिक विज्ञापनों में अक्सर गोरी दुल्हन बतौर एक शर्त के रूप में मांगी जाती है? इतनी मिसालों के बावजूद क्या यह दावा किया जा सकता है कि भारतीय समाज में भले जातिवादी मानसिकता हो, लेकिन यहां रंग भेद या नस्ल भेद नहीं है?
दरअसल, ये तमाम मानसिकताएं आज एक मानवीय और आधुनिक समाज बनाने के रास्ते में बाधा हैं। इसीलिए जाति, नस्ल और रंगभेद के मुद्दों पर बहस को तेज करने की जरूरत है। इस बात पर जोर दिए जाने की जरूरत है कि मनुष्य का शरीर परिवार की आर्थिक हैसियत, आनुवंशिक कारणों, जलवायु, और भौगोलिक पहलुओं से तय होता है। इसलिए अगर कोई काला है तो यह अपमान का विषय नहीं है या गोरा होना गर्व करने की वजह नहीं हो सकती। न ही चेहरा इंसानियत को मापने का पैमाना हो सकता है।
आजा नचले गाने पर जिस ढंग की प्रतिक्रिया हुई और उस पर जिस तरह बिना विरोध जताए सुधार कर लिया गया, वह एक सकारात्मक संकेत है। इससे कम से कम यह बात तो जाहिर हुई कि पुरानी मान्यताएं और मानसिकता अब नई उभर ताकतें चुपचाप स्वीकार नहीं करेंगी। साथ ही जो ताकतें जाने या अनजाने में पुरातन सोच से प्रभावित रहती हैं, वे यह समझने लगी हैं कि अब समय उनके साथ नहीं है। वे समय की उठ रही नई धारा के रास्ते में ज्यादा समय तक रुकावट बन कर खड़ी नहीं रह सकतीं। साइमंड्स के मामले में भले ही हलकी ही, लेकिन कानूनी कार्रवाई की शुरुआत और उन्हें चिढ़ाने के तरीके की सार्वजनिक निंदा ने भी कुछ ऐसा ही पैगाम दिया। अब जरूरत इस सकारात्मक रुझान को आगे बढ़ाते हुए सार्वजनिक विमर्श से उन सभी शब्दों को हटाने की है, जो भेदभाव की सोच को जाहिर करते हैं। दरअसल, चुनौती उस मानसिकता को खत्म करने की है, जो जन्म और शरीर के आधार पर इंसान का मूल्यांकन करती है। लेकिन यह एक लंबी लड़ाई है। यह मकसद दरअसल, सिर्फ बहस से नहीं, बल्कि व्यवस्था के विभिन्न मोर्चों पर सीधे जन संघर्ष से ही हासिल किया जा सकता है। फिलहाल, इस दिशा में एक शुरुआत संतोष की बात है।