सत्येंद्र रंजन
भारतीय लोकतंत्र जब अपने एक सबसे महत्त्वपूर्ण पड़ाव से गुजर रहा है, देश के एक प्रमुख अखबार ने इसे ‘Dance of Democracy’ नाम दिया है। मेनस्ट्रीम मीडिया में आम चुनाव की चर्चा क्रिकेट की शब्दावली में होना एक सामान्य बात है। मीडिया (कुछ अपवादों को छोड़ कर) में अक्सर यह चर्चा भी सुनी जा सकती है कि इस बार चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। तो मीडिया की चर्चाएं अक्सर नेताओं के भड़काऊ भाषणों, एक दूसरे पर कीचड़ उछालने वाले बयान, और सतही तथा अप्रसांगिक सवालों पर टिकी हुई नज़र आती है। बात अगर कुछ आगे बढ़ी तो जातीय समीकरण और गठबंधनों की जोड़-तोड़ तक यह चली जाती है। राजनीतिक दलों के चुनाव घोषणापत्रों को बेकार की चीज मान लिया गया है, इसलिए अक्सर मीडिया में इनकी कोई चर्चा नहीं होती। लोगों के सामने निष्कर्ष यह पेश किया जाता है कि ‘सब एक जैसे हैं‘। जब ‘सब एक जैसे हैं‘ तो फिर विकल्प की बात कहां है? इसलिए यह चुनाव एक राजनीतिक ड्रामा या जैसाकि वह देश का प्रमुख अखबार कह रहा है- एक डांस है यानी नाच। इसके मजे लीजिए, इससे आगे की कोई बात सोचने या समझने की जरूरत नहीं है!
यह नजरिया लोकतंत्र के उस आयोजन के प्रति है, जिसकी प्रक्रिया में देश के करोड़ों लोग शामिल हैं। देश के करोड़ों लोग जिससे अपनी सामाजिक-आर्थिक बेहतरी की उम्मीद जोड़े हुए हैं, और जिससे समाज के उन करोड़ों को लोगों के लिए इतिहास में पहली बार रोशनी की उम्मीद पैदा हुई है, जिन्हें सामाजिक निरंकुशता के दौर में सदियों तक जाति और आर्थिक हैसियत के आधार पर दबाए रखा गया। क्या सचमुच भारतीय लोकतंत्र कुछ नेताओं की महत्त्वाकांक्षा और कुर्सी की लालसा के अलावा कुछ और नहीं है? क्या सचमुच यह सिर्फ थैलीशाहों और अपराधियों का एक खेल है, जिसमें आम जन महज खामोश दर्शक है? और इन दर्शकों की दिलचस्पी चुनाव के नाम पर होने वाले ड्रामे और मनोरंजक बयानबाजियों तक में सामित है?
इन सवालों के जवाब इस पर निर्भर करते हैं कि आप इन्हें कहां से देख रहे हैं और आपके अपने स्वार्थ क्या हैं? लोकतंत्र बेशक उन लोगों के लिए बेमायने है, जो आराम की जिंदगी जी रहे हैं, या जिनके हित सामाजिक निरंकुशता की विरासत से जुड़े हुए हैं। ऐसे तबकों के लिए लोकतंत्र एक उपलब्धि नहीं, बल्कि एक खतरनाक प्रक्रिया है, और जिसे नियंत्रित करना उनका उद्देश्य है। इसके उलट इस देश के उन करोड़ों लोगों के लिए जो अपनी बुनियादी जरूरतों और मूलभूत मानवाधिकारों से वंचित हैं, यह व्यवस्था पर अपनी पकड़ बनाने का जरिया है, जिससे वो बेहतर भविष्य की उम्मीद जोड़ सकते हैं। बीते साठ साल की अविध इन तबकों में भले ही धीमी गति से, मगर निरंतर बढ़ी जागरूकता का इतिहास है। भारतीय संविधान में एक व्यक्ति एक वोट और एक वोट एक मूल्य का जो सिद्धांत अपनाया गया, उसका असर सामने आने में कुछ वक्त लगा। लेकिन इस सिद्धांत ने उन समूहों को अभूतपूर्व अवसर प्रदान किया, जो जिनके पास अपना अधिकार जताने के लिए सिर्फ संख्या बल का सहारा था।
बीते दशकों में भारत की राजनीतिक संरचना के सामाजिक आधार में व्यापक बदलाव आया है। इससे उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण की प्रक्रिया एक मजबूत परिघटना बन गई है। लेकिन यही परिघटना शासक समूहों के लिए परेशानी की वजह बनी हुई है। उनकी चिंता है कि इसे कैसे रोका जाए? संसद और राजनीति के प्रति अक्सर इन समूहों में जाहिर होने वाला अपमान भाव दरअसल इसी प्रतिक्रिया का बढ़ते कदम को बाधित करने की कोशिश की जाती है, प्रचार माध्यमों से जनतांत्रिक शक्तियों के खिलाफ प्रचार अभियान चलाया जाता है, और राजनीतिक विमर्श को भटकाने की कोशिश की जाती है। इन सबके बावजूद लोकतंत्र का कारवां आगे बढ़ता गया है।
यह कारवां इस चुनाव के साथ एक नए मुकाम पर पहुंचेगा, यह अनुमान भरोसे के साथ लगाया जा सकता है। यह मुमकिन है कि भारतीय पूंजीवाद की दो सबसे प्रमुख प्रतिनिधि पार्टियां- कांग्रेस और भाजपा- इस बार मिल कर भी लोकसभा की आधी सीटें न जीत पाएं। ऐसे में छोटी और क्षेत्रीय पार्टियां- जिनका पूंजीवाद से कोई वैचारिक मतभेद नहीं है, लेकिन जो अपने जनाधार के चरित्र की वजह से नई उभरी सामाजिक ताकतों की नुमाइंदगी करती हैं, एक महत्त्वपूर्ण हैसियत में हो सकती हैं। वाम मोर्चा के साथ मिल कर ये पार्टियां नई दिल्ली से पूरे देश और पूरी व्यवस्था को नियंत्रित करने की शासक वर्गों की इच्छा में एक अड़चन साबित हो सकती हैं। लोकतांत्रिक नजरिए से यह एक स्वागतयोग्य घटना होगी, लेकिन शासक वर्गों के लिए यह गहरी चिंता का विषय है, जिसे वो राजनीतिक अस्थिरता के भय के रूप में पेश करते हैं। सवाल है कि क्या मीडिया के लिए यह विमर्श का गंभीर मुद्दा नहीं है?
१९८० के दशक में भारत में सांप्रदायिक राजनीति का जोरदार उभार हुआ। १९९० के दशक में हालत यहां तक पहुंच गई कि धर्मनिरपेक्ष-लोकतांत्रिक भारत का विचार खतरे में पड़ गया। २००४ के चुनाव में ऐतिहासिक जनादेश से यह खतरा टला। लेकिन यह खतरा आज भी उतनी ही गंभीरता से मौजूद है, क्योंकि सांप्रदायिक राजनीतिक का सामाजिक आधार और राजनीतिक स्वार्थ ना तो तब कमजोर पड़े थे और ना आज कमजोर हुए हैं। इसीलिए भारतीय जनता पार्टी लगातार एक मजबूत ताकत बनी हुई है। दरअसल, इस चुनाव में और आने वाले कई चुनावों में यह एक प्रासंगिक मुद्दा रहेगा कि भाजपा को कैसे सत्ता में आने से रोका जाए। इसके बावजूद अगर मीडिया का बड़ा हिस्सा यह घोषणा करता दिखता है कि इस चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है, तो जाहिर है कि खुद मीडिया के अपने रुझान गहरे विचार-विमर्श का विषय हैं।
देश गहरी आर्थिक मंदी में है। लाखों लोग बेरोजगार हो गए हैं। कृषि क्षेत्र में तो संकट अब वर्षों पुराना हो चुका है। किसानों की आत्महत्याएं अब खबर नहीं बनतीं। इंडिया शाइनिंग का भ्रम टूट चुका है। खुद मनमोहन सिंह सरकार द्वारा नियुक्त अर्जुन सेनगुप्ता कमेटी ने यह तथ्य सामने रखा कि आज भी देश के ७७ फीसदी लोग हर व्यावहारिक अर्थ में गरीब हैं। अल्पसंख्यक समुदाय अपनी सुरक्षा और बुनियादी नागरिक अधिकारों के हनन को लेकर चिंतित हैं। अगर राजनीतिक दल इन्हें मुद्दा नहीं बनाते तो क्या समाज के प्रबुद्ध वर्ग का यह कर्त्तव्य नहीं है कि चुनाव जैसे मौके पर वो इन असली मुद्दों की चर्चा करें? लेकिन इन बातों की चर्चा सही संदर्भ में मीडिया में (कुछ अपवादों को छोड़ कर) कहीं देखने को नहीं मिलती। क्या यह महज एक चूक है?
यह चूक नहीं है। यह मीडिया के ढांचे से जुड़ा एक पहलू है, जिस पर जनतांत्रिक शक्तियों को अब जरूर चर्चा करनी चाहिए? आखिर मीडिया का एजेंडा कैसे तय होता है और कौन तय करता है? दरअसल किसी भी उद्यम का चरित्र कैसे तय होता है? जाहिर है, यह उसे नियंत्रित करने वाली पूंजी तय करती है। मीडिया आज एक बड़ा उद्यम है, और वह इस आम सिद्धांत से अलग नहीं है। इसीलिए अगर बौद्धिकता या प्रबुद्धता का मतलब परिस्थितियों के वस्तुगत विश्लेषण और ईमानदार निष्कर्ष से है, तो उस अर्थ में आज के दौर में मीडिया एक प्रबुद्ध माध्यम नहीं रह गया है। यह समाज के निहित स्वार्थों का प्रवक्ता बन गया है, क्योंकि ये शक्तियां ही इसे नियंत्रित करती हैं। अगर इन शक्तियों का हित असली मुद्दों को उलझाने या उन पर परदा डालने में है, तो स्पष्ट है, मीडिया अपनी तमाम रिपोर्टिंग और बहस को इसी मकसद से अंजाम देगा। इस अर्थ में मेनस्ट्रीम मीडिया वही कर रहा है, जो उसका मकसद और काम है।
ऐसे में क्या इसमें कोई आश्चर्य है कि जुलाई २००८ में अपनी सरकार के विश्वास मत के समय तमाम भ्रष्ट तरीके अपनाने और तिकड़म के बावजूद मीडिया में मनमोहन सिंह की छवि ‘स्वच्छ‘ बनी हुई है। आखिर मनमोहन सिंह नव-उदारवाद के उपकरण और भारत में अमेरिकन ड्रीम के प्रतीक हैं, जिसका फायदा देश के उच्च और उच्च मध्यम वर्ग ने खूब उठाया है। मनमोहन सिंह ने वामपंथी दलों के समर्थन से चार साल सरकार चलाने के बाद उनसे टकराव लिया, इस पर इन तबकों ने खूब तालियां पीटीं, इसलिए कि जिन वामपंथी दलों को नव-उदारवादी नीतियों के रास्ते में रुकावट माना जाता था, आखिरकार मनमोहन सिंह ने उनसे पीछा छुड़ा लिया। अब मेनस्ट्रीम मीडिया यही चाहता है कि एक ऐसी सरकार बने जो वामपंथी दलों पर निर्भर न हो
।
लेकिन भारत ऐसी इच्छाओं के दायरे से बहुत बड़ा है। लोकतंत्र का दायरा अब ऐसी इच्छाओं की पहुंच से ज्यादा बड़ा हो चुका है। आम जन की अपेक्षाएं अब दिल्ली और मुंबई में बैठ कर नियंत्रित नहीं की जा सकतीं। इसलिए १५वें आम चुनाव का परिणाम अभी अनिश्चित होने के बावजूद यह जरूर अनुमान लगाया जा सकता है कि अगली लोकसभा में देश की नई उभर रही ताकतों के प्रतिनिधियों की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति होगी। मेनस्ट्रीम मीडिया आरामदेह ड्राइंग रूम में बैठकर देश-दुनिया की चर्चा करने वाले अपने दर्शकों और पाठकों को नई स्थितियों से भयाक्रांत कर सकता है, उन्हें खुश करने के लिेए इन स्थितियों का मजाक उड़ा सकता है, और चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है- जैसी बातें कह कर लोकतांत्रिक प्रक्रिया की साख कम करने की कोशिश कर सकता है, लेकिन इससे देश की हकीकत नहीं बदल जाएगी। इससे लोकतंत्र का आगे बढ़ता कारवां नहीं थमेगा और न ही इससे उन वर्गों का उत्साह थमेगा, जिनक लिए लोकतंत्र की सफलता उनके बेहतर भविष्य की गारंटी है।
Saturday, April 25, 2009
Friday, April 10, 2009
मुद्दा वही, विकल्प धुंधला

सत्येंद्र रंजन
लोकसभा चुनाव के लिए लड़ाई की लकीरें अब साफ हो गई हैं। जितने राज्य, उतने तरह के समीकरण। इन समीकरणों के परिणाम के कुल योग से अगली लोकसभा का स्वरूप बनेगा और देश को नई सरकार मिलेगी। सबसे अहम सवाल यही है कि वह सरकार कैसी होगी? एक ऐसी सरकार जिसकी धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र में आस्था होगी, या सांप्रदायिक फासीवाद के नुमाइंदे फिर से देश की सत्ता पर सवार हो जाएंगे?
इस बार सांप्रदायिक फासीवाद का मुखौटा लालकृष्ण आडवाणी हैं। भारतीय जनता पार्टी ने ११ साल बाद फिर से अपना अलग चुनाव घोषणापत्र जारी किया है। उसमें हिंदू राष्ट्रवाद को मौजूदा संदर्भ में सबसे स्पष्ट रूप से व्यक्त करने वाले तीन मुद्दों- राम जन्मभूमि, समान नागरिक संहिता और संविधान की धारा ३७० के खात्मे- को फिर से खुल कर राजनीतिक वादे के रूप में शामिल किया गया है। इससे पहले फरवरी में नागपुर में हुई भाजपा की राष्ट्रीय परिषद की बैठक से भी यही संदेश मिला कि भाजपा बार अपने मुख्य जनाधार की ज्यादा चिंता करते हुए हिंदुत्व से जुड़े मुद्दों को जोर-शोर से उठाएगी। चुनाव अभियान शुरू होते ही वरुण गांधी के प्रकरण से हिंदुत्व के मुद्दे में नई जान आ गई।
बहरहाल, अगर भाजपा सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की रणनीति पर चल रही है तो इसमें कोई अचरज की बात नहीं है। यह भाजपा का घोषित उद्देश्य है। वह अल्पसंख्यक द्वेष, बहुसंख्यक समुदाय के भीतर असुरक्षा की फर्जी भावना और आधुनिक मुल्यों के प्रति हिकारत फैला कर ही यह उद्देश्य पूरा कर सकती है। लालकृष्ण आडवाणी ने कुछ दिन पहले कहा- ‘मंदिर मुद्दे की वजह से ही भाजपा केंद्र और कई राज्यों में सत्ता आ सकी। इस मुद्दे ने भारतीय राजनीति की धारा बदल दी।’
मंदिर का मुद्दा आखिर क्या था? यह मुस्लिम समुदाय के प्रति नफ़रत फैलाने की एक ऐसी मुहिम थी, जिसका मकसद हिंदु समुदाय के एक बड़े हिस्से के मन में बैठे पूर्वाग्रहों को उभारना और उसकी बदौलत राजनीतिक गोलबंदी करना था। १९८० और ९० के दशकों में देश में मौजूद माहौल के बीच यह तरीका काफी कामयाब रहा। भाजपा एक बार फिर वही माहौल बनाना चाहती है। तनाव और दंगों का माहौल। पिछले २० साल के अनुभव ने यह साबित कर दिया है कि भाजपा के पास कोई ऐसा खास सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं है, जिसके आधार पर वह राजनीतिक बहुमत जुटा सके। उसकी जीत की सिर्फ दो स्थितियां हैं- एक, कांग्रेस या किसी अन्य धर्मनिरपेक्ष पार्टी की सरकार के खिलाफ एंटी इन्कबेंसी, और दो- उग्र हिंदुत्व की लहर।
इसलिए भाजपा हिंदुत्व की लहर उभारने की कोशिश में रहती है। इसी से उसका मुख्य आधार उत्साहित होता है। यह संघ परिवार और उससे प्रभावित आधार है। इस आधार के मुख्य प्रवक्ता मोहन भागवत, प्रवीण तोगड़िया, अशोक सिंघल, प्रमोद मुत्तालिक, योगी आदित्यनाथ और अब वरुण गांधी हैं। इसकी नायिका साध्वी प्रज्ञा और साध्वी ऋतंभरा हैं। जिस बात को ये लोग भदेस ढंग से कहते हैं, उसी को लालकृष्ण आडवाणी, अरुण जेटली, अरुण शौरी ज़हीन भाषा में बोलते हैं। और वही बात भाजपा के घोषणापत्र एवं दूसरे दस्तावेजों में जाहिर होती है। अगर यह विचार और ये शक्तियां कभी सफल हो गईं तो ‘भारत का वह विचार‘ परास्त हो जाएगा, जो स्वतंत्रता संग्राम के मूल्यों से पैदा हुआ, जो दादा भाई नौरोजी-रवींद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी और जवाहर लाल नेहरू की देखरेख में फूला-फला।
छह साल के एनडीए राज में सबको समाहित करके चलने और सबके लिए न्याय पर आधारित इस ‘भारत के विचार‘ के लिए हमने क्रमिक रूप से गहराती चुनौतियां देखीं। वह अकेले भाजपा का शासन नहीं था। लेकिन शिक्षा, संस्कृति और आम विमर्श का भगवाकरण उस दौर की सबसे खास परिघटना रही। राज्य-व्यवस्था पर अनुदारवाद हावी रहा। इनकी आड़ में अभिजात्यवादी और धुर दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियां अपनाई गईं। इन सबके खिलाफ ही मतदाताओं की वह गोलबंदी हुई, जिससे २००४ में एनडीए पराजित हो सका।
तब यह गोलबंदी इसलिए भी मुमकिन हुई कि देश के सामने एक उद्देश्य से बना एक विकल्प था। तब सोनिया गांधी ने इस विकल्प की रूपरेखा तैयार करने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। इस विकल्प को देश का जनादेश मिला। लेकिन उसके बाद की यह त्रासदी है कि सत्ता में आया गठबंधन- यूपीए- खासकर कांग्रेस पार्टी और सोनिया गांधी, उस जनादेश के मूल स्वर को भूल गए। धर्मनिरपेक्षता को आधार बना कर जनपक्षीय नीतियों पर अमल की ऐतिहासिक जिम्मेदारी वो नहीं निभा सके। साम्राज्यवाद परस्त और जन विरोधी नीतियों को अपना कर उन्होंने धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रीय आम सहमति से विश्वासघात किया। नतीजा यह है कि २००९ के चुनाव के पहले धर्मनिरपेक्ष विकल्प बिखरा हुआ है।
जबकि देश के सामने मुख्य मुद्दा वही है, यानी सांप्रदायिक फासीवादी ताकतों को देश की राज्य-व्यवस्था पर काबिज होने से कैसे रोका जाए। क्या १६ मई को आने वाले नतीजों से यह मुमकिन हो पाएगा? फिलहाल लालकृष्ण आडवाणी और हिंदुत्व मंडली के लिए संकेत बहुत उत्साहजनक नहीं हैं। मगर, अपनी जोखिम पर ही उनकी संभावना को बिल्कुल खत्म माना जा सकता है। अभी उम्मीद का एक पहलू यह है कि भाजपा के पास सहयोगी दलों की कमी है। जनता दल (यू) को छोड़कर उसके किसी सहयोगी को बड़ी कामयाबी मिलने की सूरत नजर नहीं आ रही है। लेकिन चुनाव के बाद के समीकरणों में उसके साथ नए सहयोगी नहीं जुट जाएंगे, यह भी कोई पूरी तरह आश्वस्त होकर नहीं कह सकता।
जाहिर है, ऐसे में देश के जागरूक लोगों के सामने सिर्फ एक विकल्प बचता है। वह है, बुद्धिमानी से मतदान। इसके पीछे सबसे प्रभावी सोच यही होनी चाहिए कि भाजपा को कैसे पराजित किया जाए। कौन सा उम्मीदवार यह करने में सबसे ज्यादा सक्षम है, इसकी पहचान उनकी राजनीतिक बुद्धि की शायद सबसे बड़ी परीक्षा होगी। देश में प्रगतिशील जमात का एक बड़ा हिस्सा यूपीए के विश्वासघात को अभी नहीं भूला है। वह इसका बदला लेना चाहेगा। मगर, देश के बड़े हिस्से में ऐसे लोगों को संभवतः इसका मौका नहीं मिले। जहां तीसरा विकल्प नहीं है, वहां ऐसे मतदाता आखिर क्या करें? उन्हें यूपीए के घटक दलों, बल्कि यहां तक कि कांग्रेस को भी वोट देने का अप्रिय फ़ैसला लेना होगा। आखिर दांव पर देश का भविष्य है। देश के आम जन की बेहतरी निसंदेह सबसे बड़ा सवाल है, मगर यह काम सांप्रदायिक शासन के तहत तो बिल्कुल मुमकिन नहीं है। इसीलिए भाजपा को हराना पहली प्राथमिकता है।
Saturday, March 28, 2009
भाजपा से और क्या उम्मीद?

सत्येंद्र रंजन
जहरीला भाषण देने के लिहाज से वरुण गांधी भारतीय जनता पार्टी का अकेला चेहरा नहीं हैं। ना ही पहली बार राजनीतिक या चुनावी मंच से एक समुदाय विशेष के खिलाफ वैसी बातें कही गईं, जो वरुण गांधी के मुंह से पूरे देश ने सुना। नरेंद्र मोदी अपने ऐसे ही भाषणों की वजह से भाजपा के चमकते सितारे हैं। और योगी आदित्यनाथ, उनके गुरु महंत अवैद्यनाथ, उमा भारती, ऋतंभरा जैसे नामों की शोहरत वैसी ही भाषा की वजह से रही है। बल्कि अगर रामरथ यात्रा के दिनों को याद किया जाए, तो लालकृष्ण आडवाणी के कई भाषण उस श्रेणी में रखे जा सकते हैं। और २००२ में गोवा में दिया अटल बिहारी वाजपेयी का भाषण भी अभी लोगों को भुला नहीं है। इन सभी भाषणों में सुर की ऊंचाई और शब्दों के चयन का फर्क हो सकता है, लेकिन उनकी विषयवस्तु में एक ही बात झलकती है।
इसलिए वरुण गांधी ने जो कहा, उसमें कोई नई बात नहीं है। ना ही ये ऐसा पहला मामला है। अगर इस प्रकरण में कोई नई बात है तो वो यह कि इस बार भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था की संस्थाओं ने जिम्मेदारी की ज्यादा भावना के साथ प्रतिक्रिया दिखाई। चुनाव आयोग ने भाजपा को सलाह दी कि वो वरुण गांधी को उम्मीदवार न बनाए और इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस मामले में दर्ज एफ़आईआर को रद्द करने की अर्जी पहली ही सुनवाई में ठुकरा दी। दिल्ली हाई कोर्ट से अग्रिम जमानत की अवधि बढ़ने की उम्मीद न देखते हुए वरुण गांधी ने ये याचिका ही वापस ले ली।
इसके बाद वरुण गांधी और भाजपा ने नफरत फैलाने के आरोप का राजनीतिक लाभ उठाने की रणनीति पर चलना शुरू कर दिया है। वरुण गांधी के साथ पूरा संघ परिवार खड़ा है। इनमें उन संगठनों का जिक्र फिलहाल छोड़ देते हैं, जिनका कोई लोकतांत्रिक या संवैधानिक उत्तरदायित्व नहीं हैं। लेकिन एक वैध और पंजीकृत राजनीतिक दल के रूप में भाजपा इन जवाबदेहियों बच नहीं सकती। और भाजपा का दोहरापन फिर से सबके सामने है। उसका कहना है कि वरुण गांधी ने अगर वैसा कहा तो पार्टी उससे सहमत नहीं है, लेकिन उसे तमाम परिस्थितिजन्य सबूतों पर भरोसा नहीं है। चुनाव आयोग और पहली नजर में हाई कोर्ट को जो सच लगा है, उसके पीछे वह पूर्वाग्रह देखती है। इसलिए वह न सिर्फ वरुण गांधी को उम्मीदवार बनाए रखेगी, बल्कि वरुण गांधी, भले ही अघोषित रूप में, लेकिन अब पार्टी के स्टार प्रचारकों का हिस्सा बन जाएंगे।
संवैधानिक संस्थाओं के अनादर की इससे बड़ी मिसाल और क्या हो सकती है? लेकिन यह भी कोई पहली बार नहीं है। इन संस्थाओं के प्रति अपमान का भाव भाजपा की पुरानी पहचान है। बल्कि भारतीय संविधान में, जिसकी मूल भावना लोकतांत्रिक और धर्मनिरपेक्ष है, भाजपा की आस्था पर सवाल हैं। भाजपा जब केंद्र की सत्ता में आई तो उसके पास अपना बहुमत नहीं था, इसके बावजूद उसने भारतीय संविधान के अमल की समीक्षा के लिए एक समिति बना दी। उस समिति के पीछे छिपा एजेंडा दरअसल किसी से छिपा नहीं था। यहां यह भी याद कर लेने के लायक है, जब बाबरी मस्जिद ध्वंस से देश में सांप्रदायिकता की लहर आई हुई थी, तब विश्व हिंदू परिषद के नेता स्वामी वामदेव ने भाजपा नेताओं की पूरी संगति में भारत के वैकल्पिक संविधान का मसविदा जारी किया था। उसके मुताबिक भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना था और हिंदू राष्ट्र की राज्य-व्यवस्था कैसे चलेगी, इसका जिक्र था।
यह परियोजना तभी पूरी हो सकती है, जब भाजपा अपने बहुमत के साथ सत्ता में आए। और यह तभी मुमकिन होगा, जब हिंदुत्व के नाम पर देश के बहुसंख्यक समुदाय की उग्र गोलबंदी हो। इसलिए कि भाजपा के पास कभी ऐसे सामाजिक-आर्थिक कार्यक्रम नहीं रहे, जिसके आधार पर विभिन्न वर्गों और समुदायों का वह ऐसा गठबंधन बना सके, जिससे सत्ता में पहुंचना मुमकिन हो। भाजपा ने अब तक जो राजनीतिक गठबंधन बनाए हैं, उसके पीछे कोई कार्यक्रम या विचार नहीं रहा। यह सिर्फ वोट के फौरी समीकरणों पर आधारित रहा है। ऐसे समीकरण भाजपा भविष्य में भी बना सकती है, लेकिन इससे वह अपना असली मकसद हासिल नहीं कर सकेगी।
इसलिए उग्र हिंदुत्व, अल्पसंख्यक विद्वेष और दक्षिणपंथी आर्थिक नीतियों की वकालत पार्टी की स्वाभाविक रणनीति है। यह काम वरुण गांधी जैसे वक्ताओं के साथ ही किया जा सकता है। यानी ऐसे भाषणों के जरिए जिनसे इंसान की निकृष्टतम भावनाओं को भड़काया जाए और लोगों को मार-काट करने के लिए उकसाया जाए। विनाश की यह वही रणनीति है, जिसका दुनिया को नाजीवाद और फासीवाद के दौर में अनुभव हो चुका है। दरअसल ये प्रवृत्तियां मानव सभ्यता के विकास का प्रतिवाद (एंटी-थिसिस) हैं और इसीलिए इसके खतरे को हर व्यक्ति को समझना चाहिए।
भाजपा को एक समय देश के एक वरिष्ठ नेता ने असभ्य पार्टी कहा था। अगर उपरोक्त संदर्भ को ध्यान में रखा जाए, तो इस कथन से सहज ही सहमत हुआ जा सकता है। सभ्यता एक ऐसा क्रम है जो मनुष्य को उसकी आदिम प्रवृत्तियों से ऊंचा उठाती है। वह मतभेदों और आपसी विरोध को निपटाने के लिए खून-खराबे और भौतिक लड़ाई के बजाय वैचारिक संघर्ष और विचार-विमर्श को तरीका बनाने के लिए प्रेरित करती है। लोकतांत्रिक राजनीति के विकास के साथ ऐसे संघर्षों और विरोध की अभिव्यक्ति या समाधान का सबसे बड़ा जरिया वोट बन गया है। यही लोकतंत्र और आधुनिक सभ्यता का सबसे बड़ा योगदान है।
सवाल है कि जिन ताकतों या दलों की इस प्रक्रिया में आस्था न हो, उन्हें क्या कहा जा सकता है? जो पार्टी जहरीली जुबान के बावजूद वरुण गांधी का बचाव करती हो, या अपने दंगाई इतिहास के बावजूद मायाबेन कोडनानी जिस पार्टी की बड़ी नेता बनी रहें, उसे किस परिभाषा के तहत सभ्य या लोकतांत्रिक कहा जा सकता है? भाजपा नेताओं से इन सवालों के जवाब की उम्मीद नहीं की जा सकती। दरअसल, उनसे विचार विमर्श की किसी प्रक्रिया में हिस्सा लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। उनसे सिर्फ जुमलेबाज़ी, गंभीर से गंभीर सवालों का मखौल उड़ाने और गलाफाड़़ शोर की ही अपेक्षा की जा सकती है।
लेकिन राहत की बात यह है कि भारतीय लोकतंत्र लगातार परिपक्व हो रहा है। जिन बातों पर पहले संस्थागत रूप से प्रतिक्रिया नहीं होती थी, या हलकी प्रतिक्रिया होती थी, वहां भी अब एक रुख लिया जा रहा है। इसीलिए वरुण गांधी जमानत न लेने या गिरफ्तारी देने के तमाम ड्रामे के बावजूद शहादत का दर्जा नहीं पा सकते। न ही उनकी पार्टी और उसके एजेंडे के लिए संभावनाएं उज्ज्वल नजर आती हैं। उन सबका खतरा अब भी है, मगर अब उस खतरे के बारे में कहीं ज्यादा जागरूकता है। यह भारतीय लोकतंत्र एवं हमारी आज की सभ्यता के लिए उम्मीद की एक बड़ी किरण है।
Saturday, March 21, 2009
तीसरे मोर्चे से नफ़रत क्यों?

सत्येंद्र रंजन
आम चुनाव से ठीक पहले तीसरे मोर्चे के एक खास शक्ल ग्रहण कर लेने से न सिर्फ कांग्रेस और भाजपा के रणनीतिकारों के लिए परेशानी खड़ी हो गई है, बल्कि देश की राजनीतिक असलियत और सामाजिक संरचना से नावाकिफ़ जानकार भी बौखलाए हुए लगते हैं। मीडिया की चर्चाओं में अक्सर तीसरे मोर्चे को अस्थिरता की जड़ बताया जा रहा है। यहां तक कि इसमें शामिल दलों को ब्लैकमेलर और अपनी ताकत से ज्यादा मलाई खाने की हसरत रखने वाले नेताओं का जमावड़ा भी कहा जा रहा है। इसी के बीच वह सुझाव भी फिर सामने गया है, जो भारतीय प्रभु वर्ग की बहुत पुरानी ख्वाहिश है। यानी यह कि १५वें आम चुनाव का नतीजा आने के बाद कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी को आपस में मिलकर सरकार बनाने की संभावना पर विचार करना चाहिए। धर्मनिरपेक्षता के कुछ स्वघोषित पैरोकार यहां तक कह चुके हैं, तीसरे मोर्चे की ब्लैकमेलिंग देखने के बजाय वो पांच साल का भाजपा शासन सहना पसंद करेंगे।
ये बातें इस हकीकत को मानने के बावजूद कही जा रही हैं कि कांग्रेस और भाजपा की ताकत लगातार गिरती जा रही है, पिछले आम चुनाव में दोनों दलों ने अपने वोट प्रतिशत गवाएं थे और इस बार यह मुमकिन है कि ये दोनों दल पिछले बार की सीटों की साझा संख्या २८३ (कांग्रेस १४५ और भाजपा १३८) से काफी कम पर सिमट जाएं। इस बार यह संभव है कि लोकसभा में आधे से ज्यादा सीटें कांग्रेस और भाजपा के अलावा दलों के पास हों। तो जो दल देश के आधे से ज्यादा जनमत की नुमाइंदगी करने की स्थिति में हैं, आखिर उनके प्रति यह हिकारत का भाव क्यों? आखिर इसके पीछे कैसी मानसिकता है? आखिर यह सोच क्यों है कि भले बाकी दलों के पास ज्यादा सीटें हों, लेकिन कांग्रेस या भाजपा में से किसी एक के नेतृत्व में ही सरकार बनानी चाहिए?
यह दरअसल देश में उत्तरोत्तर लोकतंत्रीकरण से शासक वर्गों में पैदा हुई बेचैनी है। इस लोकतांत्रिक प्रक्रिया से उभर रही नई ताकतों, नई जन आकांक्षाओं और नए वर्ग समूहों से आ रहे नेताओं पर यह लगाम कसने की एक चाहत है। शासक वर्गों को अभी भी यह लगता है कि बीते वर्षों में कांग्रेस और भाजपा जैसी पार्टियां जो उनके हितों के अनुरूप पूरी तरह ढल चुकी हैं, उनके जरिए वो जनतांत्रिक परिघटना को नियंत्रित कर सकते हैं। इस मकसद में इन वर्गों की पहली पसंद निश्चित रूप से भाजपा है, जो सांप्रदायिक, भड़काऊ और कंजरवेटिव एजेंटे से आम जन को उनके असली मुद्दों से ज्यादा आसानी से भटका सकती है। मगर कांग्रेस ने आम आदमी की बात करते हुए भी प्रभु वर्ग के हितों के मुताबिक शासन करने की कला में जैसी महारत हासिल कर रखी है, उससे इन वर्गों की वह स्वाभाविक रूप से दूसरी पसंद है।
इस कथन से यह भ्रम बिल्कुल नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस और भाजपा के अलावा बाकी दलों ने मौका मिलने पर शासन का कोई अलग चरित्र दिखाया है या अलग नीतियां अपनाई हैं। वामपंथी दलों को छोड़ दें तो बाकी दलों ने वैकल्पिक नीतियों के मामले पूरा दीवालियापन ही दिखाया है और उनके नेताओं का आचार-व्यवहार अगर बदतर नहीं तो कांग्रेस और भाजपा के नेताओं से बेहतर भी नहीं रहा है। १९८० और ९० के दशक में उनसे देश को जैसी नई दिशा की उम्मीद थी, वह अब टूट चुकी है।
लेकिन इन दलों और उनके नेताओं के उभार का महत्त्व वैकल्पिक नीतियों और अलग राजनीतिक संस्कृति के संदर्भ में नहीं है। उनका महत्त्व इस संदर्भ में है कि ‘एक व्यक्ति, एक वोट और हर वोट के समान मूल्य’ के जिस सिद्धांत पर हमारे संविधान में संसदीय लोकतंत्र को अपनाया गया, उसने आम जन में अपने अधिकारों एवं सम्मान की अभूतपूर्व आकांक्षा जगाई है और इससे बीते दशकों में उनका प्रतिनिधित्व करने वाली नई राजनीतिक ताकतें उभर कर सामने आई हैं। पहले राज्यों की सत्ता पर अधिकार जताने के बाद अब ये ताकतें देश की सत्ता पर अपना प्रभाव डाल सकने की स्थिति में हैं।
बहुत सी अलग राजनीतिक शक्तियों का उदय तो इसलिए भी हुआ कि उन्हें समाहित करने की क्षमता कांग्रेस पार्टी बरकरार नहीं रख सकी, जो कभी सभी तरह के विचारों और हितों का प्रतिनिधित्व करती थी। आज कांग्रेस का ढांचा ऐसा है कि उसमें किसी नए नेता के लिए अपने जनाधार और प्रतिभा के बल पर जगह बनाना और उम्मीदवारी का टिकट पाना मुश्किल है। वंशवाद और ऊपर से थोपे गए नेताओं की वहां ऐसी जकड़न है कि किसी इलाके की किसी नई ताकत के पास एकमात्र रास्ता यही बचता है कि वह अपनी अलग शुरुआत करे। इस परिघटना से कांग्रेस सिकुड़ती गई, जबकि नई ताकतें राजनीतिक फलक पर अपनी जगह बनाती गई हैं।
कांग्रेस को २००४ में अपनी इस विफलता की स्थितियों में सुधार का ऐतिहासिक मौका मिला। इससे वह नए भारत की लोकतांत्रिक एवं संघीय उम्मीदों के मुताबिक नई नीतियों और कार्यक्रम को अपनाते हुए एक वाम झुकाव रखने वाले धर्मनिरपेक्ष गठबंधन का स्वाभाविक नेता बन सकती थी। मगर प्रभु वर्ग की सेवा के अति उत्साह में उसने ये मौका गवां दिया। उसने नीतियों के सवाल पर वामपंथी दलों से विश्वासघात किया। इस क्रम में उसने अपना नैतिक कद गंवाया और साथ ही अपने नेतृत्व वाले यूपीए गठबंधन का राजनीतिक औचित्य भी खत्म कर दिया। ऐसे में क्या यह अस्वाभाविक है कि अब उसके सहयोगी दल उसे अपमानित कर रहे हैं?
भाजपा अपनी बुनियादी सोच में लोकतंत्र, संघवाद और हर प्रगतिशील मूल्य के खिलाफ है। वह विभिन्न दलों से गठबंधन सिर्फ गैर-कांग्रेसवाद के राजनीतिक समीकरण और मजबूरियों की वजह से बना सकी। लेकिन उड़ीसा की मिसाल अब यह जाहिर कर रही है कि यह समीकरण और मजबूरियां भी भाजपा के नेतृत्व में गठबंधन कायम रहने की गारंटी नहीं है।
इन स्थितियों ने लोकसभा चुनाव के परिदृश्य को बेहद अनिश्चित कर दिया है। इस अनिश्चितता से प्रभु वर्गों में बेचैनी लाजिमी है और यही बौखलाहट मीडिया में उनके प्रवक्ता टीकाकारों के जरिए जाहिर हो रही है। लेकिन उनकी टिप्पणियों में देश की बदलती असलियत की नासमझी भी सामने आ रही है, और यह समझ सकने की अक्षमता भी कि समय की धारा अब उनके साथ नहीं है। नया जनादेश दरअसल नए भारत की नई आकांक्षाओं को प्रतिबिंबित करेगा।
Wednesday, March 4, 2009
क्रिकेट पर हमला क्यों?

सत्येंद्र रंजन
पाकिस्तान में श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमले पर भावुक होकर सोचने के कई बिंदु हैं। मसलन, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट के १३२ साल के इतिहास में यह पहला मौका है, जब क्रिकेट खिलाड़ियों को निशाना बनाया गया। दरअसल १९७२ के म्युनिख ओलिंपिक में ११ इजराइली एथलीटों की हत्या के बाद यह पहला मौका है, जब खिलाड़ी इस तरह के घातक आतंकवादी हमले का निशाना बने। यह बात किसी विवेकशील व्यक्ति के समझ के परे है कि किसी आतंकवादी संगठन को आखिर खिलाड़ियों से क्या दुश्मनी हो सकती है? खिलाड़ी किसी देश या समुदाय की नीति बनाने के काम से नहीं जुड़े होते हैं। वे अपने हुनर से टीम में जगह बनाते हैं और उनकी प्रतिभा का सौंदर्य पूरी मानवता की साझा विरासत होता है।
बल्कि सामाजिक मनोविज्ञान के जानकारों का कहना है कि प्रतिद्वंद्विता या शत्रुता का भाव रखने वाले समाजों या देशों को खेल स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का बेहतरीन मौका उपलब्ध कराते हैं। खेल के मैदान पर होड़ से मन का गुबार निकल जाता है, जबकि इसमें कोई हिंसा या नुकसान नहीं होता। खुद एक दशक पहले तक भारत और पाकिस्तान के क्रिकेट मुकाबले ऐसी प्रतिस्पर्धा की मिसाल रहे हैं।
अभी हाल तक जब कई देशों की टीमें पाकिस्तान दौरे पर जाने से इनकार करती थीं, तो पाकिस्तान और असल में हर जगह बहुत से लोगों का यह तर्क होता था कि आज तक कभी खिलाड़ियों को निशाना नहीं बनाया गया है, इसलिए इन टीमों का डर निराधार है। ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और इंग्लैंड जैसी टीमों की ऐसी आशंकाओं के पीछे नस्लीय सोच के अवशेष भी तलाशे जाते थे। इस साल जनवरी में जब भारतीय टीम पाकिस्तान नहीं गई तो इन हलकों में माना गया कि इसके पीछे वजह हमलों के अंदेशे से ज्यादा दोनों के बीच मुंबई पर हमले के बाद पैदा हुआ तनाव है। दौरे को हरी झंडी न देने के भारत सरकार के कदम को एक राजनीतिक फैसला माना गया। यह जुमला एक बार फिर दोहराया गया कि राजनीति को खेल से अलग रखा जाना चाहिए।
मगर लाहौर में १२ आतंकवादियों ने श्रीलंका के क्रिकेटरों पर गोलीबारी कर इन सारी दलीलों को एक साथ ध्वस्त कर दिया है। सौभाग्य से श्रीलंका के प्रतिभाशाली क्रिकेटर मामूली चोट के साथ ही बच गए, लेकिन आतंकवादियों की गोलियों से क्रिकेट को पहुंचा जख्म बहुत गहरा है। इसके परिणाम संभवतः क्रमिक रूप से जाहिर होंगे। पाकिस्तान २००८ में एक भी टेस्ट मैच नहीं खेल सका। दरअसल, श्रीलंकाई टीम ने वहां जाकर खेलने का जब जोखिम उठाया तो पाकिस्तानी टीम १४ महीनों के बाद किसी टेस्ट मैच में उतरी। इस हमले के बाद पाकिस्तान का यह इंतजार अब कई वर्ष लंबा हो सकता है। यह भी लगभग तय है कि उसे २०११ के विश्व कप की मेजबानी से हाथ धोना पड़ेगा।
लेकिन यह असर सिर्फ पाकिस्तान तक ही सीमित नहीं रहने वाला है। लाख टके का सवाल यह है कि क्या ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड, दक्षिण अफ्रीका और इंग्लैंड जैसी टीमें अब भारतीय उपमहाद्वीप में आने को तैयार होंगी? गौरतलब है कि मुंबई हमले के बाद बड़ी मुश्किल से इंग्लैंड की टीम भारत आकर खेलने को राजी हुई थी, लेकिन तब यह भ्रम कायम था कि आतंकवादी खिलाड़ियों पर हमला नहीं करते हैं। अब यह भ्रम टूट चुका है। भारत भले स्थिर समाज हो और यहां की सुरक्षा व्यवस्था अपेक्षाकृत भरोसेमंद हो, लेकिन विदेशी खिलाड़ी इसे बेखौफ होकर खेलने के लायक मानेंगे, यह सवाल लंबे समय तक बना रहेगा। दस अप्रैल से शुरू होने वाली २०-२० क्रिकेट की इंडियन प्रीमियर लीग का कार्यक्रम अब खतरे पड़ चुका है। यहां यह गौरतलब है कि विश्व क्रिकेट आज भारतीय बाजार पर निर्भर है और भारतीय उपमहाद्वीप आज क्रिकेट का मुख्य केंद्र है। अगर इस केंद्र और बाजार को झटके लगते हैं तो अतंरराष्ट्रीय खेल के रूप में क्रिकेट के अस्तित्व पर सवाल खड़ा हो सकता है।
पाकिस्तान को अभी हाल तक क्रिकेट का ब्राजील कहा जाता था। इसलिए कि ब्राजील में जैसे फुटबॉल के कुदरती हुनर वाले खिलाड़ी पैदा होते हैं, वैसे ही क्रिकेटर पाकिस्तान पैदा करता था। बिना किसी स्थापित सिस्टम के उफनती प्रतिभा की बदौलत उभरे उन क्रिकेटरों ने न सिर्फ अपना और अपने देश का नाम रोशन किया, बल्कि दुनिया भर के क्रिकेट प्रेमियों का भरपूर मनोरंजन किया। लेकिन क्रिकेट की यह नर्सरी आज खतरे में है। अगर वहां दुनिया की टीमें नहीं आएंगी, क्रिकेट की स्पर्धाएं नहीं होंगी तो आखिर किन रोल मॉडल्स को सामने रख कर नई प्रतिभाएं उभरेंगी?
पाकिस्तान लंबे समय से आतंकवाद की गहरी मार झेल रहा है। यह वो आतंकवाद है, जिसे पैदा करने में खुद पाकिस्तान के सत्ताधारी एक दौर में अमेरिका के सहभागी बने। अमेरिका का मकसद अफगानिस्तान से सोवियत फौज को हटाना था, तो पाकिस्तान उन्हीं मुजाहिदीन के जरिए भारत को हजार जख्म देकर खून बहाते हुए कश्मीर पर कब्जा करना चाहता था। अमेरिका का पहला मकसद तो पूरा हुआ, मगर अफगानिस्तान उन्ही नीतियों की वजह से जैसा नासूर बन गया, उसे वह आज भी भुगत रहा है। पाकिस्तान ने भारत का खून जरूर बहाया, लेकिन एक उदार और आधुनिक समाज के रूप में उसके उभरने की संभावना पर आज आतंकवाद का वह भस्मासुर हमले बोल रहा है। स्वात घाटी लेकर अब क्रिकेट तक की खूबसूरती को ये धर्मांध ताकतें नष्ट कर रही हैं।
जाहिर है, पाकिस्तान के आम लोगों के लिए यह जागने का वक्त है। पाकिस्तान आतंकवाद का अड्डा बना हुआ है, इस सच को अब वो सिर्फ अपनी कीमत पर ही झुठला सकते हैं। इसलिए कि दुनिया इस सच से वाकिफ है और इससे निपटने के लिए प्रभावित देश अपने ढंग से तैयारी कर रहे हैं। अगर पाकिस्तान में आज भी कुछ लोग ऐसा मानते हैं कि श्रीलंकाई क्रिकेटरों पर हमला भारत ने कराया, तो पाकिस्तान के भविष्य के बारे में सोच कर उनसे सिर्फ सहानुभूति ही रखी जा सकती है।
बहरहाल, यह स्थिति भारत के नीति-निर्माताओं के लिए भी एक बड़ी चुनौती है। उन्हें यह सोच कर खुश नहीं होना चाहिए कि आखिर उनकी बात सच साबित हुई। चुनौती आतंकवाद को परास्त करने की है। इसे भारत बनाम पाकिस्तान का रूप नहीं देना चाहिए। बल्कि पाकिस्तान के जिस किसी हिस्से में आतंकवाद से लड़ने की इच्छा नजर आए, उसे प्रोत्साहित करना और आतंकवाद के खिलाफ संघर्ष में उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी का सहयोगी बनाना ही इस समय सबसे सही नीति हो सकती है।
Saturday, February 21, 2009
स्वतंत्रता की कीमत पर सुरक्षा?

सत्येंद्र रंजन
आतंक के खिलाफ अमेरिका की जंग मानवाधिकारों की कीमत पर लड़ी जा रही है, नागरिक अधिकार संगठन यह आरोप लंबे समय से लगाते रहे हैं। लेकिन अब इस बात की पुष्टि एक आधिकारिक रिपोर्ट से भी हो गई है। यह रिपोर्ट अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा बनाई गई जजों की समिति ने तैयार की है। समिति ने तीन साल तक ४० से ज्यादा देशों में विशेषज्ञों, सरकारी अधिकारियों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और मानवाधिकार हनन के पीड़ित लोगों से बातचीत के बाद यह रिपोर्ट तैयार की है।
रिपोर्ट में कहा गया है- ‘दुनिया के अग्रिम लोकतांत्रिक देशों में से एक अमेरिका ने आतंकवाद से लड़ने के लिए ऐसे तरीके अपनाए हैं, जो अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानून और मानवाधिकार कानूनों के स्थापित सिद्धांतों से मेल नहीं खाते।’ १९९ पेज की इस रिपोर्ट में आठ न्यायविदों की समिति ने कहा है- ‘इसमें संदेह नहीं कि दुनिया के विभिन्न हिस्सों में आतंकवाद का खतरा वास्तविक और भारी है और यह सरकारों का कर्त्तव्य है कि इस खतरे का मुकाबला करने के लिए वो प्रभावी कदम उठाएं। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि अंतरराष्ट्रीय कानून के सुस्थापित सिद्धांतों की अनदेखी कर दी जाए।’
रिपोर्ट में खुलासा किया गया है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए यातना, लोगों को गायब कर देने, गुप्त स्थान पर हिरासत में रखने में, निष्पक्ष सुनवाई न होने और सुरक्षा बलों द्वारा मा्नवाधिकारों के हनन को बर्दाश्त करने की घटनाएं बढ़ती गई हैं। रिपोर्ट ने इस खतरे के प्रति आगाह किया है कि जिन कदमों को आतंकवाद से लड़ने के क्रम में अपवाद और ‘अस्थायी’ बताया गया था, लोकतांत्रिक देशों में भी वो स्थायी होते जा रहे हैं।
आतंकवाद से लड़ने के नाम पर अगर लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं खुद गैर कानूनी कदम उठाने लगें और बुनियादी मानवाधिकारों का उल्लंघन करने लगें, तो समझा जा सकता है कि मानव सभ्यता के विकासक्रम को कितना बड़ा झटका लग रहा है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि इस सवाल पर जागरूकता की बेहद कमी है। आतंकवाद का एक ऐसा हौव्वा खड़ा कर दिया गया है कि राजनीति से लेकर मीडिया तक के विमर्श में इसके खिलाफ लड़ाई के तरीकों पर कोई सवाल उठाना देशभक्ति के खिलाफ बता दिया जाता है। भारत में मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद जिस तरह आनन-फानन में राष्ट्रीय जांच एजेंसी और गैर कानूनी गतिविधि कानून में संशोधन विधेयक पास करा लिए गए, उससे बुनियादी लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के औचित्य पर ही सवाल खड़ा हुआ। मगर मुख्यधारा राजनीति और मीडिया में किसी ने ये सवाल पूछने की जरूरत नहीं समझी।
मुंबई में आतंकवादी हमले से उमड़ी प्रतिक्रिया के आवेग के बीच भारत के प्रधान न्यायाधीश की चेतावनी की भी अनसुनी कर दी गई। न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन ने उस माहौल में भी इससे आगाह करना जरूरी समझा कि नागरिक अधिकारों को आतंकवाद विरोधी कानूनों की बलि न चढ़ाया जाए। अब अंतरराष्ट्रीय न्यायालय द्वारा बनाई गई जजों की समिति की रिपोर्ट से दुनिया भर में जारी इस परिघटना की तरफ ध्यान खींचा गया है।
इस रिपोर्ट में दो बातें खास तौर पर गौरतलब हैं। पहली यह कि इस रिपोर्ट में ‘आतंक के खिलाफ युद्ध’ में अपनाई जा रही मौजूदा कसौटियों को ठुकरा देने की अपील की गई है और दूसरी यह कि इसमें बात पर जोर दिया गया है कि एक बेहतर आपराधिक न्याय प्रक्रिया से ही आतंकवाद के खिलाफ प्रभावी कदम उठाए जा सकते है।
दरअसल, अब जरूरत इस रिपोर्ट के निष्कर्षों से भी आगे ले जाने की है। सवाल यह है कि क्या ‘आतंकवाद के खिलाफ युद्ध’ का विचार सही है? यह शब्द ऐसी धारणा बनाता है कि जैसे आतंकवाद कोई एक इकाई हो, जिसका कोई एक मकसद हो और जो उस मकसद के लिए संगठित रूप से युद्ध लड़ रहा हो। जबकि वास्तव में बात ऐसी नहीं है। दुनिया में अलग-अलग तरह की चरमपंथी, उग्रवादी और आतंकवादी धाराएं हैं, जिनके पैदा होने की वजहें, मकसद और प्रेरणास्रोत अलग-अलग हैं। उन सबसे एक जैसे तरीकों से नहीं लड़ा जा सकता।
ध्यान देने की बात यह है कि हर तरह का गैर-सरकारी आतंकवाद इंसाफ न मिलने की भावना से ताकत प्राप्त करता है। यह इस भावना के गहराते जाने से पैदा होने वाली हताशा से उसे कार्यकर्ता मिलते हैं और इसी वजह से कुछ समुदायों का समर्थन हासिल होता है। बेशक, जैसाकि जजों की समिति ने कहा है, यह सरकारों का कर्त्तव्य है कि हिंसा और हमलों से अपने नागरिकों को बचाने का वो उपाय करें। लेकिन ये उपाय आतंकवाद की समस्या का हल नहीं हो सकते। टिकाऊ हल अन्याय की भावना को दूर करने से ही निकल सकता है, जबकि आतंकवाद विरोधी लड़ाई के लिए गैर कानूनी तरीके अपनाने से यह भावना और गहरी होती है।
लेकिन दुनिया भर में सरकारें कोई सबक लेती नजर नहीं आतीं। अमेरिका में बराक ओबामा के राष्ट्रपति से बनने से शुरुआत में जन्मी उम्मीद के कमजोर पड़ने में ज्यादा वक्त नहीं लगा है। ओबामा प्रशासन ने गुआंतानामो बे की गैर कानूनी जेल को बंद करने का फैसला तो किया, लेकिन उसके बाद वह गोपनीयता, यातना और आतंक से जंग की रुपरेखा पर बुश प्रशासन की नीतियों को अपनाते दिख रहा है। कंजरवेटिव अखबार द वॉल स्ट्रीट जर्नल इस पर खुश होते हुए लिखा है- ‘ऐसा लगता है कि बुश प्रशासन की आतंक विरोधी रूपरेखा एक नई वैधता प्राप्त कर रही है।’ और इस पर अमेरिकन सिविल लिबर्टीज यूनियन के कार्यकारी निदेशक एंथनी डी रोमेरो का कहना है- ‘हाल की निराशाजनक घटनाओं से यह चिंता गहरी हो गई है कि ओबामा अंततः बुश प्रशासन की कुछ सबसे समस्याग्रस्त नीतियों को ही आगे बढ़़ाएंगे।’
जब दुनिया की विकसित चेतना के प्रतिनिधि जजों ने इंसान के बुनियाद हकों से जुड़ी एक बेहद गंभीर समस्या पर न सिर्फ रोशनी डाली है, बल्कि दुनिया को इसके खतरों से आगाह भी किया है, उस समय भी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का उस पर ध्यान न देना मानव सभ्यता के सामने एक गंभीर चुनौती है। यह लोगों के यह कहने का समय है कि उनकी सुरक्षा के नाम पर उनकी स्वतंत्रताएं न छीनी जाएं। सरकारें खुद आतंकवादियों की तरह कानून और व्यवस्था की धज्जियां न उड़ाएं। यह हो सके इसके इसके लिए जरूरी यह है कि अंतरराष्ट्रीय न्याय अदालत की पहल से सामने आई सच्चाई आम जन तक पहुंचाई जाए।
Friday, February 20, 2009
भारत का पाकिस्तान विमर्श
सत्येंद्र रंजन
मुंबई पर २६ नवंबर को अचानक आतंकवादी हमले से सकते में रह जाने के बाद इस मामले में पाकिस्तान की जांच से भारत के लोग एक बार फिर अचंभित रह गए। पाकिस्तान सरकार सचमुच गंभीरता से जांच करेगी और हमले की साजिश की कुछ नई परतें उससे खुलेंगी, इसकी उम्मीद इस देश में बड़े से बड़े आशावादी को भी नहीं थी। पाकिस्तान ने इस मामले में जब भारत के डोज़ियर का जवाब दिया तो उस पर क्या प्रतिक्रिया जताई जाए, यह तय करना देर तक मुश्किल बना रहा।
फिर मीडिया और सिक्युरिटी एक्सपर्ट्स को समझ में आया कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तान के पास इसके अलावा कोई और चारा नहीं था। भारत सरकार ने पाकिस्तान की शुरुआती जांच को एक ‘सकारात्मक घटनाक्रम’ बताया, लेकिन इसके साथ ही विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में यह भी दोहरा दिया कि जब तक पाकिस्तान इस जांच को तार्किक नतीजे तक नहीं पहुंचाता और पाकिस्तान में आतंकवाद का ढांचा नष्ट नहीं होता, भारत चुप नहीं बैठेगा।
भारत में पाकिस्तान को लेकर होने वाले विमर्श को समझने के लिहाज से ये प्रतिक्रियाएं बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। मीडिया के ज्यादातर हिस्से में अब खबर की प्रस्तुति नाटक का रूप ले चुकी है। सनसनी इसका एक अहम पहलू है। इसके कथानक में नायक और खलनायक का होना अनिवार्य होता है। खलनायक जितना दैत्याकार हो, खबर उतनी सनसनीखेज़ हो सकती है। ऐतिहासिक कारणों से पाकिस्तान एक ऐसे खलनायक के स्वाभाविक किरदार के रूप में उपलब्ध होता है।
इसलिए मीडिया के विमर्श में पाकिस्तान का खौफ़नाक चेहरा उभारना और फिर उस पर बरसना खबर के नाम पर जारी ड्रामा या अब मेलोड्रामा का सहज हिस्सा बन गया है। सरकार भी इस नाटक के दर्शक और पाठक वर्ग की उपेक्षा नहीं कर सकती। तो उसे भी उनकी तुष्टि के लिए कुछ शब्द ज़रूर बोलने पड़ते हैं। और इस वक्त जब देश आम चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, राजनीतिक दलों के लिए पाकिस्तान एक बड़ा मुद्दा है। सत्ताधारी कांग्रेस आसानी से इस मुद्दे पर देशभक्ति का ज्वार उभार कर वोट पाने के लालच से नहीं बच सकती।
लेकिन इस विमर्श का नुकसान यह है कि देश की जनता एक बेहद पेचीदा हालत के बारे में जानने और उसके विभिन्न पहलुओं को समझने से वंचित हो गई है। पाकिस्तान की स्थितियां जटिल हैं। कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अपने वजूद के संकट से जूझ रहा है। उसका इतिहास और उसकी बुनियाद से जुड़े सवाल बेहद विकराल रूप में उसके सामने खड़े हैं। वह जिस इस्लाम के नाम पर बना, उसकी चरमपंथी धारा उसकी राज्य-व्यवस्था को चुनौती दे रही है। जिस अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहारे उसकी राज्य-व्यवस्था चलती रही, उससे अब देश के आम जन मानस का गहरा अंतर्विरोध खड़ा हो गया है। देश की असली सत्ता किसके हाथ में है, यह समझ पाना मुश्किल है।
यह परिस्थिति विस्फोटक रूप भी ले सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देश इसके खतरे से कहीं बेहतर वाकिफ नजर आते हैं। लेकिन हालात को संभावने के सूत्र उनके हाथ में भी नहीं हैं। एक बड़ी आबादी वाला देश, जिसके पास परमाणु हथियार हों, लेकिन जिसकी सत्ता का ढांचा बिखरता हुआ दिखे और जहां धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद तेजी से पांव फैला रहा हो, इसके परिणामों के बारे में सोचना भी डरावना है। मगर हर जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय ताकत को आज इसके बारे में सोचना पड़ रहा है।
अगर ऐसी सोच का कहीं अभाव दिखता है तो वह भारत ही है। हमारे विमर्श में पूरा पाकिस्तान एक इकाई है। और सारा पाकिस्तान भारत का दुश्मन है। लेकिन इस विमर्श में यह कोई नहीं बताता कि आखिर इस दुश्मन से कैसे निपटा जा सकता है? मीडिया और सियासतदां की जुबानी जंग को क्या असली जंग में बदला जा सकता है? क्या भारत सचमुच पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की अनदेखी कर पाकिस्तान से युद्ध का जोखिम मोल ले सकता है? या भारत के पास इस जटिल स्थिति से निकलने का कोई और भी विकल्प है?
अगर हम पिछले दो दशकों के विकासक्रम को समझने और मीडिया के मार्केट नैरेटिव (दर्शक या पाठक बढ़ाने की बाजार रणनीति) से निकल कर आगे देखने की क्षमता रखते हों, तो दूसरे विकल्प जरूर नजर आ सकते हैं। पाकिस्तान की बुनियाद और पहचान भले भारत विरोध के आधार पर खड़ी हुई हो, लेकिन पाकिस्तान की आज पीढ़ी ऐसी एकरूप सोच से नहीं चलती है। वहां चलने वाली बहस देश के भीतर देश के बुनियादी मुद्दों पर तेज होते अंतर्विरोधों की झलक देते हैं। जरूरत इस बारीकी को समझने की है। लेकिन भारत में इस समझ का साफ अभाव नजर आता है।
सवाल यह है कि आखिर हम चाहते हैं क्या हैं? हमारा लक्ष्य पाकिस्तान को नष्ट करना या उसकी परेशानियों पर खुश होना है, या हम शांति और प्रगति की ऐसी परिस्थितियां बनाना चाहते हैं, जिसमें पूरा दक्षिण एशिया और प्रकारातंर में पूरी दुनिया मानव विकास एवं स्वतंत्रता के उच्चतर स्तर हासिल कर सके? अगर हमारा लक्ष्य दूसरा है तो हमें पाकिस्तान के हालात को बारीकी से समझना चाहिए। वहां कट्टरपंथ और सिविल सोसायटी के बीच के अंतर्विरोधों को समझना चाहिए। वहां के सत्ता ढांचे के अंतर्विरोधों पर गौर करना चाहिए। और इनके बीच हमें ऐसी नीतियां अपनानी चाहिए, जिससे वहां प्रगति और स्थिरता की ताकतों को बल मिले।
अगर पाकिस्तान ने मुंबई हमले की शुरुआती जांच गंभीरता से की तो इसके पीछे मंसूबे तलाशने के बजाय उसे खुले दिल से हमें स्वीकार करना चाहिए। अगर इससे पाकिस्तन सरकार के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर सहयोग का कोई रास्ता निकलता है, तो उस पर चलने से भारत सरकार को नहीं हिचकना चाहिए। कट्टरपंथ और आतंकवाद दो ऐसे खतरे हैं, जिनके खिलाफ एकजुटता की आज बेहद जरूरत है। लेकिन यह एकजुटता दोमुंहेपन के साथ नहीं बन सकती। स्वात घाटी के तालिबान और भारत की राम, बजरंग और शिवसेनाओं के प्रति रुख में फर्क के साथ ये लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अगर आज देश पर तालिबान के कब्जे का अंदेशा जताते हैं, तो हमें इस खतरे से भी आगाह रहना चाहिए कि कभी भारत में भी संघ परिवार के कब्जे का खतरा पैदा हो सकता है।
दरअसल, आतंकवाद से संघर्ष में जितनी भूमिका सुरक्षा और खुफिया तंत्र की है, उससे कहीं ज्यादा विचारों और राजनीतिक नीतियों की है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि राजनीतिक दलों को इस लड़ाई में जैसा नेतृत्व देना चाहिए, वो नहीं दे रहे हैं। बल्कि उन्होंने आतंकवाद पर सारे विमर्श को संकीर्ण दायरे में समेट दिया है। यही भूमिका मीडिया भी निभा रहा है। पाकिस्तान को दैत्य के रूप में पेश करना और उसमें अंतर्निहित सांप्रदायिक मनोभावों का शोषण कर फायदा उठाना एक आसान रास्ता बना हुआ है। लेकिन यह रास्ता हमें अपने लक्ष्यों की तरफ नहीं ले जाता है। इसीलिए भारत को आज अपने पाकिस्तान विमर्श पर अनिवार्य रूप से पुनर्विचार करना चाहिए।
मुंबई पर २६ नवंबर को अचानक आतंकवादी हमले से सकते में रह जाने के बाद इस मामले में पाकिस्तान की जांच से भारत के लोग एक बार फिर अचंभित रह गए। पाकिस्तान सरकार सचमुच गंभीरता से जांच करेगी और हमले की साजिश की कुछ नई परतें उससे खुलेंगी, इसकी उम्मीद इस देश में बड़े से बड़े आशावादी को भी नहीं थी। पाकिस्तान ने इस मामले में जब भारत के डोज़ियर का जवाब दिया तो उस पर क्या प्रतिक्रिया जताई जाए, यह तय करना देर तक मुश्किल बना रहा।
फिर मीडिया और सिक्युरिटी एक्सपर्ट्स को समझ में आया कि अंतरराष्ट्रीय दबाव में पाकिस्तान के पास इसके अलावा कोई और चारा नहीं था। भारत सरकार ने पाकिस्तान की शुरुआती जांच को एक ‘सकारात्मक घटनाक्रम’ बताया, लेकिन इसके साथ ही विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में यह भी दोहरा दिया कि जब तक पाकिस्तान इस जांच को तार्किक नतीजे तक नहीं पहुंचाता और पाकिस्तान में आतंकवाद का ढांचा नष्ट नहीं होता, भारत चुप नहीं बैठेगा।
भारत में पाकिस्तान को लेकर होने वाले विमर्श को समझने के लिहाज से ये प्रतिक्रियाएं बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। मीडिया के ज्यादातर हिस्से में अब खबर की प्रस्तुति नाटक का रूप ले चुकी है। सनसनी इसका एक अहम पहलू है। इसके कथानक में नायक और खलनायक का होना अनिवार्य होता है। खलनायक जितना दैत्याकार हो, खबर उतनी सनसनीखेज़ हो सकती है। ऐतिहासिक कारणों से पाकिस्तान एक ऐसे खलनायक के स्वाभाविक किरदार के रूप में उपलब्ध होता है।
इसलिए मीडिया के विमर्श में पाकिस्तान का खौफ़नाक चेहरा उभारना और फिर उस पर बरसना खबर के नाम पर जारी ड्रामा या अब मेलोड्रामा का सहज हिस्सा बन गया है। सरकार भी इस नाटक के दर्शक और पाठक वर्ग की उपेक्षा नहीं कर सकती। तो उसे भी उनकी तुष्टि के लिए कुछ शब्द ज़रूर बोलने पड़ते हैं। और इस वक्त जब देश आम चुनाव के लिए तैयार हो रहा है, राजनीतिक दलों के लिए पाकिस्तान एक बड़ा मुद्दा है। सत्ताधारी कांग्रेस आसानी से इस मुद्दे पर देशभक्ति का ज्वार उभार कर वोट पाने के लालच से नहीं बच सकती।
लेकिन इस विमर्श का नुकसान यह है कि देश की जनता एक बेहद पेचीदा हालत के बारे में जानने और उसके विभिन्न पहलुओं को समझने से वंचित हो गई है। पाकिस्तान की स्थितियां जटिल हैं। कहा जा सकता है कि पाकिस्तान अपने वजूद के संकट से जूझ रहा है। उसका इतिहास और उसकी बुनियाद से जुड़े सवाल बेहद विकराल रूप में उसके सामने खड़े हैं। वह जिस इस्लाम के नाम पर बना, उसकी चरमपंथी धारा उसकी राज्य-व्यवस्था को चुनौती दे रही है। जिस अमेरिकी साम्राज्यवाद के सहारे उसकी राज्य-व्यवस्था चलती रही, उससे अब देश के आम जन मानस का गहरा अंतर्विरोध खड़ा हो गया है। देश की असली सत्ता किसके हाथ में है, यह समझ पाना मुश्किल है।
यह परिस्थिति विस्फोटक रूप भी ले सकती है। अमेरिका और पश्चिमी देश इसके खतरे से कहीं बेहतर वाकिफ नजर आते हैं। लेकिन हालात को संभावने के सूत्र उनके हाथ में भी नहीं हैं। एक बड़ी आबादी वाला देश, जिसके पास परमाणु हथियार हों, लेकिन जिसकी सत्ता का ढांचा बिखरता हुआ दिखे और जहां धार्मिक कट्टरपंथी आतंकवाद तेजी से पांव फैला रहा हो, इसके परिणामों के बारे में सोचना भी डरावना है। मगर हर जिम्मेदार अंतरराष्ट्रीय ताकत को आज इसके बारे में सोचना पड़ रहा है।
अगर ऐसी सोच का कहीं अभाव दिखता है तो वह भारत ही है। हमारे विमर्श में पूरा पाकिस्तान एक इकाई है। और सारा पाकिस्तान भारत का दुश्मन है। लेकिन इस विमर्श में यह कोई नहीं बताता कि आखिर इस दुश्मन से कैसे निपटा जा सकता है? मीडिया और सियासतदां की जुबानी जंग को क्या असली जंग में बदला जा सकता है? क्या भारत सचमुच पाकिस्तान के परमाणु हथियारों की अनदेखी कर पाकिस्तान से युद्ध का जोखिम मोल ले सकता है? या भारत के पास इस जटिल स्थिति से निकलने का कोई और भी विकल्प है?
अगर हम पिछले दो दशकों के विकासक्रम को समझने और मीडिया के मार्केट नैरेटिव (दर्शक या पाठक बढ़ाने की बाजार रणनीति) से निकल कर आगे देखने की क्षमता रखते हों, तो दूसरे विकल्प जरूर नजर आ सकते हैं। पाकिस्तान की बुनियाद और पहचान भले भारत विरोध के आधार पर खड़ी हुई हो, लेकिन पाकिस्तान की आज पीढ़ी ऐसी एकरूप सोच से नहीं चलती है। वहां चलने वाली बहस देश के भीतर देश के बुनियादी मुद्दों पर तेज होते अंतर्विरोधों की झलक देते हैं। जरूरत इस बारीकी को समझने की है। लेकिन भारत में इस समझ का साफ अभाव नजर आता है।
सवाल यह है कि आखिर हम चाहते हैं क्या हैं? हमारा लक्ष्य पाकिस्तान को नष्ट करना या उसकी परेशानियों पर खुश होना है, या हम शांति और प्रगति की ऐसी परिस्थितियां बनाना चाहते हैं, जिसमें पूरा दक्षिण एशिया और प्रकारातंर में पूरी दुनिया मानव विकास एवं स्वतंत्रता के उच्चतर स्तर हासिल कर सके? अगर हमारा लक्ष्य दूसरा है तो हमें पाकिस्तान के हालात को बारीकी से समझना चाहिए। वहां कट्टरपंथ और सिविल सोसायटी के बीच के अंतर्विरोधों को समझना चाहिए। वहां के सत्ता ढांचे के अंतर्विरोधों पर गौर करना चाहिए। और इनके बीच हमें ऐसी नीतियां अपनानी चाहिए, जिससे वहां प्रगति और स्थिरता की ताकतों को बल मिले।
अगर पाकिस्तान ने मुंबई हमले की शुरुआती जांच गंभीरता से की तो इसके पीछे मंसूबे तलाशने के बजाय उसे खुले दिल से हमें स्वीकार करना चाहिए। अगर इससे पाकिस्तन सरकार के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर सहयोग का कोई रास्ता निकलता है, तो उस पर चलने से भारत सरकार को नहीं हिचकना चाहिए। कट्टरपंथ और आतंकवाद दो ऐसे खतरे हैं, जिनके खिलाफ एकजुटता की आज बेहद जरूरत है। लेकिन यह एकजुटता दोमुंहेपन के साथ नहीं बन सकती। स्वात घाटी के तालिबान और भारत की राम, बजरंग और शिवसेनाओं के प्रति रुख में फर्क के साथ ये लड़ाई नहीं लड़ी जा सकती। पाकिस्तान के राष्ट्रपति अगर आज देश पर तालिबान के कब्जे का अंदेशा जताते हैं, तो हमें इस खतरे से भी आगाह रहना चाहिए कि कभी भारत में भी संघ परिवार के कब्जे का खतरा पैदा हो सकता है।
दरअसल, आतंकवाद से संघर्ष में जितनी भूमिका सुरक्षा और खुफिया तंत्र की है, उससे कहीं ज्यादा विचारों और राजनीतिक नीतियों की है। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि राजनीतिक दलों को इस लड़ाई में जैसा नेतृत्व देना चाहिए, वो नहीं दे रहे हैं। बल्कि उन्होंने आतंकवाद पर सारे विमर्श को संकीर्ण दायरे में समेट दिया है। यही भूमिका मीडिया भी निभा रहा है। पाकिस्तान को दैत्य के रूप में पेश करना और उसमें अंतर्निहित सांप्रदायिक मनोभावों का शोषण कर फायदा उठाना एक आसान रास्ता बना हुआ है। लेकिन यह रास्ता हमें अपने लक्ष्यों की तरफ नहीं ले जाता है। इसीलिए भारत को आज अपने पाकिस्तान विमर्श पर अनिवार्य रूप से पुनर्विचार करना चाहिए।
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