Saturday, May 30, 2009

जनादेश और कांग्रेस की समझ


सत्येंद्र रंजन
कांग्रेस ने २००९ के जनादेश का मतलब किस रूप में समझा है, इसका कुछ अंदाजा मनमोहन सिंह की नई मंत्रिपरिषद को देख कर लगता है। मंत्रिपरिषद में कांग्रेस की राजनीतिक जरूरतों का ख्याल जरूर रखा गया है, लेकिन कुल मिला कर इस पर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सोच और शैली की छाप है। सभ्रांत वर्ग की ‘काम’, ‘गुणवत्ता’ और ‘योग्यता’ की धारणाएं मंत्रियों के चयन में संभवतः सबसे निर्णायक पहलू रही हैं। नौकरशाही से आए, या विदेशों में पढ़े-लिखे, नफ़ासत पसंद, विशेष हित समूहों के नुमाइंदे और अभिजात्य छवि वाली शख्सियतें नई मंत्रिपरिषद में सबसे ज्यादा नजर आती हैं। जबकि देसी, ग्रामीण और आदिवासी जैसी जीवन शैलियों की झलक इसमें ढूंढने पर ही शायद कहीं नजर आ पाए।

कर्नाटक और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में, जहां कांग्रेस की हार हुई, उन्हें अनुपात से अधिक प्रतिनिधित्व और आंध्र प्रदेश तथा उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों को, जिनकी वजह से कांग्रेस की जीत इतनी बड़ी नजर आती है, कम नुमाइंदगी मिलना, सियासी कसौटियों पर समझ पाना मुश्किल है। यही बात मुसलमानों और दूसरे वंचित तबकों को मिली नुमाइंदगी पर भी लागू होती है। बहरहाल, आम तौर पर कही जाने वाली इस बात को अगर मान लिया जाए कि मंत्रिमंडल का गठन प्रधानमंत्री का विशेषाधिकार है, तब भी चुने गए चेहरों से सत्ताधारी दल की सोच और मंसूबों का अनुमान जरूर लगाया जा सकता है।

सबसे ज्यादा हैरत सहयोगी दलों के प्रति कांग्रेस के नजरिए को देखकर होती है। स्पष्ट है कि धर्मनिरपेक्ष शक्तियों की एकता का नारा कांग्रेस ने झटके से छोड़ दिया। सहयोगी दलों के प्रति उसका नजरिया उन्हें नजरअंदाज करने से लेकर उन्हें अपमानित करने तक का नजर आता है। लोकसभा में अपनी सीटों की संख्या २०० से ऊपर जाते ही कांग्रेस नेताओं ने यह फ़ॉर्मूला पेश कर दिया कि नई सरकार में सिर्फ कांग्रेस से चुनाव पूर्व सहयोगी दलों को ही शामिल किया जाएगा। इसके बावजूद झारखंड मुक्ति मोर्चा और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट को शामिल नहीं किया गया है। क्या इसलिए कि उनके नेताओं में वैसी सभ्रांतता नहीं है, जिसकी प्रधानमंत्री अपेक्षा रखते हैं?

चुनाव नतीजे आने से पहले तक कांग्रेस नेता सार्वजनिक तौर पर कहते थे कि राष्ट्रीय जनता दल यूपीए में है, भले उससे इस बार चुनाव पूर्व गठबंधन नहीं हुआ हो। तब उन्हें अंदाजा था कि नतीजे ऐसे आएंगे कि बहुमत जुटाने के लिए एक-एक सीट की मारामारी होगी। इसलिए तब धर्मनिरपेक्षता के नाम पर वे सभी संभावित सहयोगियों को खुश रखने की कोशिश में थे। लेकिन यूपीए की सीटों की संख्या २६० के पार जाते ही यह नजरिया बदल गया। इससे कांग्रेस पर लगने वाला यह आरोप गहरा ही हुआ है कि उसके लिए गठबंधन सिर्फ एक मजबूरी है। यह देश में उभर रही नई राजनीतिक परिस्थितियों की समझ के आधार पर धर्मनिरपेक्ष और प्रगतिशील धारा को मजबूत करने की किसी निष्ठा का यह परिणाम नहीं है।

चुनाव परिणाम के सारे आंकड़े आ जाने के बाद अब यह साफ है कि क्षेत्रीय दलों के वोट हिस्से में कोई गिरावट नहीं आई है। बल्कि कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के साझा वोटों में १.३ फीसदी की गिरावट आई है। ये दोनों पार्टियां राजनीतिक प्रतिस्पर्धा को अपने बीच समेट कर दो दलीय व्यवस्था कायम करने का सपना देखती हैं। ताजा चुनाव परिणामों से सरसरी पर तौर पर ऐसा आभास हुआ कि देश की राज्य-व्यवस्था उस दिशा में बढी है, लेकिन चुनावी आंकड़ों से जाहिर होता है कि हकीकत ऐसी नहीं है। ऐसे में गठबंधन और संभावित सहयोगियों की अनदेखी अल्पदृष्टि ही हो सकती है।

कांग्रेस के प्रवक्ताओं के मुताबिक नई मंत्रिपरिषद का गठन निरंतरता और स्थिरता की नीति को अपनाते हुए किया गया है। लेकिन यह निरंतरता उन मंत्रालयों में ज्यादा नजर आती है, जिनका वास्ता संभावित आर्थिक सुधारों और बड़े आर्थिक हितों से है। मसलन, राज्यसभा के सदस्य मुरली देवड़ा पेट्रोलियम मंत्रालय में लौट आए हैं। लेकिन ग्रामीण विकास जैसे मंत्रालय में इसकी जरूरत नहीं समझी गई, जबकि कभी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना को सरकारी धन की बर्बादी बताने वाला कॉरपोरेट मीडिया भी चुनाव नतीजों के आने के बाद से इसे कांग्रेस को मिली कामयाबी की एक बड़ी वजह बता रहा है। क्या रघुवंश प्रसाद सिंह को इस मंत्रालय में वापस लाना निरंतरता और स्थिरता की नीति का हिस्सा नहीं होता? आखिर इस योजना को मिली सीमित कामयाबी में इसके लिए सिंह के उत्साह की भी एक भूमिका थी। लेकिन सिंह आरजेडी के नेता हैं, जिसे चुनावी हार के बाद कांग्रेस नेता उसकी हैसियत बताना चाहते हैं, तो उस मंत्रालय में अब एक नया चेहरा है।

लोकसभा चुनाव के नतीजों के विश्लेषण से यह साफ है कि यूपीए को सकारात्मक समर्थन जरूर मिला, लेकिन उसकी जीत कुछ दूसरी वजहों से भी संभव हुई। मसलन, आंध्र प्रदेश में चिरंजीवी की प्रजा राज्यम पार्टी के १५.७ फीसदी वोट हासिल कर लेने से कांग्रेस की राह आसान हुई, तो तमिलनाडु में विजयकांत की डीएमडीके ने डीएमके नेतृत्व वाले मोर्चे से नाराज बहुत से लोगों को अपनी तरफ खींच कर उसे बचा लिया। उत्तर प्रदेश ने हैरतअंगेज नतीजे दिए, जिसकी किसी को अपेक्षा नहीं थी। अगर इन तीन राज्यों से अप्रत्याशित नतीजे नहीं आए होते तो कांग्रेस संभवतः गठबंधन धर्म की अलग व्याख्या करती सुनी जाती। यह बात यूपीए की जीत की अहमियत कम करके बताने की नहीं कही जा रही है। यह सिर्फ इस बात पर जोर देने के लिए है कि देश की राजनीतिक हकीकत बहुत नहीं बदली है, इसलिए गठबंधन की राजनीति का जीवनकाल लंबा है। इस बात की उपेक्षा कर कांग्रेस सिर्फ अपनी नासमझी का परिचय दे रही है। छोटे और क्षेत्रीय दलों के प्रति उसका मौजूदा नजरिया एक बार फिर से गैर-कांग्रेसवाद की परिघटना को बल प्रदान कर सकता है, जिसका आकर्षण पिछले पांच से सात साल में काफी घट गया है।

देश के लाखों मतदाताओं के लिए कांग्रेस की सबसे बड़ी प्रासंगिकता यही है कि संघ परिवार के सांप्रदायिक फासीवाद के खिलाफ वह एक ताकत है। भाजपा की लोकप्रियता में स्पष्ट गिरावट के बावजूद आज भी यह बात पूरे भरोसे के साथ नहीं कही जा सकती कि सांप्रदायिक ताकतें फिर से सिर नहीं उठा सकेंगी। लाखों की मतदाताओं की इस चिंता का लाभ भी हाल के चुनाव में कांग्रेस को मिला। लेकिन उन मतदाताओं की चिंता का कांग्रेस ख्याल और सम्मान कर रही है, चुनाव बाद की घटनाओं को देखते हुए ऐसा कहना मुश्किल लगता है।

1 comment:

neeraj badhwar said...

सही कहा सत्येंद्र जी। बदलाव चुनावी नतीजों में आया है राजनीतिक चरित्र में नहीं।