Wednesday, March 17, 2010

अमेरिकापरस्ती का राजनीतिक आधार

सत्येंद्र रंजन

म आदमी का मुखौटा ओढ़ कर कोई राजनीतिक व्यवस्था किस हद तक आम आदमी के हितों के खिलाफ जा सकती है, इसकी एक बेहतरीन मिसाल प्रस्तावित Civil Liability for Nuclear Damages Bill (परमाणु क्षति की नागरिक देनदारी- या परमाणु क्षतिपूर्ति बिल) है। हालांकि यह २००८ में हुए भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु सहयोग समझौते का ही एक परिणाम है, इसके बावजूद इस विधेयक के निहितार्थों को ठीक ढंग से समझने और इसके संभावित परिणामों पर विचार करने की जरूरत है।

सरकार इस बिल को पास करवा कर जो कानून बनाना चाहती है, उसका मकसद भारत में परमाणु रिएक्टर लगाने वाली विदेशी कंपनियों को भविष्य के किसी हादसे की जिम्मेदारी से पूरी तरह मुक्त करना है। २००८ में अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी से भारत के परमाणु कार्यक्रम के असैनिक हिस्से को मंजूरी मिलने और विभिन्न देशों को भारत के साथ परमाणु ऊर्जा संबंधी कारोबार की छूट मिलने के बाद से फ्रांस, रूस आदि जैसे देशों ने भारत में परमाणु रिएक्टर लगाने के करार किए हैं। अरबों डॉलर के इस बाजार में अपना हिस्सा पाने की होड़ में अमेरिकी कंपनियां भी हैं। लेकिन ये कंपनियां भारत आने के पहले यह सुनिश्चित कर लेना चाहती हैं कि अगर भविष्य में कोई दुर्घटना हुई तो इसके लिए उन पर उतनी नकेल भी नहीं कसेगी, जितनी दिसंबर १९८४ के भोपाल हादसे के बाद यूनियन कारबाइड कंपनी पर कसी थी।

अगर भारत में एक स्वाभिमानी और देश के आम जन के हितों का ख्याल रखने वाली सरकार होती, तो वह अमेरिकी कंपनियों की इस गैर कानूनी और अनैतिक मांग को ठुकरा देती। वैसे भी अब भारत को उन कंपनियों की जरूरत नहीं है, क्योंकि अगर वे भारत नहीं आती हैं, तो इसमें उनका ही नुकसान है, जबकि फ्रांस और रूस जैसे देशों की कंपनियों द्वारा लगाए जा रहे रिएक्टरों से भारत अपनी कथित ऊर्जा जरूरतों को पूरा कर सकता है। अगर इसके लिए और भी रिएक्टरों की जरूरत हो, तो इसके लिए भी ठेका यहां आने को आतुर उन देश की कंपनियों को दिया जा सकता है। मगर मनमोहन सिंह सरकार अमेरिका को नाखुश करने का जोखिम नहीं उठा सकती। इसके लिए वह अपने देश की जनता के हितों अनदेखी करने को जरूर तैयार है।

अब इस बात को शायद ज्यादा बेहतर ढंग से समझा जा सकता है कि भारत-अमेरिका परमाणु सहयोग समझौते का अकेला मकसद भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करना और परमाणु क्षेत्र में भारत के अलगाव को खत्म करना नहीं था। यह विदेश नीति संबंधी एक पूरी सोच का परिणाम था, जिसका असली उद्देश्य भारत को अमेरिकी धुरी के साथ जोड़ना है। वामपंथी दलों ने जब अमेरिका से परमाणु समझौते के मुद्दे पर यूपीए-१ सरकार से समर्थन वापस लिया, तो समझौते के इस पहलू को राष्ट्रीय विमर्श में नजरअंदाज किया गया। आज Civil Liability for Nuclear Damages Bill के संदर्भ में यह बात साफ हो जाती है कि वह बिल्कुल एक ऐसा मुद्दा था, जिस पर मनमोहन सिंह सरकार गिराई जानी चाहिए थी। लेकिन तब क्षेत्रीय दलों और खासकर समाजवादी पार्टी ने यूपीए सरकार बचाकर इस सरकार की धुर दक्षिणपंथी विदेश नीति को संसदीय समर्थन दे दिया। इसलिए अगर आज मनमोहन सिंह सरकार Civil Liability for Nuclear Damages Bill संसद में लाने की तैयारी में है, तो इसके लिए जितनी जिम्मेदार कांग्रेस पार्टी है, उतनी ही वे सभी दल हैं, जिन्होंने जुलाई २००८ में इस सरकार को बचाने में भूमिका निभाई थी।

पूर्व अटार्नी जनरल सोली जे सोराबजी की इस विधेयक के बारे में कहा है- “संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत परमाणु क्षतिपूर्ति की सीमा तय करने को न्यायोचित नहीं ठहराया जा सकता। ऐसी कोई भी कोशिश सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का उल्लंघन होगी और यह भारत की जनता एवं संविधान के अनुच्छेद २१ के तहत उनके मूल अधिकारों के खिलाफ होगी।” सोली सोराबजी किसी लेफ्ट विचारधारा के समर्थक नहीं हैं। वे भारत की अब तक की सबसे दक्षिणपंथी और सांप्रदायिक सरकार के अटार्नी जनरल रहे हैं। उस सरकार के, जिसने भारतीय विदेश नीति को अमेरिका के करीब ले जाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई थी। अगर वे भी मनमोहन सिंह सरकार की अमेरिकापरस्त एक पहल को आज भारतीय नागरिकों के मूल अधिकारों के खिलाफ बता रहे हैं, तो इस विधेयक के निहितार्थों को समझा जा सकता है।

बात आगे बढ़ाने से पहले यह देख लेना उचित होगा कि आखिर यह विधेयक है क्या।
• सरकार इस विधेयक के जरिए भारत में परमाणु रिएक्टर लगाने वाली विदेशी कंपनियों को भविष्य के किसी हादसे की जिम्मेदारी से मुक्त करने जा रही है।
• अगर भविष्य में कोई हादसा हुआ तो रिएक्टर की संचालक कंपनी को अधिकतम ५०० करोड़ रुपए का मुआवजा देना होगा। संचालक कंपनी न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एसपीसीआईएल) होगी, जो सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनी है।
• अधिकतम मुआवजा २,०८७ करोड़ रुपए का होगा, जिसमें ऑपरेटर कंपनी पांच सौ करोड़ रुपए देगी और बाकी रकम भारत सरकार देगी।
• यानी प्रकारांतर में विदेशी कंपनी की चूक या उसके पुर्जों में खराबी की पूरी भरपाई भारत के करादाताओं को करनी होगी।
• बहरहाल, इससे भी आपत्तिजनक प्रावधान विदेशी कंपनी को तमाम आपराधिक दायित्वों के मुक्त कर देना है। विधेयक के प्रावधान के मुताबिक हादसे से पीड़ित लोग विदेशी कंपनी पर न तो उसके देश में मुकदमा कर सकेंगे और ना ही भारतीय अदालतों में। मुकदमे का अधिकार सिर्फ रिएक्टर के ऑपरेटर यानी न्यूक्लीयर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड को होगा। एनपीसीआईएल भी सिर्फ तभी मुकदमा कर सकेगी, जब संबंधित कंपनी से हुए करार में इसका प्रावधान लिखित रूप से मौजूद होगा और दुर्घटना सप्लायर कंपनी की सामग्री, उपकरण या सेवा या उसके कर्मचारी द्वारा जानबूझ कर किए गए किसी कार्य या पूरी तहर अनदेखी के परिणामस्वरूप घटित होगी।
• इस विधेयक में भारतीय न्याय व्यवस्था को भी एक तरह से पंगु बना देने का एक प्रावधान है। बिल के मुताबिक परमाणु क्षतिपूर्ति के सभी सभी दावों का निपटारा दावा आयुक्त या परमाणु क्षति दावा आयोग करेगा, जिसका फैसला अंतिम होगा, जिसे किसी कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकेगी।
• बिल में यह प्रावधान भी कर दिया गया है कि मुआवजे का कोई दावा हादसे के दस साल बाद नहीं किया जा सकेगा।
• अगर हादसा प्राकृतिक आपदा या आतंकवादी कार्रवाई जैसी वजहों से हुआ तो इसमें विदेशी कंपनी की कोई देनदारी नहीं होगी।

गौरतलब है कि ऐसा कानून बनाने के लिए भारत किसी अंतरराष्ट्रीय संधि के तहत बाध्य नहीं है। बल्कि टीकाकारों ने तो इस तरफ ध्यान दिलाया है कि यह कानून परमाणु दुर्घटना संबंधी अंतरराष्ट्रीय मानदंडों को कमजोर कर देगा। इसके तहत परमाणु हादसे की गंभीरता और खतरे को बेहद हलका किया जा रहा है। सरकार की दलील है कि भारत को ऐसे हादसों के संदर्भ में हो रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था- पूरक क्षतिपूर्ति के लिए अंतरराष्ट्रीय संधि (Convention on Supplementary Compansation) - का हिस्सा बनना होगा। इसके लिए देश के अंदर जरूरी कानूनी व्यवस्था करने के लिए प्रस्तावित कानून बनाया जा रहा है। लेकिन यह दलील खोखली है क्योंकि उस संधि पर अभी तक सिर्फ १३ देशों ने दस्तखत किए हैं और उनमें से भी चार देशों ने ही इसका अनुमोदन किया है। संधि के प्रावधान के मुताबिक जब तक न्यूनतम चार लाख मेगावाट परमाणु क्षमता वाले पांच देश इसका अनुमोदन नहीं कर देते, यह संधि अमल में नहीं आएगी। जाहिर है, यह संधि अभी अमल में नहीं है। तो सवाल यह है कि आखिर भारत सरकार को किस बात की जल्दबाजी है?

जल्दबाजी इसलिए है क्योंकि असैनिक परमाणु सहयोग का समझौता करते वक्त भारत सरकार ने अमेरिका से वादा किया था कि वहां की कंपनियों से दस हजार मेगावाट बिजली पैदा करने लायक रिएक्टर खरीदे जाएंगे। मनमोहन सिंह को यह वादा निभाना है, लेकिन अमेरिकी कंपनियां तभी भारत आएंगी, जब सरकार अपनी जनता के दीर्घकालिक हितों की बलि चढ़ाते हुए यह कानून बना दे।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि भविष्य में आखिर कोई हादसा कितना बड़ा होगा, इसका अंदाजा अभी से कैसे लगाया जा सकता है? और अगर यह अंदाजा अभी से नहीं लगाया जा सकता, तो उसके मुआवजे की रकम पहले से कैसे तय की जा सकती है? परमाणु हादसे किसी छत के गिर जाने जैसी घटना नहीं होते, जिनमें कुछ ही लोगों के हताहत होने का अंदेशा रहता हो। इन हादसों के बाद फैलने वाली विकरण या रेडियोएक्टिविटी दूर तक जाती है और हजारों या लाखों लोग उसकी चपेट में आते हैं। पूर्व सोवियत संघ के यूक्रेन में हुआ चेर्नोबिल का हादसा और उससे हुई तबाही आज तक याद है। परमाणु रेडियोएक्टिविटी की चपेट में आने वाले लोगों के डीएनए में बदलाव आ जाता है और उसका असर कई बार लंबे समय बाद जाकर जाहिर होता है। हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम गिराए जाने के बाद ६५ साल गुजर चुके हैं। मगर आज भी वहां जन्म बच्चों में जीन संबंधी गड़बड़ियां देखी जाती हैं। ऐसे में मुआवजे का दावा करने के लिए दस साल की समयसीमा भी कैसे तय की जा सकती है?

दरअसल, किसी हादसे के नतीजों को सिर्फ आर्थिक कसौटी पर नहीं कसा जा सकता। किसी की जान जाने के बदले में महज मुआवजा दे देना न्याय के किसी भी मान्य सिद्धांत के तहत उचित एवं स्वीकार्य नहीं है। अगर कोई दोषी है, तो उसकी आपराधिक जिम्मेदारी भी बनती है। किसी कंपनी को पहले से ऐसी जिम्मेदारी से मुक्त कर देना क्या उसकी लापरवाही को आमंत्रित करना नहीं है? हैरत इस बात की है कि ऐसी बात उस देश में सोची जा रही है, जो दुनिया के सबसे मारक औद्योगिक हादसे यानी भोपाल गैस लीक कांड का शिकार रहा है। उस हादसे के जिम्मेदार यूनियन कारबाइड के अधिकारियों को भी आज तक सज़ा नहीं दिलाई जा सकी है, लेकिन कम से कम सिद्धांततः उनके खिलाफ अपराध दर्ज हैं और इसकी कानूनी लड़ाई जारी है। मगर भविष्य में भोपाल गैस लीक कांड से भी बड़े किसी परमाणु हादसे की जिम्मेदार कंपनी पर आपराधिक मामले की कानूनी व्यवस्था ही न रहे, यह कैसा अन्याय है, यह समझा जा सकता है।

बिल के आलोचकों ने इस ओर ध्यान खींचा है कि अमेरिका में प्राइस-एंडरसन कानून के तहत परमाणु हादसे की स्थितियों में परमाणु रिएक्टरों की संचालक कंपनियों की जो देनदारी तय की गई है, वह भारत में तय की जा रही देनदारी से २३ गुना ज्यादा है। तो सवाल जायज है कि क्या भारतीय जान की कीमत अमेरिकी जान से २३ गुना सस्ती है?
ऐसे ही प्रस्तावित प्रावधानों की वजह से इस बिल को लेकर देश एक बड़े हिस्से में गुस्सा भड़का है और इसी कारण सरकार को लोकसभा में विधेयक पेश करने के लिए तय समय से ठीक पहले अपना इरादा बदलना पड़ा। भाजपा और वामपंथी दलों ने बिल पेश होने के समय ही मत-विभाजन पर जोर डालने का नोटिस दे दिया था। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल महिला आरक्षण बिल को लेकर भड़के हुए थे, इसलिए सरकार को उनका साथ मिलने का भरोसा नहीं था। साथ ही ममता बनर्जी ने भी विधेयक के कुछ प्रावधानों पर एतराज जता दिया था। नतीजतन, विधेयक के गिर जाने की आशंका मजबूत हो गई थी और ऐसे में विधेयक को फिलहाल पेश न करने में ही सरकार को अपनी भलाई दिखी।

लेकिन यह भ्रम किसी को नहीं होना चाहिए कि विधेयक के हो रहे विरोध की वजह से सरकार ने लोकतांत्रिक नजरिया अपनाया और जनमत का सम्मान करते हुए इसे पेश नहीं किया। विरोध की बात सरकार को पहले से मालूम थी। अखबारों में छपी खबरों के मुताबिक खुद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने विपक्ष की नेता सुषमा स्वराज और माकपा नेता सीताराम येचुरी से फोन पर बात की और यह जानने की कोशिश की थी कि क्या इन दलों के रुख में बदलाव संभव है। दोनों नेताओं ने इस संभावना से इनकार किया था और बिल पेश होने के समय ही विरोध का इरादा जता दिया था। इसके बावजूद बिल को लोकसभा में पेश करने के लिए लिस्ट किया गया। मनमोहन सिंह अप्रैल में अमेरिका जा रहे हैं। वे वहां राष्ट्रपति बराक ओबामा को इस नए कानून का उपहार देना चाहते थे। शायद अब वे ऐसा नहीं कर पाएं, लेकिन देर-सबेर संसदीय तिकड़मों से बिल पास कराने की कोशिश उनकी सरकार जरूर करेगी, इसमें कोई संदेह नहीं है। जुलाई २००८ में मनमोहन सिंह ने धन बल और प्रशासनिक ताकत के दुरुपयोग से अपनी सरकार बचा कर अमेरिका से परमाणु करार का रास्ता साफ किया था। भारत अमेरिकी धुरी के साथ रहे, उनकी इस राय में आज भी कोई बदलाव नहीं आया है। इसलिए यह विधेयक उनकी सरकार की प्राथमिकता बना रहेगा, यह बात हम सबके दिमाग में साफ रहनी चाहिए।

बहराहल, मुश्किल सिर्फ यह नहीं है कि मनमोहन सिंह अमेरिकापरस्त हैं और कांग्रेस पार्टी उनके इस रुझान से सहमत है। मुश्किल यह है कि यूपीए-२ सरकार जिन आर्थिक और विदेश नीतियों पर चल रही है, सत्ता के मौजूदा समीकरणों के बीच उनके लिए समर्थन का मजबूत आधार है। नरसिंह राव सरकार में वित्त मंत्री रहते हुए डॉ. सिंह ने नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों पर खुलकर अमल शुरू किया था। वे नीतियां आज देश की मुख्यधारा हैं। सरकार चाहे किसी पार्टी की बने, वह उन्हीं नीतियों पर चलती है। नव-उदारवाद की नीति स्वाभाविक रूप से विदेश नीति को अमेरिकी साम्राज्यवाद से जोड़ देती है। भाजपा नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के शासनकाल में इन नीतियों पर कहीं ज्यादा तेज रफ्तार से अमल हुआ था। साथ ही एनडीए सरकार ने बहुसंख्यक वर्चस्व की सांप्रदायिक नीतियों को अपनाया, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान पले-बढ़े भारत के उस विचार के लिए गंभीर खतरे पैदा हुए, जिसका आधार सबको समाहित कर चलना और सबके लिए न्याय की व्यवस्था है। इसीलिए २००४ में कांग्रेस वैसे बहुत से लोगों की पसंद बनी, जो उसकी आर्थिक नीतियों का विरोध करते रहे हैं।

२००४ के आम चुनाव में जनादेश का जो स्वरूप आया, उसकी वजह से यूपीए-१ सरकार की वामपंथी दलों के समर्थन पर निर्भरता बनी। इस मजबूरी की वजह से नव-उदारवाद के रास्ते पर वह सरकार एक्सप्रेस गति से नहीं चल सकी। मगर जब विदेश नीति में अमेरिका से जुड़ने के मुद्दे पर आर या पार का सवाल आया तो यूपीए सरकार और कांग्रेस पार्टी ने सरकार गिरने का जोखिम उठाना ज्यादा पसंद किया। इस कोशिश में उसे उन दलों का भी समर्थन मिला, जिनसे अपेक्षाकृत अधिक जनपक्षीय नीति अपनाने की उम्मीद की जाती है।

उनमें से कई दल आज भी कांग्रेस नेतृत्व वाले गठबंधन का हिस्सा हैं। मुख्य विपक्षी दल भाजपा ने राजनीतिक कारणों से भारत-अमेरिका परमाणु करार का विरोध जरूर किया था और आज इसी वजह से परमाणु क्षतिपूर्ति बिल का भी विरोध कर रही है, मगर वह बार-बार यह सफाई देती भी नजर आती है कि वह अमेरिका-विरोधी नहीं है। साफ है कि भाजपा का विरोध साम्राज्यवाद के बरक्स राष्ट्रवाद की किसी समझ या आर्थिक नीतियों की तार्किक परिणति के रूप में विदेश नीति के रुझानों को लेकर नहीं है। वामपंथी दल २००९ के आम चुनाव में हार के बाद इतने कमजोर हो चुके हैं कि उनका विरोध सरकार की नीतियों में कोई बदलाव लाने में सक्षम नहीं है।

परमाणु क्षतिपूर्ति विधेयक पर विचार इस पूरे संदर्भ को ध्यान में रखते हुए किया जाना चाहिए। संसदीय समीकरणों की वजह से अगर यह विधेयक कुछ समय तक टलता रहता है, तब भी यह किसी बड़े संतोष की बात नहीं है। असली सवाल यह है कि क्या देश में कोई ऐसी राजनीतिक ताकत उभर सकती है, या कोई ऐसा राजनीतिक गठबंधन हो सकता है, जो मनमोहन सिंह सरकार की नव-उदारवादी आर्थिक नीति एवं अमेरिकापरस्त विदेश नीति का विकल्प पेश कर सके? जब तक ऐसा नहीं होता है, सरकारी नीतियों में उत्तरोत्तर दक्षिणपंथी रुझान जारी रहेगा और राजनीतिक व्यवस्था लगातार ज्यादा जन विरोधी होती जाएगी। आखिरकार इन नीतियों का मतलब यही होता है कि अधिकांश लोगों की कीमत पर कुछ लोगों की सुख-सुविधा का ख्याल किया जाए। देश के प्रभु वर्ग की ऊर्जा की जरूरतें अगर पूरी होती हों और साम्राज्यवाद का हिस्सा बनने से इस तबके में अपनी भौतिक सुरक्षा का अहसास मजबूत होता हो, तो आखिर इस बात चिंता क्यों की जाए कि कभी किसी हादसे की वजह से देश के हजारों लोग रेडियोएक्टिविटी का शिकार हो सकते हैं?

तो मुद्दा सिर्फ प्रस्तावित कानून नहीं है। सवाल नीतियों के उस ढांचे का है, जिस पर मौजूदा सरकार चल रही है, और जिसमें अन्य बहुत से संसदीय राजनीतिक दलों की आस्था है। अगर ये नीतियां चलती रहीं, तो फिर जनता के हित और देश के स्वाभिमान की बात सोचना बेमतलब है।

3 comments:

Suman said...

nice

Suman said...

mo. 09450195427 per bat karay.

Shobharam said...

very nice and informative. itne pechida subject ko apne bahut saral tareeke se samjhaya hai- tarkon ke sath. excellent

thanx