Saturday, June 6, 2009

विनिवेश से बचिए


सत्येंद्र रंजन
नमोहन सिंह सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान यूपीए और वामपंथी मोर्चे के बीच पहला टकराव जुलाई २००५ में हुआ। मुद्दा भेल (भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड) में विनिवेश का था। वामपंथी दलों ने इस सवाल पर यूपीए-लेफ्ट समन्वय समिति का बहिष्कार कर दिया। तब वामपंथी दलों के समर्थन पर टिकी सरकार झुक गई और भेल में विनिवेश का प्रस्ताव वापस ले लिया गया। इतना ही नहीं, सरकार ने यह भी भरोसा दिया कि सार्वजनिक क्षेत्र के नवरत्न कहे जाने वाले कारखानों में विनिवेश नहीं होगा।

२००४ में जब यूपीए सत्ता में आया और वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन देने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम की शर्त रखी तो उसमें यह बात बेलाग ढंग से कही गई थी कि यूपीए सरकार की प्राथमिकता विनिवेश नहीं, बल्कि निवेश होगी। सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के पुनरुद्धार और उन्हें एक बार फिर से अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाने की बात कही गई। लेकिन बाद में जाहिर हुआ कि मनमोहन सिंह सरकार का झुकाव १९९० के दशक में प्रचलित हुए इस विचार की तरफ ही है कि सरकार की आर्थिक क्षेत्र में कम से कम भूमिका होनी चाहिए। इसके बावजूद वामपंथी दलों के समर्थन पर निर्भरता की वजह से उसके कदम बंधे रहे।

२००९ के चुनाव परिणामों ने यूपीए सरकार की यह निर्भरता खत्म कर दी है। तो अब विनिवेश की चर्चा लौट आई है। मीडिया ने सरकार के सामने आर्थिक सुधारों का कॉरपोरेट जगत का एजेंडा पेश कर दिया है। सरकार इस दिशा में कितना और कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी, अभी यह औपचारिक तौर पर साफ नहीं किया गया है। लेकिन मीडिया की चर्चाओं पर भरोसा करें तो एक व्यापक विनिवेश नीति तैयार करने पर काम शुरू हो गया है।

विनिवेश के समर्थन में कई दलीलें हैं। बताया गया है कि अभी केंद्र सरकार के तहत २१४ सक्रिय सार्वजनिक प्रतिष्ठान (पीएसयू) हैं। इनमें १६० मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि ५४ बीमार हैं। लेकिन मुनाफा कमा रहे प्रतिष्ठानों के बीच सिर्फ ९९ ऐसे हैं, जिन्हें अगर बेचा जाए तो मुनाफा होगा, जबकि ६१ कारखानों का नेट वर्थ (कुल कीमत) मुनाफा कमाने के बावजूद निगेटिव है। यानी उनमें जितना निवेश हुआ है, आज बाजार में उनकी कीमत उससे कम है। विनिवेश के समर्थक कहते हैं कि जो कंपनियां फायदे में हैं, उनके विस्तार के लिए भी पूंजी की जरूरत है, ताकि वो आगे की प्रतिस्पर्धा में टिक पाएं और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सरकार को उन पर अपने बजट से खर्च न करना पड़े। एक दलील यह भी है कि कई सार्वजनिक कारखानों के पास अपने कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने के लिए पैसा नहीं है। अगर कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़नी है, तो इसके लिए पैसा कंपनी में सरकारी निवेश के एक हिस्से को बेच कर ही जुटाया जा सकता है।

तो क्या मनमोहन सिंह सरकार इन दलीलों को वजन देगी और खुल कर विनिवेश के रास्ते पर चल पड़ेगी? आखिर सरकार के सामने अब कोई पहले जैसी ‘अड़चन’ नहीं है। मनमोहन सिंह को भारत में उदारीकरण को एक विचार के रूप में स्थापित करने और व्यवहार में उस पर अमल करने का श्रेय दिया जाता है। गौरतलब है कि विनिवेश उदारीकरण के विचार का ही एक हिस्सा रहा है। बहरहाल, १९९० के दशक में भारत में जिन आर्थिक विचारों को उदारीकरण के नाम से लागू किया गया, आर्थिक सिद्धांतों के तहत उन्हें नव-उदारवाद की श्रेणी में रखा जाता है। नव-उदारवाद का यह अहम पहलू रहा है कि सरकार की आर्थिक क्षेत्र में न्यूनतम भूमिका होनी चाहिए।

भारत में ये विचार भले १९९० के दशक प्रचलित हुए, लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में १९८० के दशक में इन पर तेजी से अमल शुरू हो चुका था। अमेरिका में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने कहा था कि सरकार किसी समस्या का हल नहीं, बल्कि खुद में एक समस्या है। इन विचारों का असर इतना व्यापक था कि डेमोक्रेट राष्ट्रपति होने के बावजूद बिल क्लिंटन ने १९९६ में यह कह दिया कि सरकार की बड़ी भूमिका का युग खत्म हो चुका है। उधर, ब्रिटेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों पर इतने व्यापक रूप से अमल किया कि उसका असर आज तक मौजूद है। १९९० के दशक में यही विचार और नीतियां भारत में भी प्रचलित हुईं।

बहरहाल, अब जबकि यूपीए सरकार दोबारा सत्ता में लौटी है, इन विचारों को खुद अमेरिका और यूरोप में तगड़ी चुनौती मिल रही है। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी को नव-उदारवाद का ही परिणाम माना गया है। यह माना गया है कि बेलगाम पूंजीवाद और वित्तीय व्यवस्थाएं अनिवार्य रूप से ऐसे संकट को जन्म देती हैं, जिनका परिणाम करोड़ों लोगों को रोजगार खोने और जीवन स्तर में गिरावट के रूप में भुगतना पड़ता है। बराक ओबामा प्रशासन अर्थव्यवस्था में सरकारी भूमिका बढ़ाने की नीति पर चल रहा है और ऐसे कई कदम गॉर्डन ब्राउन की ब्रिटिश सरकार भी उठा चुकी है। कुल मिलाकर दुनिया में आज माहौल अर्थव्यवस्था को विनियमित करने और सरकार की भूमिका बढ़ाने के पक्ष में है।

क्या भारत सरकार इस धारा से उलटी दिशा में चलेगी? क्या सार्वजनिक क्षेत्र को खत्म करने या उसकी भूमिका घटाने का सिद्धांत अब भी उसकी नीतियों का प्रेरक तत्व होगा? यहां इस बात पर ध्यान जरूर खींचा जाना चाहिए कि किसी कारखाने में घाटा या पैसे की कमी सिर्फ यह साबित करती है कि उसे कुशल प्रबंधन के तहत चलाया नहीं गया। यहां गौरतलब है कि आजादी के बाद भारत की नियोजित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र को विशेष भूमिका दी गई थी और देश के बुनियादी ढांचे के विकास में इस क्षेत्र की खास भूमिका रही। साथ ही न्याय एवं सबको समान आर्थिक अवसर देने के आम मकसद को पूरा करने में भी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों ने अहम किरदार निभाया।

उदारीकरण की नीतियों पर अमल करते समय इस भूमिका को भुला दिया गया। तब ध्यान सिर्फ इनमें से कुछ कंपनियों के घाटे में रहने या मुनाफा न कमाने की तरफ खींचा गया। साथ ही सरकार के राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए भी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में विनिवेश की नीति आगे बढ़ाई गई। ये नीतियां पूंजीपति तबकों को खूब रास आईं। उनके समर्थकों ने इनका खूब जयगान किया। लेकिन सवाल है कि क्या इससे देश के आर्थिक लक्ष्यों को पाने में कोई मदद मिली? या उदारीकरण की नीतियों से व्यवस्था में न्याय एवं सबके लिए समान अवसर का लक्ष्य और दूर हो गया?

नई यूपीए सरकार जब अपनी विनिवेश नीति तय करेगी तो उसे इन सवालों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए। विश्वव्यापी मंदी और भारत में उसके गंभीर असर के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार को पांच साल के लिए नया जनादेश मिला है। लेकिन शायद इसके पीछे कुछ भूमिका उसी ‘अड़चन’ की है, जिसकी वजह से वह कथित सुधारों के रास्ते पर तेजी से नहीं चल सकी। अब दुनिया के बदले माहौल में बिना ‘अड़चन’ के भी अगर नई सरकार वही सावधानी बरते, तो इसे शायद ज्यादा व्यावहारिक कदम माना जाएगा।

1 comment:

Suresh Chiplunkar said...

विनिवेश, फ़ालतू कर्मचारियों की छंटनी या प्रबन्धन हेतु प्रोफ़ेशनल्स की नियुक्ति… यही तीन रास्ते हैं जिनसे सार्वजनिक उपक्रमों को सफ़ेद हाथी बनने से रोका जा सकता है… अब वामपंथी नामक रोड़ा हट गया है तो कांग्रेस तेजी से आगे बढ़ेगी यह तय जानिये… भाई जनता ने "साम्प्रदायिकता" को हराया है उसे विनिवेश आदि से क्या मतलब? कांग्रेस अब अगले 5 साल तक बेकाबू घोड़े की तरह दौड़ती रहेगी… जय हो…