Wednesday, June 24, 2009

मीडिया से खफ़ा जन आंदोलन


सत्येंद्र रंजन
संजय संगवई के नर्मदा बचाओ आंदोलन के नेता थे। इस आंदोलन की वैचारिक और सांगठनिक पहचान बनाने में उनकी खास भूमिका रही है। सामाजिक कार्यकर्ता बनने के पहले वे पत्रकार भी रहे। दो साल पहले छोटी उम्र में उनका निधन हो गया। तब से उनके साथियों और उन्हें जानने वालों को उनकी कमी काफी खलती रही है। बहरहाल, उन्हें श्रद्धांजलि देने का यह एक उचित तरीका ही है कि जिन दो क्षेत्रों में वे सक्रिय रहे, उनके बीच संवाद बनाते हुए उन्हें याद किया जाए। ऐसी ही कोशिश भोपाल में हुई। जन आंदोलनों के कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मियों के बीच आपसी संबंध, तथा एक दूसरे से अपेक्षाओं और शिकायतों पर वहां खुल कर चर्चा हुई।

यह मुद्दा बेहद अहम है। मीडिया को लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। इसे लोकतंत्र का पहरेदार बताया जाता है। दूसरी तरफ जन आंदोलन हैं, जो लोकतंत्र की जड़ें गहरी बनाने में जुटे हुए हैं। वे उन तबकों की आवाज हैं, जिनकी हमारी व्यवस्था में पहले से आवाज नहीं रही है; जिनके बारे में व्यवस्था यह मान कर चलती रही है कि बिना उनकी परवाह किए भी चला जा सकता है। जो तबके विकास परियोजनाओं की बलि चढ़ते रहे, जिन्हें आज तक अपने श्रम की कीमत खुद तय करने का अवसर नहीं मिला, और जिनके निजी सम्मान और मानवीय गरिमा की कभी कोई कीमत नहीं समझी गई, जन आंदोलन उनके संगठन और संघर्ष का माध्यम बनने की कोशिश कर रहे हैं। यानी लोकतंत्र में मीडिया और जन आंदोलनों- दोनों की महत्त्वपूर्ण भूमिका है।

लेकिन इन दोनों पक्षों के संवाद से कई कठिन सवाल खड़े हो जाते हैं। इससे मीडिया और जन आंदोलनों के बीच सहमति कम, मतभेद या कई मौकों पर टकराव के स्वर ज्यादा तीखे रूप में उभरते सुने जा सकते हैं। वजह लोकतंत्र के दायरे की समझ है। जन आंदोलनों की समझ है कि मीडिया लोकतंत्र के मौजूदा औपचारिक स्वरूप से संतुष्ट है। वह मौजूदा व्यवस्था का ही एक हिस्सा है, जिस पर पूंजी का वर्चस्व है। उसके संचालक और उसके लक्ष्य (पाठक, श्रोता एवं दर्शक) दोनों मौजूदा व्यवस्था में लाभ की जगहों पर बैठे समूह हैं। ये समूह नहीं चाहते कि उनके सुख और सुविधाओं में वंचित तबकों का कोई दखल हो। विकास एवं आर्थिक संपन्नता की सारी नीतियां इन शासक वर्गों के हितों के मुताबिक ही बनती एवं लागू होती हैं। मीडिया अपने वर्ग चरित्र के मुताबिक उन्हीं नीतियों की वकालत करता है। अक्सर बाकी तबकों की बात मीडिया में दब जाती है, या कई बार मीडिया आक्रामक रूप से उन तबकों के हितों की बात के खिलाफ अभियान छेड़ देता है।

मी़डियाकर्मियों का एक हिस्सा यह मानता है कि इस आलोचना में दम है। पूंजी और मुनाफा आज बुद्धि, पत्रकारीय निष्ठा एवं सार्वजनिक हित के मकसदों पर हावी हो गए हैं। मीडिया किसी भी अन्य औद्योगिक उपक्रम की तरह हो गया है, जिसमें उत्पाद का चरित्र बाजार की मांग एवं जरूरतों से तय होता है। इसका परिणाम यह हुआ है कि लोकतंत्र के नए सामाजिक प्रयोग मीडिया कवरेज के दायरे से बाहर हो गए हैं। चूंकि ये प्रयोग उन तबकों के बीच या उन तबकों के द्वारा होते हैं; जो बाजार का हिस्सा नहीं हैं, जिनके पास विज्ञापनदाता कंपनियों की महंगी चीजों को खरीदने लायक पैसा नहीं है, इसलिए मीडिया उन तबकों की परवाह भी नहीं करता। जबकि जिन तबकों की ऐसी आर्थिक हैसियत है, मीडिया उनकी सोच, उनकी पसंद-नापसंद और वर्ग नजरिए का ज्यादा ख्याल करता है, ताकि उनके मन में नाराजगी या विपरीत प्रतिक्रिया पैदा ना हो।

आज के दौर में मीडिया में पैसा लगाने वाले घराने शुरू से अंत तक इस बात ख्याल रखते हैं, और इसी मकसद को ध्यान में रखते हुए मीडिया समूहों का अंदरूनी ढांचा तैयार किया जाता है। मीडिया और लोकतंत्र के संवाद से जुड़े विश्लेषक कहते हैं कि इसी वजह से मीडिया संस्थानों के भीतर बौद्धिकता लगातार घट रही है, बल्कि कुछ विश्लेषकों का तो दावा है कि बौद्धिक होना या दिमाग का इस्तेमाल करना आज मीडिया संस्थानों में नुकसान और जोखिम का पहलू बन गया है। नतीजा खबरों का ऐसा स्वरूप उभरना है, जिसमें सच्चाई कई परदों में ढकी रहती है। सनसनी और हलकापन खबर के बिकाऊ हो सकने की अहम कसौटी बन गए हैं। ऐसे में विस्थापितों के लड़ाई, आदिवासियों की अपनी पहचान बचाने की जद्दोजहद, मानवाधिकार हनन का विरोध और ऐसी ही बहुत सी दूसरी लड़ाइयों को मीडिया में जगह एवं सही संदर्भ आखिर कैसे मिल सकता है?

लेकिन ज्यादातर मीडियाकर्मी, खासकर मीडिया में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों का भी एक पक्ष है। वे जोर देते हैं कि आज ना तो देश में आजादी की लड़ाई चल रही है और ना मीडिया का कोई मिशन है। मीडिया एक कारोबार और एक पेशा है। इस कारोबार और पेशे की अपनी तय शर्तें और मांगें हैं, और मीडिया उस दायरे में रहते हुए लोकतंत्र के प्रति अपनी जिम्मेदारी निभा रहा है। आखिर जन प्रतिनिधियों से लेकर नौकरशाहों तक के भ्रष्टाचार और पद के दुरुपयोग का पर्दाफाश यही मीडिया करता है। भुखमरी से लेकर कुपोषण एवं महिलाओं और बच्चों के शोषण की घटनाएं इसी मीडिया के वजह से सामने आती हैं। और जन आंदोलन जब सचमुच कोई प्रभाव पैदा कर सकने की हालत में होते हैं, तो उन्हें भी मीडिया में जगह मिलती है। लेकिन जन आंदोलनों को यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि अखबार या टीवी न्यूज चैनल उनके मुखपत्र की तरह काम करेंगे। अगर ये माध्यम जन आंदोलनों के मुद्दों को उनके प्रभाव के मुताबिक जगह देते हैं, तो उन्हें यह भी अधिकार है कि वे जन आंदोलनों के तौर तरीकों और उनके साथी या पीछे की ताकतों का हिसाब-किताब लें।

मीडियाकर्मियों की राय है कि जैसे उन्हें राजनीतिक दलों से सवाल पूछने का हक है, वैसे ही वे जन आंदोलनों के सामने भी कठिन प्रश्न रख सकते हैं और इस पर जन आंदोलनों को यह शिकायत नहीं करनी चाहिए कि मीडिया अपने वर्ग चरित्र की वजह से उन्हें बदनाम करने के लिए ऐसे सवाल उठा रहा है। मीडियाकर्मियों की राय में जन आंदोलनों के सामने सबसे बड़ा सवाल फंडिंग का है। आखिर इन आंदोलनों को पैसा कहां से मिलता है? क्या एनजीओ (गैर सरकारी संगठन) सेक्टर से उन्हें मदद नहीं मिलती? अगर एनजीओ विदेशी मदद लेते हैं तो क्या जन आंदोलन इस आरोप से बच सकते हैं कि वो विदेशी मदद से चल रहे हैं?

जन आंदोलनों पर एक और आरोप वैचारिक कट्टरपंथ का है। जैसे आधुनिकता, प्रगति और विकास को लेकर कुछ अंधविश्वास या गलतफहमियां हैं, वैसे ही अंधविश्वास और गलतफहमियां इनके विरोध को लेकर भी हो सकती हैं। शायद इस आलोचना में दम है कि जन आंदोलनों के कई नेता एवं विचारकों ने विरोध की कुछ चरमपंथी धारणाएं बना ली हैं, जिन पर खुले दिमाग एवं तथ्यों की रोशनी में चर्चा और बहस से वे दूर भागते हैं। उन्होंने एक ऐसा वैचारिक दायरा बना लिया है, जिसमें हर नई चीज और नया विचार उन्हें डराता है। तब जन हित एवं सभ्यताओं के संघर्ष के नाम पर वे उनके विरोध के तर्क गढ़ लेते हैं। अगर आलोचक या कुछ मीडियाकर्मी यह सवाल पूछते हैं कि आखिर यह विरोधशास्त्र एक सीमित दायरे से बाहर के लोगों को आकर्षित क्यों नहीं करता, क्यों यह सारा विमर्श वर्षों से कुछ गिने-चुने लोगों तक ही सीमित है, तो इस पर गुस्से में प्रतिक्रिया जताने या जवाबी आरोप मढ़ने के बजाय जन आंदोलनों के नेताओं को जरूर गंभीरता से आत्म मंथन करना चाहिए।

एक लोकतांत्रिक समाज में स्वतंत्र मीडिया को सबसे सवाल पूछने और सबको जनता के सामने कठघरे में खड़ा करने का अधिकार है, इस बात को लोकतांत्रिक निष्ठा वाला कोई व्यक्ति या संगठन चुनौती नहीं दे सकता। जन आंदोलनों से अगर कठिन सवाल पूछे जाते हैं, तो उन्हें भी सवाल पूछने वाले की मंशा पर शक करने के बजाय उन सवालों के जवाब देने चाहिए। आखिर कोई समूह सिर्फ दावा कर देने भर से सचमुच जन आंदोलन नहीं हो जा सकता। उसे अपने चरित्र, जन समर्थन और आस्थाओं से सबके सामने यह साबित करना चाहिए कि वे वास्तव में उन तबकों की लड़ाई लड़ रहे हैं, जिन्हें आज तक वास्तविक आजादी नहीं मिली और ना ही जिन्हें लोकतंत्र के मौजूदा ढांचे में जगह मिली है।

बहरहाल, मीडिया के सामने भी यह सवाल जरूर है कि आखिर वह कितना स्वतंत्र है? मीडिया की स्वतंत्रता की जब बात होती है तो सरकार के बरक्स होती है। सरकारी अंकुश से मीडिया बचा रहे, यह लोकतंत्र की एक बुनियादी शर्त है। मगर मीडिया पूरी तरह पूंजी के तंत्र से नियंत्रित हो, यह कितना लोकतंत्र के हित में है, यह सवाल जन आंदोलनों की बैठकों के अलावा कहीं और शायद ही उठाया जाता है। जन आंदोलन की भी इस सवाल पर सोच बहुत साफ है, ऐसा नहीं लगता। बड़े मीडिया घरानों में विदेशी निवेश के साथ उनमें लगी पूंजी के चरित्र में भारी बदलाव देखने को मिला है। इसका असर मीडिया के कवरेज और मीडिया घरानों के अंदरूनी ढांचे पर भी अब साफ दिख रहा है। दरअसल, पूंजी दो तरह से मीडिया को नियंत्रित करती है- एक निवेश के जरिए और दूसरे विज्ञापन की ताकत के जरिए। निवेश (या निवेशकों) की मांग अधिक से अधिक मुनाफा होती है, जो विज्ञापन से आता है और विज्ञापन की दर का संबंध अधिक से अधिक पाठक/ दर्शक हासिल करने से जुड़ा है। इस होड़ में वे मुद्दे और गतिविधियां दूर छूट जाते हैं, जिनका सीधा संबंध निवेश और विज्ञापन के इस बाजार से नहीं है।

इसी वजह से न सिर्फ जन आंदोलनों, बल्कि सभी लोकतांत्रिक ताकतों की मीडिया से शिकायत बढ़ती जा रही है। इस संदर्भ में आलोचकों का एक समूह यह समझ पेश कर रहा है कि मीडिया अब एक नव-उदारवादी संस्था बन चुकी है। एक ऐसी संस्था जो नव-उदारवादी सिद्धांतों से चलती है, नव-उदारवादी आर्थिक सिद्धांतों की वकालत करती है, और नव-उदारवादी हितों के मुताबिक खबरों एवं विश्लेषण/ चर्चा को प्रस्तुत करती है। इन आलोचकों के मुताबिक मीडिया का जन आंदोलनों से जो अंतर्विरोध नजर आता है, वह दरअसल नव-उदारवाद बनाम लोकतंत्र का अंतर्विरोध है। सोच की यह धारा मौजूदा वैश्विक मंदी की मिसाल देते हुए यह दलील पेश कर रही है कि जब दुनिया भर में नव-उदारवाद की साख खत्म हो चुकी है और वित्तीय संस्थानों एवं पूंजीवादी उद्योगों को सरकारें विनियमित कर रही हैं, तो मीडिया के लिए भी विनियमन पर विचार होना चाहिए।

एक विवादास्पद और गंभीर मुद्दा है। आखिर मीडिया को कौन विनियमित करेगा? मुंबई पर आतंकवादी हमले और ऐसे कई संकटपूर्ण मौकों पर यह सवाल उठा है। जाहिर है, मीडिया ऐसे सुझावों का जोरदार विरोध करता है। इसके पीछे सरकारी नियंत्रण कायम होने का खौफ दिखाया जाता है। इमरजेंसी की यादें दिलाई जाती हैं। जब माहौल बहुत प्रतिकूल होता है तो मीडिया की तरफ से खुद से अपने लिए कायदे तय करने की बात होती है। मुंबई पर हमले के बाद इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने ऐसे कुछ कायदे पेश भी किए। लेकिन इनसे मीडिया के आलोचक संतुष्ट नहीं दिखते।

तो सवाल है कि क्या जन आंदोलन मीडिया को विनियमित करने की मांग उठाएं? क्या यह मांग संसद से की जाए, जो लोकतंत्र में सर्वाधिक प्रातिनिधिक संस्था है? और इससे भी अहम सवाल यह है कि आखिर इससे हासिल क्या होगा? क्या मीडिया तब जन आंदोलनों और उनके मुद्दों के प्रति ज्यादा संवेदनशील हो सकेगा? गौरतलब है कि किसी को किसी उद्देश्य या मुद्दे के प्रति संवेदनशील होने या कोई खास रुख लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। असल में ऐसी अपेक्षा खुद लोकतांत्रिक नहीं है।

साफ है, यह एक बेहद नाजुक सवाल है। इसमें कई जोखिम हैं। मीडिया बेशक व्यापक अर्थों में लोकतांत्रिक ना हो, लेकिन सीमित अर्थों में ही इसने कई मौको पर सकारात्मक भूमिका निभाई है। अमर्त्य सेन का यह बहुचर्चित सिद्धांत है कि स्वतंत्र मीडिया बड़े पैमाने पर भुखमरी और महामारी से मौतें रोकने का साधन है और इस कसौटी पर भारतीय मीडिया का रिकॉर्ड खराब नहीं है। लेकिन मीडिया लोकतंत्र का पहरेदार या लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, उसके मौजूदा चरित्र से उसकी इस भूमिका पर फिलहाल गहरे सवाल उठ रहे हैं। अगर मीडिया जन आंदोलनों के पक्ष पर गौर करे, तो वह शायद अपनी लोकतांत्रिक साख फिर से बहाल कर सकता है, जिसे हाल के वर्षों में वह खोता गया है।

माओवादियों और सीपीएम से यक्षप्रश्न

सत्येंद्र रंजन
म्युनिस्ट विचारधारा में माओ जे दुंग का एक प्रमुख योगदान उनका ‘जनता के अंदरूनी अंतर्विरोधों’ का सिद्धांत है। उनके मुताबिक क्रांतिकारी शक्तियों के सामने हमेशा एक खास चुनौती इन अंतर्विरोधों का सही हल निकालने और उसके मुताबिक दोस्त एवं दुश्मन की पहचान करने की होती है। अंतिम मकसद सर्वहारा का राज कायम करना है, लेकिन उस मंजिल तक पहुंचने के पहले विभिन्न वर्गों के बीच गठबंधन जरूरी होता है। यह दरअसल, क्रमिक रूप से दुश्मन की पहचान करते हुए विभिन्न स्तरों पर साझा हित वाले समूहों के बीच राजनीतिक या संघर्ष का रिश्ता बनाते हुए आगे बढ़ने की प्रक्रिया है। माओवाद के तहत क्रांतिकारी और दुस्साहसी रूमानी ताकतों के बीच फर्क की कसौटी अंतर्विरोधों का यही सिद्धांत है।

अगर कोई राजनीतिक शक्ति दोस्त और दुश्मन की पहचान परिस्थितियों के ठोस विश्लेषण के आधार पर करने में नाकाम है, तो उसके तमाम समर्पण एवं निष्ठा के बावजूद उसकी गतिविधियों से कोई सकारात्मक नतीजा हासिल नहीं हो सकता। बल्कि उसका दुस्साहस खतरनाक परिणाम दे सकता है। इससे उन्हीं तबकों के लिए भारी मुसीबत खड़ी हो सकती है, जिन्हें मुक्ति दिलाने का वह दावा करती है। पश्चिम बंगाल, और अभी खास तौर पर लालगढ़ में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) की गतिविधियों को उपरोक्त वैचारिक दायरे में रख कर देखे जाने की सख्त जरूरत है।

नक्सलवादियों (जो अब खुद को माओवादी कहते हैं) की मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (या मुख्यधारा की हर वामपंथी पार्टी) से नफरत बहुत पुरानी है। उनके भीतर यह आम शिकायत रही है कि १९६० के दशक के आखिर में जब उन्होंने नक्सलबाड़ी से भारतीय राज्य-व्यवस्था के खिलाफ सशस्त्र बगावत की शुरुआत की, तो उसे कुचलने में सीपीएम और सीपीआई जैसी पार्टियां मौजूदा ‘शासक वर्गों’ के साथ हो गईं। तभी से नक्सली सीपीएम और सीपीआई को संशोधनवादी, यानी ऐसी पार्टियां कहते रहे हैं, जो अपनी सुविधा के मुताबिक सिद्धांतों को ढालती हैं।

पश्चिम बंगाल में सीपीएम की चुनावी सफलताएं नक्सलियों को कभी रास नहीं आईं। ना ही कभी उन्होंने वाम मोर्चा सरकार के भूमि सुधार जैसे प्रगतिशील कदमों के प्रति सकारात्मक नजरिया अपनाया। बल्कि उनके विमर्श से हमेशा उनकी इस राय के संकेत मिलते रहे कि मुख्यधारा की कम्युनिस्ट पार्टियां भारत में क्रांति के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा हैं। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं कि पश्चिम बंगाल में सीपीएम का किला ढहे, यह सिर्फ ममता बनर्जी या कांग्रेस ही नहीं चाहते, बल्कि यह चाहत माओवादियों में उनसे भी ज्यादा उग्र है।

नंदीग्राम से लेकर सिंगूर तक के ममता बनर्जी के आंदोलनों में माओवादी भी अहम भूमिका निभा रहे हैं, यह बात धीरे-धीरे साफ होती गई। लेकिन चूंकि ये घटनाएं वाम मोर्चे के खिलाफ जा रही थीं, इसलिए केंद्र सरकार से लेकर कॉरपोरेट मीडिया तक ने इसे नजरअंदाज किया। इसकी वजह पिछले वर्षों के दौरान नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों और सांप्रदायिकता के खिलाफ राष्ट्रीय स्तर पर संघर्ष विकसित करने में वाम मोर्चे द्वारा निभाई गई भूमिका थी। लेकिन माओवादी अगर एक प्रगतिशील राजनीतिक ताकत हैं, तो वे कैसे वाम मोर्चे की इस भूमिका की अनदेखी कर सकते हैं, यह देख कर अचरज होता है।

बहरहाल, यह एक हकीकत है कि पश्चिम बंगाल में वाम मोर्चे को कमजोर करने के उद्देश्य की समानता तृणमूल कांग्रेस, कांग्रेस, एसयूसीआई जैसी हाशिये पर की उग्र वामपंथी पार्टियों और माओवादियों को एक छाते के नीचे ले आई। यह आग से खेलने जैसा खेल था। ऐसे ही फौरी राजनीतिक स्वार्थ का परिणाम लालगढ़ में सामने आया है। माओवादियों ने नवंबर २००८ में वहां पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्री बुद्धदेब भट्टाचार्य की हत्या की कोशिश की। घात लगाकर किए गए हमले में भट्टाचार्य और उनके साथ गए तत्कालीन केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान किसी तरह बच गए। उसके बाद पुलिस ने धर-पकड़ की कार्रवाई शुरू की। उसी के विरोध में पुलिस संत्रोस विरोधी जनसाधारनेर कमेटी बनी, जिसके पीछे माओवादियों का हाथ माना जाता है। इस कमेटी के लोगों को आगे कर माओवादियों ने लालगढ़ को ‘आजाद इलाका’ बना लिया। इस पूरे दौर में हालात की गंभीरता पर गौर करने के बजाय तृणमूल कांग्रेस और यहां तक कि कांग्रेस के निशाने पर भी सीपीएम ही रही।

अब सुरक्षा बलों की कार्रवाई में माओवादियों के साथ-साथ आम लोग निशाने पर हैं। यह कोई पहला मौका नहीं है, जब माओवादियों के दुस्साहस और क्रांति की रूमानियत की कीमत आम लोगों को चुकानी पड़ी हो। अगर माओवादी सचमुच यह समझते हैं कि वे भारत के किसी इलाके को आज की परिस्थितियों में ‘जन युद्ध से आजाद’ करा सकते हैं, तो इससे उनके किसी हवाई दुनिया में विचरण करने का ही सबूत मिलता है। वरना, ऐसा करने पर सुरक्षा बलों की कार्रवाई होगी, इसका अनुमान उन्हें जरूर होगा। उस कार्रवाई का क्या परिणाम होगा, इसे भी वो समझते होंगे। तो फिर उस इलाके के लोगों को उन्होंने इस मुसीबत में क्यों डाला, यह सवाल एक दिन वे आम लोग ही उनसे जरूर पूछेंगे, जिनके नाम पर वे ऐसे दुस्साहस करते हैं।

माओवादी अपनी ऐसी गतिविधियों से निःसंदेह देश में वामपंथ की संभावनाओं को गहरी चोट पहुंचा रहे हैं। लेकिन इन हालात के मद्देनजर कुछ सवाल सीपीएम के सामने भी जरूर हैं। आखिर लालगढ़ इलाके के आदिवासी माओवादियों की बातों में क्यों आए? वहां जिस तरह का संगठन उन्होंने बनाया है, उससे साफ है कि माओवादी वहां लंबे समय से सक्रिय रहे होंगे। आखिर सीपीएम ने उन लोगों को संगठित करने और जिस न्याय की उम्मीद में वे माओवादियों के पाले में गए, वह न्याय दिलाने की कोशिश क्यों नहीं की? नंदीग्राम से सिंगूर तक माओवादियों को अपना आधार बनाने की जमीन कैसे मिली? क्या ये स्थितियां यह कठिन सवाल पेश नहीं करतीं कि क्या सीपीएम सिर्फ सत्ता की पार्टी बन गई है और उसने संसदीय दायरे से बाहर जन संघर्ष की अपनी भूमिका खो दी है?

लोकसभा चुनाव में लगे गहरे झटके और पश्चिम बंगाल में विस्फोटक होती स्थिति के मद्देनजर सीपीएम के सामने ये यक्षप्रश्न हैं। अगर वह इन प्रश्नों के उत्तर नहीं खोज पाई तो ३२ साल पुराना पश्चिम बंगाल का उसका किला अगले दो वर्षों में सचमुच ढह सकता है। सीपीएम को दरअसल माओवाद का राजनीतिक जवाब ढूंढना होगा। सुरक्षा बलों की कार्रवाई और उससे संभावित सफलता महज फौरी हैं। सीपीएम और वाम मोर्चे का दीर्घकालिक भविष्य इस पर निर्भर है कि क्या वे उस राजनीतिक जमीन को उग्र वामपंथ से छीन पाएंगे, जो उनकी जड़ों को खोखला कर रहा है?

Thursday, June 18, 2009

ईएमएस की सीख का सहारा


सत्येंद्र रंजन
ईएमएस नंबूदिरीपाद की जन्मशती मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (सीपीएम) ने ऐसे मौके पर मनाई, जब वह पिछले तीन दशक के इतिहास में सबसे गहरे संकट से गुजर रही है। इस मौके पर नंबूदिरीपाद को याद करते हुए सीपीएम महासचिव प्रकाश करात ने कहा- “उन्होंने सिद्धांतों को प्रभावी ढंग रणनीतियों में बदला, और रणनीतियों को नीतियों में।” दिवंगत नेता के इस गुण की इस वक्त सीपीएम को बेशक सबसे ज्यादा जरूरत है। पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले गठबंधन की निर्णायक जीत ने पूरे वाम मोर्चे, खासकर सीपीएम के सामने सिद्धांत, रणनीति और नीतियों से जुड़े कई कठिन सवाल खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस की यह जीत शायद वाम मोर्चे के लिए इतनी बड़ी चुनौती नहीं होती, अगर मोर्चा अपने गढ़ों को बचा पाया होता। दरअसल, अगर पश्चिम बंगाल में उसकी करारी हार नहीं हुई होती, तो आज भारतीय राजनीति में वाम मोर्चे की भूमिका और उसकी जगह लेकर वैसे सवाल खड़े नहीं होते, जैसे आज नजर आते हैं।

संकट के इस पहलू पर भी प्रकाश करात को ईएमएस याद आए। कहा- “ईएमएस ने ही हमें चुनावी पराजयों की समीक्षा करने की सीख दी। हमें पूरा भरोसा है कि सीपीएम और वाम मोर्चा सही निष्कर्ष पर पहुंचेंगे और लोगों का भरोसा वापस हासिल कर सकने में सफल रहेंगे।” वाम मोर्चे की हार के बाद पश्चिम बंगाल में लेफ्ट विरोधी ताकतों का मनोबल बढ़ा हुआ है। ममता बनर्जी अब उसी रणनीति पर राज्य के दूसरे इलाकों में भी चलने की कोशिश में हैं, जिससे उन्होंने नंदीग्राम में सीपीएम की जड़ें उखाड़ीं। पूर्वी मिदनापुर के खेजुरी में उनके समर्थकों ने हिंसक मुहिम छेड़ी। उधर लालगढ़ में माओवादियों का कहर सीपीएम समर्थकों पर टूट पड़ा है। जाहिर है, लड़ाई सिर्फ लोकतांत्रिक दायरे में नहीं है। उग्र वामपंथी ताकतों और ममता बनर्जी समर्थक यथास्थितिवादी ताकतों के बीच पिछले दो-ढाई साल में बना गठबंधन अब नई ताकत, और हिंसा एवं प्रतिहिंसा की पूरी तैयारी मैदान में कूद पड़ा है। निगाह २०११ में होने वाले विधानसभा चुनाव पर है।

क्या सीपीएम उग्र वामपंथ से धुर दक्षिणपंथ तक के बने गठबंधन का जवाब ढूंढ पाएगी? २००६ के विधानसभा चुनाव में वाम मोर्चे ने ५० फीसदी से ज्यादा वोट हासिल पा कर भारी जीत हासिल की थी। २००९ के लोकसभा चुनाव में तकरीबन सात फीसदी मतदाताओं का समर्थन गंवा कर १९७७ के बाद की सबसे बुरी हार का उसने मुंह देखा। विरोधियों की तैयारी और उनके बढ़े मनोबल को देखते हुए यह साफ अनुमान लगाया जा सकता है कि वाम मोर्चा के २०११ में अपना गढ़ बचा सकने की सिर्फ एक ही सूरत है और वह है उन मतदाताओं का समर्थन वापस पाना, जो उसके पाले से चले गए हैं। इस बेहद चुनौती भरे काम में ईएमएस से मिली सीख कितना कारगर होती है, या उस सीख को सीपीएम कितना व्यवहार में उतार पाती है, यह गौर करने की बात होगी।

बहरहाल, सीपीएम के सामने दूसरी बड़ी चुनौती सैद्धांतिक है। कांग्रेस ने आम आदमी की बात करते हुए राजनीति के सोशल डेमोक्रेटिक स्थल पर अपनी मौजूदगी बना ली है। हाल के चुनावों ने काफी हद तक इस बात की पुष्टि कर दी। हालांकि यह तथ्य है कि कांग्रेस को यह छवि और स्थान वामपंथी दलों के एजेंडे की वजह से ही मिला। २००४ में साझा न्यूनतम कार्यक्रम में जन हित के मुद्दे शामिल कराने और उन पर अमल के लिए लगातार दबाव बनाए रखने का श्रेय वामपंथी दलों को है। लेकिन चुनाव में इसका फायदा कांग्रेस को मिला। कांग्रेस के रणनीतिकारों ने इस बात को समझा है, इसकी झलक संसद के सत्र में राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के अभिभाषण से मिला। संकेत साफ हैं कि कांग्रेस आम आदमी की राजनीति पर अभी कायम रहने वाली है।

सीपीएम का दावा है कि कांग्रेस आम आदमी के हितों की नुमाइंदगी नहीं करती। बल्कि वह अरबपतियों और साम्राज्यवाद का प्रतिनिधित्व करती है। अगर कांग्रेस ने आने वाले दिनों में खुलेआम नव-उदारवादी आर्थिक नीतियों को आगे बढ़ाया, तो सीपीएम की यह आलोचना लोगों के बीच साख पा सकेगी। यह मुमकिन है कि अपने स्वाभाविक और वर्गगत रुझानों की वजह से मनमोहन सिंह सरकार जल्द ही ऐसी नीतियों पर तेजी से आगे बढ़ने लगे। तब सीपीएम राष्ट्रीय राजनीति में आम जन के हितों की वकालत करने वाली ताकत की भूमिका हासिल जरूर कर सकेगी। लेकिन अभी कांग्रेस उसे यह मौका देने के मूड में नहीं लगती।

बहरहाल, ऐसी भूमिका के लिए आज ढाई दशक बाद सबसे ज्यादा अनुकूल स्थितियां हैं। १९८० के दशक में पहले कांग्रेस के बहुसंख्यक सांप्रदायिकता का कार्ड खेलने और फिर संघ परिवार की हिंदुत्व की राजनीति के उफान के साथ प्रगतिशील और जनतांत्रिक एजेंडा काफी पीछे चला गया। १९९० के पूरे दशक में प्रगतिशील शक्तियां सांप्रदायिक फासीवाद को रोकने की रणनीति बनाने में जुटी रहीं। २००४ के चुनाव में भाजपा की हार के साथ इस मकसद का एक मुकाम जरूर हासिल हुआ, लेकिन खतरा मंडराता रहा। आखिरकार २००९ के आम चुनाव के साथ भाजपा के फिर से उभरने और सांप्रदायिक शासन की वापसी का खतरा इतना घटा है कि अब आश्वस्त हुआ जा सकता है।

इससे राजनीति में प्रगतिशील और जनतांत्रिक सवालों को उठाने का अनुकूल अवसर पैदा हुआ है। सीपीएम अगर अपनी पुरानी ताकत में होती तो वह इस मौके पर अपनी एक अधिक प्रासंगिक राष्ट्रीय भूमिका बना सकती थी। लेकिन पिछले चुनाव में लगे झटकों ने उससे यह अवसर फिलहाल छीन लिया है। अभी उसके नेताओं की सारी ऊर्जा हार के कारणों को समझने में लग रही है, और उन्हें इस बात की दलील देनी पड़ रही है कि कांग्रेस सामाजिक जनतांत्रिक शक्ति नहीं है।

सीपीएम ने चौदहवीं लोकसभा में जिम्मेदार और जन हितों के पहरुए की भूमिका निभाई थी। लेकिन विभिन्न कारणों से वह अपने गढ़ों को ही गंवा बैठी। उन गढ़ों को विकसित करने में ईएमएस नंबूदिरीपाद की महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। ईएमएस दुनिया भर में पहले निर्वाचित कम्युनिस्ट मुख्यमंत्री थे। उनकी ईमानदारी बेमिसाल थी। स्थितियों के विश्लेषण की उनकी क्षमता के कम्युनिस्ट आंदोलन के भीतर कम ही सानी थे। उन्होंने हार का भी मुंह देखा, मगर नाकामियों के बीच संघर्ष और सफलता के सूत्र तलाशते रहे। आज जब सीपीएम को उनके जैसी क्षमता के नेता की जरूरत है तो ऐसा लगता है कि सिर्फ उनकी यादें और उनसे मिली सीख ही उसके साथ हैं। क्या इनके सहारे सीपीएम इस संकट से उबर पाएगी, यह इस वक्त एक ऐसा सवाल है, जिस पर देश की सभी प्रगतिशील एवं जनतांत्रिक ताकतों की नजर है।

Monday, June 15, 2009

मुलाकात में आखिर बात क्या होगी?


सत्येंद्र रंजन
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह रूस के येकातरिनबर्ग शहर में पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी से रू-ब-रू होंगे। दोनों में बातचीत भी संभाव है। भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों का कहना है कि इस बातचीत से किसी बड़ी सफलता की उम्मीद तो नहीं की जानी चाहिए, लेकिन नवंबर 2008 में मुंबई पर आतंकवादी हमले के बाद से दोनों देशों के बीच राजनीतिक स्तर पर जो अनबोलापन है, वह इससे जरूर टूटेगा।

मनमोहन सिंह और जरदारी शंघाई सहयोग संगठन की शिखर बैठक में हिस्सा लेने येकातरिनबर्ग पहुंचे हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों को इस संगठन में पर्यवेक्षक का दर्जा मिला हुआ है। यह पहला मौका है, जब भारतीय प्रधानमंत्री इस संगठन की बैठक में हिस्सा लेंगे। बहरहाल, सबकी निगाहें उनकी जरदारी से होने वाली मुलाकात पर ही टिकी रहेंगी। ध्यान यह देखने पर लगा होगा कि क्या इस मुलाकात से दोनों देशों के बीच समग्र वार्ता फिर से शुरू होने का कोई संकेत मिलता है।

पिछले महीने आम चुनाव में जनादेश पाकर दोबारा सत्ता में लौटने के बाद मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी पाकिस्तान नीति में किसी उग्रता और जिद का संकेत नहीं दिया है। बल्कि संसद के पहले सत्र की शुरुआत करते राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल ने नई यूपीए सरकार के पाकिस्तान के बारे में रुख का खुलासा इन शब्दों में किया- “मेरी सरकार पाकिस्तान के साथ रिश्तों को नया रूप देने की कोशिश करेगी, लेकिन यह उसकी जमीन से भारत पर आतंकवादी हमले करने वाले गुटों का मुकाबला करने संबंधी पाकिस्तान सरकार के कदमों की गंभीरता पर निर्भर करेगा।”

ऐसा ही रुख नए विदेश मंत्री एसएम कृष्णा की जताते रहे हैं। उनका कहना है कि जब तक पाकिस्तान भारत विरोधी आतंकवादी गुटों के ढांचे को नष्ट नहीं करता, उससे बातचीत नहीं होगी। भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों के प्रति पाकिस्तान के रुख को देखते हुए नई सरकार के इस रुख में बहुत दोष नहीं निकाला जा सकता। कुछ दिन पहले लश्कर-ए-तैयबा से जुड़े संगठन जमात-उद-दावा के मुखिया मोहम्मद हाफिज सईद की रिहाई ने यही जाहिर किया कि पाकिस्तान सरकार का इन संगठनों के प्रति नरम रवैया जारी है।

दरअसल, पाकिस्तान में अदालतें एक्टिविस्ट रोल में हैं। बल्कि पाकिस्तान के कुछ टीकाकारों का मानना है कि इफ्तिखार चौधरी की बतौर चीफ जस्टिस बहाली के बाद वो विपक्ष की भूमिका में भी आ गई हैं। यहां यह तथ्य नहीं भुलाया जाना चाहिए कि इफ्तिखार चौधरी का जनरल मुशर्रफ से टकराव का एक बड़ा मुद्दा इस्लामी चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई था। चौधरी तब सुप्रीम कोर्ट को एक्टिविस्ट की भूमिका में ले आए और कई गिरफ्तार चरमपंथियों की रिहाई का आदेश देने लगे थे। चरमपंथियों पर कार्रवाई करने वाले पुलिसकर्मियों पर कोर्ट की गाज गिरने लगी थी। तब मुशर्रफ ने सीधे उनसे टकराव मोल लिया, जो उनके पतन का कारण बना।

इन हालात को देखते हुए आसिफ़ अली जरदारी सरकार से यह अपेक्षा जरूर थी कि वह सईद और मुंबई हमले के बाद गिरफ्तार दूसरे आतंकवादियों के खिलाफ फुलप्रूफ केस बनाएगी। लेकिन कम से कम सईद के मामले में यह जाहिर हो गया कि उसकी नजरबंदी सिर्फ रस्म अदायगी थी। इससे भारत के इस संदेह को बल मिला है कि पाकिस्तान भारत विरोधी आतंकवादी गुटों को अब भी अपने सामरिक अस्त्र के रूप में साबूत रखना चाहता है, ताकि आतंकवाद के मुद्दे पर पश्चिमी देशों की लगाम कमजोर पड़ते ही वह एक बार फिर उनका इस्तेमाल अपने विभाजन के कथित अपूर्ण एजेंडे को पूरा करने यानी कश्मीर पर कब्जा करने के लिए शुरू कर सके।

यह राष्ट्रपति जरदारी और प्रधानमंत्री यूसुफ रजा गिलानी की नीति है या नहीं, यह साफ नहीं है। लेकिन आईएसआई और पाकिस्तानी फौज का एक हिस्सा चरमपंथी तत्वों के साथ अपने गठबंधन को खत्म करने को तैयार नहीं है, पाकिस्तान की घटनाएं इसका संकेत देती रही हैं। इन हालात में भारत सरकार के लिए अपनी पाक नीति तय करना आसान नहीं है।
इसी लिहाज से मनमोहन सिंह की जरदारी से मुलाकात अहम है। भारत पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध उन्माद के रास्ते पर न चले, यह भारत के भी सभी विवेकशील लोग चाहते हैं। भारत का लोकतांत्रिक और शांतिप्रिय खेमा चाहता है कि भारत ऐसी नीति अपनाए जिससे पाकिस्तान की जनतांत्रिक और प्रगतिशील शक्तियों को ताकत मिले। समग्र वार्ता की फिर से शुरुआत इस दिशा एक ठोस कदम हो सकती है। मगर इस कदम के उठने के लिए जमीन तैयार करने की बड़ी जिम्मेदारी पाकिस्तान पर भी है, जिसे निभाने में वह नाकाम दिख रहा है।

पाकिस्तान सरकार अभी सरहदी सूबे में इस्लामी चरमपंथियों से जंग में जुटी है। इसे पाकिस्तान के अस्तित्व की लड़ाई बताया जा रहा है। लेकिन पाकिस्तान के सत्ता प्रतिष्ठान से जुड़े सभी अंगों के सामने सवाल यह है कि क्या चरमपंथियों के बीच भेदभाव बरत कर यह लड़ाई जीती जा सकती है? अगर तालिबान और अल-कायदा खतरनाक हैं तो क्या लश्कर-ए-तैयबा और जैश-ए-मोहम्मद देश की सामरिक नीति का हिस्सा हो सकते हैं? मनमोहन-जरदारी वार्ता में यह पहलू किसी न किसी रूप में जरूर उठेगा। अगर पाकिस्तान सरकार सभी चरमपंथियों से लड़ने का एक जैसा इरादा दिखाए और अपनी जमीन का भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल न होने देने का अपना वादा निभाए तो समग्र वार्ता की राह जरूर तैयार हो सकती है। जरदारी और उनकी मौजूदा सरकार का इस बारे में क्या रुख है, इसका कुछ अंदाजा येकातरिनबर्ग में मनमोहन सिंह को जरूर लग सकता है।

यह माना जाता है कि जरदारी या प्रधानमंत्री गिलानी के हाथ में पाकिस्तान की पूरी सत्ता नहीं है। दरअसल, यह पाकिस्तान में कभी भी किसी नागरिक सरकार के हाथ में नहीं होती। वहां सेना और खुफिया तंत्र की सामरिक मामलों में अहम दखल बनी रहती है। लेकिन अगर भारतीय अधिकारी यह अनुमान लगा सकें कि जरदारी-गिलानी आतंकवादियों से लड़ने का ईमानदार इरादा रखते हैं, तो भारत यह नीति जरूर अपना सकता है कि उन्हें कमजोर करने वाला कोई कदम न उठाया जाए। गौरतलब है कि तनाव या युद्ध का माहौल फौज-खुफिया तंत्र-आतंकवादी संगठनों की धुरी को और मजबूत ही करता है।

मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी दूसरी पारी शुरू करते हुए पाकिस्तान के बारे जो नीतिगत बयान दिए, उन्हें इसी संदर्भ में एक संतुलित रुख माना गया। इसमें यह संकेत देखा गया कि आतंकवाद से आशंकित इस देश में पाकिस्तान के खिलाफ भावनाएं भड़का कर अपना सियासी ग्राफ बढ़ाने के मोह से मनमोहन सिंह सरकार बच रही है।

लेकिन यूपीए सरकार तभी इस उद्देश्य में सफल हो सकेगी, जब वह अपने इस रुख के प्रति अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटा सके? ऐसे संकेत हैं कि अमेरिका, अफगानिस्तान और पाकिस्तान में अपने सामरिक उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए सभी मोर्चों पर मौजूदा पाकिस्तान सरकार के लिए अनुकूल स्थितियां बना है। इन मोर्चों में भारत से पाकिस्तान का रिश्ता भी शामिल है। मनमोहन सिंह सरकार के सामने यह चुनौती है कि वह अमेरिका को दो टूक शब्दों में कह सके कि भारत की नीति अमेरिकी सुविधा के मुताबिक नहीं बन सकती। क्या मनमोहन सिंह सरकार यह साहस जुटा सकेगी?

शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में प्रधानमंत्री का जाना भारत की विदेश नीति में आ रहे बारीक बदलाव का संकेत हो सकता है। जॉर्ज बुश के जमाने में भारत ने रूस और चीन के नेतृत्व वाले इस संगठन से इसीलिए दूरी बनाए रखी ताकि अमेरिका नाराज ना हो। अब जबकि बराक ओबामा के दौर में अमेरिकी रणनीति में भारत का महत्त्व घट गया है तो मुमकिन है मनमोहन सिंह सरकार नई कूटनीति अपना रही हो। बहरहाल, यह कूटनीति पाकिस्तान के संदर्भ कितनी अहम और फायदेमंद साबित होती है, यह भी इसकी सफलता की एक कसौटी होगी।

Saturday, June 6, 2009

सबक तो ठीक समझा


सत्येंद्र रंजन
पंद्रहवीं लोकसभा में राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के पहले अभिभाषण का पहला संकेत यह है कि संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए) ने २००९ के जनादेश को सही समझा है। लेफ्ट फ्रंट की हार और यूपीए को अपना बहुमत मिल जाने के बाद से कई हलकों में यह आशंका रही है कि मनमोहन सिंह सरकार अपनी नई पारी में आर्थिक सुधारों के नाम पर नव-उदारवादी एजेंडे को तेजी से और बेलगाम ढंग से लागू करेगी। लेकिन राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए यूपीए सरकार ने जो एजेंडा देश के सामने रखा है, वह २००४ में तय हुई दिशा के अनुरूप ही लगता है। २००४ में वामपंथी दलों ने यूपीए को समर्थन एक साझा न्यूनतम कार्यक्रम के आधार पर दिया था, जिसमें मध्यमार्ग से वामपंथ की तरफ झुकाव वाली नीतियां शामिल की गई थीं।

“२००४ में मेरी सरकार ने देश के सामने सबको समाहित कर चलने वाले समाज एवं अर्थव्यवस्था का नजरिया पेश किया था। मेरी सरकार मानती है कि उसे मिला व्यापक जनादेश नीतियों के उसी ढांचे पर जनता की मुहर है”- प्रतिभा पाटिल ने कहा। उन्होंने जोर दिया कि यूपीए की जीत ‘न्यायपूर्ण विकास और धर्मनिरपेक्ष एवं बहुलवादी भारत’ के लिए जनादेश है। जाहिर है, यूपीए ने यह समझा है कि २००४ में सांप्रदायिक फासीवाद और धुर दक्षिणपंथ की मजबूत होती जड़ों से चिंतित जन समुदाय ने यूपीए के रूप में एक विकल्प की तलाश की और मोटे तौर पर उसके कामकाज से संतुष्ट रहते हुए २००९ में उसे और भी बड़ा समर्थन दिया है।

यूपीए की पहली पारी की सबसे खास उपलब्धि शायद यही रही कि आम आदमी की एक बार फिर सरकारी नीतियों में जगह बनी और राष्ट्रीय विमर्श भड़काऊ एवं भावनात्मक मुद्दों से हट कर आम जन की रोजमर्रा की समस्याओं पर केंद्रित हुआ। यह कितना यूपीए, खासकर कांग्रेस के अपने रुझान की वजह से हुआ और कितना लेफ्ट के दबाव में, यह एक अलग बहस का मुद्दा है। लेकिन यह तथ्य है कि इस दौर में राष्ट्रीय रोजगार गारंटी कानून, सूचना के अधिकार का कानून, आदिवासी एवं अन्य वनवासी भू-अधिकार कानून, ऊंचे शिक्षा संस्थानों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिेए २६ फीसदी आरक्षण आदि जैसे दूरगामी महत्त्व के जनतांत्रिक कदम उठाए गए। इनके साथ अगर किसानों के लिए ६० हजार करो़ड़ रुपए की कर्जमाफी, सर्व शिक्षा अभियान, राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन आदि जैसे कदमों को जोड़ कर देखा जाए तो सरकारी नीतियों की दिशा में हुए बदलाव को और बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।

ताजा अभिभाषण के जरिए सरकार ने खाद्य सुरक्षा कानून बनाने, १०० दिन के भीतर विधायिका में महिलाओं के लिए एक तिहाई सीटों के आरक्षण का बिल पेश करने और सच्चर कमेटी की सिफारिशों पर गंभीरता से अमल का एलान कर नीतियों की उस दिशा पर न सिर्फ कायम रहने, बल्कि उस दिशा में और ठोस पहल करने का इरादा जताया है। इस संदर्भ में राजकोषीय अनुशासन की नव-उदारवादी मांग के मुताबिक चलने से फिलहाल सरकार ने इनकार कर दिया है। हालांकि लेफ्ट के समर्थन पर टिके होने की मजबूरी न होने के साथ ही सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों में विनिवेश की बात लौट आई है, लेकिन नीतियों का कुल झुकाव २००४ में तय हुई दिशा की तरफ ही दिखता है।


इस बात की एक और मिसाल पाकिस्तान के प्रति के सरकार का नजरिया है। आतंकवाद से आशंकित इस देश में पाकिस्तान के खिलाफ भावनाएं भड़का कर अपना सियासी ग्राफ बढ़ाने के मोह से बचते हुए मनमोहन सिंह सरकार ने अपनी नीति में स्थिरता कायम रखी है। राष्ट्रपति की यह टिप्पणी गौरतलब है- “मेरी सरकार पाकिस्तान के साथ रिश्तों को नया रूप देना चाहेगी, लेकिन यह उसकी जमीन से भारत के खिलाफ आतंकवादी हमले करने वाले गुटों का मुकाबला करने में पाकिस्तान सरकार के कदमों की गंभीरता पर निर्भर करेगा।” जमात-उद-दावा के प्रमुख मोहम्मद हाफिज सईद की रिहाई से बने माहौल में यह निश्चित रूप से एक संतुलित बयान है, जिसमें अपने देश की सुरक्षा के चिंता के साथ भारत-पाक रिश्तों में नई शुरुआत की इच्छा जाहिर होती है।


हालांकि, विदेश नीति के मामले में मनमोहन सिंह सरकार के सामने गंभीर चुनौती है। अपने पिछले कार्यकाल में यूपीए सरकार ने अमेरिका से संबंध बनाने में अपना काफी कुछ दांव पर लगा दिया। लेकिन बराक ओबामा के दौर में अमेरिकी रणनीति में भारत का महत्त्व स्पष्टतः घट गया है। ओबामा अपनी नई विश्व दृष्टि के साथ अमेरिकी नीतियों को ढाल रहे हैं, और इसमें इस्लामी दुनिया से विश्वास एवं पारस्परिक सम्मान का रिश्ता बनाना उनकी प्राथमिकता है। जॉर्ज बुश जूनियर के जमाने अपनाई गई एकतरफा कार्रवाई की नीति और दुश्मन एवं दोस्त की परिभाषा ओबामा प्रशासन ने छोड़ दी है। जाहिर है भारत सरकार के सामने विदेश नीति को नए सिरे से ढालने की चुनौती है। इस चुनौती का काफी संबंध पाकिस्तान में हो रही घटनाओं और उसके प्रति अमेरिका एवं पश्चिमी दुनिया के रुख से भी है। राष्ट्रपति पाटिल के अभिभाषण से इस दिशा में भारत सरकार की तैयारियों की झलक शायद नहीं मिली है।

बहरहाल, केंद्र सरकार के ताजा एजेंडे से इस चर्चा को जरूर बल मिलेगा कि क्या कांग्रेस एक बार फिर से नेहरूवादी विचारधारा के ढांचे में अपनी तलाश कर रही है? १९८० के दशक में कांग्रेस ने इस वैचारिक जमीन को छोड़ना शुरू किया और पीवी नरसिंह राव के जमाने में उसने नेहरूवादी विचारों को जैसे पूरी तरह गुडबाय कह दिया। वही कांग्रेस के बिखराव का भी दौर था। १९९८ से सोनिया गांधी ने कांग्रेस की कमान संभाली और बिखराव की उस प्रक्रिया को रोका। २००४ में सत्ता में आने के बाद कांग्रेस में सबके लिए न्याय के नेहरुवादी सोच के मुताबिक नीतियों को ढालने की झलक मिली। लेकिन भारत-अमेरिका परमाणु करार पर लेफ्ट से कांग्रेस की छिड़ी जंग से यह पूरी परिघटना कई तरह के विवादों और संदेहों के साये में आ गई।

२००९ में कांग्रेस को लेफ्ट फ्रंट की जरूरत नहीं है। लेकिन उसने शायद यह समझा है कि उसे लेफ्ट झुकाव वाली नीतियों और कार्यक्रमों की जरूरत है। इनसे ही उसे वह लोकतांत्रिक वैधता और चुनाव सफलताएं मिल सकती हैं, जिससे देश में उसकी दूरगामी भूमिका बनी रहे। जवाहर लाल नेहरू ने आजादी के बाद देश धर्मनिरपेक्षता और विकास एवं प्रगति का जो एजेंडा रखा, उसकी वजह से ही वो आज भी आजाद भारत के इतिहास के सबसे कद्दावर नेता नजर आते हैं। कांग्रेस अगर इससे सीख लेती रहे तो एक बार फिर उसकी जड़ें मजबूत हो सकती हैं, जैसा संकेत हाल के चुनाव से मिला है। फिलहाल, पहली झलक में लगता है कि कांग्रेस ने सही सीख ग्रहण की है।

विनिवेश से बचिए


सत्येंद्र रंजन
नमोहन सिंह सरकार के पिछले कार्यकाल के दौरान यूपीए और वामपंथी मोर्चे के बीच पहला टकराव जुलाई २००५ में हुआ। मुद्दा भेल (भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड) में विनिवेश का था। वामपंथी दलों ने इस सवाल पर यूपीए-लेफ्ट समन्वय समिति का बहिष्कार कर दिया। तब वामपंथी दलों के समर्थन पर टिकी सरकार झुक गई और भेल में विनिवेश का प्रस्ताव वापस ले लिया गया। इतना ही नहीं, सरकार ने यह भी भरोसा दिया कि सार्वजनिक क्षेत्र के नवरत्न कहे जाने वाले कारखानों में विनिवेश नहीं होगा।

२००४ में जब यूपीए सत्ता में आया और वामपंथी दलों ने बाहर से समर्थन देने के लिए साझा न्यूनतम कार्यक्रम की शर्त रखी तो उसमें यह बात बेलाग ढंग से कही गई थी कि यूपीए सरकार की प्राथमिकता विनिवेश नहीं, बल्कि निवेश होगी। सार्वजनिक क्षेत्र के प्रतिष्ठानों के पुनरुद्धार और उन्हें एक बार फिर से अर्थव्यवस्था का केंद्र बनाने की बात कही गई। लेकिन बाद में जाहिर हुआ कि मनमोहन सिंह सरकार का झुकाव १९९० के दशक में प्रचलित हुए इस विचार की तरफ ही है कि सरकार की आर्थिक क्षेत्र में कम से कम भूमिका होनी चाहिए। इसके बावजूद वामपंथी दलों के समर्थन पर निर्भरता की वजह से उसके कदम बंधे रहे।

२००९ के चुनाव परिणामों ने यूपीए सरकार की यह निर्भरता खत्म कर दी है। तो अब विनिवेश की चर्चा लौट आई है। मीडिया ने सरकार के सामने आर्थिक सुधारों का कॉरपोरेट जगत का एजेंडा पेश कर दिया है। सरकार इस दिशा में कितना और कितनी तेजी से आगे बढ़ेगी, अभी यह औपचारिक तौर पर साफ नहीं किया गया है। लेकिन मीडिया की चर्चाओं पर भरोसा करें तो एक व्यापक विनिवेश नीति तैयार करने पर काम शुरू हो गया है।

विनिवेश के समर्थन में कई दलीलें हैं। बताया गया है कि अभी केंद्र सरकार के तहत २१४ सक्रिय सार्वजनिक प्रतिष्ठान (पीएसयू) हैं। इनमें १६० मुनाफा कमा रहे हैं, जबकि ५४ बीमार हैं। लेकिन मुनाफा कमा रहे प्रतिष्ठानों के बीच सिर्फ ९९ ऐसे हैं, जिन्हें अगर बेचा जाए तो मुनाफा होगा, जबकि ६१ कारखानों का नेट वर्थ (कुल कीमत) मुनाफा कमाने के बावजूद निगेटिव है। यानी उनमें जितना निवेश हुआ है, आज बाजार में उनकी कीमत उससे कम है। विनिवेश के समर्थक कहते हैं कि जो कंपनियां फायदे में हैं, उनके विस्तार के लिए भी पूंजी की जरूरत है, ताकि वो आगे की प्रतिस्पर्धा में टिक पाएं और उन्हें आगे बढ़ाने के लिए सरकार को उन पर अपने बजट से खर्च न करना पड़े। एक दलील यह भी है कि कई सार्वजनिक कारखानों के पास अपने कर्मचारियों का वेतन बढ़ाने के लिए पैसा नहीं है। अगर कर्मचारियों की तनख्वाह बढ़नी है, तो इसके लिए पैसा कंपनी में सरकारी निवेश के एक हिस्से को बेच कर ही जुटाया जा सकता है।

तो क्या मनमोहन सिंह सरकार इन दलीलों को वजन देगी और खुल कर विनिवेश के रास्ते पर चल पड़ेगी? आखिर सरकार के सामने अब कोई पहले जैसी ‘अड़चन’ नहीं है। मनमोहन सिंह को भारत में उदारीकरण को एक विचार के रूप में स्थापित करने और व्यवहार में उस पर अमल करने का श्रेय दिया जाता है। गौरतलब है कि विनिवेश उदारीकरण के विचार का ही एक हिस्सा रहा है। बहरहाल, १९९० के दशक में भारत में जिन आर्थिक विचारों को उदारीकरण के नाम से लागू किया गया, आर्थिक सिद्धांतों के तहत उन्हें नव-उदारवाद की श्रेणी में रखा जाता है। नव-उदारवाद का यह अहम पहलू रहा है कि सरकार की आर्थिक क्षेत्र में न्यूनतम भूमिका होनी चाहिए।

भारत में ये विचार भले १९९० के दशक प्रचलित हुए, लेकिन अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देशों में १९८० के दशक में इन पर तेजी से अमल शुरू हो चुका था। अमेरिका में तत्कालीन राष्ट्रपति रोनाल्ड रेगन ने कहा था कि सरकार किसी समस्या का हल नहीं, बल्कि खुद में एक समस्या है। इन विचारों का असर इतना व्यापक था कि डेमोक्रेट राष्ट्रपति होने के बावजूद बिल क्लिंटन ने १९९६ में यह कह दिया कि सरकार की बड़ी भूमिका का युग खत्म हो चुका है। उधर, ब्रिटेन में तत्कालीन प्रधानमंत्री मार्गरेट थैचर ने निजीकरण और उदारीकरण की नीतियों पर इतने व्यापक रूप से अमल किया कि उसका असर आज तक मौजूद है। १९९० के दशक में यही विचार और नीतियां भारत में भी प्रचलित हुईं।

बहरहाल, अब जबकि यूपीए सरकार दोबारा सत्ता में लौटी है, इन विचारों को खुद अमेरिका और यूरोप में तगड़ी चुनौती मिल रही है। विश्वव्यापी आर्थिक मंदी को नव-उदारवाद का ही परिणाम माना गया है। यह माना गया है कि बेलगाम पूंजीवाद और वित्तीय व्यवस्थाएं अनिवार्य रूप से ऐसे संकट को जन्म देती हैं, जिनका परिणाम करोड़ों लोगों को रोजगार खोने और जीवन स्तर में गिरावट के रूप में भुगतना पड़ता है। बराक ओबामा प्रशासन अर्थव्यवस्था में सरकारी भूमिका बढ़ाने की नीति पर चल रहा है और ऐसे कई कदम गॉर्डन ब्राउन की ब्रिटिश सरकार भी उठा चुकी है। कुल मिलाकर दुनिया में आज माहौल अर्थव्यवस्था को विनियमित करने और सरकार की भूमिका बढ़ाने के पक्ष में है।

क्या भारत सरकार इस धारा से उलटी दिशा में चलेगी? क्या सार्वजनिक क्षेत्र को खत्म करने या उसकी भूमिका घटाने का सिद्धांत अब भी उसकी नीतियों का प्रेरक तत्व होगा? यहां इस बात पर ध्यान जरूर खींचा जाना चाहिए कि किसी कारखाने में घाटा या पैसे की कमी सिर्फ यह साबित करती है कि उसे कुशल प्रबंधन के तहत चलाया नहीं गया। यहां गौरतलब है कि आजादी के बाद भारत की नियोजित अर्थव्यवस्था में सार्वजनिक क्षेत्र को विशेष भूमिका दी गई थी और देश के बुनियादी ढांचे के विकास में इस क्षेत्र की खास भूमिका रही। साथ ही न्याय एवं सबको समान आर्थिक अवसर देने के आम मकसद को पूरा करने में भी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों ने अहम किरदार निभाया।

उदारीकरण की नीतियों पर अमल करते समय इस भूमिका को भुला दिया गया। तब ध्यान सिर्फ इनमें से कुछ कंपनियों के घाटे में रहने या मुनाफा न कमाने की तरफ खींचा गया। साथ ही सरकार के राजकोषीय घाटे को पाटने के लिए भी सार्वजनिक प्रतिष्ठानों में विनिवेश की नीति आगे बढ़ाई गई। ये नीतियां पूंजीपति तबकों को खूब रास आईं। उनके समर्थकों ने इनका खूब जयगान किया। लेकिन सवाल है कि क्या इससे देश के आर्थिक लक्ष्यों को पाने में कोई मदद मिली? या उदारीकरण की नीतियों से व्यवस्था में न्याय एवं सबके लिए समान अवसर का लक्ष्य और दूर हो गया?

नई यूपीए सरकार जब अपनी विनिवेश नीति तय करेगी तो उसे इन सवालों को जरूर ध्यान में रखना चाहिए। विश्वव्यापी मंदी और भारत में उसके गंभीर असर के बावजूद मनमोहन सिंह सरकार को पांच साल के लिए नया जनादेश मिला है। लेकिन शायद इसके पीछे कुछ भूमिका उसी ‘अड़चन’ की है, जिसकी वजह से वह कथित सुधारों के रास्ते पर तेजी से नहीं चल सकी। अब दुनिया के बदले माहौल में बिना ‘अड़चन’ के भी अगर नई सरकार वही सावधानी बरते, तो इसे शायद ज्यादा व्यावहारिक कदम माना जाएगा।

Thursday, June 4, 2009

बरकरार रहेगा सिर पर ताज!


सत्येंद्र रंजन
चौबीस सितंबर २००७ की रात ने क्रिकेट की बात बदल दी। कुछ उसी तरह जैसे २५ जून १९८३ की रात ने बदल दी थी। २५ जून १९८३ को भारत वन डे क्रिकेट का विश्व चैंपियन बना था। उसके बाद वन डे क्रिकेट की लोकप्रियता की ऐसी लहर आई कि क्रिकेट का वह नया रूप ही बहुत से लोगों के लिए असली क्रिकेट हो गया। २४ सितंबर २००७ कुछ ऐसी ही लहर टी-२० यानी ट्वेन्टी-ट्वेन्टी क्रिकेट के लिए लेकर आया।

और होता भी क्यों नहीं। अभी कुछ ही महीने हुए थे, जब भारत वन डे क्रिकेट के वर्ल्ड कप टूर्नामेंट से बड़े बेआबरू होकर पहले ही दौर में बाहर हुआ था। टीम की हालत डावांडोल थी। टीम की कमान नए कप्तान को सौंपी गई थी। भारतीय टीम बहुत कम उम्मीदें लेकर दक्षिण अफ्रीका पहुंची थी। सबकी जुबान पर था कि ऑस्ट्रेलिया, दक्षिण अफ्रीका या इंग्लैंड में से कोई टीम टी-२० के पहले विश्व कप की चैंपियन बनेगी, जिन्हें क्रिकेट के इस नए फ़ॉर्मेट का ज्यादा तजुर्बा है। भारत तो अभी कुछ समय पहले तक टी-२० क्रिकेट खेलने से ही इनकार करता रहा था। एक अनुभवहीन टीम, एक बड़ी चुनौती!

लेकिन धोनी के धुरंधरों ने वह कर दिखाया, जिससे क्रिकेट की दुनिया की अचंभित रह गई। और भारत के लोग फटी आंखों से कामयाबी का वह शिखर देख रहे थे, जिसके लिए वो २४ साल से लालायित थे। भारत एक बार फिर बादशाह था। क्रिकेट के उस फॉर्मेट में जो रोमांच और उत्तेजना से कहीं ज्यादा भरा हुआ था, फटाफट क्रिकेट का भी छोटा रूप, साढ़े तीन घंटों की कश्मकश के बाद फौरन नतीजा, पूरा मनोरंजन।

भारत की कामयाबी और क्रिकेट के इस नए रूप की कशिश ने ऐसा समां बांधा कि टी-२० क्रिकेट भारतीय क्रिकेट प्रेमियों के कल्पनालोक का हिस्सा बन गया। क्रिकेट को एक नया बाजार मिला। क्रिकेट के कारोबारी इस नए बाजार में कूद पड़े। इंडियन प्रीमियर लीग का जन्म हुआ। और आईपीएल ने अपने पहले ही साल में जो सफलता एवं लोकप्रियता पाई, उससे किक्रेट का पूरा गतिशास्त्र (डायनेमिक्स) ही बदल गया है।

वेस्ट इंडीज के कप्तान क्रिस गेल को सुनिए। कहा है कि टेस्ट क्रिकेट खेल कर वो ऊब गए हैं, अब सिर्फ टी-२० पर अपना ध्यान लगाएंगे। ऑस्ट्रेलिया के पूर्व विकेटकीपर ऐडम गिलक्रिस्ट की बातों पर गौर कीजिए। कहते हैं कि टी-२० में खिलाड़ियों को उतना ही दबाव झेलना पड़ता है, जितना टेस्ट क्रिकेट में यानी टी-२० अपनी क्वालिटी में कहीं भी टेस्ट क्रिकेट से कम नहीं है। शुद्धतावादी लोग ऐसी बातों से भड़केंगे। जो क्रिकेट को गहराई से जानते हैं या जिन्होंने ऊंचे स्तर पर क्रिकेट खेला है, वो जानते हैं कि अगर खिलाड़ी की संपूर्ण क्षमताओं का इम्तिहान कहीं होता है और टीमों की संपूर्ण क्षमता का मुकाबला कभी होता है, तो वह टेस्ट क्रिकेट ही है। टेस्ट क्रिकेट एक महाकाव्य या उपन्यास की तरह है, जिसमें पूरी जिंदगी के सभी पहलू, सारे उतार-चढ़ाव आते-जाते हैं। वन डे क्रिकेट एक कहानी की तरह आया, जो किसी एक घटना या एक अनुभव पर केंद्रित होती है। अब क्रिकेट का लघुकथा फॉर्मेट सामने है। बात संक्षेप में है, लेकिन पूरी है। आखिर लघुकथा में भी एक पूरा पैगाम तो होता ही है।

एक जमाने में वन डे क्रिकेट ने इस खेल के लिए नए सिरे से भीड़ जुटाई थी, जिससे औद्योगिक अर्थव्यवस्था की नई जीवन शैली के बीच अप्रासंगिक होते इस खेल में नई जान आई। ग्लोबलाइजेशन से फिर जीवन शैली बदली। और सैटेलाइट टीवी से कम समय में ही संपूर्ण मनोरंजन देने वाले दूसरे खेल भारतीय दर्शकों को भी उपलब्ध हो गए। इससे क्रिकेट को नई प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ा। अब टी-२० फॉर्मेट के साथ क्रिकेट ने उसका जवाब दिया है। इसलिए यह कहने वाले जानकार या खिलाड़ी गलत नहीं बोल रहे हैं कि टी-२० क्रिकेट का नया सहारा बना है, जिसका असर टेस्ट क्रिकेट पर भी होगा।

असर बेशक होगा। वन डे क्रिकेट ने जो कौशल खिलाड़ियों में भरा, उससे टेस्ट क्रिकेट में भी नई गति आई। आक्रमण और रक्षा की नई तकनीक सामने आई। अब निःसंदेह टी-२० के कौशल क्रिकेट के विकासक्रम में नए पहलू जोड़ेंगे। सिर्फ दो साल में टी-२० ने क्रिकेट को कैसे बदला है, इस पर खुद भारतीय कप्तान महेंद्र सिंह धोनी की राय पर ध्यान दीजिए- ‘बल्लेबाजों में नए ढंग के शॉट्स खेलने का रुझान बढ़ा है और वे ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। शॉर्टफाइन लेग के ऊपर से स्कूप और तेज गेंदबाजों की गेंदों पर रिवर्स स्वीप जैसे शॉट आपने टी-२० क्रिकेट के सामने आने के पहले कभी नहीं देखे होंगे। कप्तान भी ज्यादा जोखिम उठाने लगे हैं, मसलन स्पिनर्स से गेंदबाजी की शुरुआत कराना। दरअसल, यह सब जुआ है। कुछ दूसरे बदलाव भी देखने को मिले हैं। बल्लेबाज हर तेज गेंद को हिट करने की फिराक में नहीं रहते, वे स्थिति का जायजा लेते हैं और उसके मुताबिक गेंद खेलते हैं।’

जाहिर है, क्रिकेट के मैदान पर अब नए कौशल देखने को मिलेंगे। जो कौशल टी-२० में विकसित होंगे, वो टेस्ट के मैदान तक पहुंचेंगे। इससे क्रिकेट ज्यादा आकर्षक होगा। लेकिन एक अहम सवाल यह है कि क्या क्रिकेट के कर्ता-धर्ता टी-२० की नई लोकप्रियता को भुनाने के अभियान में कुछ ज्यादा ही बेसब्र नहीं हो गए हैं? टी-२० का वर्ल्ड कप हर दो साल में होगा। इस लिहाज से अगला विश्व कप २०११ में होगा और उसी साल वन डे क्रिकेट का वर्ल्ड कप भी होगा। इस बीच वन डे क्रिकेट की चैंपियन्स ट्रॉफी हर दो साल में होगी। बीच में आईपीएल और विभिन्न देशों की घरेलू टी-२० प्रतियोगिता की विजेता टीमों की चैंपियन्स लीग। इतने टूर्नामेंट के बीच क्या वह रोमांच और अहमियत बची रहेगी, जिसके लिए विश्व कप जाने जाते हैं? खेल प्रतियोगिताओं की विशिष्टता इंतजार के पहलू से भी कायम रहती है। जब हर साल एक ऐसा टूर्नामेंट हो, जिससे नए चैंपियन सामने आएं, तो उनकी क्या वही अहमियत होगी, जो चार साल बाद हुए टूर्नामेंट के चैंपियन के साथ जुड़ी होती है?

वन डे क्रिकेट ने अगर अपना महत्त्व खोया तो उसकी एक वजह ओवरडोज भी थी। टी-२० क्रिकेट के उभार के साथ वन डे क्रिकेट के सामने वजूद का संकट खडा है। लोगों को अब वन डे मैच न तो उतने रोमांचक लगते हैं और ना वे मनोरंजन के लिए अब अपना पूरा दिन बर्बाद करना चाहते हैं। यह सही है कि टेस्ट क्रिकेट बना रहेगा, क्योंकि आखिर क्रिकेट के इतने जानकार तो हमेशा रहेंगे, जो उसके महत्त्व को समझ सकें। लेकिन वन डे क्रिकेट की ऐसी क्या खासियत है जो उसे टी-२० की मार से बचा सके? आखिर वह भी मनोरंजन के लिए फटाफट रूप में सामने आया था, और अब उससे ज्यादा फटाफट फॉर्मेट सामने है।

बहरहाल, दुनिया और मानवता के विकासक्रम के साथ बहुत सी कलाएं, शिल्प और विधाएं खोती रही हैं। अगर क्रिकेट के किसी रूप के साथ भी ऐसा हो तो वह शोक मनाने का विषय नहीं है। बल्कि क्रिकेट की यह विशेषता एक संतोष का विषय है कि वह बदलते वक्त की जरूरतों के मुताबिक ढल जाता है और अपना एक नया रूप पेश कर देता है। क्रिकेट संभवतः दुनिया के एकमात्र ऐसा खेल है, जिसके तीन फॉर्मट एक साथ प्रचलन में हैं। तीन फॉर्मेट- जिनके मूलतत्व भले एक हों, लेकिन जिनकी विधाएं, तकनीक और कौशल में भारी फर्क है।

इंग्लैंड में शुरू हुए विश्व कप से क्रिकेट के इस विकासक्रम में कुछ नए पहलू जुड़ेंगे। वहां एक नया समां बंधेगा। टीमें नए लक्ष्य और पूरी तैयारियों के साथ वहां पहुंची हैं। महेंद्र सिंह धोनी के साथियों के सामने चुनौती अपना ताज बचाने की है। वो जानते हैं कि दूसरी टीमें उस ताज पर कब्जा जमाने कोशिश में कोई कसर नहीं छोड़ने वाली हैं। ताज पर राज करने की यह जंग शुरू हो चुकी है, जो अगले दो हफ्तों तक दुनिया के करोड़ों लोगों को खुद से बांधे रखेगी।

ताज बचा सकेगा भारत?

सट्टेबाजों की सुनें तो भारत एक बार फिर टी-२० विश्व कप के खिताब का सबसे मजबूत दावेदार है। इंग्लैंड के सट्टा बाजार में भारत के फिर चैंपियन बनने पर भाव १ पर ३.५ है। दक्षिण अफ्रीका पर भाव पांच और ऑस्ट्रेलिया पर भाव साढ़े पांच का है।
और क्रिकेट के ज्यादातर जानकारों की राय भी इससे अलग नहीं है। आम अनुमान यही है कि इन्हीं तीन टॉप टीमों से कोई एक विश्व विजेता का सेहरा पहनेगा। पाकिस्तान, श्रीलंका और न्यूजीलैंड की टीमों की बारी इसके बाद है।

हालांकि एक यह राय भी है कि टी-२० क्रिकेट में किसी टीम की संभावना को बढ़ा कर या कम करके आंकना एक भूल है। उदारहण आईपीएल का है। जो दो टीमें २००८ में सबसे नीचे थीं, २००९ में वो सबसे ऊपर रहीं। पिछले साल सबसे नीचे रही डेक्कन चार्जर्स इस बार चैंपियन बनी, और पिछले साल सातवें नंबर पर रही बैंगलोर रॉयल चैलेंजर्स रनर्स अप। तो क्या यह मुमकिन नहीं है कि इस बार विश्व कप का फाइनल न्यूजीलैंड और श्रीलंका के बीच हो?

क्रिकेट में सब कुछ मुमकिन है, मगर भारत का दावा मजबूत मानने के पीछे कई ठोस तर्क हैं। कप्तान धोनी ने कहा है कि भारत के पास ऐसे खिलाड़ी हैं, जो टी-२० फॉर्मेट के हिसाब से बिल्कुल फिट हैं। टीम में विशेषज्ञ गेंदबाज हैं, और ऐसे पार्टटाइम बॉलर हैं, जिन्होंने आईपीएल-२ में बेहतरीन फॉर्म दिखाया। खासकर पार्टटाइम स्पिनर्स के उपलब्ध होने से टीम के पास यह मौका है कि वह चाहे तो एक अतिरिक्त तेज गेंदबाज खेला सकती है।

आईपीएल में जितने भारतीय खिलाड़ियों ने हिस्सा लिया, उतने किसी और देश के नहीं। यानी भारतीय खिलाड़ियों के पास टी-२० का फिलहाल सबसे ज्यादा अनुभव है, और वे आईपीएल टूर्नामेंट से सीधे विश्व कप में पहुंचे हैं, यानी वो टी-२० के मोड में भी हैं।

हालांकि धोनी यह नहीं मानते कि भारत को आसान ग्रुप मिला है, क्योंकि उनकी राय में टी-२० में ना तो बांग्लादेश को हलके से लिया जा सकता है, और ना आयरलैंड को। आखिर इन दो टीमों ने ही २००७ के वन डे वर्ल्ड कप से भारत और पाकिस्तान को बाहर किया था। इसके बावजूद अगर दूसरे ग्रुप्स को देखें तो शुरुआती दौर में भारत का काम आसान लगता है।

बहरहाल, भारत की कुछ चिंताएं भी हैं। और इनमें सबसे बड़ी चिंता ओपनिंग बल्लेबाजों का फॉर्म में नहीं होना है। आईपीएल में गौतम गंभीर ने बेहद कमजोर प्रदर्शन किया और वीरेंद्र सहवाग भी दो पारियों को छोड़ कर कोई बेहतर हाथ नहीं दिखा सके। फिर जहीर खान पूरी तरह फिट नहीं हैं। वो कंधे की चोट के साथ इंग्लैंड पहुंचे हैं। इंग्लैंड के माहौल में जहां गेंद तेजी से स्विंग करती है, जहीर खान भारत के लिए तुरुप का पत्ता हो सकते हैं, बशर्ते वो फिटनेस की समस्या से उबर सकें। इसके अलावा एक और पहलू, जिसे भारत की मजबूती माना जा रहा है, वह उसके लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। आईपीएल-२ ने खिलाड़ियों को तजुर्बा जरूर दिया है, लेकिन थकाया भी है। अगर थकान का असर फॉर्म पर पड़ा तो सौदा महंगा पड़ सकता है।