Friday, May 9, 2008

डेमोक्रेटिक पार्टी का ‘ओन गोल’


सत्येंद्र रंजन
बराक ओबामा अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक पार्टी का उम्मीदवार बनने की जंग लगभग जीत चुके हैं। बीते मंगलवार को इंडियाना और नॉर्थ केरोलीना राज्यों की डेमोक्रेटिक प्राइमरी के नतीजों का सभवतः यही पैगाम रहा। हालांकि अब भी छह राज्यों में उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया बाकी है, लेकिन वहां से डेमोक्रेटिक राष्ट्रीय अधिवेशन के लिए महज २१७ प्रतिनिधि चुने जाने हैं, जबकि अब तक की सूची में ओबामा हिलेरी क्लिंटन पर १६५ प्रतिनिधियों की बढ़त बना चुके हैं। किसी भी हाल में उन छह राज्यों के सभी प्रतिनिधि हिलेरी क्लिंटन को नहीं मिल सकते और इस तरह अब यह तय है कि निर्वाचित प्रतिनिधियों की आखिरी सूची में ओबामा की बढ़त कायम रहेगी। उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया में हुए मतदान में भी ओबामा की बढ़त जारी है। उन्हें अब तक ४९.६ फीसदी वोट मिले हैं, जबकि हिलेरी क्लिंटन ४७.३ प्रतिशत वोट ही हासिल कर पाई हैं और इस तरह ओबामा से २.३ फीसदी वोटों से पिछड़ी हुई हैं।

इस सूरत के बावजूद अगर हिलेरी क्लिंटन अब भी मैदान में डटी हुई हैं, तो इसके पीछे उनका अपना गणित है। दरअसल, अब यह भी तय हो गया है कि प्राइमरी और कॉकस के जरिए ओबामा या क्लिंटन दोनों में से कोई भी स्वतः उम्मीदवारी हासिल करने के लिए जरूरी २,०२५ प्रतिनिधियों की निर्णायक संख्या हासिल नहीं कर पाएगा। ऐसे में निर्णायक भूमिका उन प्रतिनिधियों की होगी, जिन्हें सुपर डेलीगेट्स कहा जाता है। ये पार्टी के निर्वाचित जन प्रतिनिधि, पूर्व राष्ट्रपति, गवर्नर और पार्टी पदाधिकारी होते हैं और इनकी संख्या ६०१ है। इन प्रतिनिधियों में जिन लोगों ने अपनी पसंद अब तक जाहिर की है, उनमें हिलेरी क्लिंटन की बढ़त बनी हुई है। सुपर डेलीगेट्स के साथ सुविधा यह होती है कि वे आखिरी वक्त कर अपना रुख बदल सकते हैं। हिलेरी क्लिंटन की अब सारी जंग इन लोगों को यह समझाने की है कि डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर बराक ओबामा ने भले भारी समर्थन हासिल किया हो, लेकिन जब बात नवंबर में होने वाले राष्ट्रपति चुनाव की आएगी तो ओबामा आम अमेरिकी मतदाताओं के बीच इतना समर्थन हासिल नहीं कर पाएंगे, जिससे वे रिपब्लिकन उम्मीदवार जॉन मैकेन को हरा सकें।

जनमत सर्वेक्षणों पर गौर करें तो क्लिंटन के दावे में दम नजर आता है। अमेरिकी राजनीति की तस्वीर पेश करने वाली वेब साइट रियल क्लीयर पॉलिटिक्स डॉट कॉम के मुताबिक मैकेन पर जहां ओबामा को २.६ फीसदी की बढ़त हासिल है, वहीं हिलेरी क्लिंटन मैकेन से ३.९ फीसदी अंतर से आगे हैं। यानी अगर क्लिंटन उम्मीदवार बनती हैं तो उनके जीतने की संभावना ज्यादा रहेगी। असल में ओबामा भले ही ज्यादातर राज्यों में जीते हों, लेकिन अधिकांश बड़े राज्यों में, जो राष्ट्रपति चुनाव में निर्णायक होते हैं, वहां हिलेरी क्लिंटन को ज्यादा समर्थन मिला है। इसी तरह अगर अफ्रीकी मूल के अमेरिकी नागरिकों को छोड़ दें तो हिलेरी क्लिंटन को उन सभी समूहों में ज्यादा समर्थन मिला है जो डेमोक्रेटिक पार्टी का वोट आधार रहे हैं।

बराक ओबामा ने दरअसल निर्दलीय समूहों, कुछ पहले रिपब्लिकन पार्टी का समर्थक रहे समूहों और खासकर नौजवानों को ज्यादा आकर्षित किया है। ह्वाइट हाउस की होड़ में वे अपनी इराक युद्ध विरोधी छवि के साथ उतरे। जब इराक युद्ध अमेरिकी जन मानस में एक गहरा नासूर बन चुका था, उस समय बहुत से लोगों को शुरुआत से इस युद्ध का विरोधी होने की ओबामा की छवि ने आकर्षित किया। ओबामा एक ओजस्वी वक्ता के रूप में सामने आए और राजनीति की आम पेचीदगियों में न पड़ते हुए उन्होंने परिवर्तन का नारा दिया, जो सटीक बैठा। ‘वॉशिंगटन ऐस्टैबलिशमेंट’ को अपने निशाने पर लेते हुए उन्होंने एक तीर से दो शिकार किए। इससे उन्होंने जॉर्ज बुश जूनियर के प्रशासन से लोगों की गहरी नाराजगी का फायदा उठाया और साथ ही यह संदेश दिया कि हिलेरी क्लिंटन उसी पुरानी व्यवस्था की नुमाइंदा हैं, जिसकी वजह से आम नागरिकों के हाथ में अपने देश का नियंत्रण नहीं रह गया है।

इस दौर में ओबामा का सारा जोर मतभेद पाटने पर रहा है। नस्ल, वर्ग और क्षेत्र के विभाजनों से ऊपर उठ कर एक अमेरिका का अपना संदेश वे बहुत से लोगों तक पहुंचाने में कामयाब रहे हैं। जब उनके पुराने पादरी जेरमी राइट ने अमेरिका में काले लोगों के साथ अन्याय के सवाल पर जोशीला भाषण दिया तो ओबामा ने फौरन उसकी निंदा करते हुए उनसे अपने को अलग करने का एलान किया। ओबामा के इस भाषण को कई हलकों में ऐतिहासिक में बताया गया है। खासकर धनी गोरे और सभ्रांत हलकों में, जहां नस्ल के सवालों पर परदा डालने की सहज प्रवृत्ति रहती है। लेकिन मुश्किल यह है कि ये तबके रिपब्लिकन पार्टी के वोटर हैं और उनका समर्थन असली मुकाबले में ओबामा के ज्यादा काम नहीं आ सकता है।

डेमोक्रेटिक पार्टी के असली समर्थक तबकों- मसलन, मेहनतकश और मध्य वर्ग के गोरे समुदायों और हिस्पैनिक समूहों में ओबामा ज्यादा लोकप्रिय नहीं हैं। इन तबकों ने हिलेरी क्लिंटन में अपना ज्यादा भरोसा जताया है। इसकी वजह यह है कि ठोस कार्यक्रमों की बात करें तो ओबामा बेहद हलके नजर आते हैं। उन्होंने लच्छेदार भाषा में जोशीले भाषण खूब दिए हैं, लेकिन अर्थव्यवस्था, स्वास्थ्य देखभाल और यहां तक कि विदेश नीति के सवालों पर भी कोई वैकल्पिक कार्यक्रम या नीति पेश करने में नाकाम रहे हैं। इन बिंदुओं पर हिलेरी क्लिंटन कहीं ज्यादा ठोस नजर आती हैं। मसलन, स्वास्थ्य देखभाल के मुद्दे पर उन्होंने पूरी बारीकियों के साथ अपना कार्यक्रम रखा है, जबकि ओबामा यह कह कर इसका मजाक उड़ाते रहे हैं कि हिलेरी सब पर स्वास्थ्य बीमा जबरन थोपना चाहती हैं।

दरअसल, मुद्दों पर स्पष्ट रुख की वजह से ही हिलेरी क्लिंटन को बांटने वाली शख्सियत कहा गया है। जबकि ओबामा साफ रुख न लेकर मतभेदों को पाटने वाली अपनी छवि पेश करने में सफल रहे हैं। इससे उन्हें उन हलकों से खूब समर्थन मिला है, जो परंपरागत रूप से डेमोक्रेटिक पार्टी के साथ नहीं रहे हैं। लेकिन यही उनकी उम्मीदवारी के सामने सबसे बड़ा सवाल है। हिलेरी क्लिंटन की कोशिश अब सुपर डेलीगेट्स को यह समझाने की है कि अफ्रीकी-अमेरिकियों को छोड़कर डेमोक्रेटिक पार्टी का बाकी असली समर्थन आधार उनके साथ है औऱ इसीलिए उनके जीतने की संभावना ज्यादा मजबूत है।

राष्ट्रपति चुनाव के इस साल में रिपब्लिकन पार्टी ने बेहद कमजोर संभावनाओं के साथ कदम रखा। लेकिन उसने जल्दी उम्मीदवार चुन कर अपने लिए एक अनुकूल स्थिति पैदा की। जॉन मैकेन चुनाव प्रचार में उतर चुके हैं और रिपब्लिकन पार्टी के समर्थक दक्षिणपंथी धनी समूह और मीडिया उनकी छवि उभारने के अभियान में जुटे हुए हैं। दूसरी तरफ डेमोक्रेटिक उम्मीदवारी में होड़ लगातार तीखी होती गई है। इस क्रम में ओबामा और क्लिंटन दोनों ने एक दूसरे पर हमले करने के काफी हथियार अपने विरोधियों को खुद मुहैया कर दिए हैं। तमाम संभावनाएं इस ओर संकेत कर रही हैं कि यह होड़ अभी और लंबा खिंचेगी और यह मुमकिन है कि अगस्त में होने वाले डेमोक्रेटिक पार्टी के अधिवेशन में ही जाकर उम्मीदवारी आखिरी रूप से तय हो।
अगर अंततः डेमोक्रेटिक पार्टी के उम्मीदवार बराक हुसेन ओबामा ही होते हैं तो इसमें कोई संदेह नहीं कि रिपब्लिकन चुनाव मशीन नस्ल, और उनके अतीत के कई झूठे-सच्चे किस्से और सवाल जोरशोर से उठाकर मतदाताओं को भरमाने की कोशिश करेगी। बिना ठोस कार्यक्रम के वे डेमोक्रेटिक समर्थन आधार में कैसे उत्साह भरेंगे और ब्लैक समुदाय के एक नेता के राष्ट्रपति बनने की संभावना से भड़कने वाली गोरों की प्रतिक्रिया का तोड़ कैसे निकालेंगे, यह उनकी कामयाबी की असली कसौटी होगी। उधर मौजूदा हालात में अगर हिलेरी क्लिंटन उम्मीदवार बन जाती हैं तो उनके सामने भी चुनौतियां कम नहीं होंगी। इससे रिपब्लिकन पार्टी को यह प्रचार करने का मौका मिलेगा कि डेमोक्रेटिक पार्टी में आम जन के मत का कोई मोल नहीं है, सुपर डेलीगेट यानी पार्टी के मठाधीश वहां जनमत की अवहेलना कर अपनी पसंद के उम्मीदवार को जिता सकते हैं। इससे पार्टी की लोकतांत्रिक छवि प्रभावित होगी।

लेकिन अब हकीकत यही है कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने शुरुआत में अपने लिए अनुकूल दिख रहे हालात को उलझा दिया है। ओबामा और हिलेरी क्लिंटन की होड़ में लोगों को मजा खूब आया है और इससे अमेरिकी राजनीति में एक तरह की रफ्तार भी आती नजर आई है, लेकिन चुनाव संभावनाओं के लिहाज से देखें तो यह पूरा दौर, अगर फुटबॉल की शब्दावली में कहें, तो डेमोक्रेटिक पार्टी के लिए ‘ओन गोल’ करने जैसा है।

Wednesday, May 7, 2008

क्रीमी लेयर और न्यायपालिका


सत्येंद्र रंजन
अन्य पिछड़ी जातियों के लिए ऊंचे सरकारी शिक्षा संस्थानों में सत्ताइस फीसदी आरक्षण को संविधान सम्मत ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से विधायिका और न्यायपालिका में एक बड़े टकराव की आशंका टल गई। केंद्र की यूपीए सरकार ने इस फैसले से राहत की सांस ली और इसे अपनी जीत बताकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के मुताबिक इस आरक्षण पर अमल में जुट गई है। लेकिन हकीकत यही है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक न्याय की समर्थक शक्तियों की महज आधी जीत है। यह ओबीसी आरक्षण की सैद्धांतिक जीत जरूर है, लेकिन व्यवहार में इस आरक्षण के प्रभावी होने के रास्ते में हाल के न्यायिक फैसले ने कई अड़चनें भी खडी कर दी हैं।

इस आरक्षण को संभव बनाने के लिए संविधान में हुए ९३वें संशोधन के बारे में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति केजी बालकृष्णन की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा- जहां तक सरकारी सहायता प्राप्त शिक्षा संस्थानों की बात है, यह संशोधन संविधान के बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं करता। इसी संविधान संशोधन के तहत संसद में पारित हुए शिक्षा संस्थान (दाखिला में आरक्षण) कानून २००६ को सुप्रीम कोर्ट ने संविधान सम्मत करार दिया। इस तरह पूर्णतः सरकारी या सरकारी सहायता से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों में ओबीसी आरक्षण का रास्ता साफ हो गया।

लेकिन यह रास्ता क्रीमी लेयर की अवधारणा पर कोर्ट के काफी जोर देने तथा जजों की कई टिप्पणियों से खासा संकरा हो गया है। कोर्ट ने न सिर्फ क्रीमी लेयर को आरक्षण के फायदे से बाहर रखने का निर्देश दिया, बल्कि यह व्यवस्था भी दे दी है कि अगर आरक्षित सीटें अन्य पिछड़ी जातियों के गैर क्रीमी लेयर उम्मीदवारों से नहीं भरती हैं तो वे सीटें सामान्य श्रेणी के छात्रों के भरी जाएं। पांच जजों ने चार अलग-अलग फैसले सुनाए और इनमें से एक फैसले में यह भी कहा गया कि आम छात्रों से दस फीसदी कम नंबर लाने वाले छात्रों तक ही आरक्षण का लाभ सीमित रहे। क्रीमी लेयर की चर्चा करते हुए एक आदेश यह दिया गया कि मौजूदा और पूर्व सांसदों एवं विधायकों की संतानों को इसमें शामिल किया जाए, ताकि उन्हें आरक्षण का फायदा नहीं मिल सके। इन व्यवस्थाओं से जजों की सोच का साफ संकेत मिलता है। उनकी टिप्पणियां यह साफ करती हैं कि उनकी सोच में ओबीसी आरक्षण सामाजिक न्याय का कोई कदम नहीं, बल्कि वोट बैंक की राजनीति है, जिस पर लगाम लगाना जरूरी है।

देश की सामाजिक हकीकत से वाकिफ कोई व्यक्ति यह आसानी से समझ सकता है कि जिन शर्तों के साथ आरक्षण को हरी झंडी दी गई है, उनके रहते इस आरक्षण के मकसद को कभी हासिल नहीं किया जा सकता। यहां गौरतलब है कि मौजूदा फैसला इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले में १९९३ में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले के रोशनी में आया है। तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति एमएच कीनिया की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने उस फैसले में मंडल आयोग की सिफारिशों के मुताबिक केंद्र सरकार की नौकरियों में अन्य पिछड़ी जातियों के लिए सत्ताइस फीसदी आरक्षण को सही ठहराया था। लेकिन उसके साथ ही क्रीमी लेयर की अवधारणा भी उससे जोड़ दी थी। तब सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि आरक्षण का लाभ क्रीमी लेयर को नहीं मिलना चाहिए, बल्कि जो परिवार आरक्षण का लाभ पाकर आगे बढ़ चुके हैं, धीरे-धीरे उन्हें आरक्षण के फायदे से अलग करने की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए।

तब सुप्रीम कोर्ट ने क्रीमी लेयर की अवधारणा को इस आधार पर संविधान सम्मत बताया था कि संविधान में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों को आरक्षण देने की बात कही गई है, न कि पिछड़ी जातियों को। कोर्ट ने मंडल आयोग के इस निष्कर्ष को माना कि भारतीय समाज में जाति सामाजिक हैसियत और आर्थिक हालत का एक पैमाना है, लेकिन यह स्वीकार नहीं किया कि एक जाति के सभी लोग इस पैमाने के तहत आते हैं। कोर्ट का कहना था कि जाति, आर्थिक हैसियत और शैक्षिक स्थिति को एक साथ लेते हुए वे वर्ग तय किए जा सकते हैं, जिन्हें आरक्षण का फायदा मिले। तब से क्रीमी लेयर की अवधारणा आरक्षण के संदर्भ में मौजूद है और अक्सर यह मांग उठती रही है कि इसे अनुसूचित जातियों और जन जातियों के लिए जारी आरक्षण में भी लागू किया जाए। फिलहाल जब ओबीसी आरक्षण का दायरा ऊंची शिक्षा में फैलाया गया है तो सुप्रीम कोर्ट ने यहां इस पर सख्ती से अमल का आदेश दिया है।

आरक्षण का फायदा उत्तरोत्तर ज्यादा गरीब और वंचित तबकों को मिले, इस पर किसी को कोई एतराज नहीं है। लेकिन मुश्किल इस व्यवस्था से है कि अगर इन तबकों से आरक्षित सीटें नहीं भर पाती हैं तो फिर उन सीटों को सामान्य श्रेणी के छात्रों से भर दिया जाए। यह व्यवस्था आरक्षण के उद्देश्य को विफल कर देती है। सवाल है कि अगर पिछड़ी जातियों के क्रीमी लेयर के छात्र उन सीटों पर नहीं आएंगे तो वे सीटें ऊंची जातियों के क्रीमी लेयर जैसी हैसियत वाले छात्रों को क्यों मिलनी चाहिए? साथ ही इस चर्चा में आरक्षण से जुड़ी एक बेहद अहम बात नजरअंदाज कर दी गई है कि आरक्षण कोई गरीबी हटाओ कार्यक्रम नहीं है। इसका मकसद निर्णय की प्रक्रिया में उन सभी समूहों और जातियों की नुमाइंदगी सुनिश्चित करना है, जो सदियों से जाति व्यवस्था के कठोर कायदों की वजह से इससे वंचित रहे हैं। इसलिए यह व्यवस्था तो ठीक है कि आरक्षण का लाभ देने में प्राथमिकता आर्थिक आधार पर तय हो, लेकिन इसे अंतिम शर्त बना देना आरक्षण की मूल धारणा पर प्रहार है।

दरअसल, ओबीसी आरक्षण के बारे में सुप्रीम कोर्ट का हाल का फैसला ऐसी टिप्पणियों से भरा हुआ है, जो आरक्षण का पक्ष लेने के बजाय आरक्षण पर सवाल खड़ा करती लगती हैं। १९५१ में संविधान में पहला संशोधन सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए आरक्षण को संभव बनाने के लिए किया गया था। इस संशोधन के जरिए संविधान के अनुच्छेद १५ में चौथी धारा जोड़ी गई थी। अनुच्छेद १५ (४) के जरिए सरकार को सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्गों अथवा अनुसूचित जातियों एवं अनुसूचित जन जातियों की तरक्की के लिए कदम उठाने का अधिकार दिया गया। ताजा फैसले में न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी ने इस कदम के उद्देश्य पर ही सवाल खड़ा कर दिया है। उन्होंने टिप्पणी की है कि यह व्यवस्था करते समय पहली संसद संविधान निर्माताओं के उद्देश्य से भटक गई। उसने ऐसा संशोधन पास किया, जिससे जातिवाद कमजोर होने के बजाय मजबूत हुआ। जाहिर है, न्यायपालिका की एक धारा आरक्षण जैसे कदमों के साथ खुद को सहज महसूस नहीं कर रही है। वह न्याय, समानता और संवैधानिक मूल्यों के बारे में समाज के परंपरागत प्रभु वर्ग की सोच के ज्यादा करीब नज़र आती है। इस सोच में यह बात गहरी बैठी हुई है कि अन्याय के शिकार दरअसल, वे जातियां हैं जिनके हाथ से आरक्षण की वजह से प्रशासनिक वर्चस्व एवं रोजगार के महत्त्वपूर्ण अवसर निकल रहे हैं।

हाल के वर्षों में न्यायपालिका का रुझान ऐसे तबकों के हितों की चिंता करना ज्यादा नजर आता रहा है। हाल का फैसला भी काफी कुछ इसी क्रम में है। इंदिरा साहनी बनाम भारत सरकार मामले के पूर्व फैसले, शिक्षा में ओबीसी के लिए आरक्षण के सवाल पर संपूर्ण राजनीतिक सहमति तथा विधायिका में इस पर सर्वसम्मति के माहौल में सुप्रीम कोर्ट ने सिद्धांततः इस आरक्षण को संवैधानिक जरूर माना, लेकिन इसके औचित्य पर कुछ सवाल भी खड़े कर दिए हैं।

अगर लोकतांत्रिक समाजों में न्यायपालिका के इतिहास पर गौर किया जाए तो उसकी इस भूमिका को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है। भारतीय संविधान में पहला संशोधन ही इसलिए करना पड़ा क्योंकि कोर्ट ने कुछ जातियों और समुदायों के लिए शिक्षा संस्थानों में आरक्षण के मद्रास सरकार के फैसले को खारिज कर दिया। इसी तरह न्यायपालिका ने १९६० के दशक में बैंकों के राष्ट्रीयकरण और पूर्व राजा-महाराजाओं को मिलने वाले प्रीवी पर्स को खत्म करने के सरकार और संसद के फैसले को असंवैधानिक बता दिया था। उसके पहले भूमि सुधारों को लागू करने की सरकार की कोशिश भी न्यायिक हस्तक्षेप से बाधित होती रही, जिसकी वजह से संसद ने संविधान में नौवीं अनुसूची की व्यवस्था की, जिसे पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने निष्प्रभावी कर दिया। ये तमाम फैसले धनी और सामाजिक वर्चस्व रखने वाले समूहों के हित में रहे हैं।

अगर अमेरिकी इतिहास पर गौर करें तो वहां भी ऐसे न्यायिक फैसलों की कोई कमी नहीं है। १८६५ में अमेरिकी संविधान में १३वें संशोधन के जरिए गुलामी प्रथा को खत्म किया गया और १९६८ में १४वें संशोधन के जरिए सभी नागरिकों के लिए कानून के समान संरक्षण की व्यवस्था की गई। ये दौर था जब अश्वेत समुदायों के साथ खुलेआम भेदभाव किया जाता था और उन्हें उन स्कूलों में दाखिला नहीं मिलता था, जिनमें गोरे बच्चे पढ़ते थे। अश्वेत समुदायों को गोरों से अलग रखने की नीतियों को समान संरक्षण कानून के तहत जब १८९८ सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई तो सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि ये नीतियां इस कानून का उल्लंघन नहीं करतीं। १८९० के दशक के मध्य में ही अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने आय कर को असंवैधानिक घोषित करते हुए धनी तबकों को बड़ी राहत दी थी। १९३० के दशक में जब भारी मंदी के बाद तत्कालीन राष्ट्रपति फ्रैंकलीन डी रूजवेल्ट ने न्यू डील कार्यक्रम के तहत वित्तीय क्षेत्र पर लगाम कसने और कमजोर तबकों को राहत पहुंचाने की कोशिश की, तो सुप्रीम कोर्ट ने इसे असंवैधानिक करार दिया। तब चिढ़ कर रूजवेल्ट ने ये टिप्पणी की थी कि सुप्रीम कोर्ट ने अब फैसला दे दिया है, उसे खुद ही इस पर अमल करने दीजिए!

दरअसल, न्यायपालिका के ऐसे रुझान की वजह उसकी अंदरूनी संरचना से जुड़ी होती है। यहां आम तौर पर समाज के प्रभु वर्ग के लोग पहुंचते हैं और उसी तबके की सोच से उनका मनोविज्ञान प्रभावित रहता है। इस संदर्भ में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार के दौर में संविधान पर अमल की समीक्षा के लिए बने आयोग की यह टिप्पणी गौरतलब है- उच्चतर न्यायपालिका में अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जन जातियों और अन्य पिछड़ी जातियों का प्रतिनिधित्व नाकाफी है। विभिन्न हाई कोर्टों के ६१० जजों में सिर्फ २० जज ही अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जन जातियों के हैं। दरअसल, हर क्षेत्र में ऐसी हालत की वजह से आरक्षण की नीति अपनानी पड़ी। आरक्षण का असली मकसद हर क्षेत्र में ऐसे ही वंचित तबकों के प्रतिनिधित्व में बढ़ोतरी करना है। इसके बिना लोकतंत्र महज एक औपचारिक ढांचा ही बना हुआ है। लोकतंत्र की जड़ें मजबूत करने और सामाजिक न्याय को हकीकत में बदलने के लिए आरक्षण की इस मूल भावना पर अमल जरूरी है। लेकिन हाल के सुप्रीम कोर्ट के फैसले से ऐसा अमल मुश्किल हो गया है। राजनीतिक दलों और तमाम लोकतांत्रिक शक्तियों को इस फैसले के इस निहितार्थ को जरूर समझना चाहिए।

इसलिए क्रीमी लेयर की अवधारणा और उसके व्यावहारिक रूप पर आज गंभीर बहस खड़ी किए जाने की जरूरत है। इस पर संसद में न सिर्फ चर्चा होनी चाहिए, बल्कि क्रीमी लेयर कौन है, इसे तय करने का अधिकार भी संसद को खुद अपने हाथ में लेना चाहिए। लेकिन दुर्भाग्य की बात यह है कि राजनीतिक दल इस जरूरत के प्रति लापरवाह नजर आते हैं। न्यायपालिका ने १९७३ में केशवानंद भारती मामले संविधान के बुनियादी ढांचे की अवधारणा देकर संसद के हाथ बांध दिए और ये दल खामोश रहे। २००७ में नागरिकों के मूल अधिकार की न्यायिक व्याख्या कर सुप्रीम कोर्ट ने संवैधानिक मामलों में अपनी निर्णायक स्थिति बना ली और इस पर भी संसद में चर्चा करने की जरूरत नहीं महसूस की गई। अब यही हाल क्रीमी लेयर की अवधारणा पर होता दिख रहा है। लेकिन ये गौर करने की बात है कि इससे वास्तविक लोकतंत्र का वास्तविक दायरा सिकुड़ रहा है।

Tuesday, April 15, 2008

अब पहले खाने के बारे में सोचिए!


सत्येंद्र रंजन
दुनिया जिस समय विकास के एक नए स्तर पर पहुंची मानी जा रही है और ये मान लिया गया था कि अब इंसान की बुनियादी समस्याएं देर सबेर हल हो जाएंगी, उसी समय मानव समाज को सबसे बुनियादी समस्या ने घेर लिया है। समस्या खाने की है। अनाज का गहरा संकट सारी दुनिया में पैदा हो गया है और उसका सीधा असर लगभग हर समाज पर पड़ रहा है। जाहिर है, हर मसले की तरह इस संकट का भी सबसे बुरा असर गरीबों पर पड़ रहा है। विश्व बैंक का अनुमान है कि अगर इस समस्या का जल्द हल नहीं निकला तो निम्न मध्य वर्ग के दस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाएंगे। लेकिन सवाल है कि आखिर ये हल कैसे निकलेगा? क्या दुनिया भर की सरकारें इसके लिए जरूरी संकल्प दिखाएंगी?
बहरहाल, किसी समाधान पर चर्चा के पहले समझने की सबसे जरूरी बात यह है कि आखिर ये समस्या पैदा क्यों हुई? बीसवीं सदी में खेतों की पैदावार बढ़ाने की नई तकनीक सामने आई, जिससे भूख पर विजय की वास्तविक संभावनाएं पैदा हुईं। खेती में उत्पादकता में भारी बढ़ोतरी ने आबादी बढ़ने के बावजूद अतिरिक्त अनाज की उपलब्धता को संभव बनाया। लेकिन २१वीं सदी के पहले दशक में मानव समाज की वह उपलब्धि कहीं खोती नज़र आ रही है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? स्पष्टतः इसकी इंसानी और आसमानी दोनों वजहें हैं, लेकिन इंसानी वजहें ज्यादा हैं और ये वजहें तब तक दूर नहीं होंगी, जब तक सरकारों की नीतियों और प्रभावशाली तबकों की सोच में बुनियादी बदलाव नहीं आता है।

पहले इस संकट के आसमानी यानी कुदरती वजहों पर गौर करते हैं। हालांकि इसमें एक खास पहलू यह है कि आसमानी वजहों के पीछे भी एक हद तक इंसान का ही हाथ है। अभी दुनिया को जिस खाद्य संकट का सामना करना पड़ रहा है, उसके पीछे एक कारण ऑस्ट्रेलिया में पिछले दो साल से पड़ रहा अकाल है। ऑस्ट्रेलिया दुनिया में गेहूं का दूसरा सबसे बड़ा निर्यातक है। वहां से निर्यात न हो पाने की वजह से विश्व बाजार में गेहूं की भारी कमी हो गई है। मलेशिया और फिलीपीन्स जैसे पूर्वी एशियाई देशों में चावल की पैदावार घटने से ऐसी ही स्थिति चावल को लेकर बनी है।

लेकिन कुदरत की मार पर आसानी से काबू पाया जा सकता था, अगर अमेरिका और लैटिन अमेरिका के कुछ देशों में अनाज की खेती के लिए उतनी जमीन मौजूद रहती जितनी अभी हाल तक रहती थी और वहां अनाज का इस्तेमाल खाने के बजाय दूसरे मकसद के लिए नहीं होता। दरअसल, कच्चे तेल के बढते दाम और तेल के भंडार खत्म होने के अंदेशे की वजह से अमेरिका जैसे देशों ने जैव-ईंधन पर जोर देना शुरू कर दिया है। वहां मक्के और गन्ने की खेती ज्यादा जमीन पर की जाने लगी है और इन फसलों का इस्तेमाल इथोनेल जैसे बायो-फ्यूयल यानी जैव ईंधन बनाने के लिए होने लगा है। अमेरिका और ब्राजील जैसे देशों की सरकारें जैव ईंधन के लिए काम आने वाली फसलों की खेती के लिए सब्सिडी दे रही हैं और किसानों को इसकी खेती में ज्यादा फायदा नज़र आ रहा है। इससे खाने के अनाज के लिए उपलब्ध जमीन और अनाज की मात्रा दोनों घट रही है। इससे विश्व बाजार में अनाज की कमी हो गई है और उसकी कीमत बढ़ रही है।

भारत जैसे बडी आबादी वाले देश में जहां अनाज की आत्म-निर्भरता महज तकनीकी तौर पर ही हासिल की जा सकी थी, हाल के वर्षों में अनाज के बजाय कपास और ऐसी दूसरी फसलों की खेती का चलन बढता गया है, जिसे बाजार में बेच कर पैसा कमाया जा सके। किसान ऐसी खेती करने पर इसलिए मजबूर होते हैं, क्योंकि अनाज का उन्हें भरपूर दाम नहीं मिलता और अनाज उपजाने वाले किसान गरीबी में दम तोड़ते रहते हैं। दुर्भाग्य यह है कि बिक्री के लिए उपजाई जाने वाली गैर अनाज फसल में नुकसान होने का अंदेशा सामान्य से ज्यादा रहता है और इसीलिए विदर्भ जैसे इलाके में किसान सबसे गहरे संकट में हैं। लेकिन इस अनुभव से कोई सबक लेने के बजाय अब भारत भी जैव ईंधन की दौड़ में शामिल होने को तैयार होता दिख रहा है। इसके लिए ऐसी नीति का खाका तैयार कर लिया गया है और खबर है कि मई के आखिर तक कृषि मंत्री शरद पवार की अध्यक्षता वाली मंत्रियों की एक समिति इसे अंतिम रूप देने वाली है। इस खाके मुताबिक २०१७ तक देश की परिवहन ईंधन की कुल जरूरत का दस फीसदी जैव ईंधन से हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। इसके लिए एक करोड़ २० लाख हेक्टेयर में जैव ईंधन तैयार करने में काम आने वाली फसलें उपजाई जाएंगी। गौरतलब है कि देश में बायो डीजल तैयार करने पर पहले ही काम शुरू हो चुका है। आंध्र प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में इसके लिए छह लाख एकड़ जमीन पर एक खास पौधे की खेती की जा रही है।

जाहिर है, खाद्य संकट का सीधा रिश्ता अब तेल से जुड़ गया है। ऐसे में इसमें कोई हैरत की कोई बात नहीं कि तेल और अनाज की महंगाई साथ-साथ दुनिया को झेलनी पड़ रही है। विश्व बाजार में कच्चे तेल का भाव ११० डॉलर प्रति बैरल की सीमा को लांघ चुका है। तेल का दाम बढ़ने से परिवहन महंगा होता है, उससे अनाज की आपूर्ति महंगी होती है। उधर धनी-मानी तबकों की जीवन शैली महंगी होती है और उनमें भविष्य में ऊर्जा की उपलब्धता को लेकर आशंकाएं पैदा होती है। इससे वे विकल्प की तलाश में जुटते हैं और उन्होंने एक विकल्प जैव ईंधन के रूप में चुना है। इस दुश्चक्र से दुनिया भर के गरीबों के मुंह से आहार छीने जाने की हालत पैदा हो गई है।

अगर सिर्फ भारत के आंकड़ों पर गौर करें तो यहां गेहूं, मोटे अनाज, दलहन और तिलहन की खेती वाली जमीन में लगातार गिरावट आ रही है। मसलन, पिछले साल देश में दो करोड़ ८२ लाख १४ हजार हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की खेती हुई थी, तो इस साल यह खेती सिर्फ दो करोड़ ७७ लाख ४८ हजार हेक्टेयर जमीन पर हुई है। मोटे अनाजों की पिछले साल ७० लाख ५७ हजार हेक्टेयर जमीन पर खेती हुई थी, जो इस साल ६८ लाख १६ हजार हेक्टेयर रह गई है। यही हाल दालों और तिलहन का भी है। साफ है कि अनाज की पैदावार देश की कृषि नीति में प्राथमिकता नहीं रह गई है, औऱ इसका नतीजा अब सामने आने लगा है।

लेकिन अनाज संकट की वजहें यहीं तक सीमित नहीं हैं। इसका संबंध बिगड़ते जलवायु और विकासशील देशों में खान-पान की बदलती आदतों से भी है। धरती के बढ़ते तापमान के साथ बारिश का चक्र बिगड़ गया है और इससे कहीं ज्यादा बारिश, तो कहीं सूखा पड़ने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। उधर समुद्र में जलस्तर बढ़ने से कई तटीय इलाकों के डूबने का खतर बढ़ता जा रहा है। इससे भी खेती की काफी जमीन इनसान के हाथ से निकल सकती है। जानकारों के मुताबिक ऑस्ट्रेलिया में पड़े अकाल के पीछे जलवायु परिवर्तन की खास भूमिका है। चीन, भारत और कई दूसरे विकासशील देशों में तेजी से औद्योगिक विकास ने जलवायु परिवर्तन की वह रफ्तार तेज कर दी है, जो पहले ही पश्चिम की उपभोक्तावादी जीवनशैली की वजह से खतरनाक रूप ले रही थी। इन देशों में औद्योगिक विकास का एक और परिणाम यहां के धनी तबकों में पश्चिमी ढंग की जीवनशैली का प्रसार है। क्रयशक्ति में इजाफे और उपभोग की बढ़ती प्रवृत्ति के साथ इन देशों में अनाज की खपत भी तेजी से बढ़ी है। मसलन, अब लोग यहां मांसाहार ज्यादा करने लगे हैं। जानकारों के मुताबिक १०० कैलोरी के बराबर बीफ (गोमांस) तैयार करने के लिए ७०० कैलोरी के बराबर का अनाज खर्च करना पड़ता है। इसी तरह बकरे या मुर्गियों के पालन में जितना अनाज खर्च होता है, उतना अनाज अगर सीधे खाना हो तो वह कहीं ज्यादा लोगों को उपलब्ध हो सकता है।

ऊर्जा की बढ़ती मांग और बढ़ते उपभोग के साथ-साथ बढ़ती आबादी ने संकट में एक नया आयाम जोड़ दिया है। खासकर एशिया के देशों में आबादी के स्थिर होने का लक्ष्य अभी दूर की बात है। इस बीच एक बार फिर यह हालत पैदा हो गई है कि आबादी में इजाफे की दर अनाज की पैदावार बढ़ने की दर से आगे निकल गई है। ऐसे में अनाज की किल्लत एक स्वाभाविक परिघटना है। बहरहाल, अब उम्मीद की एक वजह यही नजर आती है कि भले ही देर से लेकिन अब सरकारें इस संकट के प्रति जागरूक होती लग रही हैं। प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का जैव ईंधन के लिए अनाज की जमीन के इस्तेमाल के खिलाफ चेतावनी देना इस बात का प्रमाण है कि आम तौर पर उद्योग जगत के हितों को तरजीह देने वाले नेता भी अब यह समझने लगे हैं कि अगर पर्याप्त अनाज उपलब्ध नहीं रहा तो औद्योगिक सभ्यता की जड़ें भी हिल जाएंगी। इसके अलावा लोकतांत्रिक समाजों के बढ़ते दायरे के साथ अब आम जन की बुनियादी समस्याओं से बिल्कुल मुंह मोड़े रखना सरकारों के लिए मुमकिन नहीं रह गया है। विश्व बैंक जैसी अंतराष्ट्रीय पूंजी की हितैषी संस्था का भी खाद्य संकट को लेकर चिंतित होना यह बताता है कि इस संकट ने आखिरकार सभी स्तरों पर हलचल पैदा की है।

लेकिन क्या हलचल वास्तव में नीतियों में किसी आमूल बदलाव की शुरुआत कर सकेगी, इस वक्त यह सबसे बड़ा सवाल है। इसलिए कि ये ऐसी समस्या नहीं है जो कुछ फ़ौरी कदमों से हल कर ली जाए। इसके लिए सोच में बड़े बदलाव की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि दुनिया चाहे विकास की जिस मंजिल पर पहुंच जाए, खेती उसकी बुनियादी आवश्यकता बनी रहेगी। बिना भोजन किए न तो अंतरिक्ष की यात्रा की जा सकती है और न इंटरनेट और सूचना तकनीक के जरिए सारी दुनिया से जुड़े रहने का आनंद लिया जा सकता है। इसलिए खेती और किसानों को सम्मान देना, किसानों की मेहनत का पूरा दाम देना और उन्हें विज्ञान एवं तकनीक के विकास से उपलब्ध हर सुख-सुविधा मुहैया कराना हर विकास नीति के केंद्र में होना चाहिए।

खासकर यह संकट भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश के लिए एक बड़ा सबक है। जिस देश में खाने के लिए एक अरब दस करोड़ मुंह हों, वहां खेती की अनदेखी सिर्फ विनाश को निमंत्रण देते हुए ही की जा सकती है। मुख्य रूप से उस समय जब विश्व बाजार से अनाज के आयात का विकल्प बेहद संकुचित होता जा रहा है। इस मौके पर १९६० के दशक में सीखा गया वो सबक सबको जरूर याद कर लेना चाहिए कि अगर देश की संप्रभुता कायम रखनी है और देश को स्वाभिमान के साथ दुनिया में खड़ा रहना है तो अनाज पैदावार में आत्मनिर्भरता उसकी बुनियादी शर्त है। तत्कालीन प्रधानमंत्री लालबहादुर शास्त्री ने 'जय किसान' का जो नारा दिया था, उसकी अहमियत आज एक बार फिर समझे जाने की जरूरत है।

इसके साथ ही देश के राजनेता अगर कई देशों के हाल के घटनाक्रम पर गौर करें और उससे जरूरी सबक लें तो वे अपने देश के साथ-साथ अपना भी कुछ भला कर सकते हैं। हैती में अनाज की महंगाई की वजह से भड़के दंगों पर पुलिस फायरिंग के बाद आखिरकार वहां के प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा है। उधर मिस्र, कैमरून, सेनेगल, बर्किना फासो के साथ-साथ अपने पड़ोसी बांग्लादेश में भी अनाज के लिए दंगों की खबरें मिली हैं। अर्जेंटीना में इस खतरे से जागी वामपंथी सरकार ने अनाज के निर्यात पर पाबंदी लगा दी तो इस संकट में अपनी उपज से ज्यादा पैसा कमाने की उम्मीद लगाए बड़े किसानों के विरोध प्रदर्शनों का उसे सामना करना पड़ा।

फिलहाल भारत में महंगाई का खूब शोर है। विपक्ष के लिए सरकार पर हमला बोलने का यह एक असरदार मुद्दा है। कॉपोरेट मीडिया के पास जन हितैषी का लाबादा ओढ़ने का इससे मौका मिला है। इसका सकारात्मक पक्ष यह है कि इससे सरकार दबाव में आई है और वह महंगाई रोकने के कुछ कदम उठाने को मजबूर हुई है। लेकिन इस सारी चर्चा में संकट की असली गंभीरता, उससे जुड़े तथ्य और उसके व्यापक आयाम गायब हैं। जरूरत इन सभी पहलुओं पर सभी संभव नजरिए से विचार करने और समाधान के कदम उठाने की है। इसमें सबकी बराबर की जिम्मेदारी है। और सबके लिए आजादी के तुरंत बाद कहा और उसके बाद सैकड़ों बार दोहराया गया जवाहर लाल नेहरू का यह कथन सर्वाधिक प्रासंगिक हो गया है कि फिलहाल बाकी सब कुछ इंतजार कर सकता है, लेकिन कृषि नहीं। उसके बारे में तुरंत सोच बदले जाने और कदम उठाने की जरूरत है।

Saturday, April 5, 2008

कितना कारगर है ये नुस्खा?


सत्येंद्र रंजन
पहले भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और फिर मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के महाअधिवेशन से वामपंथी राजनीति और रणनीति के मुद्दे बेहतर ढंग से उभर कर सामने आए हैं। जाहिर है, बड़ी और ज्यादा जवाबदेह पार्टी होने के नाते माकपा ने इन मुद्दों पर अपनी समझ को ज्यादा ठोस ढंग से व्यक्त किया। तीन साल पर होने वाले इन सम्मेलनों में दोनों पार्टियों ने अपनी सांगठनिक स्थिति, अपने सामने मौजूद चुनौतियों और अपने भावी लक्ष्यों पर भी विचार-विमर्श किया, लेकिन एक आम नागरिक की ज्यादा दिलचस्पी उन मुद्दों में है, जिनका देश की राजनीति पर आने वाले समय में असर हो सकता है। इस लिहाज से दोनों पार्टियों की मोटे तौर पर तीन कार्यनीति और रणनीतियों पर हम गौर कर सकते हैं।

माकपा ने अपनी उन्नीसवीं पार्टी कांग्रेस की समाप्ति के साथ यह साफ किया कि आज के राजनीतिक संदर्भ में उसके तीन खास मकसद हैं- नव उदारवादी आर्थिक नीतियों का विरोध, भारत को अमेरिकी सामरिक परियोजना में जूनियर पार्टनर बनने से रोकना और भारतीय जनता पार्टी को केंद्र की सत्ता में दोबारा न आने देना। पार्टी ने अपनी ज्यादातर कार्यनीति और रणनीतियां इन्हीं तीन मकसदों से बनाई औऱ उनका एलान किया है। इनमें पहले दो मकसद दीर्घकालिक हैं, और उनके लिए लंबे संघर्ष की जरूरत है। जबकि तीसरा मकसद फौरी है और पार्टी की इस कार्यनीति का इम्तिहान एक साल के अंदर ही होने वाला है।
नव-उदारवाद दुनिया भर में जारी एक परिघटना है, जिसकी वैचारिक और राजनीति जमीन पिछली आधी सदी से ज्यादा समय में बहुराष्ट्रीय पूंजी की सक्रिय कोशशों से तैयार हुई है। करीब दो दशक पहले सोवियत खेमे के दुनिया के नक्शे से गायब हो जाने से इस परिघटना के रास्ते में मौजूद सबसे बड़ी रुकावट खत्म हो गई औऱ उसके बाद से यह तेजी से आगे बढ़ी है। भारत के भीतर धनी और खासकर कॉरपोरेट हितों से जुड़े समूहों और शक्तियों ने इस आर्थिक-राजनीतिक विचार और इससे जुड़ी नीतियों के पक्ष में माहौल बनाने में पूरी ताकत झोंक रखी है। नतीजा यह हुआ है कि दक्षिणपंथ से लेकर मध्यमार्गी राजनीतिक दलों में इन नीतियों पर आज आम सहमति नजर आती है।

दरअसल, अमेरिकी साम्राज्यवाद के पक्ष में भारतीय विदेश नीति का झुकना नव-उदारवादी राजनीतिक परिघटना का ही एक परिणाम है। यह स्वाभाविक ही है कि जो राजनीतिक ताकतें देश के अंदर गरीब औऱ कमजोर तबकों को बेलगाम पूंजीवाद की मर्जी पर छोड़ने की दलील स्वीकार कर लें, वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर खुद को उस शक्ति के साथ जोड़ें, जो इस दलील को दुनिया भर में थोपने की कोशिश कर रही है। इसलिए इसमें कोई हैरत की बात नहीं है कि कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार विदेश नीति के मामले में उसी रास्ते पर चलने को उतावली नजर आई है, जिस पर भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार चली थी। यह दरअसल, देश के धनी और प्रभुत्वशाली तबकों का दुनिया के ऐसे ही समूहों के साथ अपने हित और अपनी आकांक्षाएं जोड़ने की परिघटना है, जिसे इस देश के जनतांत्रिक और प्रगतिशील समूहों को जरूर समझना चाहिए। इसीलिए नव-उदारवाद का विरोध और स्वतंत्र विदेश नीति के लिए संघर्ष इस वक्त दो बेहद अहम राजनीतिक मुद्दे हैं और असल में एक दूसरे से जुड़े हुए हैं।

माकपा एवं भाकपा ने इन दोनों परिघटनाओं को चर्चा में लाकर एक तरह से अपनी जिम्मेदारी निभाई है। इसके बावजूद यह जरूर कहा जा सकता है कि इन सवालों पर लंबे संघर्ष का कोई खाका इन दोनों पार्टियों ने पेश नहीं किया है। बल्कि इसके लिए जिस तीसरे विकल्प की कार्यनीति माकपा ने पेश की है, वह समस्याओं से भरी हुई है। तीन साल पहले खुद माकपा ने कहा था कि सिर्फ चुनावी गठबंधन या चुनाव बाद के समीकरणों के लिए तीसरा मोर्चा बनाने के हक में वह नहीं है। वह ऐसे तीसरे विकल्प के पक्ष में है, जो नीतियों और कार्यक्रमों पर सहमति और साथ-साथ संघर्ष से उभरे। ऐसे तीसरे विकल्प के संकेत आज भी भारत के राजनीतिक क्षितिज पर कहीं नजर नहीं आते। लेकिन अब माकपा और भाकपा ने समाजवादी पार्टी, तेलुगू देशम पार्टी और उनके सहयोगी क्षेत्रीय दलों के साथ अपना मेल-जोल बढ़ाना शुरू कर दिया है। इसमें दिक्कत यह है कि ये दल नीति, आकांक्षा और अपने वर्ग-चरित्र में कहीं से नव-उदारवाद या साम्राज्यवाद के खिलाफ खड़े नजर नहीं आते हैं।
१९८० के दशक में जब मध्य जातियों में आधार रखने वाले और क्षेत्रीय दलों का उभार शुरू हुआ, तब यह उम्मीद जरूर की गई थी कि ये पार्टियां सामाजिक जनतंत्र को आगे बढ़ाने का जरिया बनेंगी। एक हद तक ये भूमिका इन दलों ने तब निभाई। लेकिन जल्द ही ये दिशाहीन हो गए। ये महज अपने नेताओं की व्यक्तिगत महत्त्वाकांक्षा का माध्यम बन कर रह गए। १९९० के दशक में इनमें से ज्यादातर दल राष्ट्रीय स्तर पर भारतीय जनता पार्टी जैसी सांप्रदायिक फासीवादी पार्टी के सहयोगी बन गए। उस अनुभव से इन दलों ने कोई सबक सीखा है, ऐसा कोई संकेत नहीं है। ऐसे में इन दलों के साथ किसी तीसरे विकल्प के उभरने की उम्मीद बेबुनियाद है। ये दल फौरी राजनीतिक फायदे के लिए चंद नव उदारवादी आर्थिक नीतियों या भारत-अमेरिका असैनिक परमाणु करार जैसे विदेश नीति से जुड़े मुद्दों का विरोध कर सकते हैं, लेकिन उनका यह विरोध सैद्धांतिक या किसी राजनीतिक कार्यक्रम पर आधारित है, यह नहीं कहा जा सकता।

इसके बावजूद माकपा ने अगर इन दलों के साथ मेलजोल बढ़ाने और इनको साथ लेकर दो अहम मुद्दों पर लड़ाई को आगे बढ़ाने की बात की है, जाहिर है, इसे कोई रणनीति मानने के बजाय एक फौरी कार्यनीति ही कहा जा सकता है। यह मुमकिन है कि वामपंथी दलों की जितनी ताकत है, उसके बीच उन्हें इन अहम सवालों पर संघर्ष को आगे बढ़ाने का कोई और तरीका समझ में न आता हो। खासकर उस समय जब जन संघर्षों से जुड़ी ताकतों में आपसी होड़, ईर्ष्या भाव और एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने का भाव इतना गहरा है कि उनके बीच एकता की कोई सूरत फिलहाल नजर नहीं आती। आज देश में भले जन संघर्ष मजबूत हो रहे हों, और समान मकसद वाले संगठनों का दायरा फैल रहा हो, लेकिन उनके बीच संवाद और सहयोग की गुंजाइश बेहद कम बनी हुई है। बल्कि इन ताकतों पर एक दूसरे को नुकसान पहुंचाने की प्रवृत्ति इतनी हावी है कि व्यापक वामपंथी, जनतांत्रिक और प्रगतिशील एकता एक सपना ही बना हुआ है। इस संदर्भ में फिर से भाकपा महासचिव चुने जाने के बाद एबी बर्धन का माओवादियों से संवाद बनाने की इच्छा जताना भले प्रशंसा के काबिल हो, लेकिन ऐसा हो सकने की कोई ठोस स्थिति फिलहाल मौजूद नहीं है। खासकर हाल के नंदीग्राम मसले के अनुभव के बाद तो ऐसी उम्मीदें औऱ दूर हो गई हैं।

वैसे भी संसदीय लोकतंत्र में उन ताकतों की अहमियत कभी कम नहीं आंकी जा सकती जो विधायिका में एक मजबूत मौजूदगी बनाने की हैसियत रखते हैं। इसलिए कथित तीसरे मोर्चे के दलों के साथ नजदीकी बढ़ाने के माकपा के फैसले का भले कोई सैद्धांतिक आधार नहीं हो, लेकिन इसे बिल्कुल अनुपयोगी नहीं कहा जा सकता। दरअसल, इसकी उपयोगिता का खुलासा करते हुए माकपा महासचिव प्रकाश करात ने यह कहा कि भाजपा की रणनीति क्षेत्रीय औऱ छोटे दलों को साथ लेकर अगले चुनाव के बाद केंद्र की सत्ता में लौटने की है। करात ने कहा कि माकपा ऐसा नहीं होने देगी औऱ इसलिए उसने भाजपा के संभावित सहयोगी दलों से संवाद और सहयोग की प्रक्रिया पहले से शुरू कर दी है। बहरहाल, अगर बात इरादे और प्रयास की हो, तो माकपा की यह कोशिश जरूर फायदेमंद मानी जा सकती है। लेकिन इसमें भी मुश्किल यही है कि तीसरे मोर्चे के नाम पर जिन दलों को इकट्ठा करने की कोशिश हो रही है, वे सत्ता का लालच सामने होने पर भी एक अलग राजनीतिक समूह के रूप में बने रहेंगे, इस पर संदेह करने की पर्याप्त वजहें हैं। १९९८ से २००४ के मध्य तक अब यूएनपीए नाम से इकट्ठा होने वाले दलों ने भाजपा के साथ जिस तरह का प्रत्यक्ष या परोक्ष सहयोग किया, वह अनुभव इस संदेह का सबसे बड़ा आधार है।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ-भारतीय जनता पार्टी के सांप्रदायिक फासीवाद को आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़े खतरे के रूप में चिह्नित करना एक सही राजनीतिक समझ है। वामपंथी पार्टियों को इस बात का श्रेय दिया जाना चाहिए कि उन्होंने इस समझ को न सिर्फ सार्वजनिक रूप से व्यक्त किया है, बल्कि इसके मुताबिक भाजपा को रोकने की रणनीति पर अपनी ताकत और प्रभाव के मुताबिक अमल भी किया है। २००४ में कांग्रेस नेतृत्व वाले मोर्चे को समर्थन उनका एक अहम राजनीतिक फैसला था, जिससे देश को एक स्थिर धर्मनिरपेक्ष सरकार मिल सकी। यह सरकार अगर आम जनता के हित को सर्वोपरि मानकर चलती और मध्यमार्ग से वामपंथ तक के सहयोग को मजबूत करने की नीतियों पर अमल करती तो धर्मनिरपेक्ष जनतंत्र आज ज्यादा सुरक्षित एवं मजबूत नजर आता। लेकिन नव-उदारवादी नीतियों के वर्चस्व की वजह से यूपीए ने यह मौका काफी हद तक गंवा दिया, जिसकी कीमत उसे अपनी सरकार की अलोकप्रियता के रूप में चुकानी पड़ रही है। ऐसे में वामपंथी दलों का नई संभावनाओं की तलाश करने की मजबूरी और व्यग्रता दोनों समझती जा सकती है। इसके बावजद हकीकत यही है कि ऐसी संभावनाएं बेहद सीमित हैं औऱ देश में आज भी कांग्रेस को छोड़कर किसी धर्मनिरपेक्ष विकल्प की गुंजाइश नहीं है। बल्कि यह बात पूरे भरोसे के साथ कही जा सकती है कि अगले आम चुनाव के बाद केंद्र में या तो यूपीए जैसा प्रयोग ही दोहराया जाएगा या फिर भारतीय जनता पार्टी की अपने सहयोगी दलों के साथ सत्ता में वापसी होगी। १९९६ की तरह संयुक्त मोर्चा जैसे प्रयोग की उम्मीद आज लगभग न के बराबर है। इसलिए कि संयुक्त मोर्चा के घटक रहे ज्यादातर दल कांग्रेस या भाजपा की धुरी पर आज गोलबंद हो चुके हैं। और यह भी गौरतलब है कि १९९६ का प्रयोग भी कांग्रेस के बाहर से समर्थन से ही मुमकिन हो सका था।

ऐसे में ज्यादा व्यावहारिक नीति शायद यह लगती है कि वाम मोर्चा अपनी ताकत बरकरार रखे और अपने वैचारिक एवं रणनीति प्रभाव क्षेत्र में समाजवादी पार्टी या यूपीए में शामिल डीएमके और कुछ दूसरे दलों को लाने की कोशिश करे। अगर इन दलों की संसद में ठोस उपस्थिति रहती है, तो नव-उदारवादी नीतियों में यकीन करने वाली पार्टियों को लेकर बनी सरकार पर भी लगाम रखी जा सकती है। भारत-अमेरिका परमाणु करार को रोकने में जैसे वामपंथी दल अब तक कामयाब रहे हैं, और जैसा कि पिछले चार साल का अनुभव है, वैसे ही जन हित और देश की संप्रभुता से जुड़ी बहुत सी नीतियों पर वे अपना असर डाल सकते हैं।

भारतीय राष्ट्र अभी विकास क्रम के जिस मुकाम पर है, वहां वामपंथी नीतियों पर चलने वाली सरकार का गठन मुमकिन नहीं है। राज्य-व्यवस्था के वर्ग आधार और राजनीति को संचालित करने वाली शक्तियों के चरित्र को देखते हुए अभी सर्वाधिक वांछित विकल्प एक ऐसी मध्यमार्गी सरकार ही है, जो धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र को कायम रखने और जनतांत्रिक प्रयोगों को आगे बढ़ाने में सहायक बने। इस बीच सभी जनतांत्रिक शक्तियों के बीच संवाद और सहयोग एक ऐतिहासिक जरूरत है। लेकिन ये शक्तियां इस जरूरत से नाकिफ नजर आती हैं। उनका अपना मनोविज्ञान इसमें आड़े आता है औऱ अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए उग्र नीतियां और कार्यक्रम अपनाकर वे एक ऐतिहासिक फर्ज़ के प्रति लापरवाही बरत रही हैं।

इसी परिस्थिति और संदर्भ में देश की दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियों ने अपना आगे का एजेंडा तय किया है। इस एजेंडे में शायद नई बात कोई नहीं है। बल्कि १९९० के दशक में भारतीय जनता पार्टी के उभार और उसके देश की एक राजनीतिक धुरी बन जाने के बाद वामपंथी दलों की रणनीति और कार्यनीतियों की जो दिशा तय हुई, उसी को इन पार्टियों ने अब ज्यादा साफ किया है औऱ उस पर आगे बढ़ने का इरादा जताया है। चूंकि यूपीए सरकार के गठन से पहले सबसे बड़ी चुनौती सांप्रदायिक सरकार को सत्ता से हटाना था, इसलिए तब नव-उदारवाद और राष्ट्रीय संप्रुभता के मुद्दे वामपंथी एजेंडे में मौजूद होने के बावजूद बहुत प्रमुख नहीं थे। लेकिन यूपीए सरकार की आर्थिक और विदेश नीतियों की दिशा को देखने और उसके परिणामों का अनुभव करने के बाद अब जाहिर है, सांप्रदायिकता के विरोध के साथ-साथ ये मुद्दे भी प्रमुख होकर उभरे हैं।

Wednesday, March 19, 2008

वाम एकता के अहम सवाल


सत्येंद्र रंजन
भारत की दोनों बड़ी कम्युनिस्ट पार्टियां जब मार्च के अंतिम दस दिनों में अपनी राष्ट्रीय कांग्रेस का आयोजन कर रही हैं, तो उनके सामने एक बड़ा सवाल वामपंथी ताकतों की एकता को कायम रखने तथा इसे और व्यापक बनाने का है। देश में धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र कायम रहे और राज्य-व्यवस्था में आम जन के हितों के लिए एक न्यूनतम जगह बनी रहे, इसके लिए यह एकता आज बेहद महत्त्वपूर्ण है। चार साल पहले वामपंथी दलों को इस संदर्भ में जो जनादेश मिला, कहा जा सकता है कि उन्होंने इसे जिम्मेदारी के साथ निभाया है। कम से कम मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के लिए तो यह बात जरूर ही कही जा सकती है। कम्युनिस्ट शब्दावली में जिसे ‘संघर्ष और सहयोग साथ-साथ’ की नीति कहा जाता है, उस पर वाम मोर्चा परिस्थितियों के मुताबिक कमोबेश ठीक ढंग से चला है।

हालांकि वाम मोर्चे के अन्य घटक दलों- भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, आरएसपी और फॉरवर्ड ब्लॉक ने कई बार अपनी तीखी जुबान से ठोस हालात के प्रति गैर-जिम्मेदार रवैये का परिचय दिया है, मगर वो कुल मिलाकर धर्मनिरपेक्ष एकता को भंग करने की हद तक नहीं गए हैं औऱ इसकी तारीफ की जानी चाहिए। जहां तक तीखी जुबान का सवाल है, उसका संबंध राजनीति या विचारधारा से कहीं ज्यादा मनोविज्ञान से है, जिसे राजनीतिक समूहों का विश्लेषण करते समय ध्यान में रखा जाना चाहिए। अक्सर देखा जाता है कि जो राजनीतिक गुट या दल जितना छोटा होता है, उसकी नीतियों में उतनी ही ज्यादा उग्रता होती है। इसकी एक वजह संभवतः अपनी अलग पहचान दिखाने की मजबूरी होती है और दूसरी यह कि चूंकि वह गुट या दल किसी बड़े समूह, हित या आकांक्षा की नुमाइंदगी नहीं करता, इसलिए उसकी जवाबदेही भी कम ही होती है।

जब बात वामपंथी, जनतांत्रिक या प्रगतिशील ताकतों की एकता की हो, तब यह मनोविज्ञान खासा अहम हो जाता है। इसलिए कि एकता के इस दायरे में जिन ताकतों को आना चाहिए या कम से कम जिनके बीच एक दोस्ताना संवाद बनना चाहिए, उनमें खुद को एक दूसरे से अलग दिखाने की होड़ बहुत तीखी होती है और इस क्रम में उनकी नीतियों या कहें शब्दजाल की उग्रता बढ़ती जाती है। इसीलिए आज देश में भले जन संघर्ष मजबूत हो रहे हों, और समान मकसद वाले संगठनों का दायरा फैल रहा हो, लेकिन उनके बीच संवाद और सहयोग का पुल बनने की गुंजाइश बेहद कम नजर आती है। बल्कि उनके बीच ऐसे मुद्दों पर अपनी ताकत झोंक देने या कहें बर्बाद कर देने की प्रवृत्ति खूब दिखाई देती है, जिनका कोई प्रगतिशील तार्किक परिणाम नहीं हो सकता और जिनसे कुल मिलाकर जनता के हितों को नुकसान ही पहुंचता है।

हाल में एक ऐसा ही मुद्दा नंदीग्राम रहा। औद्योगिकरण के मुद्दे पर पश्चिम बंगाल की वाम मोर्चा सरकार का रुख सही है या गलत, यह एक बहस का मुद्दा है। नंदीग्राम का सवाल इसी मुद्दे से खड़ा हुआ। लेकिन शुरुआती विरोध के साथ ही पश्चिम बंगाल सरकार ने एलान कर दिया कि प्रस्तावित औद्योगिक इकाई उस जगह पर नहीं लगेगी। सवाल है कि उसके बाद दस महीनों तक वहां आंदोलन किसलिए चलता रहा और उस आंदोलन में सक्रिय ताकतें कौन थीं? लेकिन बहुत सी जनतांत्रिक शक्तियों ने यह सवाल नहीं उठाया। इसके विपरीत उन्हें माकपा पर बरसाने के लिए नंदीग्राम का नाम का एक डंडा मिल गया और उस पर अपने रुख की व्याख्या के लिए दलीलें गढ़ ली गईं।

माकपा और भाकपा के सामने चुनौती इस संदर्भ को ध्यान में रखते हुए वाम एकता के सवाल पर विचार करने की है। लेकिन यह चुनौती सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। असली चुनौती तो उस मकसद की समझ बनाना और उसे जनता के सामने पेश करना है, जिसके लिए यह एकता आज सबसे ज्यादा जरूरी हो गई है। निसंदेह सबसे बड़ा सवाल धर्मनिरपेक्षता का है, और वामपंथी दलों के सामने ऐसी रणनीति बनाने की चुनौती है, जिससे अगले लोकसभा चुनाव के बाद भी सांप्रदायिक ताकतों को सत्ता में आने से रोका जा सके। दूसरा बड़ा मकसद विदेश नीति में देश की संप्रभुता और स्वतंत्रता कायम रखने की है, जिसका सौदा करने के लिए देश का प्रभु वर्ग आज सहज तैयार नजर आता है। इस विदेश नीति का सीधा संबंध देश के भीतर आर्थिक और शासन संबंधी दूसरी नीतियों से है। स्वतंत्र विदेश नीति की समर्थक ताकतें वे हैं जो देश के भीतर वंचित और उपेक्षित तबकों के हितों की वकालत करती हैं। जबकि सुविधाप्राप्त समूहों का सीधा हित साम्राज्यवादपरस्ती से जुड़ गया है। यानी अगर कुल मिलाकर कहें तो असली मुद्दा जनतांत्रिक संघर्ष को नए आयाम देने का है।

माकपा ने कांग्रेस और भाजपा की पूंजीवादी समूहों की हितैषी पार्टी के रूप में जो पहचान की है, वह सिद्धांततः सही है। इस लिहाज से जनतांत्रिक संघर्ष को आगे बढ़ाने के लिए तीसरे मोर्चे के गठन का उसका फॉर्मूला भी सही है। लेकिन दिक्कत इसे व्यावहारिक रूप देने में है। इसके लिए माकपा ने जिन साथियों की तलाश की है, उनमें कोई अपने वर्ग चरित्र, राजनीतिक चाल-ढाल, या उद्देश्यों में भी कांग्रेस से अलग है, यह कहना मुश्किल है। चाहे समाजवादी पार्टी हो या तेलुगू देशम पार्टी या यूएनपीए के दूसरे घटक दल, अवसरवाद, परिवारवाद और भ्रष्टाचार की कसौटियों पर कहीं ज्यादा दागदार नजर आते हैं। इन दलों को लेकर कैसा तीसरा मोर्चा बन सकता है, यह आसानी से समझा जा सकता है। जाहिर है, माकपा पिछले तीन साल तक कार्यक्रम और संघर्ष आधारित जिस तीसरे मोर्चे की बात करती रही, उसे अचानक छोड़ कर यूएनपीए से दोस्ती कर लेने के उसके दांव पर गंभीर सवाल खड़े किए जा सकते हैं। साफ है, यह प्रयास किसी दीर्घकालिक रणनीति का हिस्सा नहीं हो सकता।

प्रश्न यह है कि क्या यह सिर्फ एक फौरी कार्यनीतिक दांव है, जिसका मकसद इन दलों से अभी से संवाद कायम करना है, ताकि लोकसभा चुनाव के बाद उन्हें भाजपा के करीब जाने से रोकने की कोशिश करने की गुंजाइश बनी रहे? संभवतः इस लिहाज से यह एक उपयोगी कार्यनीति हो सकती है, लेकिन १९९८ और १९९९ में यूएनपीए में शामिल दलों ने धर्मनिरपेक्षता जैसे मूलभूत सिद्धांत के प्रति जैसी बेरुखी दिखाई, उसके मद्देनजर इस कार्यनीति के कामयाब होने की कम ही उम्मीद है। इस कार्यनीति का एक दूसरा मकसद मौजूद राजनीतिक ताकतों के साथ मिलकर एक ऐसा दबाव समूह बनाना हो सकता है, जिससे केंद्र की यूपीए सरकार को विदेश नीति और दूसरे मुद्दों पर साझा न्यूनतम कार्यक्रम से भटकने से रोका जा सके। फौरी तौर पर इस प्रयास के कुछ नतीजे भी दिखे हैं। लेकिन लंबी अवधि की राजनीति की कोई दिशा या राह इससे निकल सकेगी, फिलहाल इसकी उम्मीद करने का कोई ठोस आधार नहीं है।

यह बात वामपंथी नेता भी समझते होंगे और दरअसल, राजनीति की साधारण समझ रखने वाले सभी लोग इसे महसूस करते हैं कि अभी के हालात में कांग्रेस को दरकिनार कर कोई भाजपा विरोधी गठबंधन कारगर नहीं हो सकता। लेकिन कांग्रेस के अपने रुझानों और वर्ग चरित्र को देखते हुए यह भी साफ है कि उसके साथ व्यापक जन हितों का प्रतिनिधित्व करने वाला कोई गठबंधन बनने की संभावना नहीं है। और न ही दीर्घकालिक कार्यक्रम पर आधारित किसी तीसरे मोर्चे के उभरने की गुंजाइश है। ऐसे में वाम और जनतांत्रिक एकता एक पेचीदा और उलझा हुआ सवाल है।

हकीकत यह है कि इस एकता के दायरे में जो भी दल आते हैं, उनमें किसी को छोड़ कर चलने या किसी के साथ दूर और दीर्घकाल तक चलने की रणनीति वामपंथी दल नहीं बना सकते। दरअसल, एकता का आधार कोई बड़ा उद्देश्य, नीतियां और कार्यक्रम नहीं, बल्कि चुनावी समीकरण हैं और इसमें जहां जो गणित माफिक पड़ेगा, वहां उसके मुताबिक कार्यनीति अपनाने को वामपंथी दल भी मजबूर हैं। इन समीकरणों की जो सूरत चार साल पहले उभरी थी, उसमें बदलाव की आज भी ज्यादा गुंजाइश नहीं है। ऐसे में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी और मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी की राष्ट्रीय कांग्रेस से कोई नई राजनीतिक दिशा निकलने की उम्मीद नहीं जोड़ी जानी चाहिए। उनसे ऐसी समालोचना की उम्मीद जरूर है जिससे देश के जागरूक लोग मौजूदा हालात की गंभीरता और इन हालात में अपने फर्ज को बेहतर ढंग से समझ सकें।

Saturday, March 15, 2008

ऐतिहासिक, लेकिन जोखिम भरी प्रक्रिया


सत्येंद्र रंजन
अमेरिका में राष्ट्रपति पद के लिए डेमोक्रेटिक पार्टी में उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया लोकतंत्र की एक जीवंत शक्ल पेश कर रही है। मुकाबला इतना सघन है कि अब फैसला अगस्त में होने वाले पार्टी के राष्ट्रीय सम्मेलन तक खिंच सकता है। इस साल जब पलड़ा डेमोक्रेटिक पार्टी के हक मे झुका माना जा रहा है, कई जानकारों की राय में अंदरूनी लोकतंत्र की यह लंबी प्रक्रिया पार्टी के लिए भारी भी पड़ सकती है। यह वो दौर है जब डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवारी हासिल करने की होड़ में जुटे दोनों नेता- बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन का निशाना एक दूसरे पर सधा हुआ है, जबकि रिपब्लिकन पार्टी जॉन मैकेन को अपना उम्मीदवार चुन चुकी है और अब वह असली मुकाबले के लिए संसाधन जुटाने और रणनीति तैयार करने में लगी हुई है। बराक ओबामा और हिलेरी क्लिंटन एक दूसरे की राजनीति छवि को विश्लेषित करने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं औऱ इस क्रम में वे कई ऐसे पहलू उजागर कर रहे हैं, जो बाद में रिपब्लिकन पार्टी के काम आ सकते हैं।
इस अंदेशे के बावजूद डेमोक्रेटिक उम्मीदवार चुनने की यह प्रक्रिया इसलिए ऐतिहासिक है कि इसके साथ अमेरिकी सियासत में पुरुष और गोरे वर्चस्व की एक बड़ी दीवार ढह गई है। शुरुआती कॉकस और प्राइमरी मुकाबलों के बाद जब जॉन एडवर्ड्स ने अपना नाम उम्मीदवारी से वापस लिया, उसके बाद अमेरिकी इतिहास में यह पहला मौका आया, जब देश की एक प्रमुख पार्टी की उम्मीदवारी की होड़ में कोई गोरा पुरुष नहीं बचा। इस घटना का सिर्फ प्रतीकात्मक महत्त्व ही नहीं है। यह उस लोकतांत्रिक परिघटना का चरमोत्कर्ष है, जो १८६० में गुलामी प्रथा खत्म होने और १९६० के दशक में ब्लैक समुदाय के लोगों को मताधिकार देने के साथ आगे बढ़ी। गौरतलब है कि १८६० और १९६० के दशक- दोनों ही मौकों पर अमेरिका को हत्यारे के हाथ अपना एक राष्ट्रपति गंवाना पड़ा। आज उसी ब्लैक समुदाय का एक नेता खुद राष्ट्रपति बनने की दहलीज पर खड़ा है। अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम, अमेरिकी स्वतंत्रता का घोषणापत्र, (नागरिकों के) अधिकार घोषणापत्र (बिल ऑफ राइट्स) औऱ अमेरिकी संविधान का अस्तित्व में आना मानव सभ्यता के विकास के अहम मुकाम हैं। सारी दुनिया ने इनसे प्रेरणा ली। मगर यह विडंबना है कि जिन बुनियादी अधिकारों की बात उन घोषणापत्रों में की गई, जिन सिद्धांतों की स्थापना के लिए ब्रिटिश राज के खिलाफ वहां अठारहवीं सदी में विद्रोह हुआ और संविधान में जिन मूल्यों को मूर्त रूप दिया गया, उन्हें वास्तव में लागू करना दूर का मकसद बना रहा। तब भले सभी मनुष्यों को जन्मजात समान घोषित किया गया, लेकिन ब्लैक समुदाय की गुलामी खत्म करने के लिए देश को गृह युद्ध से गुजरना पड़ा और महिलाओं और ब्लैक समुदाय के लोगों को मताधिकार पाने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ा। यह संघर्ष बीसवीं सदी में आकर ही सफल हो सका। मगर बीसवीं सदी में भी यह बात संभवतः कल्पना से दूर रही कि कोई महिला या ब्लैक देश के सर्वोच्च पद पर पहुंच सकेगा।
डेमोक्रेटिक पार्टी ने कभी कल्पनातीत लगने वाले इस मकसद को हकीकत बनाने का जोखिम इस बार पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के साथ उठाया है। ज्यादातर राज्यों में पार्टी इस प्रक्रिया से गुजर चुकी है, लेकिन यह तय नहीं है कि आखिरकार इस बार राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कौन होगा? फिलहाल, वोट प्रतिशत और प्रतिनिधियों की संख्या दोनों ही मामलों में बराक ओबामा बढ़त बनाए हुए हैं, लेकिन पिछड़ जाने के बाद दो बार हिलेरी क्लिंटन ने जैसी वापसी की है, उसे देखते हुए उन्हें खारिज करने का जोखिम उठाने को कोई तैयार नहीं है। उम्मीदवार चुनने की प्रक्रिया का अगला मुकाम पेनसिलवेनिया राज्य है, जहां २२ अप्रैल को मतदान होगा। तमाम सर्वेक्षणों के मुताबिक हिलेरी क्लिंटन को वहां भारी बढ़त मिली हुई है। दूसरा बड़ा मुकाम नॉर्थ कैरोलीना है, जो ओबामा का अपना राज्य है और जाहिर है, वहां बढ़त उन्हें हासिल है।
मुकाबला अगर इतना ही कांटे का रहा तो यह मुमकिन है कि दोनों में से कोई उम्मीदवार प्राइमरी और कॉकस के जरिए २०२५ प्रतिनिधि हासिल न कर सके, जो उम्मीदवारी हासिल करने के लिए जरूरी है। उस हालत में सुपर डेलीगेट कहे जाने वाले प्रतिनिधियों की भूमिका निर्णायक हो जाएगी। पार्टी के निर्वाचित प्रतिनिधि, गवर्नर, पार्टी पदाधिकारियों और पूर्व राष्ट्रपतियों को सुपर डेलीगेट का दर्जा मिला होता है। यह मतदान पार्टी के राष्ट्रीय अधिवेशन में होता है और तब तक शायद लोगों का ध्यान डेमोक्रेटिक पार्टी के अंदर चल रही दिलचस्प होड़ पर ही टिका रह सकता है। यह होड़ इसलिए दिलचस्प है क्योंकि इसमें लोगों की भागीदारी सामान्य से ज्यादा है, दोनों उम्मीदवार व्यक्तिगत खूबियों और खामियों के साथ-साथ ठोस मुद्दों पर भी चर्चा कर रहे हैं और दोनों ने जॉर्ज बुश-डिक चेनी के लगभग निरंकुश और आधुनिक कुलीनतंत्र जैसे शासन से मुक्ति दिलाने की उम्मीद लोगों में जगाई है।
यह एक हकीकत है कि उम्मीदवार चुनने के इस दौर में सबसे ज्यादा जोश बराक ओबामा ने भरा है। उनके ओजस्वी भाषणों ने खासकर नौजवान पीढ़ी और निर्दलीय समूहों में जबरदस्त उत्साह पैदा किया है। उनके नारे- चेंज, येस वी कैन यानी हां, हम परिवर्तन ला सकते हैं- का जादू जैसा असर देखने को मिला है। ओबमा जब परिवर्तन की बात करते हैं तो उनके निशाने पर सिर्फ बुश-चेनी नहीं होते। वो जब कथित वाशिंगटन ऐस्टैबलिशमेंट से मुक्ति की बात करते हैं, परोक्ष रूप से उनके निशाने पर हिलेरी क्लिंटन भी होती हैं। क्लिंटन परिवार आठ साल ह्वाइट हाउस में रह चुका है और अमेरिकी राजनीति में मान्यता है कि इस परिवार के पास एक मजबूत राजनीतिक मशीन है, जिससे वह बहस और राजनीतिक होड़ दोनों को अपनी ओर मोड़ सकता है। लेकिन अब तक के अनुभव से साफ है कि यह मशीन ज्यादा कारगर नहीं रही है, बल्कि इससे कथित रूप से जुड़े होने का हिलेरी क्लिंटन को नुकसान ज्यादा उठाना पड़ा है।
हिलेरी एक ऐसी शख्स मानी जाती हैं जो देश में मत-विभाजन पैदा करती हैं। उनके कट्टर समर्थक हैं और उतने ही कट्टर विरोधी भी। गर्भपात, नारी और समलैंगिकों के अधिकार तथा अन्य प्रगतिशील मुद्दों पर उनकी साफ सोच है, जिससे समर्थन और विरोध की बुनियाद पड़ती है। जब बिल क्लिंटन राष्ट्रपति थे और हिलेरी बतौर प्रथम महिला ह्वाइट हाउस में थीं, तब भी वे सिर्फ पति के साथ खड़ी रहने वाली महिला नहीं रहीं। बल्कि उन्होंने अपनी खास भूमिका बनाई। हेल्थ केयर यानी स्वास्थ्य देखभाल की जो नीति १९९३-९४ में उन्होंने लागू करने की नाकाम कोशिश की, वह डेमोक्रेटिक पार्टी के एजेंडे पर आज भी खास है। बल्कि जब से यह चुनाव अभियान शुरू हुआ है, इराक के बाद अगर कोई सबसे बड़ा मुद्दा इसमें है, तो वह स्वास्थ्य देखभाल ही है। हालांकि इस नीति को ठोस स्वरूप देने में सबसे बड़ी भूमिका जॉन एडवर्ड्स की रही, जिन्होंने इस नीति का व्यावहारिक खाका पेश किया। इसके साथ ही एडवर्ड्स ने कॉरपोरेट तबके से देश को वापस हासिल करने का नारा दिया, जिससे मजदूर एवं वंचित समूहों में पार्टी के समर्थन आधार को फिर से जीवित करने में मदद मिली।
एडवर्ड्स के चुनाव मैदान से हटने के बाद इन नीतियों की वारिस हिलेरी क्लिंटन बनी हुई हैं। अब तक की चुनाव प्रक्रिया से यह साफ है कि उन्हें बराक ओबामा के मुकाबले मजदूर और गरीब तबकों का ज्यादा समर्थन मिल रहा है। साथ लैटिनो यानी लैटिन अमेरिका से आकर बसे तबकों का भी ज्यादा समर्थन उन्हें हासिल हुआ है। इसके विपरीत बराक ओबामा को उच्च मध्य वर्ग के गोरे समुदायों, ब्लैक समुदाय, नौजवानों और उन लोगों का समर्थन ज्यादा मिला है, जो राजनीति से उदासीन रहे हैं। नीतियों और सियासी शख्सियत की उभरती इस पहचान के कारण ही ओबामा आज पूंजीपतियों के ज्यादा प्रिय नजर आते हैं और चंदा उगाहने में उन्होंने हिलेरी क्लिंटन को पीछे छोड़ दिया है।
ओबामा को इस बात का श्रेय है कि उन्होंने शुरू से इराक पर अमेरिकी हमले का विरोध किया। इसलिए आज जब वे सत्ता में आने पर इराक से फौज वापस बुलाने का वादा करते हैं, तो वह ज्यादा विश्वसनीय लगता है। दूसरी तरफ हिलेरी क्लिंटन ने बतौर सीनेटर इराक पर हमले का अधिकार देने के विधेयक के पक्ष में वोट डाला था, इसलिए बुश की इराक की नीति का जब वो विरोध करती हैं, तो वो खुद ही कई सवालों से घिर जाती हैं। इसके बावजूद शायद यह निष्कर्ष निकालना सही नहीं है कि हिलेरी क्लिंटन बुश-चेनी के न्यू कंजरवेटिव एजेंडे के ज्यादा करीब हैं और ओबामा बुश की एकतरफा कार्रवाई की नीति के सिद्धांततः विरोधी हैं। हकीकत यह है कि ईरान के मामले पर ओबामा आक्रामक बातें करते रहे हैं और आतंकवादियों के खिलाफ युद्ध में पाकिस्तान पर हमला कर देने जैसी बचकानी बातें भी कह चुके हैं। दरअसल, विदेश नीति एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें सत्ता बदल जाने से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। फर्क सिर्फ प्राथमिकता का पड़ता है, दिशा का नहीं। अगर इस पहलू को ध्यान में रखा जाए तो हिलेरी आज जो बातें कहती हैं, वह ज्यादा सूझबूझ भरी और व्यावहारिक लगती हैं।
ओबामा ने हिलेरी क्लिंटन की विभाजक छवि का फायदा उठाने के लिए देश को एकजुट करने का नारा दिया है। इससे उन्होंने अपनी उस छवि को अपनी राजनीतिक पूंजी बनाने की कोशिश भी की है, जिसमें माना जाता है कि वे जो भी कहते हैं, वह दिल की आवाज होती है, उसमें बनावटी कुछ नहीं होता। जबकि हिलेरी क्लिंटन की छवि कुछ इस रूप में पेश की गई है कि वे जो भी कहती हैं, उसके पीछे एक गणित, एक राजनीतिक चाल होती है। ओबामा की इस पूंजी का सिक्का फिलहाल चलता नजर आ रहा है। इसके जरिए उन्होंने हिलेरी क्लिंटन के अनुभव बनाम भोलेपन के मुद्दे को एक तरह से बेअसर कर रखा है। क्लिंटन का अपने भाषणों में यह कहना कि सिर्फ ओजस्वी और लच्छेदार भाषण देश को नई दिशा देने के लिए काफी नहीं है, अब तक ज्यादा असरदार साबित नहीं हुआ है।
जबकि हकीकत यही है कि चाहे सवाल विदेश नीति का हो या स्वास्थ्य देखभाल जैसे बेहद जरूरी घरेलू मुद्दे का, ओबामा ओजस्वी भाषण के अलावा कोई ठोस कार्यक्रम पेश करने में नाकाम रहे हैं। इस लिहाज से शायद यह निष्कर्ष भी निकाला जा सकता है कि राजनीति चाहे कहीं की हो, ठोस कार्यक्रम चुनाव के लिए ज्यादा जरूरी नहीं होते। बल्कि भावनात्मक बातें ज्यादा फायदेमंद साबित होती हैं। वरना, यह कहा जा सकता है कि कार्यक्रम के आधार पर जॉन एडवर्डर्स से बेहतर उम्मीदवार डेमोक्रेटिक पार्टी के पास नहीं था, लेकिन समर्थन न मिलने की वजह से उन्हें शुरुआत में ही हटना पड़ा और अब अपेक्षाकृत ज्यादा ठोस कार्यक्रम पेश कर रहीं हिलेरी क्लिंटन का भी यही हश्र हो सकता है। दूसरी तरफ रिपब्लिकन पार्टी ने वियतनाम युद्ध में हिस्सा ले चुके फौजी जॉन मैकेन को अपना उम्मीदवार चुन लिया है। मैकेन रिपब्लिकन उम्मीदवारों की परंपरा में सटीक बैठते हैं, जिनके पास कोई विचार और कार्यक्रम नहीं होता। वो कॉरपोरेट जगत, जमींदारों, चर्च औऱ कंजरवेटिव समूहों का एक ऐसा मुखौटा होते हैं, जिन्हें बतौर नायक पेश किया जा सके और जो लोगों को अपने कथित प्रभावशाली व्यक्तित्व से लुभा सकें। कोई आस्था और विचार न होने की सच्चाई पर मैकेन अपनी कथित फक्कड़ छवि का परदा डालने की कोशिश करते रहे हैं। असल में उनका व्यक्तित्व अंतर्विरोधों से भरा है। वे करों में कटौती के बुश की पहल के खिलाफ थे, लेकिन अब उसे अनिश्चित काल तक जारी रखने की बात करते हैं। वे मरीजों के स्वास्थ्य की सरकारी तौर पर देखभाल चाहते हैं, लेकिन इसे लोगों का अधिकार नहीं मानते। वो इराक पर हमले के पक्ष में थे, लेकिन हमले के तरीकों पर एतराज जताया और अब सौ साल तक अमेरिकी फौज को अमेरिका में रखने की वकालत कर रहे हैं। ये ऐसे पहलू हैं जिनके आधार पर उनकी सियासी शख्सियत के चिथेड़े बिखेरे जा सकते हैं। लेकिन ऐसा करना इसलिए आसान नहीं है, क्योंकि रिपब्लिकन पार्टी की पीठ पर धनी तबकों और कॉरपोरेट मीडिया का हाथ है।
फिलहाल, मैकेन के साथ सुविधा यह भी है कि डेमोक्रेटिक पार्टी अपने अंतर्द्वंद्व से नहीं उभर सकी है। अभी हिलेरी क्लिंटन और बराक ओबामा का सारा जोर एक दूसरे से आगे निकलने पर है। जब तक यह होड़ खत्म नहीं होती, उनकी असली जंग शुरू नहीं होगी। यह मैकेन और रिपब्लिकन पार्टी के लिए बड़े राहत की बात है।

Friday, March 14, 2008

गंभीर मुद्दे पर सतही चर्चा


सत्येंद्र रंजन
अगर मुंबई में भारत के सबसे धनी लोग नहीं रहते और यह महानगर टेलीविजन न्यूज चैनलों के लिए टीआरपी का सबसे बड़ा केंद्र नहीं होता, तो शायद राज ठाकरे और फिर बाल ठाकरे की उत्तर भारतीय समुदायों के खिलाफ आक्रामक टिप्पणियों का मामला उतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता, जितना वह बना हुआ नजर आता है। चूंकि मुंबई और महाराष्ट्र से जुड़ी हर बात आज बड़ी खबर बन जाती है, क्योंकि वहां सबसे ज्यादा क्रय शक्ति वाले दर्शक/ पाठक हैं, इसलिए ठाकरे चाचा-भतीजे की टिप्पणियां देश की एकता के लिए बड़े खतरे के रूप में पेश की गईं हैं। लेकिन हकीकत यह है कि विभिन्न समुदायों के बीच ऐसे पूर्वाग्रह न सिर्फ देश में अलग-अलग रूपों में मौजूद हैं, बल्कि उनके हिंसक परिणाम भी हमें देखने को लगातार मिलते रहे हैं। जिन बिहारी या उत्तर भारतीय समुदायों पर अब ठाकरे चाचा-भतीजे ने निशाना साधा है, वे काफी समय से असम में उल्फा की हिंसा का शिकार हैं, जिनमें बहुत से लोग अपनी जान गवां चुके हैं और बहुत से लोग पलायन को मजबूर हुए हैं। लेकिन ऐसे इलाकों की ऐसी घटनाएं फौरी खबर बनकर रह जाती हैं, इसलिए कि वे इलाके टीआरपी ज़ोन में नहीं आते।
विभिन्न समुदायों के बीच एक दूसरे के लिए या किसी खास समुदाय को लेकर बड़े पैमाने पर पूर्वाग्रह का फैला रहना कोई नई बात नहीं है, और न ही उन पूर्वाग्रहों को भड़का कर राजनीतिक रोटियां सेकने की प्रवृत्ति नई है। दरअसल, आधुनिक लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के सामने जो सबसे बड़ी चुनौतियां हैं, उनमें ऐसे पूर्वाग्रहों का हल भी एक अहम मुद्दा है। लेकिन यह हल तभी निकल सकता है, जब चिंता वास्तविक हो, और उदात्त मूल्यों और बड़े लक्ष्य की रोशनी में उन पर चर्चा हो।
भारतीय संविधान ने न सिर्फ देश के सामने ऐसे मूल्य और लक्ष्य रखे हैं, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारने के लिए संवैधानिक प्रावधान भी किए हैं। इसके बावजूद पिछले साठ साल में ठाकरे ब्रांड की राजनीति जारी रही है। अगर आरएसएस ब्रांड की राजनीति को इससे जोड़ कर देखा जाए तो यह राजनीति आज आधुनिक भारतीय राष्ट्र के लिए सबसे बड़ी चुनौती पेश कर रही है। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि बहुत सी ऐसी राजनीतिक ताकतें जो इस ब्रांड की राजनीति का अतीत में हिस्सा नहीं रहीं, उन्होंने भी अब प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इसे गले लगा लिया है। उदाहरण के तौर पर हम बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को ले सकते हैं। समाजवादी पृष्ठभूमि से आने का वो दावा करते हैं और आज बिहार के हितों की नुमाइंदगी करने का भी। लेकिन क्या वे इसका कोई तार्किक जवाब दे सकते हैं कि हर बिहारी को सौ बीमारी बताने वाले बाल ठाकरे की पार्टी के साथ वे राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में क्यों बने हुए हैं?
ठाकरे का उदय कांग्रेस की मौकापरस्त राजनीति से हुआ। हम सभी जानते हैं कि तब मकसद वामपंथी ट्रेड यूनियनों को कमजोर करना था और इसके लिए ठाकरे को आगे बढ़ाया गया। तब ठाकरे के निशाने पर दक्षिण भारतीय (मद्रासी) लोग थे। बाद में ठाकरे ने मराठी मानुष के अपने मुद्दे को हिंदू मानुष से जोड़ा और मुसलमानों को निशाना बनाया। अब राज ठाकरे ने उत्तर भारतीयों का सवाल उठाया है तो चाचा जान भी अपनी लाठी लेकर मैदान में कूद पड़े हैं। लेकिन बिहार या पूर्वांचल के लोग अपनी जमीन से क्यों पलायन करते हैं, या एक अखिल भारतीय बाजार में कैसे विभिन्न राज्यों के लोग एक से दूसरे राज्यों में जाकर काम कर रहे हैं, ऐसे आर्थिक और सामाजिक सवालों पर चर्चा के लिए इस प्रकरण में कोई गुंजाइश नहीं है। चर्चा सीधे ठाकरे द्वारा तय किए गए एजेंडे पर है। शायद इसलिए कि जो मीडिया या शासक समूहों के लोग इस चर्चा के सूत्रधार हैं, उनका हित भी इसी में है कि बात असली मुद्दों से भटकी रहे। बहरहाल, जिम्मेदार सामाजिक और राजनीतिक समूहों जरूर इस मुद्दे को व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखने की कोशिश करनी चाहिए।